नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
विवाद
पुरस्कार की राजनीति : रंजीत वर्मा

किसी भी प्रतियोगिता और पुरस्कार का सार इस बात में निहित है कि उस प्रतियोगिता और दिये जाने वाले पुरस्कार का कितना और किस स्तर पर प्रचार किया जा रहा है, उसे किस रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है और अंततः इसका उद्देश्य क्या है। जब तक इस उद्देश्य को पूरी तरह नहीं समझा जाएगा तब तक उसका सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकेगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लगभग हर पुरस्कार की अपनी राजनीति होती है और ज्यादातर मामलों में इसका इस्तेमाल विरोधी स्वर को अप्रासंगिक बनाने के लिए किया जाता है, लेकिन इसका स्वरूप ऐसा बनाया जाता है कि लगता है जैसे इसका मकसद पूर्णता में उस विधा विशेष का भला करने के लिए है। यह धोखे का एक ऐसा खेल है जिसे सभी समझते होते हैं लेकिन गंभीर बने रहते हैं। हालाँकि गंभीर बने रहने की भी अपनी एक सीमा होती है जो मामला के हद से आगे बढ़ते ही टूट जाती है और जब कभी ऐसा होता है तो उस सत्य को छूने की जगह अमूमन उस व्यक्ति की मंशा और निहितार्थ की पड़ताल की जाने लगती है जो इस जकड़न के टूटने का कारक बनता है।

पिछले तीस वर्षों से दिये जाने वाले 'भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार' की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग गये हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है बल्कि शुरू से ही साहित्यकारों का एक वर्ग था जो इसे शक की नजर से देखता था लेकिन अब खुद चयनकर्ता ने इस पर सवाल खड़े कर दिये हैं। पुरस्कार के प्रारंभिक दिनों से ही जुड़े रहे और चयन समिति के पाँच सदस्यों में से एक विष्णु खरे ने बाजाप्ते एक लेख लिखकर इस पूरे खेल का पर्दापफाश किया है। उन्होंने लेख के शुरू में ही सवाल उठाते हुए कहा है कि,''क्या चर्चाधीन पुरस्कार के सारे निर्णायक इतने योग्य और पूर्वग्रह मुक्त हैं कि वे पात्रा कवि की 'पिछले वर्ष' की 'श्रेष्ठ' कविता जान और चुन सकें, क्या वे सारी वांछनीय कविता पढ़ चुके होते हैं, क्या सारे निर्णायक और हिन्दी कविता के सभी किस्म के पाठक सचमुच सहमत हो पाते हैं कि पुरस्कृत कविता विचाराधीन वर्ष की श्रेष्ठ कविता है?'' उनका जवाब अधिकांश मामलों में नकारात्मक है।

उन्होंने खुद अपने चयन पर भी सवाल उठाये हैं। पिछले तीस वर्षों में उन्होंने छह लोगों को चुना जिनके बारे में संक्षेप में अब वे खुद क्या आकलन करते हैं यह जानना बेहद दिलचस्प होगा। विनोद भारद्वाज को उन्होंने एक ऐसे कवि के रूप में याद किया है जिनका नाम सहज ही जुबां पर नहीं आता। हालाँकि इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि वे कम लिखते हैं या शायद इसलिए कि वे कवियों की धक्का-मुक्की में नहीं रहते। लेकिन लगता है कि वे शायद यह कहना चाह रहे हैं कि वे एक अनियमित कवि हैं। विमल कुमार के बारे में उनकी टिप्पणी है कि वे स्तरीय कविता नहीं लिख पा रहे हैं और इधर उनकी कविताओं में झोल बढ़ा है। संजय चतुर्वेदी के बारे में उनकी धारणा है कि वे नकारात्मक हो चुके हैं।

इन कवियों को क्रमशः वर्ष १९८२, १९८७ और १९९२ में पुरस्कृत किया गया था। इन तीनों के अलावा उन्होंने जिन तीन अन्य कवियों का चयन किया था वे हैं- नीलेश रद्घुवंशी ;१९९७द्ध, आर चेतनक्रांति ;२००२द्ध और गीत चतुर्वेदी ;२००६द्ध। इन तीनों के चयन को आज भी उन्होंने सही ठहराया है। अगर इनमें से यह देखते हुए कि २००० के बाद के पुरस्कृत कवि पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी तो एकमात्रा नीलेश रद्घुवंशी बचती हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि चयनकर्ता को तसल्ली है कि वह सही हैं यानी कि छह में सिपर्फ एक पर बात जाकर टिकती है। हिसाब के जानकार लोग कह सकते हैं कि यह १६-१७ प्रतिशत के बीच का मामला है। वैसे यह प्रतिशत और भी नीचे गिरेगा जब तमाम दूसरे चयनित कवियों की भी तस्वीर सापफ होकर सामने आएगी।

खुद अपने चयन के बाद उन्होंने अशोक वाजपेयी द्वारा चयनित कवियों की खबर ली है। हालाँकि कोई जरूरी नहीं है कि दूसरों के चयन पर उनके विचार से उसी तरह सहमत हुआ जाए जिस तरह खुद उनके द्वारा किए गये चयन पर हुआ जा सकता है। पिफर भी उनकी राय जानना महत्वपूर्ण होगा। १९८० में अरुण कमल को पहले पुरस्कार के लिए अशोक वाजपेयी ने ही चुना था। विष्णु खरे ने इस चयन पर यह कहकर कि आज १९७९ में प्रकाशित अन्य कवियों की कविताओं को याद करना असंभव सा है, उन सभी कवियों की कविताओं की याद ताजा कर दी जिनकी कविताएँ उस वर्ष प्रकाशित हुई थीं। एक अन्य लेख में वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने इस संदर्भ में आलोक धन्वा की कविता 'कपड़े के जूते', मंगलेश डबराल की 'एक स्त्राी' के साथ वीरेन डंगवाल, राजेश जोशी, ज्ञानेंद्रपति, वेणु गोपाल, मनमोहन को याद किया है।

यानी कि यह मान लेने में किसी को कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए कि पहले पुरस्कार के लिए ही एक कमजोर कविता का चयन कर अशोक वाजपेयी ने यह सापफ कर िदया कि इस पुरस्कार की योजना के पीछे हिन्दी कविता की किसी मजबूत धारा को विकसित करना नहीं है बल्कि इसका मकसद उस कविता का निषेध करना है जो विचारधारा को साथ लेकर चलती है। इसलिए हम देखते हैं कि बाद में उन्होंने जिनका चयन किया उनमें से कइयों को आज खुद को कवि कहते हिचकिचाहट होगी चाहे वे गगन गिल हों या तेजी ग्रोवर या गिरिराज किराड़ू या नामवर सिंह द्वारा चयनित अनिल कुमार सिंह हों या केदारनाथ सिंह द्वारा चयनित उदय प्रकाश हों या नेमीचंद जैन द्वारा चयनित राजेन्द्र द्घोड़पकर जबकि दूसरी ओर नीलाभ, अष्टभुजा शुक्ल, कात्यायनी, अनिता वर्मा, पंकज सिंह, मदन कश्यप, नीलय उपाध्याय, आशुतोष दुबे, निर्मला पुतुल, रंजीत वर्मा आदि कवियों की ठीक वैसी ही उपेक्षा की गयी जैसी उपेक्षा आलोक धन्वा, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, गोरख पांडे, वेणु गोपाल आदि की पहले की गयी थी।
इस तरह कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक बेहद मजबूत कवियों की लंबी कतार के बरक्स कमजोर या कई बार तो अकवि से दिखते कवियों की कतार खड़ी करने की एक कोशिश की गयी इस पुरस्कार के जरिए।

१९७९ में जब इस पुरस्कार की रूपरेखा अशोक वाजपेयी तैयार कर रहे थे तो अतिवामपंथी कहे जाने वाले कवियों से निपटने की चुनौती थी उनके सामने, साथ ही कलावादी कवियों को साहित्य में स्थापित करने की बेचैनी भी और इसके अलावा उन्हें वामपंथी लेखकों के संगठनों से भी निपटना था। इसके लिए उन्हें एक ऐसे मंच की जरूरत थी जहाँ उदारवादी कम्युनिस्टों मतलब कि ऐसे वामपंथी जिनका चेहरा मानवाधिकारवादियों से मिलता हो, को आने में कोई परेशानी न हो। एक सापफ-सुथरी छवि पैदा करने की गरज से ही अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह और विष्णु खरे का इस्तेमाल किया और दुर्भाग्य तो यह कि वे इस्तेमाल हुए भी। अगर वे इस्तेमाल नहीं हुए होते तो ठीक वही सब नहीं होता जो अशोक वाजपेयी ने पहले से सोच रखा था।

उन्हें पता था कि युवा प्रगतिशीलों को उनकी ओर आने में कोई झिझक नहीं होगी अगर ये तीनों उनके साथ खड़े रहते हैं। उनका लाया जाना इसलिए जरूरी था क्योंकि बिना उनके आये वे सच्चे अर्थों में वामपंथी कवियों को निस्तेज नहीं कर सकते थे। सिपर्फ ढोबले, गिल और ग्रोवर के भरोसे वे इस लड़ाई को नहीं लड़ सकते थे उन्हें अरुण कमल, विमल कुमार, संजय कुंदन, चेतनक्रांति जैसे कवियों की सख्त जरूरत थी। उन्हें ऐसे चेहरे चाहिए थे जो आधुनिक दिखते हों ताकि प्रगतिशीलता का धोखा खड़ा किया जा सके। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि इन उदार वामपंथियों या मानवाधिकारवादियों ने कलावादियों से भी ज्यादा खतरनाक भूमिका निभायी। और ऐसे में अगर कोई कहे कि ऐसा उन्होंने जानबूझ कर किया तो उसे जबरन चुप नहीं कराया जा सकता।

प्रत्येक दस वर्ष में 'उर्वर प्रदेश' नाम से पुस्तक के प्रकाशन का मकसद यह स्थापित करना था कि यही वे कवि हैं जो पिछले दस वर्षों में आए हैं हिन्दी साहित्य में। इस तरह से तीस वर्षों में इन्होंने तीन पुस्तकें निकाली और संगठन और विचारधारा का निषेध करते हुए अलग से तीस कवियों का एक कुनबा बनाया। इन सब पर एक नजर डालने पर उपरोक्त तर्क की सच्चाई को बल मिलता है। अशोक वाजपेयी ने इस कुनबे को बनाने की शुरूआत 'कविता की वापसी' के नारे के साथ की थी। यह नौवें दशक की शुरूआत थी। संगठन की जगह व्यक्तिवाद और विचारधारा की जगह दशकों के कवियों की अवधारणा को स्थापित किया जा रहा था। बाजारवाद और वैश्वीकरण के इस देश में प्रवेश करने की सुगबुगाहट का दशक था वह। सोवियत संद्घ के पतन का दशक भी था वह।

बाद के दिनों में इस बाजारवाद ने सबसे ज्यादा अहित किसानों का किया। दो लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएँ कर लीं पिछले बीस वर्षों में। करोड़ों लोगों को बेद्घरबार होने पर इसी दौरान मजबूर होना पड़ा। अचानक गरीब से भी बदतर हो गये वे। उजड़ते गाँवों और बेतरतीब शहरों के बीच भटकते करोड़ों बेरोजगारों का देश होकर रह गया भारत। और इसी भारत को कुछ लोग 'कविता की वापसी' की सपफलता मान रहे हैं। वे इस भयावहता को जश्न के मौके के रूप में देख रहे हैं। अपने अधिकार के लिए लड़ते आम आदमी पर लड़ाकू जहाज से हमला करने को तैयार बैठी है सरकार और इसी सरकार से सत्ता के गलियारे में अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन कराने की पफाइल लिए द्घूमते देखा गया है इन्हें।

ये वही लोग हैं जिन्होंने मंच से कई बार द्घोषणा की है कि अब कहीं कोई आंदोलन नहीं है। प्रेमचंद जयंती पर अशोक वाजपेयी जब ऐसा बोल रहे थे तो ठीक उसी वक्त छत्तीसगढ़ और लालगढ़ के जंगलों में आदिवासियों को द्घेरकर उन पर चारों ओर से गोलियाँ बरसाने की योजना बना रही थी सरकार। उनके नेताओं को गिरफ्रतार किया जा रहा था, उन्हें चारों ओर से खदेड़ा जा रहा था। बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी उनका सीधा समर्थन करते हुए सड़क पर उतरी हुई थीं। और वे अकेली नहीं थीं बल्कि उनके साथ बु(जिीवियों का पूरा हुजूम था। उमड़ती हुई जनता को उनके पीछे देखा जा सकता था। उन्होंने इस बात की भी परवाह नहीं की कि इस वर्ष साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए उनका नाम भी दौड़ में शामिल है और वे सलमान रुश्दी से आगे चल रही हैं और ऐसे समय में माओवादियों का साथ देना उन्हें नोबेल पुरस्कार से वंचित कर सकता है, उन्होंने आम आदमी की लड़ाई में शरीक होना ज्यादा जरूरी समझा। क्या हिन्दी में है कोई महाश्वेता देवी? कहाँ है हिन्दी में बु(जिीवियों का वह समूह जो सड़कों पर उतरने से नहीं द्घबराता?

किसी एक हिन्दी कवि का वे नाम बतायें जो एक दिन के लिए भी दांतेवाड़ा के जंगलों में गया हो, जिसने सलवा जुड़ूम की असलियत को अपनी आँखों से देखने की कोई कोशिश की हो, जिसने कभी नंदीग्राम या सिंगूर में चल रहे संद्घर्ष को नजदीक से जानना चाहा हो। मुझे पता है कुछ लोग एक स्वर में बोल पड़ेंगे कि कवियों-लेखकों पर ऐसी कोई शर्त नहीं लगायी जा सकती। वे उसी साँस में यह भी कहेंगे कि बेहतर रचना कहीं चले जाने से नहीं रची जा सकती। वे यह सब कहेंगे लेकिन यह कभी नहीं कहेंगे कि बेहतर रचना के जो मापदंड उन्होंने तय कर रखे हैं उसे बदलने का वक्त आ गया है। क्योंकि ऐसा कहते ही उन्हें महाश्वेता देवी या अरुंधती राय के रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाना पड़ेगा जहाँ हर वक्त गिरफ्रतारी का खतरा मंडराता रहता है।

वे इस राह पर मरते दम तक नहीं चलना चाहेंगे और अगर उन्हें मजबूर किया गया तो पक्का है कि कई सापफ कह देंगे कि वे कवि-उवि नहीं हैं जो हैं उन्हें ले जाइए। दरअसल सत्ता के गलियारे से बाहर इन्हें धूप लगती है, मुरझा जाने का खतरा पैदा हो जाता है, इनकी कल्पनाशीलता जवाब देने लगती है। अगर इनकी कल्पना की उड़ान देखनी है तो तब देखिए जब ये किसी प्रतिष्ठान की कुर्सी पाने की जोड़-तोड़ में लगे होते हैं, जब ये किसी पुरस्कार को अपने जबड़े में दबोचे होते हैं या जब ये विदेश यात्राा के लिए धक्कामुक्की कर रहे होते हैं।
जनता ने इन्हें पहचानने से इंकार कर दिया है।

८०-डी, पॉकेट-बी, दिलशाद गार्डेन, दिल्ली-११००९५
मो. ०९२१३४३६४९४

 
 
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