बीसवीं सदी का अंतिम दशक सोवियत संद्घ के रूप में समाजवादी व्यवस्था के दरकने और उन्मुक्त बाजार के उभार को सामने लाया। सोवियत संद्घ के ढहने से वैश्विक भू-राजनीतिक माहौल एकध्रुवीय दिशा में तब्दील होता गया। जिन लोगों के लिए समाजवादी व्यवस्था प्रतिब(ता और प्रेरणा का एक मुख्य अवलम्बन थी, उनमें से अनेक लोगों का स्वप्न भी दरकने लगा। कुछ लोगों ने इसे चुनौती मानकर इतिहास, समाज तथा व्यवस्था की अपनी समझ पर पुनर्विचार करना शुरू किया और बदलते परिदृश्य के मद्देनजर नयी दिशा की तलाश आरंभ की। सोवियत संद्घ के ढहने से मुक्त व्यवस्था के समर्थकों, वाम विचार के विरोधियों को वैचारिक बल मिला। इनका मनोबल बढ़ा। हालांकि सोचना दरकार है कि समाजवाद विरोधी मुक्त व्यवस्था खुद कितनी 'मुक्त' है? इस उन्मुक्तता में किसका हित सध रहा है? बहरहाल, मुक्त बाजार का सबसे ज्यादा असर तीसरी दुनिया के देशों में दिखना शुरू हुआ। ऐसे विकासशील मुल्क मुक्त बाजार की मंडी बनने लगे। भारत में विकास का नेहरूवादी स्वप्न तो अरसा पहले दरक चुका था। बीसवीं सदी का अंत आते-आते उसका बचा-खुचा वजूद भी नहीं रहा।
इसी दौर में, मंडल और कमंडल ने भारतीय समाज को झकझोर दिया। मंडल ने पिछले तबके को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाकर लोकतंत्रा को मजबूत बनाया तो बाबरी मस्जिद के ध्वंस ने लोकतंत्रा पर काला धब्बा लगाया। इसी दौरान, कई सामाजिक समूह, जो व्यवस्था में हाशिए पर थे, बड़े पैमाने पर मुख्यधारा में आए। हर युग का अपना युगधर्म होता है। जैसे मध्यकाल का युगधर्म 'धर्म' था। वैसे ही आधुनिक काल का युगधर्म 'राजनीति' है। यही 'राजनीति' यानी युगधर्म हाशिए पर धकेले गए तबके को केन्द्र की तरफ लाने में मददगार साबित हुआ। अगरचे मुक्ति की राह दिखाने वाली इसी राजनीति के जरिए अपना मुल्क मुक्त अर्थव्यवस्था की मंडी भी बना। बावजूद इसके, 'राजनीति' की मापर्फत ही समय-समाज में व्यापक परिवर्तन लाने की लालसा भी अनेक लोगों में बची रही। लाजिमी तौर पर, युवा वर्ग में मुक्त बाजार द्वारा दिखाए और पैदा किए गए मधुर स्वप्न को हकीकत में बदलने की कामनाओं का प्रस्फुटन होने लगा। पर साथ ही युवाओं के एक तबके में समाज और व्यवस्था में बदलाव की कामना भी दिखती रही।
बीसवीं सदी के अंतिम और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में हिन्दी साहित्य में युवाओं की रचनाशीलता के विस्फोट को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह विस्फोट कितना गुणात्मक है और कितना परिमाणात्मक, बहसतलब बात है। इसी कालखण्ड में हाशिए- दलित और स्त्राी- की रचनात्मक भागीदारी में पर्याप्त इजाफा हुआ है। बहरहाल, इन नए रचनाकारों को सामने लाने में साहित्यिक पत्रिाकाओं का अहम योगदान है। किसी भी साहित्यिक पत्रिाका और संपादक के मूल्यांकन की एक कसौटी अपने दौर के नए रचनाकारों को सामने लाना हो सकता है। नए रचनाकारों, नयी रचनाशीलता की खासियत को पहचानना, उसके साथ कदम-ताल मिलाते हुए उसकी सीमाओं को रेखांकित करना संपादक का एक मुख्य दायित्व होता है। दरअसल, वर्तमान की नयी/युवा रचनाशीलता ही भविष्य की मुख्य रचनाशीलता का स्थान लेती है। लिहाजा, संपादक का इस वर्तमान को पहचानने का मतलब भविष्य को समझना भी होता है। इसके साथ ही गौरतलब बात है कि पत्रिाकाएँ और संपादक एक सत्ता-संस्थान भी होते हैं। इस प्रकार, वे नयी और भावी रचनाशीलता को रूप, गति एवं आकार भी प्रदान करते हैं।
हाल के वर्षों में हिन्दी की कई पत्रिाकाओं ने युवा रचनाशीलता के विस्फोट को देखते हुए अपना नवलेखन अथवा युवा अंक प्रकाशित किया है। इनमें से कुछेक के पास तो तयशुदा नाम थे। परंतु कुछ पत्रिाकाओं ने इस तरह की जकड़बंदी का रास्ता न अपनाकर ज्यादा खुला और लोकतांत्रिाक रवैया अख्तियार किया है। इस वजह से ऐसी पत्रिाकाओं में कई तरह की आवाज को जगह मिल सकी है। बगैर किसी शोर और नकारात्मक हदबंदी के, कथाकार शंकर के संपादन में निकलने वाली, त्रौमासिक पत्रिाका 'परिकथा' के नये रचनाकारों पर केंद्रित अंक आए हैं। इसकी कड़ी के तौर पर 'परिकथा' का इक्कीसवाँ अंक 'युवा कथाकारों का रचना-संसार' देखा जा सकता है। 'लेखन का यौवन' शीर्षक संपादकीय में शंकर ने वाजिब ही लिखा है कि ''रचनाशीलता का परिदृश्य अभी बहुत भरा-पूरा और सक्रियता से परिपूर्ण है। इस परिदृश्य में कम से कम नब्बे सौ युवा लेखक सक्रिय दिखायी पड़ रहे हैं। इनमें सभी तरह के युवा लेखक हैं-कुछ वे जो आहिस्ता-आहिस्ता बिना प्रचार की कामना लिए पूरे दायित्वबोध के साथ रचना-कर्म कर रहे हैं, कुछ वे जिन्हें अपने रचना-कर्म की तुलना में अभी ही ज्यादा पहचान मिल चुकी है, कुछ वे जो समान तरह का लेखन कर रहे लेखकों की एक छोटी-सी दुनिया का हिस्सा बने हुए हैं और जिन्हें नयी कहानी दौर की लेखक-त्रायी जैसी किसी स्थिति का स्वप्न अभिभूत किए हुए है, कुछ वे जिन्हें आत्ममुग्धता बाँधे हुए है और कुछ वे भी जो समाज की प्रबु( इकाई की तरह अपने समय की चिंताओं से मुखातिब हैं और अपने रचनाकर्म को एक कारगर भूमिका में रखना चाहते हैं।
ये चुपचाप रचना-कर्म किए जा रहे हैं और इस सवाल को एक तरफ रखे हुए हैं कि उन्हें स्वीकृति और पहचान कब मिलती है, मिलती है कि नहीं मिलती है।''
कथाकार शंकर ने शुरू और अंत में जिन युवा रचनाकारों का जिक्र किया है, उनकी रचनाओं पर खास तौर से गौर फरमाना जरूरी है। नयी कहानी दौर का हश्र अब जगजाहिर हो चुका है। जो तिगड़ी उस दौर में नेता बनकर शोर मचा रही थी, उससे कहीं बेहतर कहानियाँ दूसरे लोग मसलन- फणीश्वरनाथ रेणु, निर्मल वर्मा, अमरकांत, शेखर जोशी आदि बिना शोरगुल के रच रहे थे। इसलिए वर्तमान में चकाचौंध के जरिए अपने को केंद्र में रखने वाले कहानीकारों की बजाय अपने दौर की चिंताओं से मुखातिब होकर बेहतरीन रचना करने वाले नये कहानीकारों पर निगाह डालने की जरूरत है। 'परिकथा' के इस अंक में प्रियदर्शन, पंकज मिश्र, कविता, पंकज सुबीर की कहानियाँ हैं तो साथ ही आरती झा, मिथिलेश कुमार राय और शंकरानंद जैसे नवोदित रचनाकारों की भी कहानियाँ हैं।
'परिकथा' के इस विशेषांक के साथ 'नया पथ' के दो युवा अंकों को देखा जा सकता है। पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव के दरम्यान एक तथ्य जोर-शोर से बताया गया कि इस बार सर्वाधिक युवा भागीदारी दर्ज कराएँगे। चुनाव के बाद भी युवा शक्ति की मीडिया द्वारा खूब चर्चा की गयी। कारण था-पच्चीस से चालीस साल की उम्र के ८२ सांसदों का चुनकर आना। मीडिया के बार-बार इस युवा शक्ति को बढ़-चढ़कर आँकने पर सवाल पूछते हुए 'नया पथ' के अतिथि संपादक संजीव कुमार ने लिखा है कि ''क्या इन युवाओं के बारे में यह कहा जा सकता है कि इनमें भारतीय राजनीति की पूरी तस्वीर को बदल कर रख देने वाली ताजगी है, कि इनका भारतीय राजनीति के क्षितिज पर इस भांति उभरना एक नये कल की उम्मीद जगाता है? मुख्यधारा के मीडिया में इन चुनावों के बाद कुछ इस तरह की उम्मीदों से भरी चर्चाएँ बीच-बीच में सुनने को अवश्य मिली हैं, पर व्यापक रूप से उदारीकरण और मुक्त बाजार के समर्थक इस मीडिया के लिए आदर्श युवा पीढ़ी के प्रतिमान क्या हैं?'' विभिन्न अनुशासनों और माध्यमों के जरिए समाज में परिवर्तनकारी भूमिका अदा करने वाले अगल-अलग दौर के युवाओं के साथ मौजूदा लोकसभा में आए युवाओं के बीच रिश्ता देखने पर, संजीव कुमार की तरफ से खड़े किए गए सवालों का जवाब नकारात्मक होगा। 'परिकथा' और 'नया पथ' के इन युवा रचनाकारों पर केंद्रित अंक के संपादकीय को एक साथ मिलाने पर एक व्यापक चिंता उभरती है। साहित्य और राजनीति- दोनों क्षेत्राों में अवाम के पक्षधर, वर्तमान का क्रिटीक रचने वाला, परिवर्तनकारी युवा हाशिए पर है। बहरहाल, 'नया पथ' सिपर्फ मौजूदा युवा रचनाकारों की रचनाओं तक सीमित नहीं है अपितु आठवें दशक के युवा स्वर की कुछ प्रतिनिधि आवाज को भी शामिल किया है।
|
द्विमासिक कला पत्रिाका 'क' ;संपादक-विजय शंकरद्ध ने अपने महोत्सव के आयोजन के बाद प्रकाशित अंक में कलाओं के क्षीण होते अंतर्संबंध पर चिंता जाहिर की है। इस चिंता की ८ाद में महज उसका भाव पक्ष ही नहीं है। उसके व्यावहारिक पक्ष और शैक्षणिक पक्ष पर भी जोर दिया गया है। कला समीक्षक विजय शंकर ने इस बाबत लिखा है कि एक बहुत साधारण-सी बात अकसर देखी जाती है, चित्राकला के विद्यार्थी शास्त्राीय गायन के कार्यक्रम में न८ार नहीं आते। ठीक उसी तरह संगीत के अध्येता कला-प्रदर्शनी या पिफर रंगमंच की प्रस्तुति में अथवा कविता पाठ में उपस्थित नहीं रहते हैं। उसके जो नफा-नुकसान हैं उसे बताते हुए ठीक कहा गया है कि अन्य कलाओं की जो तकनीकी शब्दावलियाँ हैं उससे हम परिचित नहीं हो पाते। जैसे-रागों के नाम, उसकी खूबियाँ, उसका कला-पक्ष जैसे- मीड, षड्ज, विलिम्बित, द्रुत, स्वरों का ज्ञान, आलाप आदि। ठीक वैसे ही नृत्य की कई बारीकियाँ हैं, पेंटिंग को एप्रिशियेट करने के लिए कई शब्दों को समझना भी जरूरी है। जैसे- संयोजन, रंगसंयोजन, संतुलन, अमूर्तन, रंगों की महत्ता, मीडियम, भाव पक्ष, अभिव्यक्ति का ज८बा, कैनवास में से झाँकता जीवन, संवेदनाओं का शब्द रूप, रंग रूप या रूपक, भू-दृश्यों का मर्म ऐसी कई बातें हैं जिसकी जानकारी न होने से हम उस कला का ठीक-ठीक आस्वाद नहीं ले पाते, उसका आनंद हमसे वंचित रह जाता है।
उर्दू के प्रति हबीब साहब की चिंता को महत्व देना इस पत्रिाका के विस्तृत दायरे को उजागर करता है। उन्होंने लिखा है कि उर्दू को बेद्घर बना दिया गया। उसे एक मुहल्ला, एक शहर, एक राज्य तो छोड़िए एक सड़क तक नहीं दी गयी कि उर्दू यहाँ बोली जाती है। एम.ए. में उर्दू पढ़ा देने का कोई मतलब नहीं जबकि उसकी जड़ें खोद दी गयी हों। आज उर्दू न तो नौकरी की भाषा है और न ही शिक्षा का माध्यम। इसलिए जो उर्दू जानते थे, उन्हें मजबूरन हिन्दी सीखनी पड़ी। हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर किसी को एतराज नहीं और होना भी नहीं चाहिए। लेकिन जब उर्दू की कीमत पर हिन्दी को बढ़ावा दिया गया तो हिन्दी का भी नुकसान हुआ। उर्दू पर जो ज्यादती हुयी, उसका सीधा असर हिन्दी थियेटर पर पड़ा। वहाँ एक बनावटी जबान पनपने लगी। हकीकत यह है कि आप लिखित भाषा में तो 'पण्डिताई' या 'मुल्लापन' बद्घार सकते हैं, लेकिन मंच की भाषा में नहीं। उर्दू की अपनी ताक़त है, हालांकि इसे उसी तरह अपाहिज कर दिया गया जैसे रावण ने जटायु को किया था। |