प्रख्यात आलोचक पुष्पपाल सिंह की नयी किताब 'जुग बीते युग आये' के नाम से ही ऐसा ध्वनित होता है कि इसमें न केवल बीते जमाने की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक उदात्तता को रेखांकित किया गया है, बल्कि वर्तमान युगीन सांस्कृतिक दरिद्रता की ओर भी संकेत किया गया है। वैसे तो यह कथा रिपोर्ताज है मगर यह पढ़ने में जहाँ कहानी जैसा आनंद देता है, वहीं इसकी सत्यता इसे इतिहास के निकट ले जाती है।
अपनी इस किताब में पुष्पपाल सिंह ने जीवन के तमाम आधुनिक रंगों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने जहाँ जीवन में कुछ नये रंग द्घोले हैं वहीं पुराने रंगों की चमक कुछ फीकी पड़ी है। इस जमाने में जब होली शहरी क्षेत्राों में एक दिन और ग्रामीण क्षेत्राों में मात्रा दो दिन का त्यौहार बनकर रह गया है वहीं लेखक पुराने जमाने को याद करके लिखते हैं, ''वस्तुतः इस त्यौहार की लम्बी श्रृंखला बहुत पहले ही प्रारंभ हो जाती थी, वसंत पंचमी के दिन। आज हम पश्चिम के नव वर्षोत्सव को देखकर दंग रहते हैं कि कैसे वहाँ पूरे १५-२० दिन या कहें पूरे एक माह राग-रंग छाया रहता है, किंतु हमारे यहाँ वसंत पंचमी से ही पूरे सवा महीने उस उत्सव की धूम रहती थी, और जैसे-जैसे होली पास आती जाती थी, इस उत्साह में निरंतर बढ़ोतरी होती थी।
वसंत पंचमी को पीले वस्त्रा पहनकर, याद पड़ता है कि किस प्रकार लोग पीली टोपी और पीले रुमाल, ओढ़नियाँ-चुन्नियां रंगते थे, लोग विभिन्न उत्सवों में भाग लेते थे, उसी दिन पंडित वहाँ भूमि पूजनकर कुछ लकड़ियाँ रख देता था जहाँ होलिका दहन होता था। उसी दिन रात को 'हुलियारे' होली गाने के शौकीन, होली गाकर, नेग कर शुभ-शकुन मानते थे कि आज से होली गायी जा सकती है।
होली गान के साथ-साथ लोक वाद्यों का भी प्रयोग होता था, ढोलक, कुछ जगहों पर बड़े-बड़े दमामे भी होते थे जिन्हें एक साथ कई लोग अपने गढ़े नये डण्डे नुमा लकड़ी से बजाते थे। द्घंटे, द्घड़ियाल, मजीरा, थाली, थाली में काँसे का बर्तन रखकर उसे डण्डे से बजाना, होली-गायन के साथ चलता था। अपने स्वल्प साधनों में लोग यह योजना बनाते कि अब की बार होली के पैसों से कौन सा नया वाद्य यंत्रा खरीदा जाएगा। जिस प्रकार सांग ;स्वांगद्ध आदि की किताबें गंगा के मेले-ठेले से लायी जाती थीं, वैसे ही प्रसि( होली गायकों की किताब वहाँ से लाते थे। एकाध कोई पढ़ा-लिखा थोड़ा-बहुत वह गाकर सुना देता तो होली कंठस्थ हो जाती थी।
भूल भी जाएँ तो अपने छप्पर में खोंसी हुई होली की किताब से लोग उसे स्मृति में ताजा कर लेते थे। कुछ आशु कवि भले ही अनपढ़ थे, उन होलियों में अपनी पंक्तियाँ रुचि और मिजाज से जोड़ लेते थे। ;पेज-१८द्ध दरअसल, होली अब एक रिवाज बनकर रह गयी है। ऐसे पर्व-त्यौहारों पर अब लोग कैसेट बजाने लगे हैं। लोकगीत, लोक नृत्य और लोक वाद्य यंत्रा अब परिदृश्य से गायब होते जा रहे हैं। कुछ आलोचक इसे सामाजिक-सांस्कृतिक विद्घटन का परिचायक मानते हैं।
अपनी संस्कृति से कटना चिंताजनक है। मगर इसे चिंताजनक द्घोषित करने से पहले यह विचारना होगा कि ऐसे अवसर पर किस जाति के लोग स्वांग करते थे? जाहिर सी बात है कि ऐसे कामों की जिम्मेदारी दलितों की थी। और ऐसा सामंतों को खुश करने के लिए किया जाता था। अब जबकि दलितों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ रहा है तो वे अपने परंपरागत कामों से विमुख हो रहे हैं। और इस तरह जो सांस्कृतिक रिक्तता उत्पन्न हुई है उसे भरने के लिए सवर्ण और उस मानसिकता के आलोचक आगे क्यों नहीं आते। और जब नहीं आते तो ऐसे में सांस्कृतिक विद्घटन न हो तो क्या हो?
दलित साहित्य सवर्णों के प्रति आक्रोश का स्वर है। हजारों वर्षों से सवर्णों के द्वारा दलितों पर हुए अत्याचार को रेखांकित करना जहाँ दलित साहित्यकारों का एक सूत्राीय कार्यक्रम रहा है वहीं यह दलित साहित्य का प्राण भी है और सीमा भी। दलित साहित्य को बहुआयामी बनाने के लिए उस सामाजिक संरचना का सूक्ष्म अवलोकन करना होगा जिसमें शोषण के बावजूद दलितों और सवर्णों का आपसी संबंध कम मधुर नहीं था। हालांकि यह शोध का विषय हो सकता है कि निर्मम शोषण के बावजूद ऐसी क्या चीज थी जो दलितों और सवर्णों को आपस में जोड़ती थी।
पुष्पपाल सिंह लिखित ''त्यौहार-त्यौहारी और दलितों से सहकार'' दलित विमर्श को एक नया आयाम देती है। ''ननिहाल में आकर तीसरी-चौथी कक्षा में पढ़ रहे बालक से उसकी माँ द्घर में काम करने वाली मेहतरानी के लिए कहती, ''अपनी नानी से नमस्ते कहो।'' बच्चा अपनी समझ में यह बिठा चुका है कि गर्हित काम करने वाली वह औरत उसकी नानी नहीं हो सकती क्योंकि यह तो भंगन है, जमादारिन है। वह नमस्ते तो करता है पर संकोच के साथ। पिफर उसे याद आता है कि अपने गाँव में जब पिताजी ने नाई काे बुलाने भेजा तो उसने रद्घुवीर नाई से कहा था, ''ताऊ पिताजी ने बुलाया है।'' द्घर के भंगन को भी वह और बच्चे 'दोहरो चाची' कहते थे। यही हाल बढ़ई, धींवर, धोबी आदि को दिए गये संबोधनों का था। गाँव में रिश्ते-नाते के तार समाज के इन तथाकथित निचली जातियों के लोगों से जुड़े होते थे।''
आजादी के बाद भारतीय समाज तेजी से बदला है। गाँवों पर पड़ती शहरी छाया से जहाँ चकाचौंध पैदा हुई है वहीं सामाजिकता का लोप और अजनबीपन का भाव भी उत्पन्न हुआ है। पुष्पपाल सिंह अपनी इस किताब में इसे मानवीय संकट के रूप में रेखांकित करते हैं। जिस तरह नागरिक समाज की अपनी खूबियां और खामियां होती हैं उसी तरह ग्राम्य समाज की भी होती हैं। मगर तमाम खामियों के बावजूद पहले के गाँवों में जीवन प्रकृति के निकट होता था, लेकिन बढ़ते औद्योगीकरण, शहरीकरण तथा तकनीकों के प्रचार-प्रसार से गाँवों में भी न तो जीवन बचा और न ही प्रकृति। भारतीय समाज की लुप्तप्राय परंपराएँ बोली-बानियों से समृ( भाषिक अभिव्यक्ति की उदारता तथा मेले-ठेले से समृ( जीवन की रंगीनियों में गाय-बैल की पारिवारिक सदस्य की भांति प्रस्तुति को अपने कथा-रिपोर्ताज में लेखक बारीकी से दर्ज करते हैं।
ए-१९२, गली नं.-५
वेस्ट विनोद नगर, नई दिल्ली-९२
|