अक्टूबर २०१०

 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
पुस्तक के बहाने
परंपरा का बोध और परंपरा की खोज
भगवान सिंह
 

'दूसरी परंपरा की खोज' में एक शिष्य के मन में अपने गुरु के प्रति हुए अन्याय की गहरी पीड़ा और उसी अनुपात में उनके विचारों और वस्तुदृष्टि की आवेशपूर्ण पक्षधरता दिखाई देती है। ये दोनों बातें इसे मार्मिक बनाती है, वस्तुपरक और सन्तुलित नहीं रख पातीं। द्विवेदी जी क्यों काशी आना चाहते थे, शान्तिनिकेतन जहाँ उनका दूसरा जन्म हुआ था, उसमें सुलभ और प्रस्तावित अनन्य सुविधाओं को छोड़ कर काशी क्यों आना चाहते थे, इस पर एक लंबी चर्चा है। ये विवरण न तो द्विवेदी जी की महिमा को प्रकट करते हैं, न ही इतनी सुविधाओं के बीच अपने को दरिद्र मानने और कहने के औचित्य को। नामवरजी स्वयं अपने जीवन में उससे कठोर दौरों से गुजरे हैं और मुझे याद नहीं कि उन्होंने किसी से या किसी बहाने अपना दैन्य प्रकट किया हा

 

 

इतिहास, परंपरा, समाजरचना, नृतत्व, भाषा और संस्कृति पर मेरी समझ इन क्षेत्राों के अधिकारी विद्वानों से कुछ अलग है। विद्वानों के बीच मेरी स्थिति द्विवेदी जी के एक पात्रा खट्टर काका की है। अपने पात्रा के नाम का अर्थ द्विवेदीजी ने तो नहीं समझाया, नामवरजी को समझाना चाहिए था। उन्होंने भी नहीं समझाया। खट्टर का अर्थ है खटने वाला, पोथी से नहीं, आँखों से देखने वाला और अपनी आँखों पर भरोसा करने वाला।
हमारा समस्त चिन्तन एक ऐसे मिथक से निर्देशित रहा है जिसके समर्थन में जालसाजी का प्रयत्न तक किया गया पर दो सौ साल के अनवरत श्रम के बाद भी एक भी प्रमाण नहीं जुट पाया पिफर भी हम उस मिथक को निर्णायक कसौटी मान कर प्रामाणिक को ही नहीं, प्रमाणों को भी खारिज करते रहे। अन्त में वह मिथक हवा हो गया।
हमारा सीधा तर्क यह रहा है कि यदि क, ख, ग, द्घ का आधार घ है और क की गहरी छानबीन में घ ध्वस्त हो जाता है तो क, ख, ग, द्घ में से एक नहीं अपितु सभी ध्वस्त हो जाएँगे और हमें सभी निर्मितियों को नए आधार पर रखना होगा। आर्य जाति, आर्य आक्रमण, यहाँ तक कि आर्यभाषा, उसके पीछे भारोपीय परिवार काल्पनिक सत्ताएँ हैं जिन्हें इतिहास, नृतत्व, पुरातत्व, तुलनात्मक भाषाविज्ञान सभी का आधार बनाया गया था। आर्य जाति का खंडन तो पहले से होता आ रहा था, पिछले तीस चालीस वर्षों में आर्य भाषा-भाषियों के किसी आक्रमण या आव्रजन का भी खंडन विविध क्षेत्राों के विशेषज्ञों के द्वारा होता रहा। परन्तु हमारे विशेषज्ञ एक ऐसी अन्धी गली में पहुँच गए थे, जहाँ से आगे रास्ता नहीं था। उनमें पीछे लौटने की ईमानदारी न थी। नए अनुसंधानों को स्वीकार करने पर उनका सारा कृतित्व ध्वस्त हो रहा था। अतः सूचना के स्रोतों से निकट से जुड़े होने पर भी वे जगत गति की व्याप्ति से अलग खड़े रहे- स्तंभित! चालीस साल तक सौ साल पुरानी बातें दुहराते हुए! इनमें इतिहासकार भी थे, पुरातत्वविद भी थे, नृतत्वविद भी थे और समाजशास्त्राी भी थे। यहाँ तक कि वेदज्ञ और संस्कृतज्ञ भी।
मैंने छोटा सा काम यह किया कि आर्य द्रविड़ भाषाओं के कतिपय पक्षों के विवेचन में यह दिखाया ;१९७३द्ध कि ये दोनों भाषाएँ दसियों हजार साल से भारतीय परिवेश में विकसित होती आई हैं। बोलियों के विविध अनुपातों में द्घुलने मिलने से पारिवारिकता और अलगाव का भ्रम पैदा करती हैं। उदाहरण के लिए पत्ते की गिरने की ध्वनि, पत्ते की संज्ञा, और गिरने ;पतनद्ध का और पत्ते के गुण ;पतलाद्ध और पत्ते से बने ;पतूखी, पत्तलद्ध या उससे संबंधित ;पत्रा, पातीद्ध या अनुगुण ;पतीला, पतीली, पात्राद्ध जैसी शब्दावली का विकास होता है। पात्रा के लिए पत्ते से संबंधित शब्द उसी सांस्कृतिक और जलवायविक परिवेश में संभव था जिसमें पत्ते या पत्तों को गूंथ कर बनाए गए उपादान में भोजन किया और परोसा जाता रहा हो। पात्रा से पहले की शब्दावली यूरोपीय भाषाओं में नहीं मिलेगा या मिलेगा तो अर्थान्तर के साथ, जैसे अंग्रेजी का पेटल - पफूल का दल, पर पाटरी मिल जाएगी जो पात्रा का ही तद्भव या रूपान्तर है। अर्थात्‌ भांड निर्माण से पहले की शब्दावली केवल भारत में है, इसके बाद की इसी मूल से निकली आधी अधूरी शब्दावली भारोपीय में परिगणित अन्य भाषाओं में मिल जाएगी जबकि बाद का भी समग्र केवल भारत में। यह तो हुई पत की एक ध्वनि से निकली शब्दावली, परन्तु पंख पफड़पफड़ाने ;जो मूर्धन्य ध्वनि वाली बोली से संपर्क से पहले पत्‌ ही थी और पाँव के भूमि पर रखने से उत्पन्न ध्वनि पत्‌ की ऐसी ही शब्दावली, पिफर एक के आशयों का दूसरे पर आरोपण और उससे निकली व्यंजनाएँ। सबके मामले में यही देखने में आता है।द्ध
पिफर आँग्वेद का हड़प्पा की उपादान संस्कृति से मिलान करते हुए एक पाठ तैयार किया ;१९८७द्ध और दिखाया कि हड़प्पा सभ्यता और वैदिक समाज के बीच तो कोई भिन्नता है ही नहीं। रही सही कसर थी भी पूरी हो गई। परन्तु जुंबिश अंग्रेजी में प्रकाशन ;दि वेदिक हडप्पन्स, १९९५द्ध के बाद ही दिखाई पड़ी।
इन अध्ययनों के बाद अब वैदिकभाषी ही हड़प्पा सभ्यता के निर्माता बन गए। यह सभ्यता हजारों साल के दौरान भारतीय भूभाग में ही विकसित हुई थी, यह बात मार्शल ने भी मानी थी जिसका आग्रह था कि यह सभ्यता वैदिक हो ही नहीं सकती। अतः भारत में वैदिकभाषी इससे पहले हजारों साल से थे। इसकी कुछ पड़ताल भारतीय सभ्यता की निर्मिति ;२००४द्ध में भाषा वैज्ञानिक साक्ष्यों से आ चुका है।
हजारों साल पहले की वे नवपाषाणी संस्कृतियाँ भी आधुनिक खुदाइयों से प्रकट होती जा रही हैं- खंभात की खाड़ी, मे''गढ़, लूकणसर, भिर्राना, कुणाल, काल्डिहवा, महगरा, चौपानी मांडो, लहुरादेवा आदि। यह सिलसिला आगे भी जारी रहने वाला है। अब वे मिथक और विश्वास और कलाविधान जिनका आँग्वेद में प्रयोग हुआ है वे भी कई हजार साल में विकसित होते दिखाई देते हैं।
वे सारे काम जो द्घटक 'घ' को आधार बना कर प्रकांड विद्वानों और चिंतकों द्वारा मानविकी के किसी भी क्षेत्रा में किए गए थे, गलत हो गए और जहाँ गलत नहीं हुए वहाँ भी गड़बड़ी और हड़बड़ी तो गोचर होने ही लगी। इसके अपवाद द्विवेदी जी भी नहीं हैं, न ही रवीन्द्रनाथ हो सकते थे। हमारा परंपराबोध ही नहीं समाजबोध भी इसलिए भिन्न है कि 'घ' पर आधारित समाज रचना के छिन्न-भिन्न हो जाने के बाद जिस समाज रचना का साक्षात्कार होगा वह तत्वतः भिन्न होगा ही।


भारत में दो परंपराएँ बहुत प्राचीन काल से विद्यमान हैं। कम से कम दस हजार साल से। इस दस को बढ़ाकर बीस किया जा सकता है, परंतु द्घटा कर नौ नहीं। झूम खेती के प्रथम प्रयोग के साथ ही यह अलगाव पैदा हो गया। आज से आठ-नौ हजार साल पहले तक कृषिकर्मियों ने स्थायी बस्तियाँ बसा ली थीं। इसके प्रमाण लगभग पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मिलते जा रहे- खंभात की खाड़ी, मे''गढ़, लूकणसर, भिर्राना, कुणाल, कोल्डिहवा, महगरा, चौपानी मांडो, लहुरा देवा आदि। सिलसिला जारी है। इनमें से अनेक उस काल रेखा पर पहुँचते हैं या उससे भी पीछे जाने की संभावना प्रकट करते हैं जिस पर पश्चिम एशिया के जर्मो, जेरिको, नातूपफ, शतलहुयुक आदि को देखकर कल्पना कर ली गई थी कि कृषि का आरंभ पश्चिम एशिया में हुआ था। यह कहना भी गलत होगा कि यह भारत में ही हुआ था। अभी तक की उपलब्ध सामग्री से पश्चिम एशिया पर प्रश्न चिथ लगने लगे हैं और समस्या अधिक पेचीदा हो गई है। एक महा अटन क्षेत्रा है जिसमें समय असमय विचरण करने वाले कृत्रिाम उत्पादन की दिशा में लगभग कुछ ही आगे पीछे स्थाई बस्तियाँ बसाने और खेती को अपनी जीविका का प्रधान स्रोत बनाने की दिशा में अग्रसर होते दिखाई देते हैं।
स्थायी खेती से पहले अस्थिरता का एक लंबा दौर है जो अभाव के दिनों की उस दुर्गति से बचने की एक सूझ के साथ आरंभ हुआ कि जिन वरुण प्रद्घासों ;औषधियों या अनाजोंद्ध को हम जहाँ-तहाँ से दूसरे जानवरों चरने और चिड़ियों के चुंगने से बच जाने पर एकत्रा करते हैं यदि उनकी एकत्रा खेती और देखभाल करते हुए पूरा बचाया जा सके तो अभाव के दुर्दिनों में क्षुधानिवारण आसान हो जाएगा। इस विचार से प्रथमतः प्रेरित होने वालों ने जंगल का कुछ भाग जला कर उसमें खेती आरंभ की। परन्तु यह सोच कहाँ पैदा हुई और किनमें पैदा हुई इस परअधिक गहनता से भारतीय विद्वानों को काम करना चाहिए। पाश्चात्य विद्वान यह काम ईमानदारी से नहीं कर सकते।
इस प्रस्ताव का दूसरों ने विरोध ही नहीं किया, अपितु उनके प्रयास को विपफल करने का हर संभव प्रयत्न किया। पिफर भी झूम खेती को क्रमशः कुछ और जनों ने अपनाया। भारतीय सन्दभ्र्ा में हम इतना अधिकार के साथ कह सकते हैं कि इसमें अग्रणी भूमिका जिन लोगों की थी, वे जो बोली बोलते थे उसका ही विकास संस्कृत में, ''ास वैदिक में और पुनरु(ार पाणिनीय संस्कृत में हुआ।
राक्षस ;वनसंपदा की रक्षा के लिए कटिब( जनद्ध और असुर ;कृत्रिाम उत्पादन के विरोधीद्ध और दनु या दानव ;मिल-बाँट कर खाने और उदार भाव से किसी अपरिचित को भी देने वालेद्ध, इन कृषिकर्मियों की निन्दा इनको देव और ब्राह्मण ;दोनों का अर्थ था 'आग लगाने वाले'द्ध कह कर करते थे और अपने प्रयास में बाधा डालने के कारण ये राक्षसों, असुरों, दानवों से जितनी द्घृणा करते थे उससे भी अधिक द्घृणा वे देवों/ब्राह्मणों से करते थे। राक्षसों के सच्चे उत्तराधिकारी विश्नोई ही रह गए हैं जो पेड़ कटने की आशंका होने पर उससे चिपक कर खड़े हो जाते हैं- पहले मुझे काटो पिफर पेड़ को। अविश्वसनीय अतिजीविताओं के इस देश में जो मृत प्रतीत होता है वह भी जाने कहाँ किस रूप में जीवित मिल जाए- जीवित भी और सार्थक भी।
हमारी आसुरी परंपरा बहुत सारी परंपराओं का विपाक है। यह उन असंख्य जनों, भाषाभाषियों की अपनी मान्यताओं, विचारों, भाषाई द्घटकों, अनुभवों, कल्पनाओं, विश्वासों और अन्धविश्वासों का द्घोल जो विगत हिमयुग में प्राणरक्षा के लिए जिधर भी सूझा पलायन करने को बाध्य हुए थे और जिनमें से जो भाग्यशाली थे उनमें से ही कुछ से उत्तर, पूर्व, पश्चिम और यहाँ तक कि देर-सवेर आग्नेय दिशा से भी भारतीय भू-भाग में पहुँचे थे। हिमालय की दीवार के कारण उत्तरी हवाओं का भारत पर वैसा असर नहीं था जैसा पश्चिम एशिया में। यहाँ की प्रकृति भी उतनी कृपण न थी। अतः यह सबसे सुरक्षित कोना था। इस विशेषता के कारण ही यह हिमयुग में ही 'मनुष्यता का सागर' बन गया। नृतत्वशास्त्रिायों द्वारा पहचाने गए लक्षणों- काकेशीय, अल्पाइन, भूमध्यसागरीय, मंगोलीय, दक्षिणदेशीय ;आस्ट्रिकद्ध, निगर, नीग्रोसम, पोलीनेशियन, और ऊपर से जाने कौन-कौन से जन जिनका श्रेणीविभाग हुआ ही नहीं, यहाँ की आबादी में तलाशे जा सकते हैं।

यदि आदमी प्राण रक्षा के लिए भागा था तो जानवर भी उसी चिन्ता से न भागे हों यह संभव नहीं। अतः भारतीय पर्यावरण में विचित्रा लगने वाला झबरा भालू, द्घोड़ा, हाथी, आदि भी भाग कर पहुँचने को विवश थे। शीत से बचाव के लिए चर्बी की उतनी मोटी पर्त और प्रचुर आहार जो पहले जरूरी थी, अब न होने कारण उनके कद-काठी में भी कुछ कमी आनी ही थी। उस महा-आपदा ने भारत को केवल मानव-समुद्र नहीं बनाया जीवप्रजाति का भी सबसे बड़ा आश्रयस्थल बना दिया। परन्तु इतनी सारी भिन्नताओं वाले समुदायों के अनुभव के साझे रिक्थ ने उस सर्जनात्मकता को भी जन्म दिया जिससे विश्व सभ्यता का उदय हुआ। हमें नैतिक और बौ(कि रूप में जितने जतन से कुपोषित बना कर रखा गया है उसमें अन्तिम बात अधिकांश लोगों को पचने वाली नहीं है। परंतु यह सच है कि भारतीय सभ्यता विश्वमानवों की साझी संपदा है और विश्व सभ्यता का मूल इस सुयोग या कुयोग के कारण ही भारतीय भूभाग।
इस अन्तर्ग्रथित और विपाकी परंपरा को असुर/दानव/राक्षस कोई परंपरा कहा जा सकता है क्योंकि इनमें सर्वनिष्ठ तत्व था प्राकृतिक स्रोतों पर पूर्ण निर्भरता ।
इस तर्क से सभ्यता की दिशा में आगे बढ़ने वालों की परंपरा को देव परंपरा या ब्राह्मण परंपरा या आर्य परंपरा कहा जा सकता है। ब्राह्मण से हमारा तात्पर्य ब्राह्मण जाति से नहीं, उस समुदाय से है जिसने आग लगा कर जंगलों-झाड़ियों की सपफाई करके खेती के प्रयत्न आरंभ किये। यह दूसरी बात है कि बाद में वर्णव्यवस्था स्थापित होने पर ब्राह्मण उस पुरानी अवस्था की क्षीण स्मृति के आधार पर अपने को आग का पर्याय और धरती का देव बताने लगा और दूसरों को भी इस भ्रम में डालने में सपफल हुआ कि वह भूदेव है, उसका क्रोध विनाशकारी है, शाप तो सर्वनाश ही कर डाले।
अतः दूसरी परंपरा या लोक परंपरा को पहली परंपरा कहना अधिक उचित होगा। इन दोनों में वैसा विरोध नहीं है जो आर्य और आर्येतर, आगत और स्थानीय, आक्रान्ता और आक्रान्त के द्वन्द्व से पैदा किया गया था। यह सच है कि किसी भी दिशा से भारत में लोगों का आना और यहाँ से बाहर जाना कभी रुका नहीं। दुनिया में अन्यत्रा भी नहीं रुका। परन्तु यहाँ उस प्राचीन चरण पर जो तीस, चालीस या पचास हजार पहले तक जा सकता है, वह मानव-महा-सागर तैयार हो चुका था, और आने वाले कुछ समय तक अलग दीखने के बाद उसी में द्घुल कर विलीन हो जाते रहे हैं।
कृषि की ओर अग्रसर होने वाला समाज उसी असुर/राक्षस/दानव समाज से निकला था। भिन्नता भाषा या रक्त की नहीं, कर्म की थी। अपने अतीत के प्रति उसका लगाव और आकर्षण कभी समाप्त न हुआ, परन्तु यह बु(विादी समाज था और पहले की अतर्क्य और नृशंस रीतियों और व्याहाराें को समाप्त करना चाहता था, इसलिए इनकी निन्दा भी करता रहा। जीविका के स्रोतों के साथ मूल्यों को लेकर भी तनाव और समायोजन चलता रहा।
अतः लोक और वेद अलग हो कर भी एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। सांस्कृतिक दृष्टि से भी, भाषाई दृष्टि से भी, जातीय दृष्टि से भी। अन्तर लगभग वैसा ही जैसे उसी परिवार के अनपढ़, गँवार और रूढ़िवादी सदस्यों की तुलना में उससे निकला सुशिक्षित व्यक्ति जिसकी बोली, बानी, वेश और रुचियाँ कापफी भिन्न हो जाती हैं। वेद ने लोक को मिटाया नहीं, संजोया है। लोके च वेदे च, लोकाचार और वेदाचार जैसे प्रयोगों में तो इसे लक्ष्य किया ही जा सकता है, जिनमें लोक वेद से पहले आता है, वैदिक तत्वों के लोकजीवन में समावेश से भी इसे समझा जा सकता है।
इस बात को दुहराना जरूरी है कि लोकाचार उस मुक्त और आहार-संग्रही अवस्था से चले आए हैं जब मनुष्य उत्पादक नहीं बना था, आर्थिक और सामाजिक भेद नहीं पैदा हुआ था। समाज पूरी तरह समान और स्वतंत्रा था। इसे मार्क्सवादी पदावली में हैवानियत ;सैवेजरीद्ध की अवस्था कहा जाता है जो पाश्चात्य सांस्कृतिक नासमझी का प्रमाण है। इसे अधिक औचित्य से आदिम अवस्था कहा जा सकता है।
हैवानियत की अवस्था में जो नासमझी और तिरस्कार भाव है, उसमें यह अपेक्षा ही नहीं की जाती कि सभ्यता के विकास में इस चरण पर जीने वाले या इन अवस्थाओं में कभी रह चुके लोगों का कोई महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है जब कि हमारे जीवनमूल्यों और मानवमूल्यों का स्रोत आसुरी परंपरा ही है। भतृहरि के उस श्लोक को याद करें:
अयं निजः परोवेति गणना लद्घुचेतसाम्‌। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्‌।
'यह मेरा है यह दूसरे का, इस तरह का भेद क्षुद्र लोग ही करते हैं, उदारचरित मनुष्यों के लिए तो पूरी वसुधा ही एक कुटुंब है' और उस आदिम अवस्था का स्मरण कीजिए जिसका चित्राण वायुपुराण में हुआ है और जिसे ही हमने अपने ढंग से प्रस्तुत किया है तो समझ में आ जाएगा कि जिस वसुधैव कुटुंबकं की अवधारणा को हम भारतीय मूल्य व्यवस्था का वैशिष्टय मानते हैं उसका स्रोत वह आदिम अवस्था ही है, जिसमें किसी का कुछ भी निजी और कुछ भी पराया नहीं था। आँग्वेद के कवियों के नामों में विश्वामित्रा, बन्धु, सुबन्धु, विश्वबन्धु, विश्वकाय, विश्वसामा और भौवन जैसे नाम इस बोध के लोक से वेद में प्रवेश की कहानी कहते हैं।
व्यवहार में वसुधा का बोध ही न था। पूरा गण या कबीला एक परिवार था अपने आप में एक विश्व। उसका एक गणपति होता था। गणपति भी ऐसा जिसकी उपस्थिति का पता किसी दूसरे गण से किसी कारण से टकराव की स्थिति में ही चलता था, अन्यथा छोटे बड़े का भेद न था। संभव है कि उसकी योग्यताओं में एक उसका पौरुष रहा हो। मातृप्रधान गणों में गणपति का स्थान गणिका- भाषाभेद से इनकी जो भी संज्ञा होती हो- ले लेती थी। कृत्रिाम उत्पादन, स्थायी बस्ती तथा आगे के विकास के क्रम में इनका चरित्रा, कार्यभार और अधिकार बदलता रहा।
शतपथ ब्राह्मण में इस बात की क्षीण याद है कि कबीलाई अवस्था में ही मनुष्यों ने क्षेत्राीय बटवारा कर लिया था और उसी के भीतर सीमित रहते थे। इसकी सीमाओं के लिए पहले 'मर्यादा' का प्रयोग चलता था। मर्यादा का अर्थ हुआ जिसका उल्लंद्घन होने पर जान पर बन आती थी। रामायण में बालि और सुग्रीव के प्रसंग में इसका ही झलक कुछ बदले रूप मे मिलती है। इस तरह देश, राष्ट्र और मातृभूमि की अवधारणा तथा इसकी रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग की परंपरा भी इस अवस्था का ही अवशेष है।
अकेले चोर की तरह नहीं खाना, बाँट कर खाना, अकेले हों तो किसी संभावित अतिथि के लिए पहले उसका हिस्सा अलग करके अपना भाग ग्रहण करना, जिसकी अभिव्यक्ति 'एको स्वादु न भुंजीत' जैसे नीतिवाक्य, और परंपरावादी परिवारों में भोजन से पहले अग्रासन या भोजन का एक अंश अलग कर देने की रीति में देखा जा सकता है। अतिथिदेव की अवधारणा भी उसी अवस्था की देन है।
मोटे तौर पर कहें तो हमारे नैतिक मूल्य और आत्मिक पक्ष से जुड़ी मान्यताओं, दर्शनों और आन्दोलनों- मधुविद्या, उपनिषद, जैन, बौ(, सि( और सन्त साहित्य- की जड़ें उस आदिम चरण तक पहुँचती हैं। यह अकारण नहीं है कि सि(ों की उलटबासियों का आँग्वेद की पहेलियों से सीधा संबंध दिखाई देता है। व्यापक स्तर पर बुझौवल या पहेली में भी उसी की छाया दिखाई देती है। योग, शैव और शाक्त मत के मूलाधार उसी अवस्था में तलाशे जा सकते हैं।
अल्प से संतोष, अपव्यय से परहेज, प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण, कराधान के लिए वह आदर्श जिसमें कहा गया है कि जैसे भ्रमर पफूल को क्षति पहुँचाए बिना उसका रस ग्रहण करता है उसी तरह राजा को कर इस तरह उगाहना चाहिए कि वह पीड़ित न हो आदि भी उसी दार्शनिक सोच की देन है। अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, इन्द्रियनिग्रह१ ;जिसका ही चरम और अव्यावहारिक रूप ब्रह्मचर्य हैद्ध क्रोध, लोभ, भय, द्वेष पर नियंत्राण आदि के आदर्श भी उसी से आए हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह समाज बहुत आदर्शजीवी था। उसमें आपसी मुठभेड़ में हिंसा भी बहुत होती थी। इसके निवारण के लिए ही उस काल के बु(मिानों ने लोगों को संयम से काम लेने का दर्शन दिया था, जो जीवन में था पुस्तकों में नहीं। मितव्ययिता और सहभागिता तो अभाव के दिनों के अर्थशास्त्रा से पैता हुई थी जब खाद्यान्न के संकट से उबरने के लिए गूलर, महुआ, पीपल, बड़, पाकड़ ;प्लाक्ष या पिलखलद्ध के गोदे को सुखा कर रखा और इस उपलब्ध कन्दों आदि के साथ कंजूसी से खाया जाता था कि सबकी जीवन रक्षा हो सके। कहें दर्शन जीवन से पैदा हुआ था और मूल्य बन कर आगे जारी रहा। बौ( धर्म जिसके लोकमत में विगलन की बात द्विवेदी जी करते हैं, वह उसी मूल्यव्यवस्था को आदर्श मान कर चला था। बौ( भक्षुओं के लिए श्मशान में पफेंका हुआ वस्त्रा भी उपयोग की चीज था। चीवर पफट जाने पर जब तक उसमें पैबन्द लगाते हुए उसका उपयोग किया जा सके तब तक उपयोग करना, पिफर जीर्णशीर्ण हो जाने पर उससे पायदान बना लेना, उस रूप में भी उपयोग के योग्य न रह जाने पर पफर्श लीपने के लिए पोंछा बना कर प्रयोग में लाना। इसी तरह के विधान मिट्टी के पात्राों के विषय में भी, उस आदिम अर्थशास्त्रा की देन है जो मूल्य बन कर जीवित रहा था। ध्यान रहे कि बु( की ज्ञात जीवनी के अनुसार उनको खेती में हल चलाने से होने वाले कीटों के बाहर आकर विनाश की अधिक चिन्ता है, मात्रा मनुष्य के जीवन यापन के लिए कृषिकर्म की नहीं। इसमें एक उन्नत स्तर पर देव-व्यवस्था के प्रति वैसा ही अवज्ञा भाव है जैसा असुरों/राक्षसों/दानवों के कृषिकर्म ;यज्ञद्ध के विरोध में दिखाया गया है। इस तथ्य को समझे बिना अतिविदों ने जैन और बौ( मत के उत्थान को क्षत्रिाय-ब्राह्मण संद्घर्ष बना दिया। यह सच है कि इन विचारधाराओं के प्रसार के बाद ब्राह्मणों पर वैसा ही आर्थिक संकट आया जैसा संकट तुलसी को सि(ों-संतों की बढ़ती प्रतिष्ठा, राजकीय आश्रय के 'यवन महामहिपाल' होने, इस्लाम की चुनौती और सि(ों के प्रतिनिधि योगियों और संतमत अपनाने वालों के इस्लाम में प्रवेश से दिखाई दी थी। तुलसी का वर्णवाद मुझे अर्थशास्त्राीय लगता है न कि धर्मशास्त्राीय। उन्होंने अपने बचपन की दारुण अवस्था का जो चित्राण किया है वह सच था, उसका कारण उन्होंने वर्णव्यवस्था के प्रति उपेक्षा भाव को माना, अन्यथा यह जानते ही कि यह बालक ब्राह्मण है, उनकी उदरपूर्ति की विकट समस्या तो हल हो ही जाती। महान कृतियाँ सांस्कृतिक संकट की पूँजी पर ही लिखी गई हैं, वह वाल्मीकि के नाम से प्रचलित रामायणम्‌ हो अथवा व्यास के नाम से प्रचलित महाभारत, या उन्हीं के नाम से जाने जाने वाले पुराण। उनके पूर्वरूप विवरणात्मक रहे होंगे। अस्तु।
हमारी कलाओं, क्रीड़ाओं और विनोद के रूपों का स्रोत भी वही आसुरी अवस्था है। प्रचुरता के दौर में पेट भरने के लिए कुछ समय में ही आहार जुट जाता था। अब प्रश्न खाली समय को बिताने का था। मक्रट न होने और मक्रटक्रीड़ा तक सीमित न होने के कारण अपने खाली समय का उपयोग मनुष्य ने अधिक कल्पनाशीलता से किया। नृत्य, संगीत, अभिनय का भी आरंभ यहीं से होता है। अभिनय आरंभ में पशुओं आदि की नकल करके चौंकाने और डराकर मनोरंजन करने तक सीमित था, पिफर कुछ और आगे चल कर संवादों से भी जुड़ा और इस तरह नाटक का विकास हुआ। इसमें पशुओं के सींग और सिर की अस्थियों को मुखौटे के रूप में लगाने, पक्षियों के पंखों से अपने को सजाने आदि के आयोजन हुआ करते थे। कुछ समुदायों ने अपने को अपनी कल्पना के अनुसार प्रभावशाली या सुन्दर बनाने के लिए इनको अपने वेश का अंग बना लिया था। पफैशन परेड कराने वालों को अपने इतिहास का ज्ञान हो तो उन्हें यह भी पता चल जाएगा कि वे आदिम अवस्था का अत्याधुनिक में द्घोल पैदा कर रहे हैं जो समाज को आगे ले जाने की गारंटी तो नहीं देता, परन्तु यह भी सच है कि वह इस कारण ही उसे पीछे भी नहीं ले जाएगा। अपने को सुन्दर और ओजस्वी दिखाने के विधानों का इतिहास बहुत पुराना है और जड़ें इतनी गहरी हैं कि आप चाहें तो भी खोद नहीं सकते।
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आश्चर्य नहीं कि बाद तक नृत्य संगीत और अभिनय से जुड़ी जातियों- यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, किरात आदि- उसी आदिम पृष्ठभूमि से जुड़े रहे हैं। बाजीगरी, जिसका चित्राण आँग्वेद में भी है, उसी अवस्था के मनोरंजनों अथवा अपेक्षाओं का विकास है। रस्साकशी तो एक ही शिकार पर दो शिकारियों के दावे और खींच कर ले भागने का ही विकसित रूप है।
कहें हमारे नैतिक मूल्य ही नहीं, जीवनमूल्य, कलारूप और कलामूल्य भी उस अवस्था में ही जन्म ले चुके थे। भारतीय गल्प जिसमें पशु-पक्षी मानव पात्राों की तरह आते हैं, उनका स्रोत भी वह आदिम चरण ही है। खजुराहो, कोणार्क आदि की मूर्तियों में अंकित क्रियाओं, विवाह आदि में किए जाने वाले कुछ आयोजन और महिलाओं द्वारा गाए जाने अमर्यादित गान, यज्ञों के अवसर पर लोकाचार के नाम पर कतिपय ऐसे ही आयोजन, होली के त्योहार का कामोन्माद ये सभी उसी स्रोत से संबंध रखते हैं। ऐसे बहुत से बुनियादी कार्य हैं जिनका विकास उस आदिम अवस्था में या उससे जुड़े हुए लोगों ने किया था, जिनके बिना सभ्यता का जन्म हो ही नहीं सकता था, जैसे मछियारी के क्रम में नौवहन, पशुशावकों को पकड़ना और उनको शिक्षित करना या साधना, जड़ी बूटियों की पहचान और उनके औषधीय गुणों का निर्धारण, मधुसंग्रह, प्रस्तर शिल्प और शिलाओं के माध्यम से कुछ खनिजों की पहचान आदि। इन्हीं में मादक औषधियों की पहचान और उनके सेवन की लत भी शामिल है।
मनुष्य ने उत्पादन आरंभ करके जैसे प्रकृति पर समग्र निर्भरता से मुक्ति पाई उसी तरह उसने लिपि का विकास करके ज्ञान के लिए श्रुत परंपरा पर एकान्त निर्भरता से मुक्ति पाई। कई लोग मानते हैं कि पौराणिक परंपरा अवैदिक है और वैदिक परंपरा का संबंध आर्यों से है। रोचक बात यह है कि वे वेदों को भी श्रुत परंपरा से ही जोड़ते हैं। यह भी एक चूक है। वेद लिखित साहित्य है और अपने रचना के समय भी लेखन की सहायता से इतनी विदग्ध उक्तियों को रचने के बाद स्मृति में रखा जा सकता था। पौराणिक परंपरा उस दौर से संबंध रखती है जिसमें विचारों को अंकित करने की कोई युक्ति नहीं विकसित हुई थी अथवा रैखिक संकेतों का इतना विकास नहीं हो पाया था उनके माध्यम से कोई विचार शब्दशः प्रस्तुत किया जा सके, यद्यपि वस्तुओं का प्रस्तुतीकरण उतना कठिन न था। अतः चित्रा या संकेत के माध्यम से कथ्य के सार को प्रेषित करने की एक विधि अपनाई जाती थी जिसका विकास चित्राकथाओं या चित्रालेखन में हुआ। पाश्चात्य हैवानी बोध में शैलाश्रयों और गुपफाओं में अंकित चित्राों को भी नहीं समझा जा सका। उन्हें टोना-टोटका या सिंपैथेटिक मैजिक से जोड़ दिया गया। सच यह है कि जैसे दूसरी कलाओं का विकास उस चरण से संबंध रखता है उसी तरह चित्राकला भी उस चरण तक जाती है और उसे कलात्मक रागात्मकता के साथ चित्रिात किया गया है।


जिसे हम वेद या शास्त्रा की परंपरा कहते हैं और जिसको नामवरजी ने पहली परंपरा माना है, उसे हावी या दबंग ;कवउपदंदजद्ध परंपरा के अर्थ में ही ग्रहण किया जा सकता है। अंग्रेजी में इनके लिए प्रयुक्त हायर टै्रडिशन और लोअर ट्रैडिशन ;प्रवर परंपरा और अवर परंपराद्ध अधिक समीचीन हैं। भारतीय लोक परंपरा की शास्त्राीय परंपरा से लगातार जुगलबन्दी चलती रही है। हमारी भाषा के सबसे प्राचीन शब्द वे नहीं हैं जो संस्कृत से आए हैं, अपितु वे हैं जो आज भी लोक भाषाओं में मिल जाते हैं।
शास्त्राीय परंपरा स्वतः भी कई परंपराओं का विपाक है। वेद की भाषा में तीन भाषाई समुदायों के तार जुड़े हुए हैं और ऊपर से कुछ और भी द्घुला-मिला है जो निपातों के रूप में पहचाना जा सकता है। जैसे किसी लुप्तप्राय बोली की उकारान्तता जो तेलुगू में सबसे अधिक पाई जाती है, वैदिक संस्कृत में इदु, अदु, एदु आदि में दृष्टिगोचर होती है और मध्यकालीन बोलियों में पिता माता आदि के पितु मातु आदि प्रयोगों में लक्ष्य की जा सकती है। हमारे सांस्कृतिक चरित्रा के निर्धारण में उनकी भूमिका अनेक रूपों में उजागर होती। द्विवेदी जी की भाषा के आर्य और आर्येतर के सिरे से इस रचाव को नहीं समझा जा सकता, यद्यपि काम चलाऊ रूप में हम इन्हें देव और देवेतर का योग कह सकते हैं। इसका इतिहास बहुत पीछे जाता है।
वैदिक समाज को अपने प्राचीन और अर्वाचीन कालों का बोध था। उनके विवेचन में देव युग, मानुष युग और आने वाले ;आ ते गच्छन्ति उत्तरा युगानिद्ध युगों की चर्चा है जिसे स्थायी आवास से पहले के चरण, बाद के चरण और आगामी चरण कहना अधिक सही होगा। इनमें से प्रत्येक की दीर्द्घता कई हजार साल की है।
परंपरा के लिए आँग्वेद में स्रुति का प्रयोग हुआ है। इस परंपरा में विश्व प्रपंच के भौतिक विकास की व्याख्या को देव परंपरा या प्रकृति विज्ञान के बोध की परंपरा और सामाजिक-आर्थिक विकास को मनुष्यों की परंपरा के रूप में याद किया गया है :
द्वे स्रुती अशृणवं पितृणां अहं देवानां उत मर्त्यानाम्‌ ।
ताभ्यां इदं विश्वं एजति समेति यत्‌ अन्तरा पितरं मातरं च। आँ. १०.८८.१५
मैंने पितरों से देवों और मनुष्यों के दो मार्गों या परंपराओं को सुना है। इनमें धरती और आकाश के बीच का समस्त प्रपंच आ जाता है।
प्राचीन श्रुतियों की अभिज्ञता और काव्य रूढ़ियों के निर्वाह का प्रयत्न हम आँग्वेद में आदि से अन्त तक पाते हैं और संभवतः यही कारण है कि वैदिक कवि स्वयं भी श्रुति की बात करते हैं :
तं पृच्छन्तो(वरासः पराणि प्रत्ना त इन्द्र श्रुत्यानु येमुः।
अर्चामसि वीर ब्रह्‌मवाहो यादेव विद्म तात्‌ त्वा महान्तम्‌। आँ. ६.२१.६
स तु श्रुधि श्रुत्या यो दुवोयुर्द्याैर्न भूमाभि रायो अर्यः ।
असो यथा नः शवसा चकानो युगे-युगे वयसा चेकितानः ॥ ६.३६.५
इन्द्रः किल श्रुत्या अस्य वेद स हि जिष्णुः पथिकृत्सूर्याय।
आन्मेनां कृण्वन्नच्युतो भुवद् गोः पतिर्दिवः सनजा अप्रतीतः ॥ १०.१११.३
हम विस्तार से वचने के लिए केवल पहले उ(रण का ही अनुवाद करेंगे।
अर्वाचीन लोग तुम्हारे प्राचीन कृत्यों के बारे में जिज्ञासा करते हैं, जिसे हम श्रुतियों से ही जान पाते हैं। ऐ वीर! हम तुम्हारी प्रशस्तियों से अर्चना करते हैं और जितना ही तुम्हें जानते जाते हैं, उतना ही तुम्हारी महानता प्रकट होती है।
अतः श्रुति वेद का नाम नहीं है उस परंपरा लब्ध ज्ञान का नाम है जिसे आधार बना कर कवियों ने अपनी रचनाएँ अपने समय में की। इसमें बहुत प्राचीन काल में किए गए कारनामों के हवाले आते हैं। अतः इस बात को दुहराना जरूरी है कि वेद लोक से ही निकला है, लोकमानस में शास्त्राों और संस्कृत काव्यों से अधिक सहज गति से प्रवाहित रहा है और लोकजीवन में उसकी अनन्त अभिव्यक्तियाँ पाई जाती है जिनकी चर्चा यहाँ अप्रासंगिक है।
परन्तु संस्कृत कवियों ने, वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भवभूति, भारवि और माद्घ तक ने आँग्वेद से कविता का मर्म सीखा है, उसके कवियों से प्रतिस्पर्धा की है और उससे आगे नहीं बढ़ सके और जहाँ बढ़ भी सके वहाँ उसी की पूँजी के बल पर, यह अध्ययन का अलग विषय है।
यहाँ इतना ही कि पाश्चात्य अध्येताओं ने आँग्वेद को धर्मग्रंथ या पुरोहितों के उपयोग की रचना बना कर रख दिया, अपनी समझदारी का प्रमाण देने वालों ने उनकी मान भी ली, परन्तु भारतीय कवियों ने तुलसी पर्यन्त आँग्वेद को एक काव्यकृति मान कर पढ़ा है और उससे कवि के रूप में ही सीखा है।
परन्तु वेद लोक का अनुकार नहीं, परिष्कार है। लोक वेद का प्रेरणास्रोत। आँग्वेद शिष्ट साहित्य है। इसमें लौकिक कुरीतियों की, भदेसपन की, अशिष्टता की, अभद्र और कठोर भाषा की, अमर्यादित व्यवहार की निन्दा पाई जाती है जबकि लोक में इनका खुल कर व्यवहार होता है।
हजारों वर्ष तक चलने वाले उस लंबे द्घमासान में जिसे आँग्वेद ने अपना प्राचीन काल कहा है, मूल्यों का टकराव और प्रतिस्पर्धा बनी रही, जिसने सहयोग और सहभागिता का भी रास्ता अपनाया। समुद्र मंथन में देव और असुर दोनों भागीदार हैं। इस सांस्कृतिक मन्थन से ही क्रमशः नगर सभ्यता का विकास हुआ। इसलिए आँग्वेद में एक ओर तो असुर परंपरा के कवि दिखाई देते हैं दूसरी ओर देव परंपरा के और पिफर तो देवों को भी अपनी शक्ति और चातुर्य के लिए असुर कहने में आपत्ति नहीं रह जाती। प्रतिस्पर्धा का ही एक रूप यह है कि असुर भी कहने को असुर रह जाते हैं, वैभव और उत्कर्ष का मार्ग वे भी अपनाते हैं और नगर सभ्यता के उदय में उनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यह है वह इतिहास जो प्राचीन कृतियों से छन कर आता है जिनको प्रचुर प्रमाणों और आँकड़ों के साथ मैंने अपने लेखों और कृतियों में प्रस्तुत किया है। अतः यहाँ उनका उल्लेख मात्रा पर्याप्त है। इसके दायरे में ही मैं अपनी बातें रख सकता हूँ।


'दूसरी परंपरा की खोज' परंपरा की खोज नहीं है, न ही उसमें ऊपर के विकास का बोध है। कारण, उस समय तक ही नहीं अभी हाल तक 'कारवां आते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया' का ही बोध हमारी चेतना में कूट-कूट कर भरा गया था। द्विवेदी जी के शब्दों में ''ना ना देशों से ना ना जातियाँ आईं जिन्होंने ना ना समय पर ना ना आचार प(तियों के द्वारा ना ना प्रकार से आर्य संस्कृति को समृ( किया।'' यह उस वस्तुस्थिति का धुँधला और किंचित विकल पाठ है और यह विकलता कालबोध और वस्तुबोध दोनों कारणों से है। जिन आर्यों की बात द्विवेदी जी करते हैं उनकी तो बात ही नहीं की जा सकती, पर जिस अर/अल या हो ;ीवमद्ध का खेती के आरंभिक चरण पर प्रयोग किया गया और जिससे ही आर्य संज्ञा ने जन्म लिया, उस चरण से भी पहले यह बहुमिश्र साँचा तैयार हो चुका था, जिसे भारतीयता कहते हैं जिसके मूल्यों और दायों का हवाला हम दे आए हैं। इसी से वह अग्रणी समुदाय भी निकला था जिसने कृषि के प्राथमिक प्रयोग किए थे। यदि हम भारत में देव पूर्वपद वाले स्थान नामों और देव उपनामों पर ध्यान दें तो पाएँगे ये भी किसी एक क्षेत्रा के निवासी नहीं थे, दूसरे समुदायों की तरह यत्रा-तत्रा बिखरे हुए थे और उस चरण से ही एक का दूसरे पर प्रभाव पड़ रहा था। द्विवेदी जी बोध के स्तर पर इससे अवगत हैं और स्वीकार करते हैं कि सब कुछ अविशु( है, शु( कुछ भी नहीं, परन्तु यह अवस्था आँग्वेद से भी पहले आ चुकी थी इसका आभास उनके लेखन में नहीं मिलता। चरित्रा को ले कर भी कुछ अस्पष्टता है। अविशु(ता के बाद भी अलग पहचान और शु(ता का भ्रम इस महारास को और भी रंगारंग बना देता है।
जिनमें भारतीय परंपरा का किंचित्‌ गहनतर बोध था, जैसे प्रसाद में, उनके विचारों को हमने यह कह कर किनारे डाल दिया कि ये कोरी भावुकता या देशप्रेम के उद्गार हैं। उन्हें इतिहास की अधिक गहरी समझ थी इसे इतिहास ने सि( कर दिया। अनुमानतः प्रसाद जी की यह धारणा अपने निजी अध्ययन और राखालदास बनर्जी से मौखिक चर्चाओं के योग से बनी थी।
शान्तिनिकेतन, जहाँ द्विवेदी जी का नया जन्म हुआ था, एक ऐसे ऊहापोह की स्थिति में खड़ा दिखाई देता है जिसमें यह तय करना कठिन हो जाता है कि हमारी सही सांस्कृतिक पहचान क्या है। द्विवेदी जी शान्तिनिकेतन पहुँचे उसके कुछ ही आगे पीछे बहुत रोमांचक द्घटनाएँ द्घटित हुई थीं। इनमें से एक था सुनीतिकुमार चटर्जी का शोध प्रबन्ध जिसमें अपने विवेचन में उनका ध्यान बार-बार इस तथ्य की ओर जाता है कि संस्कृत का बोलियों की समृ(ि में जो भी योगदान हो, इसने बोलियों से बहुत कुछ लिया है और इसलिए उनका बहुत पहले से अस्तित्व था। दूसरा था उनके और प्रपफुल्लचन्द्र बागची के संपादन में स्वयं उनके और सिल्वियाँ लेवी, प्रित्स्लुस्की, ब्लाख आदि के लेखों का संकलन जिनमें यह दावा किया गया था कि वैदिक तथा हमारी आधुनिक भाषाओं ने द्रविड़ के अतिरिक्त मुंडा आदि से बहुत कुछ लिया है। तीसरा था सिन्धु सभ्यता का उद्द्घाटन जिसके उत्खनन कर्ताओं में सबसे प्रमुख राखालदास का यह मत कि उस समय सरस्वती द्घाटी में देव सभ्यता पल रही थी और सिन्धु द्घाटी में असुर सभ्यता। बनर्जी की रपट को मार्शल ने अपनी बृहद् रपट में स्थान नहीं दिया था परन्तु उनके मत से उस समय के प्रबु( जन परिचित थे। इसका एक पाठ तो प्रसाद का था जिसमें भारत को ही मूल देश माना गया था और इस गल्प को नकारा गया था कि आर्यभाषी कहीं बाहर से आए थे। दूसरा सुनीति कुमार चटर्जी जैसों का मत था जो बाहर से आने की बात तो मानते थे परन्तु किसी रहस्यमय तन्त्रा द्वारा हड़प्पा काल में ही आर्यभाषियों को सरस्वती द्घाटी में द्घुसा हुआ बताते थे।
अतः एक ओर तो बाहर से आने वाले आर्य थे, जिनको पशुचारण से आगे बढ़ा नहीं दिखाया जाता था, दूसरी ओर वैदकी कविता थी जिसके मर्म और सौन्दर्य पर गुरुदेव मुग्ध दिखाई देते हैं। द्विवेदी जी ने विशेष आयोजनों पर सबसे पहले वैदिक कविताओं के पाठ के लिए गुरुदेव के आग्रह और उनके आदेश पर कुछ आँचाओं के अपने अनुवाद की और उनमें गुरुदेव द्वारा किए गए सुधार की जो चर्चा की है उस पर ध्यान दें तो पता चलेगा टैगोर स्वयं और उनके संपर्क में रहने वाले विद्वान भी एक कठिन अन्तर्द्वन्द्व में थे। तथ्यों पर आधारित अध्ययनों और उनके निष्कर्षों को आत्मासक्तिवश ठुकराया नहीं जा सकता था, अतः वे आर्य-अनार्य के साँचे को तोड़ नहीं पाते थे। उस काल सीमा को नकार नहीं पाते थे और उस कालसीमा के भीतर भारत के सांस्कृतिक विकास को समेटने पर असंख्य प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल पाते थे। असमंजस कुछ वैसा ही था जो ब्लाक पहेली में एकमात्रा सही अनुक्रम पर ध्यान न जाने तक बहुत कुछ ठीक बैठ जाने के बाद भी अन्त में इस नतीजे पर पहुँचना होता है कि अब सब कुछ नए अनुक्रम में सजाना होगा।
जहाँ तक काल सीमा का प्रश्न है, एक तथ्य पर ध्यान दिलाना उचित होगा। जिस दौर में विंटरनिट्ज़ ने अपना इतिहास लिखा, जिसे उन्होंने गुरुदेव को ही समर्पित भी किया था, उन दिनों ;१९२६ से पहलेद्ध आर्यों के बाहर से आने की मान्यता तो अकाट्य थी, और उनके आने का लगभग सर्वमान्य काल १५०० ई.पू. से पीछे नहीं जाता था। विंटरनिट्८ा ने लाखों वर्ष की प्राचीनता और इस १५००-१२०० की नवीनता को हास्यास्पद रूप में प्राचीन और हास्यास्पद रूप में नवीन कहा था और इसे पुनः २५००-२००० ई.पू. की उस पुरानी अवधि में ले गए थे जिसे कभी हि्‌वटनी आदि ने सुझाया था। कुछ ही साल बाद मोहनजोदड़ो की खुदाई ने पुरातात्विक आधार पर इसी कालावधि की एक महान सभ्यता का उद्द्घाटन भी कर दिया। परन्तु प्रश्न उठता है कि विंटरनिट्८ा ने इस कालावधि को क्या गुरुदेव से हुई चर्चाओं के बीच उनके प्रश्नों और आशंकाओं पर ध्यान देते हुए तो नहीं बदला था? संभावना लगती है, प्रमाण नहीं है। यदि हाँ तो इससे उस असमंजस का भी पता चलता है जिसे गुरुदेव आर्य आक्रमण आदि को मानने पर अनुभव करते थे।
'दूसरी परंपरा की खोज' में एक शिष्य के मन में अपने गुरु के प्रति हुए अन्याय की गहरी पीड़ा और उसी अनुपात में उनके विचारों और वस्तुदृष्टि की आवेशपूर्ण पक्षधरता दिखाई देती है। ये दोनों बातें इसे मार्मिक बनाती है, वस्तुपरक और सन्तुलित नहीं रख पातीं। द्विवेदी जी क्यों काशी आना चाहते थे, शान्तिनिकेतन जहाँ उनका दूसरा जन्म हुआ था, उसमें सुलभ और प्रस्तावित अनन्य सुविधाओं को छोड़ कर काशी क्यों आना चाहते थे, इस पर एक लंबी चर्चा है। ये विवरण न तो द्विवेदी जी की महिमा को प्रकट करते हैं, न ही इतनी सुविधाओं के बीच अपने को दरिद्र मानने और कहने के औचित्य को। नामवरजी स्वयं अपने जीवन में उससे कठोर दौरों से गुजरे हैं और मुझे याद नहीं कि उन्होंने किसी से या किसी बहाने अपना दैन्य प्रकट किया हो।
द्विवेदीजी के विरोधी अपने क्षुद्र स्वार्थ के चलते उनका विरोध कर रहे थे। इसके लिए वे शुक्लजी की आड़ ले रहे थे और प्रचारित कर रहे थे कि द्विवेदीजी ने आचार्य शुक्लकी पूरी परंपरा को ही उलट दिया है। लंबे प्रचार के बाद उन्हें इसमें सपफलता भी मिली। आचार्य शुक्ल का नाम लेकर उनके स्मृति शेष रह जाने के बाद कौन कैसा खेल खेल रहा है, इसमें शुक्लजी कहीं नहीं आते। द्विवेदीजी ने कहीं शुक्लजी के प्रति अनादर नहीं प्रकट किया है। विचारों की भिन्नता और उस भिन्नता को प्रकट करना भी आदर का ही एक रूप है। जिसकी केवल पूजा हो, वह पत्थर बन जाता है।
परन्तु नामवरजी ने इस विषय में सचेत होते हुए भी, शुक्ल जी को ओट बनाने वालों या उनके प्रचार के प्रभाव में द्विवेदीजी की आलोचना करने वालों का सारा क्रोध शुक्लजी पर उतारा है। शुक्लजी कितने संकीर्ण, वर्णवादी या हिन्दुत्ववादी और पुरातनपंथी थे, यह सि( करने पर जितना श्रम नामवरजी ने किया है, यदि यही द्विवेदी की कक्षाओं और व्याख्यानों में भी उभर कर आता रहा हो, तो इससे तो शुक्ल विरोध को द्विवेदी विरोध का रूप देने वालों के ही पक्ष का समर्थन होता है।
शुक्ल बड़े हैं या द्विवेदी यह भी ठीक नहीं लगता। यदि अनेक मामलों में शुक्लजी को गलत सि( किया जा सकता है, तो उतने ही मामलों में इन पंक्तियों का लेखक द्विवेदीजी या नामवरजी को गलत पाता है। क्या इन गलतियों को चिथित करने के कारण वह इन दोनों में से किसी की समकक्षता या उनसे वरीयता का दावा कर सकता है? इन पंक्तियों के लेखक को अन्य बातों के अलावा द्विवेदीजी से एक पीढ़ी बाद का होने का भी लाभ मिला है। द्विवेदीजी शुक्लजी से एक पीढ़ी बाद के आलोचक हैं। शुक्लजी हिन्दी आलोचना के जनक हैं, द्विवेदीजी हिन्दी आलोचना में एक महत्वपूर्ण नाम।
मुख्य प्रश्न यह है कि कोई व्यक्ति अपनी कालगत और वैचारिक परिवेश की सीमाओं को देखते हुए अपनी निजी क्षमताओं की उच्चतम संभावना को प्राप्त कर पाया या नहीं। वह अपने संभाव्य से छोटा रह गया या उसे अतिक्रान्त कर गया। यदि नहीं पहुँचा तो दोष उसके मनोबल और अध्यवसाय का है या उसमें बाधा पहुँचाने वाली शक्तियों का, या उसके अपने गलत निर्णयों का। इसी तरह यदि वह अपनी संभावना को अतिक्रान्त कर गया तो इसमें सहयोगी शक्तियों की भूमिका विशेष थी या बाधक शक्तियों की? ध्यान रहे यदि वे बाधक हैं तो भी वे शक्तियाँ हैं, सहायक हैं तो भी शक्तियाँ ही हैं और सहायक शक्तियाँ कई बार ऊर्जा को मन्द कर सकती है और बाधक शक्तियों के कारण इतनी त्वरा और ऊर्जा पैदा हो सकती है कि लब्धि संभाव्य या अपेक्षित को अतिक्रान्त कर जाए। विचार इस पर होना चाहिए कि इस दृष्टि से शुक्लजी और द्विवेदीजी को अपनी संभाव्यता से कितना ऊपर उठने या नीचे रह जाना पड़ा।
नामवरजी को यह पक्ष सूझ ही नहीं सकता। एक बार मैंने उनका एक अन्तर्दशन ;इंटरव्यूद्ध किया था, और पूछा था जिन पाश्चात्य आलोचकों को वह उ(ृत करते हैं उनको प्रमाण की तरह उ(ृत करने के स्थान पर उनसे दृष्टि ले कर भारत की अपनी परंपरा, सामाजिक स्थिति और अपेक्षा के अनुरूप वह एक सै(ान्तिकी तैयार कर सकते थे। नामवरजी ने सचमुच अपने कान छूते हुए और उन विभूतियों का नाम स्मरण और नमन करते हुए उनकी महिमा को स्वीकार किया था और बताया था कि वह ऊँचाई उनके लिए संभव ही नहीं। इसका सार यह किः
१. नामवरजी की विनम्रता और आदरभाव केवल अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी तक ही सीमित नहीं है, यह उन सभी गुरुओं के प्रति जिनसे उन्होंने कुछ सीखा है। यह एक दुर्लभ गुण है। परन्तु गुरु के प्रति सच्चा आदर उसको अतिक्रान्त करके ही प्रकट किया जा सकता है। जहाँ तक वह पहुँचा था वहाँ से आगे की यात्राा जारी रख कर। प्राच्यवादी षड्यंत्रा का शिकार अकेले नामवरजी की नहीं, भारत के अप्रतिम विद्वानों की साझी त्राासदी है कि उनकी 'महानता' का स्रोत पश्चिम के समक्ष उनके दैन्य में छिपा है जिसका प्रकाशन करने में वे संकोच नहीं करते। वे पश्चिम से सीखते नहीं, उसे अपनाते हैं। अपने शिष्यों को यही सिखाते और पिलाते हैं, भले पाचन शक्ति के अभाव में वे अपफारा करते पिफरें।
२. सुखद यह है कि रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा इस ग्रन्थि से मुक्त रहे हैं। वे पश्चिम को जानते हैं और उसके सामने विनम्रता से पर दृढ़ता से खड़ा होने का साहस रखते हैं।
३. जहाँ तक संभाव्यता को प्राप्त करने या उसका अतिकर्ष करने का प्रश्न है मिशनरी स्कूल में ड्राइंग का वह अध्यापक विमल जिसने बीए भी न किया था जिस ऊँचाई पर पहुँचता है वह हमें विस्मित करती है। द्विवेदीजी अपने संभाव्य से पीछे रह गए, यह कहने में संकोच नहीं। नामवरजी द्वारा उ(ृत उनके ही वाक्य में कहें तो 'कहाँ से शुरू किया और कहाँ आ गिरा हूँ। जो चाहा था वह नहीं हो सका जो सोचा भी नहीं था उसके चक्कर में पफँस गया हूँ।'
मैं नहीं जानता कि द्विवेदीजी को शान्ति निकेतन जाने का अवसर न मिलता तो उनमें शुक्लजी की वे सीमाएँ होती या नहीं जिनके लिए नामवरजी उनकी कुछ कटुता से आलोचना करते हैं। शान्ति निकेतन में वह रामचन्द्र शुक्ल की तुलना में अधिक पुरातनपंथी ब्राह्मण के रूप में पहुँचे थे। यदि उन्हें शुक्ल से अधिक मानवतावादी सि( भी किया जा सके तो यह द्विवेदी ़ टैगोर-प्रभाव हुआ जो उनसे पहले किसी हिन्दी लेखक में पफलीभूत नहीं हुआ था। मूल्यांकन व्यक्ति की प्रतिभा और उसके युग और परिस्थितियों को केन्द्र में रख कर किया जाना चाहिए, न कि व्यक्ति को केन्द्र में रख कर। व्यक्ति को केन्द्र में रखने पर अधिमूल्यन और अपमूल्यन के कई रास्ते खुल जाते हैं और व्याख्या विषाक्त होने से बच नहीं पाती।
रामचन्द्र शुक्ल बंगाल में नहीं, पूर्वी संयुक्त प्रदेश में, द्विवेदीजी से एक पीढ़ी पहले पैदा हुए थे और वहीं रह गए। टैगोर ब्रह्म समाजी आन्दोलन से स्पन्दित बंगाल में पैदा हुए थे और उन्हें उसके मानवमूल्यों का दाय मिला था जिसमें वर्ण और धर्म की कठोरताओं के लिए स्थान न था। उन्हें नोबेल पारितोषिक उस समय मिला था जब बंग भंग से बंगाल में इतना विक्षोभ पैदा हुआ था कि भारत से अंग्रेजों की सत्ता भले न उठी हो, कलकत्ता से राजधानी हटाने की तैयारी आरंभ हो गई थी। उन्होंने नोबेल की राशि से उस हलचल के समय कलकत्ता से दूर बोलपुर के एकान्त में 'शान्ति निकेतन' स्थापित किया था। अरविन्द द्घोष ने निर्वासित हो कर एक अलग कोने में एक आश्रम खोला था। शान्ति निकेतन की शिक्षा प(ति को वह गुरुकुलों के निकट ले गए थे। विचार केवल प्रतिभाओं से पैदा नहीं होते, उनका एक पर्यावरण भी होता है, इसलिए सभी तरह के विचार सब समय नहीं पैदा होते। अपने उपयुक्त पर्यावरण में ही वे जीवित रहते हैं। अन्यथा बचे भी रहे तो निस्तेज या मृतप्राय हो जाते हैं।
रामचन्द्र शुक्ल राजनीति से सीधे जुड़े नहीं रहे परन्तु स्वतंत्राता आंदोलन के लिए कैसे मनुष्य की जरूरत है, उसके निर्माण में कैसा साहित्य सहायक हो सकता है, उसे कैसी कला दृष्टि और मूल्य दृष्टि चाहिए, यह श्रृंगारिक और रहस्यवादी और गूढ़ रचनाओं के प्रति उनकी विरक्ति का कारण था। टैगोर कलकत्ता की राजनीतिक गतिविधियों से दूर, शान्ति निकेतन के और रहस्यवाद के दुहरे एकान्त में जा कर भी अपनी प्रतिभा के कारण समादृत रहे। अन्यथा उनको उक्त दो कारणों से पलायनवादी भी कहा ता सकता था। द्विवेदीजी ने उनसे जो कुछ लिया उसमें न रहस्यवाद है न पलायनवाद, यह द्विवेदीजी के पक्ष में जाता है। अपने उपन्यासों के लिए उन्होंने समकालीन समाज को न लेकर इतिहास में जगह तलाशने की कोशिश की, यह उनके पक्ष में नहीं जाता।
जहाँ तक प्रतिभा का प्रश्न है, शुक्लजी चिन्तक हैं, द्विवेदीजी कला साधक। उनके यहाँ पहुँच कर विचार भी कला रूप ले लेते हैं। कृतियाँ तो ऐसी प्राणवान सूक्तियों से भरी हैं जो वैदिक सूक्तियों की समकक्षता में चली जाती हैं। परन्तु उसका एक कारण यह भी है कि सि(ों तक वैदिक धारा अन्तःसलिला के रूप में प्रवाहित है। उनके पफक्कड़पन ने द्विवेदीजी को भी वह पफक्कड़ी भाषा दी जो हताशा और अकेलेपन के क्षणों में भी व्यक्ति में प्राण शक्ति भर दे। परन्तु चिन्तन और अतीत के बोध के स्तर पर वह शुक्लजी से कमजोर पड़ते हैं। अध्ययन में भी वह गहराई नहीं है जो शुक्लजी में है, और शुक्लजी का जो कुछ है वह उनको किसी से मिला नहीं है, स्वार्जित है और अपने परिवेश परिधि को देखते एक ऊँची छलांग।
शुक्लजी की आलोचनादृष्टि और मान्यताओं की आलोचना की गई है। उनका बचाव मुझ जैसा अल्पज्ञ करने चले तो भी कहीं न कहीं ऐसी गलतियाँ रह जाएँगी कि पढ़ने वाले सोचने की जगह हँसने को विवश हो जाएँ। पिफर भी वह हिन्दी के पहले आलोचक हैं। उन्होंने आलोचना की भाषा दी, आलोचना का क्षेत्रा विस्तार किया और साहित्य की सै(ांतिक समस्याओं पर गंभीरता से विचार किया। रस पर उनके बल को रसों की शास्त्राीय व्याख्या से नहीं अलंकृति और संवेद्यता के बीच संवेद्यता पर उनके बल के सिरे से विचार किया जाना चाहिए। साहित्य की एकांतिक अंतरंगता की अपेक्षा उसकी सामाजिक प्रयोजनीयता पर बल, श्रृंगार पक्ष की अपेक्षा उदात्तता और कर्मठता पर बल, अलंकृति की अपेक्षा संवेद्यता पर बल, रंजकता की अपेक्षा प्रेरकता पर बल, रसिक समाज की अपेक्षा बहुजनग्राह्‌यता पर बल स्वतंत्राता आंदोलन का साहित्यिक मोर्चा था।
'दूसरी परंपरा की खोज' में परंपरा मध्यकाल से पीछे नहीं जा पाती। अतः कबीर-सूर-तुलसी तक सिमट कर रह जाती है। द्विवेदीजी तुलसीदास पर लिखने वाले थे और शुक्लजी कबीर पर लिखने की तैयारी में जुटे थे और धर्मतत्व का सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, विकासवादी और नीतिशास्त्राीय दृष्टियों से गहन अध्ययन कर रहे थे। द्विवेदीजी भी केवल कबीर की बात नहीं करते हैं, वह उन परिस्थितियों का भी चित्राण करते हैं जिसमें कबीर हुए थे। उनके न होने पर या तुलसी की सामाजिक स्थिति में होने पर कबीर उन्हीं समस्याओं से जूझते यह नहीं सोचा जा सकता। द्विवेदीजी जो करते हैं, उसे नामवरजी नहीं कर पाते, वह इतने गंभीर विषय को पोलैमिकल बना देते हैं जिसमें चुना वह जाता है जो आप के इरादों और लालसाओं के अनुकूल हो, शेष को छोड़ दिया जाता है, या उसकी अपव्याख्या की जाती है।
सन्तों में लगभग सभी कारीगर हैं, पेशों से जुड़े हुए लोग, जिनको अपनी सामाजिक हैसियत से गहरा असंतोष है। वे इस मामले में भी संयोगवश वैदिक कवियों के निकट पहुँच जाते हैं, जिनमें लोहे वाले आंगिरस ;अयास्य आंगिरसद्ध और रथ निर्माता भृगुगण, महाजनी करने वाले ;कुसीदीद्ध काण्व, माल ढोने वाले ;रथवीतिद्ध, रथ हाँकने वाले ;शुचद्रथद्ध आदि हैं। दस्तकार अपने काम में सपफाई पर ध्यान देता है। कमी रहे तो जूल-जोड़ बैठ ही न पाए। उसकी भाषा में भी यह सपफाई उतर आती है, वह सीधी और सधी बात कहता है। इसके विपरीत भाषा की कारीगरी करने वाले सीधी बात को भी इतनी टेढ़ी बना देते हैं कि उसे समझने में समय लगता है।
यह निवेदन करना जरूरी है कि लोक की महिमा गाते समय हमें उसे अलौकिक न बना देना चाहिए। वह आधार है और उसमें गुरुत्वाकर्षण है, परन्तु ऊर्जा, सर्जना और जीवन गुरुत्वाकर्षण के विरु( विद्रोह है। लोकानुभव को शास्त्रा का पूरक माना जाना चाहिए न कि शिष्टता और ज्ञान का विरोधी और इनकी तुलना में अधिक वरणीय। शास्त्रा भी अनुभवों का सार ही है, उसमें वर्गीय स्वार्थों की भी झलक मिलती है। अनुभूत को भी रंग दिया जा सकता है।
आसुरी/राक्षसी/दानवी मूल्य व्यवस्था और उसको अचेत रूप में अपनाने वाली परंपरा संक्रान्ति के प्रत्येक दौर में, कहें ब्राह्मणवाद पर किसी कारण से संकट आने पर, बलवती हो कर सामने आती रही है। इसका अपवाद आँग्वेद भी नहीं है। इसकी प्रकृति अन्तर्मुखी रही है, साधनापरक। इसने सामाजिक विषमता का लगातार विरोध किया है, परन्तु यह मात्रा इसी कारण प्रगतिशील नहीं कही जा सकती। बौ( मत का उल्लेख हम कर आए हैं, कबीर में भी आर्थिक पक्ष में रूखी-सूखी खा कर ठंडा पानी पीने पर ही बल है। विकास विमुख अध्यात्मवाद को प्रगतिवादी आंदोलन नहीं कहा जा सकता। यह आदिम अवस्था के गौरवमंडन का ही एक रूप है। अन्याय और विषमता भी प्रगति की अपनी चक्की का ही आटा है। एक ओर आत्मवाद है दूसरी और भौतिकवाद। एक ओर आनन्दवाद है, दूसरी ओर कर्मवाद और भोगवाद। कबीर कबीर हैं, तुलसी तुलसी। कबीर में जो नहीं मिलता उस दुकाल पर क्षोभ और जीविकाविहीन सीद्यमान जनों की तड़प कबीर में नहीं तुलसी में है। और इसका कारण वह कुशासन और दुहरे उत्पीड़न को मानते हैं जिसमें कुछ क्षोभ यवन महामहिपाल को लेकर भी तो है ही। द्विवेदी जी को जिस बात पर हँसी आती है उस पर हमें नहीं आती। विरोध का स्वर उत्तर भारत में जो सीधे मुस्लिम शासन में आ चुका था उठना संभव नहीं था। तुलसी पिफर भी कलिकाल के बहाने यह याद दिलाने से अपने को रोक नहीं पाते कि यह जनसामान्य की, विशेषतः हिन्दुओं की असह्‌य दुरवस्था का दौर है। द्घरों में द्घुस कर सिल, बट्टे और चक्की तक तोड़ देने के अपमान का वर्णन तुलसी करते हैं। द्विवेदीजी ने जिस मध्यकालीन हिन्दू की बात की है वह तो किरातार्जुनीय का किरात हुआ, प्रभाव शून्य या नितांत जड़।
शुक्ल शुक्ल और द्विवेदी द्विवेदी। क्या यह विचित्रा नहीं है कि उत्पादन से जुड़े हुए संतों का स्वर आत्मवादी है और श्रम से परहेज करने वाले वर्णवादियों का स्वर वस्तुवादी और उपभोक्तावादी। यह एक असंतुलित विकास है, और द्विवेदीजी के शब्दों सब कुछ अविशु( है। आवश्यकता शुक्ति की नहीं संतुलन की है। न्याय को विकास के अनुरूप और विकास को न्याय्‌य बनाने की समस्या।
इस विवेचन का एक पक्ष धर्मनिरपेक्षता भी है। धर्मनिरपेक्षता को जिन सामी विरोधी औजारों से अकेले हिन्दुत्व विरोध के रूप में चलाया जाता रहा है उसमें अपने को धर्मनिरपेक्ष माना जाना तक लज्जाजनक लगता है। यह भी उसी प्राच्यवाद की देन है और इसका प्रमाण यह है कि यह रुग्ण हिन्दूवादी राजनीति के विरोध तक ही नहीं रुकता, यह हिन्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तान को भी अपनी लपेट में ले लेता है जिसके कारण इसकी बहुलता और खुला आकाश बचा हुआ है। सेक्युलरिस्ट केवल इनसे ही नहीं द्घृणा करता, अपने को सच्चा सेक्युलर सि( करने की कवायद में वह अपने आप से द्घृणा करने लगता है, और यह बोध उसके चेतन से अवचेतन में उतर कर ग्रन्थि का रूप लेता है। वह जातिवाद कर सकता- पता कीजिए अपने को मार्क्सवादी कहने वाले इतिहासकारों ने अपनी-अपनी जाति के अयोग्य व्यक्तियों को ही उत्तरदायी पदों पर क्यों लगाया- पर अपने समाज का नहीं हो सकता। धर्मनिरपेक्षता को पाखंड का पर्याय बना कर उसकी अन्तर्वस्तु को ही नष्ट कर दिया गया।

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इतिहास लिखने की ओर कोई जाति तभी प्रवृत्त होती है जब उसका ध्यान अपने इतिहास के निर्माण की ओर जाता है। यह बात साहित्य के बारे में उतनी ही सच है जितनी जीवन के। हिन्दी में आज इतिहास लिखने के लिए यदि विशेष उत्साह दिखाई पड़ रहा है तो यही समझा जाएगा कि स्वराज्य-प्राप्ति के बाद सारा भारत जिस प्रकार हिन्दी के विद्वान एवं साहित्यकार भी अपना ऐतिहासिक दायित्व निभाने के लिए प्रयत्नशील हैं। पहले भी जब साहित्य का इतिहास लिखने की परम्परा का सूत्रापात हुआ था तो सम्पूर्ण राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न क्षेत्राों के इतिहास-निर्माण के साथ ही। यदि आरंभिक इतिहासों के इतिहास में न जाकर पं. रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास को ही लें, जो हिन्दी-साहित्य का पहला व्यवस्थित इतिहास माना जाता है, तो उसकी ऐतिहासिकता द्योतित करने के लिए उस युग का राष्ट्रीय आन्दोलन समानान्तर दिखाई पड़ेगा। राजनीतिक इतिहास-ग्रन्थों का सिलसिला भी उसी ऐतिहासिक दौर में जमा। परन्तु शुक्लजी के इतिहास के सन्दर्भ में जो सबसे प्रासंगिक तथ्य है वह है तत्कालीन रचनात्मक साहित्य की ऐतिहासिक क्रान्ति-कविता और कथा-साहित्य का नवीन सृजनात्मक प्रयत्न। साहित्य का वैसा इतिहास तभी संभव हुआ जब साहित्य-रचना के क्षेत्रा में एक ऐतिहासिक परिवर्तन आया, जब सच्चे अर्थों में इतिहास बना।
नामवर सिंह के लेख 'हिन्दी-साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार' से

 
 
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