अक्टूबर २०१०

 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
संवाद
पुनर्पाठ की जरूरत और कुपाठ के खतरे
नामवर सिंह से अरुण आदित्य की बातचीत
 

यह बातचीत सिपर्फ एक विषय 'पुनर्पाठ' पर केन्द्रित है। सबसे पहले इस शब्द को ही समझते हैं, पुनर्पाठ यानी क्या?

पुनर्पाठ यानी पिफर से पढ़ना। पिफर से विचार करना। पुनर्विचार का सीधा संबंध संदर्भ से है। पर हमारे यहाँ कई ऐसे भी लोग हैं जो किसी बात पर पुनर्विचार करना ही नहीं चाहते हैं। जिंदगी भर एक ही बात को दोहराते रहते हैं। एक ही लकीर को पीटते रहते हैं। पहले यह कहा गया है, पहले वह कहा गया है, यही कहते रहते हैं। उनका जोर मूल पाठ पर रहता है। मूलपाठ पर जोर देने को ही बुनियाद परस्ती या पफंडामेंटलिज्म कहते हैं। प्रत्येक देश-काल में ऐसे लोग मिल जाते हैं। चूंकि समय के साथ हर बात का संदर्भ बदल जाता है इसीलिए पुनर्पाठ की जरूरत महसूस होती है, चाहे वह कोई रचना हो या अवधारणा। किसी शब्द का अर्थ दरअसल उसके संदर्भ में होता है। संदर्भ बदल जाने के साथ अर्थ बदल जाता है।
पुनर्पाठ की जरूरत के साथ-साथ इसके अपने खतरे भी होते हैं।

बिल्कुल, खतरे तो हर चीज में हैं। सबसे अहम बात यह होती है कि पुनर्पाठ का मकसद क्या है। कुछ लोग अपनी सुविधा और अवसर देखकर पाठ करते हैं। हमारे कथावाचकों को देखिए वे स्थान-समय और श्रोताओं का मूड देखकर रामचरित मानस की चौपाइयों के तरह-तरह के पाठ करते रहते हैं। यह पुनर्पाठ नहीं अवसरवाद है। मतलब यह कि जितना बड़ा खतरा मूल पाठ पर बल देने में है, उतना ही बड़ा खतरा अवसर के मुताबिक पाठ को बदल देने में है। तत्ववाद और अवसरवाद दोनों ही द्घातक हैं। अपनी सुविधा के मुताबिक पाठ करने की प्रवृत्ति नई नहीं है। तमाम बड़े विचारक इसके शिकार हुए हैं। स्वामी विवेकानंद के विचारों की अलग-अलग व्याख्याएँ की जा रही हैं। गाँधी जी तक को अपनी सुविधानुसार पढ़ा जा रहा है।

आखिर पुनर्पाठ का कोई पफार्मूला तो है नहीं। हर आदमी अपनी मानसिक संरचना के मुताबिक ही पाठ करता है। पिफर अवसरवादी पाठ और एक जरूरी पुनर्पाठ के बीच का अंतर कैसे पहचाना जाए।
जैसा कि मैंने पहले भी कहा पाठ करते समय संदर्भ बहुत महत्वपूर्ण होता है। अंग्रेजी में कहते हैं कि हर टेक्स्ट का एक कांटेक्स्ट होता है। इसलिए सही तरीका यह है कि पहले मूल पाठ के संदर्भ का उल्लेख किया जाए। पिफर बताया जाए कि उसी पाठ या उक्ति का आज के संदर्भ में नया अर्थ क्या है। संदर्भ के साथ-साथ पाठ करने वाले की मंशा भी बहुत मायने रखती है। एक ही रचना का पाठ एक ही संदर्भ में दो अलग-अलग लोग दो अलग-अलग तरीके से करते हैं। निष्कर्ष भले ही पाठ के भीतर से निकाले जा रहे हों लेकिन उन्हें पाठकर्ता के उद्देश्य के सांचे से होकर भी गुजरना पड़ता है। एक गीता की कितनी टीकाएँ लिखी गई हैं। गीता में ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों की चर्चा है। तिलक ने गीता रहस्य लिखा तो पूरा जोर कर्म पर दिया क्योंकि आजादी की लड़ाई में इसकी जरूरत थी। जो गीता अर्जुन को अस्त्रा उठाने का संदेश देती है, वही गाँधी को अहिंसा की प्रेरणा देती है। उसी गीता को हाथ में लेकर क्रांतिकारी पफांसी के पफंदे पर झूल रहे थे। एक ही गीता का अर्थ क्रांतिकारी के लिए एक, तिलक के लिए दूसरा और गाँधी के लिए तीसरा था। वेद और बाइबिल के भी कई अर्थ लगाए जाते हैं। एक ही मार्क्स को अलग अलग संदर्भ में पुनर्पाठ करते हुए हमारे यहाँ सीपीआई, सीपीआईएमएल से लेकर लिबरेशन तक कितने संगठन बन गए हैं।

अवसरवादी पाठ के साथ-साथ कुपाठ के भी खतरे बढ़ रहे हैं। प्रेमचंद से लेकर आज के रचनाकारों तक के कुपाठ कापफी चर्चा में रहे हैं।

कुपाठ की परंपरा नई नहीं है। हर युग में होता रहा है। तुलसीदास ने भी तो लिखा है-
हरित भूमि तृण संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ
जिमि पाखंड विवाद ते लुप्त होंहि सद्ग्रंथ।

सद्गं्रथों यानी अच्छी कृतियों को लेकर पाखंड-विवाद की परंपरा रही है। सद्ग्रंथों को विवादों के जरिए लुप्त करने का प्रयास किया जाता रहा है।

अवसरवादी पाठ या कुपाठ को एक तरपफ कर दें तो पुनर्पाठ की एक ऐतिहासिक जरूरत भी होती है।
बिलकुल होती है। पुनर्पाठ बहुत जरूरी हो जाता है पुनर्मूल्यांकन के संदर्भ में। साहित्य में कई ऐसे लोग होते हैं, जो अपने समय में उपेक्षित रह जाते हैं। बहुत समय बाद जब उनका पुनर्पाठ होता है तो उनके महत्व को समझा जाता है। कबीर, सूर, तुलसी सबके साथ ऐसा हुआ है। स्वयं प्रेमचंद के समय में उनके महत्व को नहीं स्वीकार किया गया। समकालीन कवियों में मुक्तबोध इसके उदाहरण हैं। जीते जी उन्हें वह महत्व नहीं मिले जिसके वे हकदार थे, लेकिन बाद में उनके अवदान को स्वीकारा गया। त्रिालोचन जी के साथ भी यही हुआ। उन्हें भी बहुत बाद में महसूस किया गया कि वे कितने बड़े कवि हैं। इसका उलटा भी होता है। कुछ लोग जो बहुत ऊँचे पद पर होते हैं, प्रभावशाली भूमिका में होते हैं, उन्हें उनके वास्तविक अवदान से ज्यादा महत्व मिल जाता है। जब तक वे पद पर होते हैं, चारों ओर उनकी वाह-वाह होती रहती है, लेकिन जब वह दुनिया में नहीं रहते या दुनिया में रहते हुए भी प्रभावशाली नहीं रह जाते तो उनके अवदान का पिफर से मूल्यांकन होता है तो पता चलता है कि इसमें तो कुछ ऐसा था ही नहीं, जिसे इतना महत्व दिया जा रहा था। इस तरह पुनर्पाठ से इतिहास की गलतियों को सुधारा भी जाता है। तो साहित्यकारों के महत्व का सेंसेक्स भी समय के साथ चढ़ता गिरता रहता है।

पुनर्पाठ होता है तो इतिहास के कुछ पफैसलों पर भी उंगलियाँ उठती हैं। मसलन नागार्जुन, शमशेर और त्रिालोचन के होते हुए श्री नरेश मेहता को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल गया। लेकिन समय ने इन चारों की जगह तय कर दी है, तो क्या उस पफैसले पर भी सवाल नहीं उठता?

पुरस्कार साहित्यिक कद नापने की कसौटी नहीं है। छोटे-मोटे पुरस्कारों की बात छोड़िए नोबेल पुरस्कार तक को भी कोई कसौटी नहीं माना जा सकता। टॉल्सटॉय को नोबेल नहीं मिला था। और सार्त्रा ने तो द्घोषणा होने के बाद भी आलू का बोरा कहकर नोबेल पुरस्कार को ठुकरा दिया था। टैगोर को जिस किताब पर मिला था वह उनकी कमजोर कृति थी। टैगोर की कई कृतियाँ इससे अच्छी हैं। जहाँ तक ज्ञानपीठ की बात है, यह क्यों भूलते हैं कि महाकवि निराला को भी ज्ञानपीठ नहीं मिला था, जबकि पंत को मिला था। हजारी प्रसाद द्विवेदी को नहीं मिला था। दिनकर को मिला पर बच्चन को नहीं मिला। निराला जी को तो साहित्य अकादमी पुरस्कार भी नहीं मिला था। महादेवी को भी साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिला था, लेकिन ज्ञानपीठ मिला।
पुनर्पाठ के खतरे भी हैं। आपने सुमित्राानंदन पंत का पुनर्मूल्यांकन करने की कोशिश की तो मुकदमेबाजी में पफंसा दिया गया।

पंत जी वाले मामले में बात को संदर्भ से काटकर पेश किया गया। मैंने जो कहा था, कई लोग पहले भी वह बात कह चुके हैं। मैंने कहा था कि पंत जी का उठान जिस तरीके से हुआ उसके बाद उनकी सृजनात्मकता में लगातार ''ास होता गया। पल्लव उनकी सर्वाधिक क्रांतिकारी रचना थी, लेकिन बाद में क्रमिक विकास होने के बजाय क्रमिक ''ास होता गया। इसके विपरीत निराला की आरंभिक कविताएँ कमजोर थीं, लेकिन बाद में उनका उत्तरोत्तर विकास होता गया। पंत जी के पास प्रसाद की कामायनी जैसी कोई पुस्तक नहीं है। निराला की 'राम की शक्ति पूजा' जैसी एक भी रचना नहीं है उनके पास। महादेवी जी ने एक जैसा स्तर बनाए रखा। उन्होंने कमजोर कविताएँ छपवाई ही नहीं। मैंने यही बात वहाँ कही थी। मैंने ये कहा था कि किसी साहित्यकार का मूल्यांकन करते हुए उसके विकास और उसके अवदान को समग्रता में देखना चाहिए। जयशंकर प्रसाद ने कविता के अलावा नाटक और उपन्यास भी लिखे। यह देखना जरूरी है कि अपने समय में किसी लेखक का सृजनात्मक हस्तक्षेप कितना है। इस दृष्टि से देखा जाए तो उस युग के कवियों में निराला का स्थान पहला है, दूसरा प्रसाद का, तीसरा महादेवी का और चौथा पंत जी का है। यह पाठ मेरा है। इस दृष्टि से मैं देखता हूँ।
किसी रचना का एक समकालीन पाठ होता है, जो उस दौर के विमर्श से प्रभावित रहता है। मसलन महादेवी को विरह और पीड़ा की कवि करार दिया गया। लेकिन आज जब स्त्राी-विमर्श साहित्य के केंद्र में है तो उनकी रचनाओं का इस संदर्भ में पुनर्पाठ किया जा सकता है। 'मैं नीर भरी दुख की बदली' जैसी वेदनामयी कविता में भी स्त्राी-विमर्श के सूत्रा हैं। 'विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना' क्या स्त्राी के स्पेस की बात नहीं है?

बिलकुल महादेवी सिपर्फ विरह-वेदना और पीड़ा की कवि नहीं हैं। उनकी रचनाओं में वेदना से परे तेजस्विता भी है। रात के उर में दिवस की चाह का सुर हूँ जैसी तेजस्वी पंक्तियाँ भी उन्होंने लिखी हैं। मेरा यही कहना है कि किसी भी रचनाकार को उसकी रचनाधर्मिता की समग्रता में ही देखना चाहिए। आज स्त्राी-विमर्श, दलित-विमर्श साहित्य के केंद्र में हैं तो इन पर ढेरों किताबें आ रही हैं। उसकी तुलना में स्त्रिायों और दलितों की रचनाएँ बहुत कम आ रही हैं। हाँ, कुछ आत्मकथाएँ इस बीच बहुत अच्छी आई हैं, जिनमें महिला रचनाकारों ने अपने संकोच से मुक्ति पाकर लिखा है। यह सब अपने स्पेस की ही बात है।
पुनर्पाठ का काम अगली पीढ़ियों पर छोड़ देना चाहिए या लेखक को खुद भी अपनी रचना का पुनर्पाठ करना चाहिए?

अगर पुनर्पाठ का मतलब पुनर्विचार या नए संदर्भों में रचना का पाठ है तो एक सचेत लेखक चाहे वह रचनाकार हो या आलोचक, अपने लिखे हुए पर भी पुनर्विचार करता रहता है। अध्ययन अनुभव से हमारी चेतना लगातार विकसित होती है। ऐसे में जरूरी नहीं है कि २५ साल पहले आपने जो स्थापना दी थी, वह आज भी आपको उतनी ही सटीक लगे। प्रेमचंद के विकास क्रम को देखिए। उन्होंने विचार और रचनाशीलता के स्तर पर किस तरह वक्त के साथ अपने को बदला है। हमारे गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के यहाँ भी पहले और बाद के कहे में अंतर्विरोध दिखता है। सचेत लेखक-कलाकार इस तरह के अंतर्द्वंद्व से गुजरता ही है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें समझ में आ जाता है कि उन्होंने जो स्थापना दी थी, वह गलत थी, इसके बावजूद उस पर अटल रहते हैं। यह नैतिक दृढ़ता नहीं, बल्कि हठधर्मी है। एक सजग लेखक लगातार आत्मालोचना करता है और अपने को परिमार्जित करता रहता है। इसीलिए कहा जाता है कि किसी रचनाकार के विकास को समझना हो तो उसकी रचनाओं को कालक्रम के अनुसार पढ़ना चाहिए।
दूसरी परंपरा के बाद अब तीसरी परंपरा को खोजने की भी कोई तैयारी है?

दरअसल दूसरी परंपरा की खोज में दूसरी परंपरा का मतलब द्वितीय परंपरा नहीं बल्कि एक और परंपरा है। वह गणना के क्रम में दूसरी नहीं थी इसलिए तीसरी या चौथी परंपरा का कोई सवाल नहीं है।
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;यह अप्रकाशित साक्षात्कार साल भर पहले लिया गया था।द्ध
एपफ-२, प्लॉट नंबर २०२, ज्ञानखंड-१, इंदिरापुरम, गाजियाबाद ;उ.प्रद्ध।
मो. ९८७३४१३०७८

 
ऐसी है दिनचर्या

'वे मुझसे दस साल बड़े हैं लेकिन मुझसे ज्यादा ऐक्टिव हैं। हम दोनों एक साथ खड़े हो जाएँ तो मैं उनसे ज्यादा बूढ़ा लगता हूँ। आखिर क्या है इस चुस्ती-पफुर्ती का राज? सुबह पाँच बजे उठकर वे खुद चाय बनाते हैं। चाय पीकर द्घूमने निकल जाते हैं। करीब एक द्घंटा द्घूमने के बाद द्घर आते हैं। तब तक कामवाली आ जाती है और दूसरी चाय वह बनाकर देती है। इसके बाद कमरा बंद करके आधा पौन द्घंटा एक्सरसाइज करते हैं। सात साढ़े सात तक वे शेव करके नहा धोकर तैयार हो जाते हैं। पिफर पफोन का सिलसिला शुरू हो जाता है। वैसे उन्हें पफोन करने बहुत कम पड़ते हैं। ज्यादातर पफोन उनके पास आते हैं। किसी को सेमिनार में बुलाना है, तो कोई किसी गोष्ठी में बुलाना चाहता है। कहीं भाषण देने जाना है तो कहीं किसी किताब का विमोचन करने। नामवरजी डायरी देखकर बताते हैं कि उस दिन वे खाली हैं या नहीं। उनका हर काम बहुत सुव्यवस्थित होता है। उनकी सेहत का एक राज यह भी है कि दिल्ली में रहते हुए उन्होंने कार नहीं खरीदी। पैदल खूब चलते हैं। पैदल चलने के अभ्यास ने उन्हें सीधा खड़ा रखा। जब सहारा ने उन्हें सलाहकार बनाया तो कार भी दी, लेकिन नामवरजी के लिए यह कोई बहुत बड़ी सुविधा नहीं है। उनके लिए तो अपने पैर जिंदाबाद।'
पढ़ने की ललक ने भी उन्हें युवा बना रखा है। वे दिल्ली में रहें या दिल्ली से बाहर खाने के बाद कुछ न कुछ पढ़ने की उन्हें आदत है। वे युवा से युवा लेखक को पढ़ते हैं और युवाओं से सतत संवाद रखते हैं। वे कहते हैं, 'युवाओं को पढ़ते हुए मुझे लगता है कि मैं नए समय को पढ़ रहा हूँ।'
;जैसा कि काशीनाथ सिंह ने अरुण आदित्य को बतायाद्ध

 
 
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