अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
मीमांसा
अपने मुहावरे गढ़ती नारियां : कमलेश पांडेय

आलोच्य उपन्यास में वर्णित पात्रा अपनी तमाम विसंगतियों के साथ जीवन संद्घर्ष में जुटे हुए हैं। खासकर उपन्यास में वर्णित सभी नारी पात्राों को समाज की सबसे क्रूर सच्चाई 'महिला का शोषण' से जूझना पड़ रहा है। पुरुष पर विश्वास और अविश्वास के संबंधों के बीच उपन्यास के नारी पात्रा आज की जटिल सामाजिक व्यवस्था के कुछ चित्रा पाठकों के सामने पेश करते हैं।

एक ओर मोरा जैसी पात्रा दो-दो बार विवाह संबंधों के बावजूद स्वाभाविक जीवन नहीं व्यतीत कर पाती है, जबकि वह आर्थिक रूप से भी पराश्रित नहीं है। उसे अपने बच्चों तथा पतियों तक को त्यागना पड़ता है। इसी प्रकार कत्याल की माँ महिन्दर के हवाले से भारत-पाक विभाजन के दौरान बंटवारे की त्राासदी को झेलने वाली तथा सबसे अधिक पीड़ित व प्रभावित महिला वर्ग का उल्लेख कर अभिज्ञात ने उस काल की ज्वलंत पीड़ा को एक बार पिफर सामने रखा है, एक नये प्रस्थान बिन्दु के साथ।

समय-काल के अनुरूप परिस्थितयां व समस्याएँ भी बदल रही हैं। इसी के अनुसार विभिन्न पात्राों की सोच व उनकी प्रतिक्रियाएँ भी बदलती हैं। भूमंडलीकरण के कारण भारतीय समाज पर वैचारिक तौर पर क्या रद्दोबदल हो रहा है उसकी स्पष्ट झलक उपन्यास के नारी पात्राों में दिखायी देती है। उपन्यास की नारियां अपना युगीन मुहावरा ख़ुद गढ़ने में जुटी है। चाहे वह दैहिक नैतिकता के मसलें हों या भावात्मक।
उपन्यास में विशेष तौर पर देखा जा सकता है कि अभिज्ञात की नारी पात्रा ख़ुदमुख्तार हैं तथा अपने इस शोषण का प्रतिकार भी अपने तरीके से करती हैं। मोरा अपनी माँ के प्रति द्वेष का भाव कायम रखती है अतः जब उपन्यास के नायक अतुल को उसकी मौत की बात बताती है तब अतुल की आँखों में आँसू देख, सहसा संपर्क कायम करती है।

इसी प्रकार कत्याल भी स्वेच्छया व्यास के किनारे नायक से दैहिक संबंध कायम करती है। वहीं उपन्यास का एक और किरदार अतुल की पत्नी अंजू भी स्वयंसि(ा की भांति अपनी पेंटिंग्स के माध्यम से समाज में स्थापित होने का संद्घर्ष स्वयं के बलबूते कर जारी रखती है। उपन्यास की एक और पात्रा रीतू नाटकों, पिफल्मों तथा माडलिंग के माध्यम से इस समाज में अपनी तथाकथित सफलता के जरिए अपनी पहचान कायम रखना चाहती है, जिसके लिए उसे अपने शरीर की कीमत तक चुकाने में कोई गुरेज नहीं।

उपन्यास का नामकरण कला बा८ाार यहाँ सार्थक दिखता है, क्योंकि उपन्यास के नारी पात्रा मोरा, कत्याल, रीता उपर्फ रीतू और अंजू गायन, माडलिंग, पिफल्म तथा चित्राकला के क्षेत्रा से जुड़ी हैं। और नायक पत्राकारिता से। आज जब द्घर में बा८ाार का प्रवेश हो चुका है, ऐसे में कला के क्षेत्रा में बा८ाार के प्रवेश को भला कैसे रोका जा सकता है।

स्त्राी पात्रा जहाँ अपनी जिजीविषा से संद्घर्षरत इस बा८ाार में जीवन बिताने को बाध्य हैं, वहीं उन्हें अपने आँसू बहाने को अतुल का सहज कंधा मिलता है, जो कि एक ओर जहाँ प्लेटोनिक संबंधों वहीं दूसरी ओर सहज मानवीय संपर्कों के प्रति आश्वस्त करता है। बा८ाार और खासकर उसके कारण स्त्राी-पुरुष संबंधों पर पड़ रहे असर का कलात्मक निरूपण इस उपन्यास में अभिज्ञात ने किया है। जिसमें कहीं-कहीं उनकी पत्राकारिता की विधा की स्पष्ट झलक दिखती है जिसके कारण भाषा पारदर्शी व बोधगम्य हुई है। चरित्राों की बहुलता के बावजूद तारतम्यता नहीं टूटी है एवं उपन्यास की पठनीयता अंत तक बरकरार रही है, जिसे लेखक की अतिरिक्त सफलता मानी जानी चाहिए।

 

४०/२ विजय कुमार, मुखर्जी रोड, सलकिया,
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