अक्टूबर २०१०

 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
बातों-बातों में
नामवर सिंह के साथ बातचीत : प्रेम भारद्वाज और गोपेश्वर सिंहद्ध
यह लद्घु-मानवों के अभ्युदयका दौर है
 
विलक्षण प्रतिभा और विवादास्पद शख्सियत वाले स्टार आलोचक नामवर सिंह खुद को दोहराने या आत्म-प्रचार में विश्वास नहीं करते। यह उनकी साधारण के पीछे छिपी असाधारणता भी है। हमारे लम्बे साक्षात्कार के आग्रह को पूरी विनम्रता के साथ यह कहते हुए टाल दिया- जो पहले कहा जा चुका है, उसको दोहराने का कोई मतलब नहीं। वह सांप के निकल जाने पर लाठी पीटने सरीखा होगा। बात कुछ नए ढंग की होनी चाहिए। 'एकाक्षरी' किस्म की बात हो तो क्या कहने? हमें उनकी सलाह उचित लगी। अपने शत्राु और मित्राों के लिए अनिवार्य बने नामवर सिंह ने बातों-बातों में जो भी कहा उसका साहित्य के लिए ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि इसमें कई बातें नई हैं तो कुछ उनकी बदली हुई राय। जो भी है, वो अब आपके सामने है

;प्रेम भारद्वाज के प्रश्नद्ध
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मूल शिक्षा क्या ग्रहण की?
'चढ़िए हाथी ज्ञान को सहज दुलीचा डाल!
प्रथम वाक्य लिखने में आप बहुत परिश्रम करते हैं क्या है इसका रहस्य?
रहस्य जैसा कुछ नहीं। अंग्रेजी की वह उक्ति है न? 'ॅमसस इमहंदए ींसि कवदम'
शुरुआत अच्छी तो आधा काम हो गया। बस यही समझ लीजिए।
मंच पर जाने से पहले की तैयारी कैसी होती है?
अध्यापन-कक्ष में जाने जैसी, जो अक्सर बेकार साबित होती है।
अकेलापन कितना परेशान करता है?
वैसे तो अकेले होने के क्षण कम ही होते हैं, लेकिन जब होते हैं तो आलम कुछ ऐसा होता है-
'तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता!'
लेकिन उस 'तुम' के बारे में सवाल न ही करें तो अच्छा!
प्रेम? आपकी दृष्टि में?
'प्रेमा पुमर्थो महान्‌'
हिन्दुत्व क्या है? आपकी न८ार में?
'त्व' अवांछित है।
मौत से डर लगता है?
जो निश्चित है उससे डर क्या?
बकौल गालिब 'मौत का एक दिन मुअक्षयन है'? लेकिन मिसरे के दूसरे हिस्से का तजुर्बा नहीं
'नींद क्यों रात भर नहीं आती!'
जीवन का सबसे दुख भरा पल?
माँ को उसकी अंतिम द्घड़ी में न देख सका।
सबसे बड़ी खुशी?

'कि खुशी से मर न जाते अगर एतबार होता।' गर८ा कि अभी तक ऐसी खुशी का मौका आया ही नहीं।
बड़े आलोचक की पहचान?
राजशेखर की 'काव्य मीमांसा' के अनुसार जो 'तत्वाभिनिवेशी' है और आनंदवर्धन की तरह 'सहृदय-हृदय चक्रवर्ती'
;प्रो. गोपेश्वर सिंह के प्रश्नद्ध
ऐसा काम जिसे करने का अपफसोस हो?
अपफसोस तो यही है कि अपफसोस भी नहीं।
ऐसा काम जिसे न करने का अपफसोस हो?
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।
वह अकेली पुस्तक जिसे आप निर्वासन में साथ रखे?
रामचरित मानस।
आपका प्रिय भोजन?
सत्तू
दुबारा जीवन मिले तो आप कैसा जीवन जीना चाहेंगे?
पुनर्जन्म में विश्वास ही नहीं है।
आपकी प्रिय अकेली आलोचना पुस्तक?
दूसरी परंपरा की खोज
अकेला आलोचक?
विजय देव नारायण साही
अकेला कवि?
रद्घुवीर सहाय
अकेला कहानीकार?
निर्मल वर्मा
अकेला उपन्यासकार?
पफणीश्वरनाथ रेणु
अकेला निबंधकार?
हरिशंकर परसाई
किसी एक महापुरुष को चुनना हो तो किसे चुनेंगे?
महात्मा गाँधी
गाँधी और मार्क्स में किसी एक को चुनना हो तो?
मार्क्स को- विचारक के रूप में।

इस दशक के १० कवि, १० कहानीकार, १० उपन्यासकार और १० आलोचक?
इन सवालों को सुनकर त्रिालोचनजी के एक सानेट की यह पंक्ति सहसा याद आ रही है-
''प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है, उसमें कहीं त्रिालोचन का तो नाम नहीं है।'' वाकया १९५० के आसपास का है। इशारा स्व. प्रकाशचन्द्र गुप्त की ओर था। इसके बाद ऐसी भूमिका में उतरने का साहस भला यह नाची८ा कैसे करता?

वैसे, इस दशक में उभरने वाली कुछ प्रतिभाओं के बारे में पूछना चाहें तो बात और है।
वही सही- एक-एक करके कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना के क्षेत्रा की नई प्रतिभाएँ?
;कद्ध कवियों में अष्टभुजा शुक्ल, हरिश्चन्द्र पांडे, देवीप्रसाद मिश्र, राकेश रंजन और गीत चतुर्वेदी ने मुझे आकृष्ट किया।

;खद्ध कहानीकारों में महेश कटारे, एस.आर. हरनोट, योगेन्द्र आहूजा, नीलाक्षी सिंह, अल्पना मिश्र और संजय कुंदन ने। और हाँ, यदि गीत चतुर्वेदी की सौ-सौ पृष्ठों की लम्बी कहानियों को उपन्यास न कहकर कहानी ही माने तो निश्चय ही गीत चतुर्वेदी भी।

;गद्ध जहाँ तक उपन्यासों का सवाल है, कम ही पढ़ पाया हूँ। हाल ही में जिन उपन्यासों को पढ़ने के लिए समय निकाल पाया उनमें 'विसर्जन' के लेखक राजू शर्मा और हरीचरन प्रकाश के 'उपकथा का अंत' की याद ता८ाा है।

;द्घद्ध जहाँ तक आलोचना का सवाल है, या तो साहित्यिक समालोचना के नाम पर किसिम-किसिम के 'विमर्श' हो रहे हैं या पिफर ऐतिहासिक अनुसंधान के कार्य हो रहे हैं। कभी-कभी अच्छी पुस्तक समीक्षाएँ मिल जाती हैं या पिफर किसी पूर्ववर्ती कृति का गंभीर पुनः पाठ। अभी हाल ही में पुरुषोत्तम अग्रवाल की 'अकथ कहानी प्रेम की' आई है जो कबीर की गंभीर पुनर्व्याख्या है। अन्य युवा आलोचकों में से कुछ के नाम लेने का मतलब होगा उन्हें औरों के निशाने पर लाना। जो आप भी न चाहेंगे।
आप अपने खतों का क्या करते हैं?

कौन से ख़त? जो मुझे मिले हैं वे प्रायः सुरक्षित हैं- खासतौर से साहित्यिक मित्राों के। उनमें से कुछ-एक के तो प्रकाशित भी हो गए हैं। जहाँ तक मेरे लिखे हुए पत्राों का सवाल है उनमें से कुछ तो काशी ने प्रकाशित कर दिए हैं, बाकी तो उनकी थाती है जिन्हें लिखे गए हैं।

वैसे, दूर-संचार के वाचिक साधनों की वृ(ि के चलते पत्रा-लेखन की प्रवृत्ति क्षीण हो चली है। स्वयं मैंने ही पत्रा लिखना छोड़ रखा है तो औरों से क्या शिकायत करूँ? वैसे रमेशचन्द्र शाह जैसे बंधु आदि भी हैं जो अपनी चिर-परिचित द्घुणाक्षर न्याय वाली लिपि में कभी-कभी पत्रा लिख भेजते हैं।
बनारस से उखड़कर दिल्ली में आ बसने पर आपने क्या खोया और क्या पाया?
आपा खोया, सरोपा पाया।

एक आलोचक का जनपद क्या है? और इसी के साथ यह कि आपका जनपद कौन सा है?
'जनपद' से आपका अभिप्राय क्या है, यह ठीक-ठीक समझ नहीं पा रहा हूँऋ पिफर भी अपनी समझ के अनुसार मेरा जनपद तो जे.एन.यू. यानी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी है। लगभग वैसे ही जैसे एपफ.आर. लीविस का कैम्ब्रिज था, रामचन्द्र शुक्ल जी का काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और हजारी प्रसाद द्विवेदी का विश्व भारती, शांति निकेतन!

आपके समय में और आज के साहित्यिक माहौल में बदलाव क्या है?
'आपके समय' का क्या मतलब? क्या आज के साहित्यिक माहौल का हिस्सा मैं नहीं हूँ? इस हिस्सेदारी को महसूस करके ही 'बदलाव' को समझा जा सकता है। प्रसंगवश मुझे बौ( दर्शन की 'प्रतीत्य-समुत्पाद' की अवधारणा याद आ रही हैऋ जिसका अर्थ है 'विच्छिन्न-प्रवाह'। यह बदलाव बीसवीं सदी के अंतिम दशक से ही शुरू हो गया था, जब सोवियत रूस के समाजवाद का अंत हो गया, जो राजनीति की भाषा में 'दूसरी दुनिया' कहलाती थी। विडंबना यह कि इसके बाद वह 'तीसरी दुनिया' भी खत्म हो गई जिसमें अपना देश 'भारत' गिना जाता था। गर८ा कि अर्थतंत्रा की दृष्टि से संपूर्ण विश्व एक जैसा हो गया, जिसे 'भूमंडलीकरण' के नाम से पहचाना जा रहा है। जिसका मोटे तौर से अर्थ है 'बाजार तंत्रा का वर्चस्व! कला, साहित्य और संस्कृति में भी इस बा८ाार-तंत्रा का दखल सापफ दिखाई पड़ रहा है। इस बदलाव को 'विच्छिन्न-प्रवाह' की रोशनी में देखने की कोशिश की जा सकती है।

आपने जब शुरू किया तब शीत-यु( का समय था। दुनिया दो शिविरों में बंटी थी। आलोचना भी। आपने एक शिविर को चुना। यदि आज शुरू करना हो तो अपने सामने कौन चुनौती होगी?
इस भूमंडलीकरण की आंधी की चपेट में जब अपनी तीसरी दुनिया भी आ गई है तो हमें मार्क्स के 'कम्युनिस्ट द्घोषणा पत्रा' के व८ान पर वही नारा पिफर दुहराना होगा कि दुनिया के लेखकों एक हो! खोने के लिए तुम्हारे पास कुछ नहीं है सिवा अपनी ८ांजीरों के। लेखकों के लिए ये जंजीरें खास तौर से अपने दिमागी मकड़जाले हैं।
यथार्थवाद और कलावाद/रूपवाद का जो विवाद था, वह आज आलोचना के लिए कोई माने रखता है या नहीं?
विडंबना यह है कि अपनी आलोचना इतनी 'यथार्थवादी' हो गई है कि साहित्य के रूप पक्ष और कला पक्ष पर पिफर से ८ाोर देने की ८ारूरत महसूस होती है- यह जानते हुए कि 'रूपवाद' और 'कलावाद' इतिहास की वस्तु हो चुके हैं!

लेखक की मृत्यु हो चुकी है और सबका अपना-अपना पाठ है। तब आलोचना?
निराला के उस गीत को याद कीजिए- 'मरा हूँ ह८ाार मरण!'
लेखक की मृत्यु कई तरह से होती है। इस 'मृत्यु' के धोखे में न आइए! मृत्यु तो आज दरअसल पाठक की हो गई है। पिफलहाल मेरी चिंता के केन्द्र में वह पाठक है!
महावृत्तांत का दौर खत्म हो चुका है, तब विश्वदृष्टि की ८ारूरत क्यों है? है भी या नहीं?
'महावृत्तांत का अंत' अब एक पिटा हुआ मुहावरा है। यह तो 'लद्घु' मानवों के अभ्युदय का दौर है। विजय देव नारायण साही के उस लेख को क्यों भूल रहे हैं?
दार्शनिकों ने दुनिया की तरह-तरह से व्याख्या की है। क्या सचमुच व्याख्या हो चुकी है?
उपर्युक्त उक्ति को आपने आधे में ही क्यों छोड़ दिया? उत्तरार्ध को भी याद कीजिए क्योंकि असल काम है दुनिया को बदलना!
अध्यापन आलोचना में कितना सहायक, कितना बाधक होता है?
वह तो एक तरह से मेरी 'प्रयोगशाला' रही है। अब वह छुटी तो अपना लिखना भी कम हो गया!
वह शेर है न-
जब मैक़दा छुटा तो पिफर अब क्या जगह की कैद। मस्जिद हो, मदरसा हो, कोई खानाख्वाह हो!
परिवार आलोचना-कर्म में बाधक है या साधक?
यहाँ तो कोई परिवार भी अब नहीं रहा! पिफर भी लिखना कहाँ हो पाता है?
लिखा तो सब कुछ तभी जब भरा पूरा परिवार साथ था- मेरा अपना सच ताे यही है।

 
 
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