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हरिहर प्रसाद माथुर ने द्घड़ी को दो बार देखा, पिफर वहाँ पफैले लम्बे क्यू को। वह लपककर क्यू में शामिल हो गये। क्यू को नियन्त्रिात करने के लिए लोहे के पाइप से जो संकरे बाड़े बनाए गये थे, उनमें वह तीसरे में जगह पा सके थे। दो भर चुके थे। नहीं, बल्कि ढाई। उन्होंने अंदाजा लगाया कि कितने लोग उनके आगे होंगे। एक लाइन में अगर सत्तर-पचहत्तर हैं, तो दो में हुए डेढ सौ। तीसरी में भी उनके आगे बीस-पच्चीस तो हैं ही। यों वह पौने-दो सौ लोगों के पीछे हैं। हो सकता है कि यह संख्या दो सौ की हो। |
हरिहर प्रसाद के भाई जो अपना कुछ निजी काम होने से दिल्ली साथ आए थे और आठ-दस बार वहाँ किसी-न-किसी बहाने से पहले आ चुकने के कारण दिल्ली का क ख ग जानते थे, उन्होंने पास आकर बताया कि नान-इमीग्रेशन वीजा के प्रार्थना-पत्रा लेने का वक्त साढ़े आठ से साढ़े दस का है। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने सामने की दीवार पर जड़ी सूचना-पट्टिका पर लिखा हुआ दिखाया। उनको किसी ने आठ से दस तक का कार्य समय बताया था।
वे होटल से साढ़े पाँच बजे निकले थे। वीजा पाने के लिए भीड़ होती है, ऐसा तो उन्होंने सुन रखा था, लेकिन भीड़ इस कदर होगी, इसका इल्म उन्हें नहीं था। होता तो वे और जल्द निकल लेते। उन्होंने चार-पाँच टैम्पोवालों से ही बस पूछताछ की थी और पिफर एक पर बैठ गये थे, यह समझते हुए कि इसने भी वाजिब से ज्यादा पैसे मांगे हैं। टैम्पोवाला टैम्पो तेज रफ्रतार से ही लाया था। बल्कि उन्होंने ही उसे टोका था-''भाई मजे-मजे चलो। ऐसा न हो कि अमेरिका जाने का वीजा दिलाने की बजाय आप मुझे ऊपर का वीजा दिलाने का इंतजाम कर दें।'' उन्होंने टैम्पोवाले को अमेरिका जाने की बात पहले भी बतायी थी। चूंकि उसने उम्मीद के बरखिलापफ उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की थी, उन्होंने मान लिया था कि उसने सुना नहीं है। इस बार टैम्पोवाला बिला रफ्रतार धीमी किए हुए एक हाथ उठाकर बोला था,
''पिफकर न करो। अपन के भी बाल-बच्चे हैं।'' भाई ने उनको समझाया था कि गाड़ी तेज चलाने पर डीजल की बचत होती है। सड़क पर इस वक्त ट्रैपिफक भी बहुत कम है। टैम्पोवाले ने गलती यह की थी कि वह उनको इंग्लैण्ड की एम्बेसी पर ले गया था, पिफर वहाँ से चलते हुए एक गलत मोड़ ले लिया था, जिसे सही करते हुए बुदबुदाया था-''सुबह-सुबह जो एक लपफड़ा हो गया, उसने सर ठिकाने नहीं रखा है।'' मगर इन सबसे ज्यादा-से-ज्यादा दस-पन्द्रह मिनट का पफर्क पड़ा होगा। वे अमेरिकन एम्बेसी पर ठीक साढ़े छह बजे पहुँच गये थे।
कारें, टैक्सी बराबर आकर रुक रही थीं। बीच-बीच में स्कूटर और टैम्पो भी, हालाँकि उनकी उपस्थिति अल्पसंख्यकों वाले किस्म की थी। लोग उतरकर क्यू में शामिल होते जा रहे थे-आदमी, औरतें, बच्चे सभी।
हरिहर प्रसाद ने अपने पीछे खड़े व्यक्ति से पूछा, ''क्या सब लोगों का नम्बर आ जाएगा?''
वह व्यक्ति बस इतना ही बोला, ''देखिए!''
हरिहर प्रसाद ने थोड़ी देर पहले कुछ ऐसा ही अपने आगेवाले से पूछा था। उसने उनकी ओर केवल देखा ही था, एक उचटती मुस्कुराहट के साथ जिसमें तरस भी था और निर्लिप्तता भी, या इनमें से कोई एक ही। दरअसल, वहाँ कोई किसी से बोल नहीं रहा था। अपरिचय की परत को तोड़ने में वे संकोच महसूस कर रहे थे, या वैसा करने पर असभ्य, अशालीन, असंस्कारी हो जाने का खतरा था, इसलिए बच रहे थे।
सामने चौड़ी सड़क पर एक विदेशी जोड़ा हौले-हौले दौड़ता गुजर गया। वे बनियान, नेकर और स्पोर्ट शू पहने हुए थे। उनके जिस्म की गोरी-चिट्टी पुष्ट मांसपोशियाँ चमक छोड़ रही थीं। सड़क पर दोनों ओर पेड़ व हरियाली थी, भरी-पूरी। गन्दगी दूर तक नहीं थी। उसे उस भाग से जैसे किसी ऑपरेशन के तहत निष्कासित कर दिया गया था।
पिफर एक और गोरी चमड़ीवाला आदमी दौड़ता हुआ आया। यह केवल नेकर और शू ही पहने था। कुछ पफासले पर बने एक बंगले में वह द्घुस गया।
हरिहर प्रसाद ने इन विदेशियों को उस दृष्टि से देखा था जिसमें कुछ-कुछ स्निग्धता और स्तुत्य का भाव भरा था। मई के इस महीने में भी उन्होंने जागिंग की है, वह भी सूरज निकल आने के बाद। दरअसल, ये लोग पंछी-पखेरू के जागने के साथ नहीं जागते हैं। पूरी नींद ले लेने पर ही उठते हैं, आराम से। इनकी सेहत और लम्बी उम्र का राज छोटी-छोटी चिन्ताओं, बेपिफजूल की हड़बड़ियों और गैर जरूरी वर्जनाओं से अपने को दूर रखना है। असली बात है उचित मात्राा में कैलोरी-भरा सापफ-सुथरा खान-पान और जिस्म को चुस्त-दुरुस्त रखना।
पहले वाले बाड़े में ऊपरी शेड दीवार से कुछ अलग हटकर था। धूप उस रास्ते से नीचे उतरने लगी थी। धूप की चमक जिनके चेहरों पर जाकर चिपक रही थी, वे कुछ असहजता अनुभव करने लगे थे। हरिहर प्रसाद ने अपनी द्घड़ी की ओर पिफर देखा। सवा सात का वक्त हो रहा था। उनका अपना वाला बाड़ा भी भर गया था और चौथे बाड़े में लोगों का द्घुसना शुरू हो गया था।
खाकी लिबास में सिक्योरिटी के दो आदमी नमूदार होकर वहाँ जुट रही भीड़ को चन्द मिनट तक चुपचाप ताकते रहे। पिफर गेट के अन्दर गायब हो गये।
हरिहर प्रसाद वाले बाड़े के एक आदमी को उसके साथ आए आदमी ने आकर बताया कि पहली पंक्ति के शुरू के कई लोग ढाई-तीन बजे रात के आए हुए हैं। बच्चे के साथ खड़ी भारी जिस्म की वह औरत भी।
''तब उनकी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी।'' जिसे बताया गया था, वह बोला।
हरिहर प्रसाद ने सूचना को सुन लिया था। उनका मुँह आश्चर्य से पफैल गया-''दे आर देयर सिन्स टू थर्टी ए.एम.। ओ माई गाड!''
कुछ देर बाद सिक्योरिटी के आदमी पिफर नमूदार हो गये थे। पहले वाले दो के अलावा दो और थे। उनमें से एक उन लोगों की अलग लाइन लगवाने लगा जो पाइप के बाड़ों से बाहर थे और जिनके हाथों में लिपफापफे व पैकेट थे।
''यहाँ ये लोग किस वास्ते हैं?'' हरिहर प्रसाद ने अपने आगे खड़े व्यक्ति से पिफर पूछा। आगे वाला व्यक्ति इस बार भी खामोश रहा। हाँ, उससे आगे खड़े व्यक्ति ने बड़ी शाइस्तगी से अपनी गर्दन द्घुमाकर कहा, ''ये इमीग्रेशन वाले होंगे। आई मीन हू वाण्ट्स टु इमीग्रेट टु यू.एस.ए. परमानेण्टली। इन लोगों को अपने सारे कागजात लेकर आने के लिए तारीख और वक्त की इत्तला लेटर के जरिए दे दी जाती है।''
''आई सी।'' हरिहर प्रसाद ने जताया कि वह समझ गये हैं।
कहने वाले ने अपनी गर्दन को उसी अंदाज से बहुत आहिस्ता से वापस द्घुमा लिया जैसे वह काँच की हो और अनचाहा झटका लगने पर दरक सकती है।
दूसरे बाड़े में से एक अधेड़ दम्पती निकलकर इस नयी लाइन में शामिल हो गया। पिफर हरिहर प्रसाद के अपने बाड़े में से भी एक बूढ़ा शख्स अपनी गलती के लिए शर्मिन्दगी लादे हुए उनमें जाकर मिल गया। उनकी संख्या ज्यादा नहीं थी, पिफर भी बीस के आस-पास होगी।
सिक्योरिटी का एक आदमी अंदर से निकलकर आया और बाड़े एक व दो में छपे हुए पफार्म बाँटकर वापस चला गया। हरिहर प्रसाद को परेशानी हुई। इसने और लोगों को पफार्म क्यों नहीं दिए? क्या सिपर्फ पहली दो लाइन वालों के ही प्रार्थना-पत्रा कबूल किए जाएँगे? बाकी को बैरंग लौट जाना है?
सिक्योरिटी का एक और आदमी सामने से गुजरा था। हरिहर प्रसाद ने आवाज लगायी-''आई आलसो रिक्वायर एन एप्लीकेशन पफार्म। प्लीज हैव मी। प्लीज...।'' आवाज लगाने के साथ ही उन्होंने अपना पासपोर्ट भी हवा में लहराया। दूसरे बाड़े में पफार्म बाँटते वक्त पफार्म बाँटने वाले आदमी ने वहाँ खड़े लोगों को अपना पासपोर्ट हाथ में ले लेने का निर्देश दिया था।
सिक्योरिटी गार्ड बिना रुके हुए आगे बढ़ गया। उसने मुड़कर देखा तक नहीं।
हरिहर प्रसाद वाले बाड़े के कई लोगों ने हरिहर प्रसाद की ओर अपनी आँखें द्घुमायी थीं। पिफर उन्हीं में से एक बोला, ''पफार्म हम लोगों को भी मिलेंगे। अभी नहीं दिए तो कुछ देर बाद देंगे।''
कुछ देर बाद वाली बात हरिहर प्रसाद की समझ में आयी नहीं।
धूप पहले वाले बाड़े की दीवार के अब कई हिस्से में उतर आयी थी और अपने होने का अहसास ढेर सारे लोगों को कराने लगी थी, कुछ-कुछ इस भाव से कि मेरे हँसने से तुम खीजते हो तो मैं और हँसूगा।
हरिहर प्रसाद के भाई ने जब पास आकर जानना चाहा कि वह पानी की बोतल खरीद लाएँ, प्यास लगी होगी, तो उन्होंने भाई से कहा कि पहले वह पफार्म के बारे में पता लगा लें।
''ऐसा तो नहीं कि बाँटने के बाद पफार्म बचे न हों और बाँटने वाला दोबारा लाए?''
''पता लगा लेना ठीक रहेगा।''
भाई जिनके चेहरे पर भी उम्र ने झुरियाँ पफैला दी थीं और एक दुर्द्घटना ने जिनकी चाल को सम नहीं रखा था, गेट की ओर बढ़ चले। लेकिन उनके वहाँ पहुँचने से पहले ही एक और आदमी को सिक्योरिटी गार्ड ने तेजी से हाथ हिलाकर वापस कर दिया था।
कई लोग साथ में ही पफार्म लेकर आए थे। हरिहर प्रसाद को दरअसल एक दिन पहले दिल्ली आ जाना चाहिए था। किसी ट्रैवेल एजेण्ट के पास जाकर पफार्म हासिल कर लेते और दूसरी और बातों का पता लगा लेते। वैसे कुछ समय पहले अमेरिका हो आए एक सुपरिचित ने लगभग सारी जरूरी औपचारिकताओं की जानकारी उनको खत के जरिए दे दी थी। यह भी लिखा था कि पफार्म उनको वहीं एम्बेसी के आदमी से मिल जाएगा। हरिहर प्रसाद ने अपनी यह भी गलती मानी कि वह होटल से चार बजे नहीं निकले। तब वह पहली लाइन में जगह पा सकते थे। तीसरी लाइन में तो नहीं ही होते। उन्होंने देखा कि पहले और दूसरे बाड़े के कई लोगों ने पफार्म मिल जाने पर उनको अपने बैग या ब्रीपफकेस में रख लिया था। उनको किसी विद्वान का यह कथन याद आ गया, जिसको वह दूसरों को भी सुनाते थे कि 'यू शुड पफील योर लाइपफ विद इक्सपीरियेन्सेज नाट इक्सक्यूजेस'। पिफर इसी के साथ जुड़ा हुआ यह भी याद आ गया कि 'लाइपफ इज ए चैलेंज वन शुड पफेस इट'। अनुभव और चुनौती की बात से उनको बल मिला, यद्यपि वह ज्यादा ठोस नहीं था।
द्घर से भरकर पफार्म लाने वालों में से एक से बिना पफार्म वाले एक ने पूछा था कि अगर उसके पास अतिरिक्त पफार्म हो तो वह उसे दे दे। उस व्यक्ति ने पालिश लगी मुस्कुराहट के साथ 'सारी' कह दिया था। हरिहर प्रसाद के ठीक सामने दूसरे बाड़े में एक सरदार जी के पास भी पफालतू पफार्म था। उसके मन में कई बार इरादा बना कि वह उनसे उस पफार्म को स्पेयर कर सकने के लिए पूछे, लेकिन अपने उस इरादे पर अमल करना वह टालते रहे, यों इस टालने के दौरान उन्होंने पूछने वाले वाक्य की संरचना कई बार की थी।
आठ बजे के करीब सिक्योरिटी का आदमी दूसरे लोगों को भी पफार्म बाँट गया।
हरिहर प्रसाद ने शैड से दूर खड़े भाई को इशारा किया। भाई के आ जाने पर उनको अपने स्थान पर खड़ा कर वह पफार्म भरने के लिए बाहर निकल आए। कई लोग ऐसा कर चुके थे।
हरिहर प्रसाद की राइटिंग सुंदर और सेट थी। अपनी राइटिंग के इस गुण से इस समय उनको और भी संतोष हुआ, क्योंकि पफार्म पर उसको टाइप या प्रिंट अक्षरों से भरने की सलाह टीपित थी। बावजूद इसके कि सत्तर की उम्र की जद में होने के सबब से उनके हाथ में थोड़ा कम्पन था, पेन को रोक-रोककर चलाने से उन्होंने अपने लेख की उसी खूबी को बनाए रखा। दो प्रविष्टियों को लेकर पहले कुछ अस्पष्टता रही, लेकिन पिफर वे स्पष्ट हो गयी थीं। बल्कि पास में बैठे एक व्यक्ति की उन्होंने पफार्म भरने में सहायता की थी। द्घर से साथ लाए स्टेपलर से अपना पफोटो निर्दिष्ट स्थान पर लगाने के बाद उन्होंने इस काम के लिए अपना स्टेपलर भी उसे दे दिया था। एक तीसरे शख्स को भी उन्होंने स्टेपलर देने की पेशकश की थी, लेकिन उसने टेप की मदद से अपना पफोटो चिपका दिया था।
खिड़की खुल गयी है, जैसे ही यह आवाज हवा में सरसरायी, हरिहर प्रसाद ने अपनी कलाई पर पिफर नजर डाली। आठ पैंतीस हुए थे। उन्होंने अपनी द्घड़ी की सूई पाँच मिनट पीछे कर ली। हालाँकि जब आठ तीस पर खिड़की नहीं खुली थी, इधर-उधर कई जगह से वैसी शिकायत उठी थी। हो सकता है कि यहाँ एम्बेसी के दफ्रतर में आठ तीस अब बजे हों। स्कूल-कॉलेजों में परीक्षा सुपरिण्टेण्डेण्ट अपनी द्घड़ी के हिसाब से परीक्षा कराता है। उन्हें यह भी याद आया कि अमेरिका और हिन्दुस्तान के टाइम में करीब दस द्घंटे का पफर्क है। जब वहाँ लोग जागते होते हैं यहाँ सोते होते हैं। इसके विपरीत की बात उनके दिमाग में नहीं आयी।
लाइन में लोग जो कुछ ढीले-ढाले खड़े थे, खिड़की खुल जाने से अब एक-दूसरे से सट गये थे। लाइन यों आगे बढ़ी थी जैसे साँप जिस्म में लहरियाँ डालकर तेजी से रेंगा हो। हरिहर प्रसाद एकबारगी अपने बाड़े में सबसे आगे पहुँच गये थे। किन्तु इसके बाद आगे बढ़ने की गति एकदम धीमी पड़ गयी। खिड़की के पास कभी हरकत होती लगती थी, कभी नहीं।
भाई ने आकर इत्तला दी कि एक नहीं, दो खिड़कियों पर दरखास्तें ली जा रही हैं।
''मुझे लगता नहीं कि नम्बर आ पाएगा।''
''लोग बताते हैं, जितनी भीड़ इस एम्बेसी पर होती है, उतनी किसी मुल्क की एम्बेसी पर नहीं। पाकिस्तान की एम्बेसी पर भी नहीं।''
धूप शैड के अंदर निडर बन अच्छा-खासा अतिक्रमण कर रही थी। कुछ लोगों ने सिर पर सीधी पड़ती कौंध से बचाव के लिए हाथ में पकड़ी पफाइल या बैग की आड़ कर ली थी। बीच-बीच में लोग बोतल के पानी से अपना गला भी सींच लेते थे।
''क्यू में इतनी देर तक खड़े रहना किसी पफौजी के लिए भी मुश्किल पड़ेगा।'' गर्मी और थकान से पस्त एक प्रार्थी बोला।
''तपस्या करना जैसा है यह।'' एक औरत बोली।
''जिन्दा स्वर्ग में पहुँचने के लिए यह ज्यादा नहीं है।'' एक जवान ने चुटकी ली।
''लंकादहन के समय हनुमान जी की पूँछ इतनी लम्बी नहीं होगी जितनी यहाँ लोगों की बन गयी है।'' एक अन्य ने उस चुटकी से प्रेरित होकर कहा।
दस बज रहे थे जब रेंगते-रेंगते हरिहर प्रसाद पहले बाड़े में दाखिल हुए। उन्होंने मान लिया था कि प्रार्थना-पत्रा प्राप्ति की समय-सीमा समाप्त होने तक वह खिड़की पर नहीं पहुँच पाएँगे। अब भी कम-से-कम सौ लोग उनसे आगे हैं। एक आदमी के कागजात देखे जाने ने अगर दो मिनट भी ले लिए तो दोनों खिड़कियों पर साढ़े दस तक पन्द्रह यानी कुल तीस आदमी निपट पाएँगे, हद-से-हद चालीस। बच रहे लोगों को उनकी किस्मत पर छोड़ दिया जाएगा। कल-परसों जब भी आना चाहें, आइए और क्यू में दोबारा खड़े होकर सूखिए।
तभी भाई ने चहकते हुए आकर बताया कि एप्लीकेशन्स उन सभी की ली जाएँगी जो यहाँ इनक्लोजर में साढ़े दस बजे तक दाखिल हो जाते हैं।
''रियेली? क्या सिक्योरिटी के किसी आदमी ने ऐसा बताया?''
''एकदम ऐसा ही है।''
''दैट्स वाट इट शुड हैव बीन। मोस्ट रीजनेबल।''
अभी भी सड़क पर कारें आकर रुक रही थीं। क्यू में पफंसे एक आदमी ने जब जल्द ही आए अपने एक परिचित से नजर मिलने पर पूछा कि उसने आने में इतनी देरी क्यों की? वह मुस्कुराया-''पफर्क क्या पड़ा? पहले की बजाय अब तीन-चार द्घंटे खड़े हो लूँगा। सब काम से पफारिग होकर आया हूँ।''
भाई की दी गयी सूचना सही है, इसकी सम्पुष्टि हो गयी थी। हरिहर प्रसाद अब वीजा के प्रार्थियों पर गर्दन द्घुमा-द्घुमाकर नजर डालने लगे। नजर वह पहले भी डाल रहे थे। किन्तु तब वह डालना यों ही आधा-अधूरा था। कहा जाए कि डगमगाता हुआ-सा, बिला मकसद का। इस बार देखने में एक दिलचस्पी थी। उन्होंने पाया कि औरतों की संख्या भी खासी है। कुछ नयी शादीशुदा हैं। पति पहले जा चुके होंगे। उनके वहाँ जम जाने पर अब वे जा रही हैं। कई औरतों व जवान लड़कियों ने जीन्स और स्पोर्ट या जिप शर्ट्स पहन रखी हैं, कई चोली और स्कर्ट्स में हैं। जो साड़ी-ब्लाउज या शलवार-कुर्ते में हैं, वे भी अपने कटे हुए बालों या दूसरे हाव-भावों से मार्डन लग रही हैं। लड़के जीन्स पैण्ट व रंग-बिरंगी शर्ट में थे। एक लड़के ने सिर द्घुटा रखा था और कानों में रिंग्स पहन रखे थे। एक लड़के ने औरतों की तरह चोटी रख छोड़ी थी। साठ-सत्तर की उम्र वाले दो-तीन आदमी नेकर व टी शर्ट में थे। एक के सिर पर गहरे नीले रंग की फ्रलैपदार कैप थी। दरअसल, ऐसी कैप उनको भी लगानी चाहिए थी।
इसके फ्रलैप से धूप का बचाव तो होता ही, उनकी पर्सनेलिटी में कुछ और निखार आ जाता, मसलन स्मार्टनेस। द्घोर गर्मी के मौसम के बावजूद उन्होंने पैरों में मोजे के साथ तस्मेदार शू पहने थे और गले में टाई बाँधी थी। कोट जरूर नहीं पहना था, लेकिन पफुलस्लीव की चौड़े कपफवाली शर्ट इस कमी को दूर कर रही थी। वह इस धारणा के थे कि 'ए मैन इज नोन बाई हिज ड्रेस ऐण्ड एड्रेस'। उन्होंने अपने एड्रेस पर भी हमेशा ध्यान दिया था। वह शिष्ट और कोमल शब्दों से संजोया हुआ था। यों वह एक पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में इतिहास के प्रोपफेसर थे, किन्तु उनकी अंग्रेजी खासी अच्छी थी, अपने सापफ-सुथरे ऐसेंट के साथ। उनके कॉलेज में जो एक बिहारी इंगलिश का लेक्चरर था, उसके लिए उनकी राय थी कि वह किसी देहाती की तरह अंग्रेजी बोलता है। उनकी छह साल की पोती जब अमेरिका से आयी थी, वह उसे अपने कॉलेज लाए थे और उसके बोलने के लहजे को बतौर आदर्श पेश करते हुए बोले थे, ''यह है असली योरोपियन ऐसेंट, बल्कि कहें अमेरिकन। कोई भी भाषा अपने शु( उच्चारण से ही दूसरे पर प्रभाव छोड़ती है। टोस्ट या सेंडविच दोने-पत्तल में सर्व करने पर द्घिना जाते हैं।''
क्यू आगे खिसक रहा था और उसी के साथ उसमें कड़ियों की तरह जुड़े लोग।
एक अधेड़ आदमी ने पफार्म के साथ एप्लीकेशन पफीस की मद में लगाए जाने वाले बैंक ड्राफ्रट के पीछे अपना नाम व पता नहीं लिखा था। खिड़की के पीछे बैठी लड़की ने पफार्म लौटाते हुए उससे खिड़की छोड़ देने को कहा। आदमी अपनी जेब से पेन निकालता हुआ बोला कि वह अभी आधा मिनट में नाम-पता लिख देता है। आदमी के पीछे खड़ी उसकी औरत ने भी खुशामद की-''बहन, गलती से रह गया है। अभी लिखा जाता है।'' शायद आदमी ने एक ड्राफ्रट पर लिख भी दिया था। पर अंदर का स्वर वही बना रहा, बल्कि उसमें कुछ बल पड़ गया-''आई से लीव द विण्डो।''
सिक्योरिटी गार्ड ने उनको हटाकर क्यू के सबसे आखिरी सिरे पर भेज दिया। खिड़की के पीछे खड़े एक आदमी ने कहा, ''यहाँ डयूटी बजाते कर्मचारी सब हिन्दुस्तानी हैं, पिफर भी अपने लोगों के साथ रुखाई से पेश आ रहे हैं। गोरी चमड़ी के आगे-पीछे रहकर काली चमड़ी वाले भी साहब बन जाते हैं।''
''मुझे लगता है, क्रिश्चियन और ऐंग्लो-इण्डियन कम्यूनिटी के लोगों को ही एम्बैसी वाले जाब में रखते हैं।'' एक सरदार बोला।
हरिहर प्रसाद को भी इस हादसे का पता लग गया था। वह कुछ देर खामोश रहे। पिफर अपने पीछेवाले को निगाह में तोलकर बोले, ''हर मिनट के बाद सामने स्क्रीन पर उभरकर आ जाता है कि पफार्म से ताल्लुक रखने वाली क्या-क्या पफार्मेलटीज पूरी करना जरूरी है। आफ्रटर आल रूल इज रूल। नो एक्सक्यूज।''
क्यू कमर टूटे च्यूँटे की चाल से वैसे ही द्घिसट रहा था। अब क्यू के पिछले हिस्से में नयी कड़ियाँ नहीं जुड़ रही थीं। साढ़े दस बज चुके थे। सिक्योरिटी गार्ड किसी नये आदमी को अंदर द्घुसने से रोकने के लिए इंक्लोजर के प्रवेश-द्वार पर खड़े हो गये थे। बल्कि अतिरिक्त सावधानी के नाते एक अधिकारी ने सबसे पीछे खड़े आठ-दस प्रार्थियों के पफार्मों पर अपने हस्ताक्षर कर दिए थे।
खिड़की पर हरिहर प्रसाद के कागजात में कोई कमी नहीं पायी गयी। उनको टोकन दे दिया गया। किन्तु अब मुख्य भाग में प्रार्थियों को प्रवेश करने नहीं दिया जा रहा था। अंदर हाल भर चुका है। वे एक बजे तक प्रतीक्षा करें।
हरिहर प्रसाद भाई के पास चले गये जो पास की एक दूसरी इमारत के बाहर एक पेड़ के नीचे सात-आठ लोगों के साथ बैठे थे। दिल्ली में ही रहने वाला एक अनुभवी परिवार अपने साथ एक प्लास्टिक शीट लाया था जिसको उसने द्घास पर बिछा रखा था। भाई ने बातचीत का सिलसिला जोड़कर उनको बताया था कि वह एकाउंट्स आपिफसर के पद से पिछले वर्ष रिटायर हुए हैं, उन्होंने पासपोर्ट बनवा लिया है, अगले साल वह इंग्लैंड जाएँगे और उधर से दो-चार महीने के लिए अमेरिका भी द्घूम आएँगे। भाई ने कई और लोगों पर भी मौका निकालकर ऐसा ही जाहिर किया था।
हरिहर प्रसाद भी बातचीत में शामिल हो गये। एक के यह पूछने पर कि जब उनका बेटा अमेरिका में टेलीकम्युनिकेशन की एक नामी कंपनी में एक अच्छे जॉब में पिछले पन्द्रह वर्षों से है, वह वहाँ का नागरिक हो गया है और वह खुद यहाँ रिटायर हो चुके हैं, तो अब वह वहाँ जाकर स्थायी रूप में क्यों नहीं रहने लगते हैं, उन्होंने कहा कि उनके बेटे ने उनके तथा अपने दोनों छोटे भाइयों के लिए वहाँ वैसी एप्लीकेशन्स लगा रखी हैं, किन्तु चूंकि उस तरह जाने के लिए सात-आठ साल से पहले नम्बर आने की गुंजाइश नहीं है, उन्होंने सोचा कि अभी विजिटर वीजा पर ही एक चक्कर लगा आया जाए। इसी के साथ वह यह बताना नहीं भूले कि उनका बेटा पढ़ने में हमेशा अपने क्लास में पफर्स्ट रहा है, उसने बराबर एक-न-एक स्कालरशिप पाया है, आई.आई.टी. से एम. टेक करने के बाद सरकार ने उसे अपने खर्चे से एक समर कैम्प में जर्मनी भेजा था।
एक बजे तक प्रतीक्षा करने के लिए हाँक दिए गए प्रार्थी खिड़की पर से हट-हटकर इधर-उधर जगह खोज रहे थे। जिनके पास अपने वाहन थे और जो आसपास आसानी से इस बीच जा सकते थे, वे जा भी रहे थे।
ऊपर पेड़ पर बैठे एक पफाख्ते ने बीट कर दी थी जो सीधे हरिहर प्रसाद के सिर पर गिरी। हरिहर प्रसाद ने रूमाल की सहायता से बीट से मुक्ति पा ली। भाई ने इसी के साथ ढेला उछालकर पफाख्ते को उड़ा दिया।
''मेरी ग्रांडमदर कहती थीं कि कौवे का आदमी के सिर पर बैठना असगुन होता है जबकि चिड़िया का बैठना सगुन।'' वहाँ बैठा एक प्रार्थी बोला।
निकट के किसी बंगले में कोई कुत्ता भौंका था। हरिहर प्रसाद बताने लगे कि अमेरिका में कुत्ते-बिल्ली द्घरों में पाले जाते हैं, वे पेट्स कहलाते हैं, किसी को काटते नहीं हैं, सड़कों पर एक भी आवारा जानवर द्घूमने नहीं दिया जाता है, वहाँ रेबीज से मौत का परसेंटेज जीरो है। उनका बेटा बताता था कि हिन्दुस्तान की तरह वहाँ अखबार की रद्दी या दूसरा टूटा-पफूटा सामान बेचा नहीं जाता है। द्घरों के आगे रख दिया जाता है। ट्रक आते हैं और उनको उठाकर ले जाते हैं। वहाँ हरेक के पास कार है। नर्सें, होटलों के वेटर-वेटरेस, स्टोरों के सेल्समैन, सब अपने-अपने कामों पर कार में बैठकर जाते हैं। वहाँ दूध, पफल, खाने का दूसरा सामान सब बिना मिलावट का एक क्वालिटी का मिलता है। किसी चीज की कमी नहीं है। स्टोर पटे पड़े रहते हैं।
दूसरे लोग भी अमेरिका की खुशहाली, वहाँ की समृ(ि और हर क्षेत्रा में उसकी उन्नतशीलता की बातें कर रहे थे, अपने सगे-संबंधियों या दूसरे स्रोतों से मिली सूचना के आधार पर। कुछ वहाँ के आकर्षण में और भी चटख रंग भर रहे थे।
उनमें से अधिकतर लोग उच्च शिक्षा प्राप्त थे, समाचार-पत्राों तथा दूसरे सूचना तंत्राों से संबंध बनाए रहते थे, किन्तु कोई भी यह नहीं बता रहा था कि चन्द साल पहले अपने देश में लोग सिपर्फ एक ही टी.वी. स्टेशन के कार्यक्रम देख सकते थे, अब पचास से अधिक केबल चैनेल हैं, अब अंतरिक्ष में हमारे अपने सैटेलाइट्स हैं, स्पेस और कम्प्यूटर टेक्नोलाजी में हमने अपनी सुस्पष्ट पहचान बना ली है, पचास लाख के आटोमोबाइल्स की बिक्री अब हमारे देश में है, चाय व चीनी की उपज में हम आगे हैं और कई मुल्कों की टेक्सटाइल्स व मोती, जवाहरात के बाजार पर हमारा ही कब्जा है।
कई लोग केवल द्घूमने के उद्देश्य से वहाँ जाना चाह रहे थे। उनसे किसी ने यह नहीं पूछा था कि जनाब, आपने देश कितना द्घूमा है? कारण शायद यह था कि वहाँ कोई भी ऐसा नहीं था जिसने अपना देश अच्छी तरह देखा हो।
अंदर के मुख्य हिस्से से लोग इंटरव्यू दे-देकर बाहर निकल रहे थे। एक खबर लाया कि कापफी लोगों के प्रार्थना-पत्रा खारिज किए जा रहे हैं। खारिज शुदा एक उम्रदराज आदमी उधर पास में बैठे अपने साथ आए आदमी के करीब बढ़ आया और बताया कि वह इंटरव्यू लेने वाले की बात ही ठीक से नहीं समझ पाया। जब दो बार उसने 'बेग योर पार्डन' कहा, तो हिन्दुस्तानी में उससे पूछा गया, 'इंडिया मा कितना बचा है।' उसके इसको भी न समझ सकने पर इंटरव्यू लेने वाला कागज लौटाकर बोला... गो। वहाँ उसकी बगल में बैठने वाले एक आदमी ने जब बताया कि आपसे पूछे गये सवाल का मतलब था कि इस मुल्क में आपके और कितने बच्चे हैं, उसने इंटरव्यू लेने वाले के पास जाना चाहा, लेकिन अंदर तैनात सिक्योरिटी के आदमी ने जाने नहीं दिया। कहा कि आप दोबारा एप्लीकेशन लगाइए।
''तो दोबारा लगा देना।'' साथ आया आदमी बोला।
''दोबारा एप्लीकेशन लगाने में पिफर से सात सौ बीस रुपये का ड्राफ्रट लगाना पड़ेगा, बतौर एप्लीकेशन पफीस। उस पर भी गारंटी नहीं। मेरे आगे बैठे एक बंगाली सज्जन ने तीसरी बार दरखास्त लगायी थी और खारिज हो गयी। वह बेचारे एपिफडेविट्स साथ में लाए थे, मगर देखे नहीं गये।''
सलवार-कुर्ता पहने एक जवान औरत इनक्लोजर पार कर सड़क की जानिब धीरे-धीरे बढ़ रही थी। पीछे-पीछे गर्दन लटकाए एक अधेड़ द्घिसट रहा था। रामकहानी जानने वाले ने बताया कि इस औरत को भी वीजा नहीं मिला। उसका आदमी शादी कर कुछ वक्त के बाद उसको जल्द ही बुला लेने का वादा कर अमेरिका चला गया था। जब आदमी ने दो साल बीत जाने पर भी उसे बुलाया नहीं तो भाई ने कहा कि वह कहीं-न-कहीं से पैसों का इंतजाम कर देगा, वह खुद चली जाकर उसका दामन कसकर पकड़ ले। उसकी दरखास्त यह वजह बताते हुए खारिज कर दी गयी कि वहाँ की सरकार पर भार बन जाएगी।
हरिहर प्रसाद ने भाई से कहा कि हिन्दुस्तान की ज्यादातर औरतें इंग्लैंड, अमेरिका जैसे विकसित देशों में अपने को ढाल नहीं पाती हैं। वहाँ बहुत खुली और पफास्ट लाइपफ है। उन्होंने भाई को अपनी दूर की उस ममेरी बहन की याद दिलायी जिसके आदमी ने वहाँ दूसरी शादी कर ली थी।
एक बज रहा था। लोग गेट के पास जाकर जमा होने लगे थे। हरिहर प्रसाद भी अंदर दाखिल हो गये।
अंदर बड़ा-सा हाल था। दो सौ से कम कुर्सियाँ नहीं पड़ी होंगी। जैसे कोई कुर्सी खाली होती थी, नया आने वाला बैठ जाता था। बहुत से कुर्सियों की चिंता न कर पीछे दीवार से टिककर खड़े हो जाते थे। ऐसा करने वालों में जवान लड़के-लड़कियाँ अधिक थे। उनमें भी अधिकतर यूनिवर्सिटीज या बड़े इन्स्टीटयूट्स से ताजा-ताजा निकला वर्ग था, ऊँची उड़ान भरने के लिए डैने खोले हुए। वहाँ पीछे बातचीत, हँसी-मजाक करने की अधिक सुविधा थी। आपस में जरा-सा परिचय होने पर उनमें खुलापन आ जाता था। इण्टरव्यू के तनाव को या तो वे जज्ब कर चुके होते थे, या उसे कहीं अंदर बहुत सपफाई से छिपा लेते थे।
शर्ट की स्लीव रोम-भरी बाँहों में ऊपर तक रोल किए हुए एक लड़का जीन्स पहने हुए एक लड़की को बता रहा था-''अगर मुझे यहाँ वीजा नहीं मिलता है तो मैं आस्ट्रेलिया के लिए ट्राई करूँगा। आस्ट्रेलिया वालों ने टेक्नोक्रेट्स के लिए अपने दरवाजे खोल रखे हैं। लेकिन पफर्स्ट प्रीपफरेन्स स्टेट्स के लिए है। दे आर यट नम्बर वन। मेरी मम्मी को पता नहीं है। उन्हें बड़ा शॉक लगेगा। बात यह है, मेरे डैडी की यंग एज में डेथ हो गयी थी। लेकिन इमोशन्स में वन शुड नाट किल हिज फ्रयूचर!''
लड़की अपने दाँतों को किसी मल्टीनेशनल कंपनी के टूथपेस्ट के विज्ञापन वाली चमक से चमकाती हुई बोली, ''मेरी ममा भी कुछ पुराने खयालात की हैं। ममा का वश चलता तो वह मेरी मैरेज ग्रेजुएशन के बाद ही कर देतीं। लेकिन मेरे डैड प्रोग्रेसिव थिंकिंग के हैं। डैड का मानना है कि सयाने हो गये बच्चों को अपनी जिंदगी से जुड़े डिसीजन्स खुद लेने दिए जाएँ।
यों कुर्सियों पर बैठे लोग भी ज्यादातर अंग्रेजी में बोल रहे थे, लेकिन दीवार के पास वाला युवा वर्ग एकमात्रा इस भाषा का ही इस्तेमाल कर रहा था, यहाँ तक कि अपनी हँसी और तमाम किस्म की भाव-भंगिमाओं में भी वे स्वर को यों खींच-खींचकर बोलते थे कि शब्द देसी चोला त्यागकर योरोपियन खाँचे में ढल जाते थे। उन सबको देखकर किसी की यह भविष्यवाणी कपोल-कल्पित नहीं लगती थी कि दुनिया का अंतिम शत-प्रतिशत विशु( अंग्रेज हिन्दुस्तान का ही होगा।
हरिहर प्रसाद को बैठने के लिए जल्द ही कुर्सी मिल गयी थी, लेकिन इण्टरव्यू के लिए नम्बर देर से ही आ पाया था। इसके लिए उन्होंने स्वयं को ही दोषी ठहराया था। हुआ यह कि बाहर के हिस्से में जहाँ सुबह साढ़े छह से एक बजे दोपहर तक वह बने रहे थे, टायलेट जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। कुछ लोग इसके लिए असंतोष प्रकट कर रहे थे, पर कुछ यह भी कह रहे थे कि एम्बैसी वालों ने ऐसा सोच-समझकर ही नहीं किया है कि इससे वहाँ गंदगी को खुली दावत देनी होगी। वे हमारी खसलत से बहुत अच्छी तरह परिचित हैं।
दूर-दूर तक सड़क पर बंगले-ही-बंगले या लम्बी-चौड़ी इमारतें थीं जिनका आभिजात्य वैसी किसी बेजा हरकत पर अंकुश लगाए हुए था। हरिहर प्रसाद जब अपने शहर में भी द्घर से बाहर निकलते थे, सभ्य और शिष्ट कहलाने वाले आचरणों का लबादा बहुत जतन से ओढ़े रहते थे। वह कुछ देर अंदर भी यों ही बैठे रहे थे, लेकिन जब पता लगा कि वहाँ उस तरह की सुविधा की समुचित व्यवस्था है, तो उठकर चले गये। आईने के सामने रुककर रूमाल से चेहरा पोंछते हुए उन्होंने पाया कि रूमाल में गपफलत से चिपटी रह गयी बीट ने चेहरे को गंदा कर दिया है। तब वाशबेसिन में अपना चेहरा देर तक सापफ किया। पिफर टाई की नाट कसी और कमीज की सलवटें खोज-खोजकर निकालीं।
बाहर आकर उन्होंने बगल में बैठे हमउम्र सज्जन से पूछा कि उनका नाम तो नहीं पुकारा गया है?
''माई ेण्ड, नाम इस तरह लिए जा रहे हैं कि देर तक सोचना पड़ता है कि किसको बुलाया जा रहा है?''
सच में ऐसा ही हो रहा था। 'परमजीत कौर' को 'पारम जिट कौर' और रिपुदमन सिंह' को 'राइप डामन सींग' में तबदील कर दिया गया था।
सामने खड़ा एक और भी कर्मचारी हाथ में वीजा के प्रार्थना-पत्रा लेकर आवाज लगा रहा था। जब पन्द्रह-बीस मिनट बाद हरिहर प्रसाद उसके पास दरयाफ्रत करने गये तो वह बोला, ''हाँ, आपकी आवाज लगायी थी। आप बोले नहीं तो कागजात अलग रख दिए। बैठिए, नाम पिफर पुकारा जाएगा!''
तीन बजे ही पिफर दोबारा आवाज लगी थी।
खिड़की के पीछे बैठे हुए गोरी चमड़ी वाले अधिकारी ने कागजात अंदर समेटते हुए पूछा, ''वाइ टू यू. एस. ए?''
''सर, देर इज माइ सन विद हिज पफैमिली। ही इज एन यू.एस. सिटीजन। आई डिजायर टू सी देम।... सर, मोरओवर, दैट कंट्री इज ग्रेट।'' हरिहर प्रसाद प्रश्न के उत्तर में इतना ही कहकर खामोश नहीं हुए, आगे भी जोड़ा कि ''अमेरिका के लोग बहुत ही अनुशासित और सभ्य हैं, कि वहाँ वे जिंदगी को इन्ज्वाय करते हैं जबकि यहाँ हम स्ट्रगल करते हैं, कि...।''
सपफेद चमड़ी वाला इस बीच उन पर एक नजर हल्की-सी डालकर अपनी ओर के पफर्श को यों देखने लगा था कि वहाँ कोई चीज गिर गयी है, किन्तु वहाँ कुछ नहीं गिरा था जिसको वह उठाता। हाँ, इससे हरिहर प्रसाद ने कारण गिनाने का वक्त पा लिया था-''इन योर पेपर्स यू गेव कलर आपफ हेयर एज ग्रे। आई सी दे आर ब्लैक।'' सपफेद चमड़ी वाले ने उनकी ओर नजर पिफर डाली थी, इस बार ठहरी हुई-सी।
हरिहर प्रसाद के चेहरे पर परेशानी झलकी, पिफर गाढ़ी हुई, ''सर, आई एम सारी, वेरी-वेरी सारी पफार दिस मिसटेक।... पफार सम टाइम...।''
''पफार सम टाइम यू आर डाईंग योर हेयर पफार पफीलिंग यंग। देट इज करेक्ट?''
''यस सर, यस सर।''
हरिहर प्रसाद जब वहाँ से हटकर वापस आए, वह बेहद प्रसन्न थे। उन्हें एक साल का वीजा मिल गया था। इतनी ही अवधि का उन्होंने मांगा था। उन्होंने पास में बैठे दो-तीन व्यक्तियों को बताया कि इंटरव्यू लेने वाला 'ए वेरी नोबिल एण्ड चार्मिंग परसन' है।
वीजा की निर्धारित पफीस काउण्टर पर जमा कर वह बाहर आ गये। उन्होंने भाई से भी इंटरव्यू लेनेवाले अधिकारी के नोबिल और चार्मिंग होने की बात कही। पासपोर्ट की प्रविष्टि के अनुसार वीजा के प्रार्थना-पत्रा में भी अपने बालों को डाई करने की बात भूलकर उनका रंग सपफेद उल्लिखित करने की गलती बताने के बाद उन्होंने यह भी बताया कि खाँसी का ठसका आ जाने पर अंतिम क्षणों में उनकी बत्तीसी ढीली पड़ गयी थी, इस पर इंटरव्यूकर्ता बोला था, ''जेण्टलमैन, टेक केयर आपफ योर डेन्चर।'' पिफर भाई को यह बताते हुए कि वह अमेरिका जाने से पहले अपनी दूसरी बत्तीसी इस बार एक अच्छे डेण्टिस्ट से लगवा लेंगे, यह भी बताया कि उन्होंने पूछे गये हर सवाल को तुरंत कैच कर लिया था और एक बार भी 'बेग योर पार्डन' कहने की नौबत नहीं आने दी।
भाई ने उनको एक जायकेदार किस्सा सुनाया जो उन्होंने अभी कुछ देर पहले वीजाप्रार्थियों के रिश्तेदारों से सुना था। किस्सा यों था। पंजाब के गाँव का एक जाट परिवार न्यूयार्क में जाकर बस गया। जाटिनी अपने वहाँ जनमे छोटे बच्चे को लेकर डॉक्टर को दिखाने गयी। डॉक्टर ने पूछा, ''वाट प्राब्लम विद योर बेबी?'' जाटिनी बोली, ''डॉक्टर साहब, ग्रेट प्राब्लम इज माई बेबी स्लीप दा ना, ईट दा ना, ओनली वीप दा, वीप दा, वीप दा...।''
हरिहर प्रसाद ने जाटिनी की अंग्रेजी का लुत्पफ लिया। पिफर उन्होंने भी एक किस्सा तुरंत परोस दिया जो हाल के अंदर पीछे खड़े युवावर्ग के बीच से उन्होंने पाया था। यदि भाई का किस्सा उद्दीपन न बनता तब भी वह अंदर द्घटी तमाम हलचलों का बखान करते हुए उसको भी किसी-न-किसी प्रसंग से लपेटकर अवश्य सुनाते।
हरिहर प्रसाद का सुनाया हुआ किस्सा यों था। एक आदमी अपने बेटे के पास रहने अमेरिका गया। बढ़ी हुई उम्र और अपने से खाल की तरह पुरानापन चिपटाए हुए वह आदमी लंगोट का इस्तेमाल करता था। उसका मानना था कि लंगोट बाँधने वाले की आँत कभी नीचे उतरती नहीं है और उसकी कमर भी सीधी रहती है। हुआ यह कि कुर्ता, धोती, बण्डी, जिनका धारण किया जाना वह भारतीय संस्कृति की संरक्षा के लिए आवश्यक मानता था, उनको जरूरत लायक साथ लेता आया था, लेकिन लंगोटवाली गड्डी किसी गपफलत से रखने से छूट गयी थी। साथ आए वे दो लंगोट, जिनको सुबह-शाम बदल-बदलकर वह इस्तेमाल करता था, जवाब देने लगे थे। बेटे के यह आशंका प्रकट करने पर कि वे वहाँ उपलब्ध नहीं होंगे और भारत से डाक द्वारा मंगवाए जा सकते हैं, प्राचीनता को ढोने वाले उस शख्स ने कहा कि जब पालक, लौकी, तोरई, परवल जैसी भारतीय सब्जियाँ, केला, सेब, पपीता, खरबूजा जैसे भारतीय पफल तथा पापड़, बड़ी, अरहर, उर्द की दाल व हींग, जीरा, लौंग जैसे भारतीय खाद्य पदार्थ यहाँ मिल जाते हैं तो भारतीय लंगोट भी जरूर मिलता होगा। कई हिन्दुस्तानी स्टोर और दुकानों का चक्कर लगाया गया। पिफर चालीस-पचास मील के पफासले वाली छोटी काउंटी और टाउनशिप में तलाश की गयी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। अंत में बाप-बेटा एक शुभचिंतक की सलाह पर 'हरे कृष्ण' समुदाय के एक मंदिर में गये। वहाँ मूँछ-दाढ़ी मुड़ाए और चोटी रखे संन्यासी अधोवस्त्रा के रूप में जो धारण किए हुए थे, उन्होंने पाया कि लंगोट के बजाय वे अंडरवियर हैं, हाँ, उनका रंग गेरुआ जरूर था।
इस बार भाई और आसपास खड़े लोगों के हँसने की बारी थी।
साढ़े चार बज गये थे। सूरज दिन की तपिश को अब भी निष्ठा से सहेजे हुए था। खिड़की के पास पिफर लम्बा क्यू लगने लगा था। इस दपफा क्यू वीजाप्रार्थियों का नहीं, वीजा पाए लोगों का था। उनको अपना पासपोर्ट वापस लेना था।
''टाइम के ये अमेरिकन भी पाबन्द नहीं रहे हैं।'' निर्धारित समय से कापफी आगे द्घड़ी की सूई द्घूम जाने पर एक शख्स बोला।
''लगता है, हिन्दुस्तान में आकर इन लोगों की भी आदत बिगड़ गयी है।'' एक दूसरा बोला।
क्यू में पफंसे हुए हरिहर प्रसाद को यह टिप्पणी पसंद आयी।
कुछ वक्त बाद जब किसी ने यह कहा कि ढेर सारे लोगों की एप्लीकेशन्स खारिज हो जाने के बावजूद वीजा लेने वाले कापफी तादाद में हैं, हरिहर प्रसाद ने अपने आगे खड़े व्यक्ति को बताने का एक मौका पिफर पा लिया कि विण्डो नम्बर चार को कापफी सख्त माना गया है, पर उनके साथ उस विण्डो का आपिफसर बहुत ही शरापफत और ेण्डली वे में पेश आया। उसने उनको पूरे पाँच मिनट तक सुना और ओ.के. कर दिया।
खिड़की खुल गयी। सुबह वाले टोकन ले-लेकर पासपोर्ट वापस किए जाने लगे थे। जिनका पैसा देर से जमा हुआ था और पासपोर्ट पर वीजा की प्रविष्टि नहीं हो सकी थी, उनको लौटाया जा रहा था। हरिहर प्रसाद का भी पासपोर्ट अंदर से नहीं आया था।
''नो मैटर सर!आई हैव पेशेन्स, आई विल कलेक्ट इट टुमारो।'' हरिहर प्रसाद खिड़की से चेहरे पर बिना एक अतिरिक्त शिकन डाले हट आए। |