इस अंक से 'पाखी' में हर माह हम किसी स्थापित कथाकार की ऐसी कहानी को पुनः प्रकाशित करेंगे जो न केवल अपने समय की चर्चित कहानी रही हो बल्कि स्वयं रचनाकार की भी प्रिय रचना हो। प्रयास रहेगा कि रचनाकार एक संक्षिप्त नोट भी कहानी के संदर्भ में दे सकें। पच्चीस वर्ष या उससे पूर्व प्रकाशित रचनाओं का ही पुनः प्रकाशन किया जाएगा। इसकी शुरूआत सुप्रसि( कथाकार विजय की १९८४ में 'धर्मयुग' में प्रकाशित कहानी 'बौ सुरीली' से कर रहे हैं।
हाथ खिसका तो लकड़ी का खुरदरापन महसूस हुआ कि इश्कपेचा की बेल वही, दरवाजे की चौखट थामे अतीत के वृंदावन में भटका हुआ था, जहाँ सिपर्फ यादों और रिश्तों की कंटीली फेंसिंग भर थी, अड़ोस-पड़ोस की जमीन पर उग आये पथरीले मकान उचक-उचककर झाँक रहे थे-क्या करेगा मुकोरा बर्थवाल! पहाड़ में तो पहले ही बेहिचक भविष्यवाणी गूंज उठी थी-उल्टी गंगा बही है, जरूर कुछ अनर्थ होकर रहेगा... आज यही प्रश्न बपर्फीली चोटियों से उभर रहे होंगे। क्या करेगा अब गोविंद महाराज का लड़का। क्या निरन्तर इंतजार करता रहेगा? पर कब तक?
नीचे से ऊपर तक झाँकता है सुकांत-पहाड़ दर-पहाड़ और अंतिम पंक्तियों पर किरणों-सी श्वेत बपर्फ! तपस्वियों की समाधि की साक्षी! चिर कौमार्य की प्रतीक!
केशी गौड़ बिना किसी हिचक के टीन के नीचे पसरे पोलीनुमा टीन के बरामदे से हुक्का उठाकर बरोसी में सुलग रही कंडे की आँच का उपला चिलम में डाल, दो-चार लम्बे कश लगाते हैं, कफ जब पिद्घल उठता है तो खंखारकर चौतरे से नीचे बलगम थूक, गला हल्का कर पुकारते, ''अरे, ओ गोविंद महाराज! अब उठो न! सूरज देव तो भागीरथी में डुबकी लगाकर बाहर निकल रहे होंगे।'' ...कभी अवेर हो जाने पर चिचियाते, ''अब निकलो भी या बेटे की ससुराल के गद्दे से आँख भी चिपक गयी है कि पलक न खुले।''
सुकांत के बुबां अर्थात् गोविंद महाराज तब नये मुलायम कम्बल के सिरों को कन्धे पर खींच हँसते हुए बाहर निकल चुभास उछालते, ''बुढ़ास ने सिर में कुढांस भी भर दी है तुम्हारे केशो, इसीलिए बौ ;भाभीद्ध ने सुबह होने से पहले ही निकाल दिया। यहाँ सूरज से सुबह होए, तुम्हारे मैदान की तरह द्घड़ी की सूई आँख में द्घुसेड़ कोई नहीं जागे है।'' बाहर कोहरे में तब भी अभ्रक-सी चमक होती। ही-ही कर हँस पड़ते तब केशो गौड़। दोनों अदल-बदलकर हुक्के के लम्बे कश खींच, लोटा थामे नीचे उतर पड़ते। नीचे, जहाँ चट्टानें झुक जाती हैं और गोद में मचलता है भागीरथी का पावन चिर विकल जल... चिर पावन अमृत। कोहरे में डूबते हुए दो इंसान दूर से अस्तित्व के प्रतीक जैसे लगते।
पति की बाँहों को स्वयं से मुक्त कर तब मिथिला उठकर सुकांत को झिझोड़ती, ''उठो भी! बुबां कब के निकल गये।''
सुकांत कुड़मुड़ाता, ''दिल्ली जाना ही ठीक रहेगा। यहाँ तो सुबह होने से पहले चरवाहे की तरह हाँक दिया जाता है।''
''तो मत लाओ पानी! मेरी भी छुट्टी पर ववे तब क्या मेरे चौके में प्रवेश पर चिमटा ठोंक मनाही नहीं करेंगी? मुझे क्या! आराम ही मिलेगा।'' मिथिला हँसते हुए कहती।
''धत् तेरे की! चिपका दी सुबह-सुबह वीटो। ठीक ही कहा जाता है कि गढ़वाल की औरत ठिगनी होने पर भी पेट में बुरांस का पेड़ छुपाये रहती है।'' सुकांत अंगड़ाई लेते हुए उठता। दूर से उभरता भागीरथी का कलकल स्वर साफ सुनाई पड़ता... पर पानी लाना वहाँ से क्या संभव है? पंधेरा नल ;ऊपर से आती जल की धाराद्ध ताको तो पलक ऊपर और जाओ तो दो कि.मी. का चक्कर, और बड़े पंडित पानी खुद लाएँ, खुद भात पकाएँ और खाएँ सब।
मिथिला हँसते हुए पूछती, ''ये बड़े पंडित और छोटे पंडित का क्या चक्कर है?''
''हमारे बुबां ;पिताद्ध और सौरू ;ससुरद्ध... यही अन्तर है।'' सुकांत कहकर मुस्कुराता।
''ठीक है, हम छोटे सही, पर अब तो बड़े ही कहलाएँगे।'' मिथिला की आँखें भी मुस्कुरातीं।
सुकांत कहता, ''प से पहाड़ और प से पंडित, बड़े पंडित किसी का बनाया भात नहीं खाते और उनका पकाया औरों के लिए प्रसाद। तपस्वी आँषियों ने भोग-उन्मत्त हो रचना की है यहाँ के ब्राह्मणों की। छोटे ब्राह्मण का भात क्षत्रिाय और शूद्र खाएँ पर बड़े पंडित ठुकराएँ। ऊँची पहाड़ी के जो ठहरे, बगल में पोथी रखी पर हल की मूंठ नहीं छुई कभी।''
''पिफर छोटे ब्राह्मण की लड़की क्यों ली?'' मिथिला आकर्षक तुनक के साथ कहती।
''तुम कोई भात तो नहीं हो, मिश्री हो न... इसीलिए।'' सुकांत छेड़ते हुए बाल्टी उठा के चलता तो उंगली में पड़ी हीरे की अंगूठी कोहरे की पर्तों को नकारकर चमक उठती-टिंकल-टिंकल लिटिल स्टार... हाऊ आई वंडर ह्वाट यू आर।
बाहर निकला तो जगदीश डिमरी ने रास्ता छेंक दिया, ''सुणा! दंगड़िया सुणा, भाई! क्या हाल-चाल छिन? अरे यार, तू त शादी होण के बाद नजर ही नहीं आए।'' सुकांत टाल-मटोल कर आगे बढ़ता है, मिथिला पर कुड़बुड़ाता है, पिफर स्वयं मुस्कुराते हुए चल पड़ता है धारा की ओर। लगता कि अफसरी और शादी ने पहाड़ के स्वच्छन्द जीवन की तरंग से उसे अनचाहे ही विरक्त कर दिया है। पंधेरा नल पर जुड़ी मिलती मजलिस। औरत और मरद अलग-अलग। बच्चे जवान चहकते-पांडव नृत्य, धमाधम सफेद कुर्ते-पाजामे को भक्क सफेद करने की प्रतियोगिता में पीटते। ऊपर से चाँदी की पाजेब-सी बजती उतरती रहती धारा-स्वच्छन्द, निर्मल, अनवरत। अगर धारा न हो तो पहाड़ सिपर्फ पत्थर के बुत हो जाएँ।
कोई पूछता, ''तू आएगा, सुक्कू?''
''न भाई, कौन ठंड में हाड़ गलाए? बहुत देखा है मैंने।'' सुकांत कतराता।
''हाँ, भाई! तू ठहरा मैदानी अफसर और वो भी केंद्र का! पॉलिटिक्स के नाच देखे हैं रोज। तेरे लिए तो इस नाच और महाभारत में धरा ही क्या है!'' कोई फब्ती कसता।
पर भुली ;छोटी बहनद्ध ढिढोरची का काम अच्छी तरह कर देती। जा के सीधी मिथिला के कान में फुसफुसायी, बौ, पांडव नृत्य! देखोगी तुम तो दंग रह जाओगी।'' मिथिला के द्घर के लोग जैसी भी बने पर मैदानी बोली ही बोलते। एक-दूसरे से कहते-मैदान में जन्मी, वही पत्नी, हमारी बोली समझ लेती है, यही क्या कम है। गाँव की ब्वारी है मिथिला पर सास की सोनिचरैया। उसकी हर मुद्रा पर निहाल है जू ;सासद्ध।
द्यूर ;देवरद्ध श्रीकांत फुसफुसाता, ''मेरे साथ चलना, बौ! औरतों के बीच फंस गयी तो चै-चै कर अधमरा कर देंगी। बड़ी पंचाइतिन होती हैं पहाड़ की औरतें। उस पर टोना-टोटका, किसी के बाल कतर लिए, किसी की धोती कुतर ली और किसी की गाँठ में मनौती की सुपाड़ी बाँध दी। हो गया महाभारत। खींच लिए झौंतरें और उद्घाड़ लिए रहस्य।''
मिथिला कुछ कहती, उससे पहले भुली त्योरी चढ़ा कहती, ''बौ मेरे साथ जाएँगी।''
मिथिला चिढ़ाती, ''मैं किसी के साथ नहीं जाती, मैं तो उनके संग जाऊँगी।''
श्रीकांत फुर्ती से भर जाता, ''एकसीलेंट बौ, एकदम पिफल्मी सिचुएशन-हाथ में हाथ डालकर चलना, बाँझ और बुराँस के पेड़ों को छू-छूकर गीत गाना-ओ बसंती पवन पागल!''
मिथिला उत्सुकता से भर जाती, ''तुझे आता है गाना तो तेरे साथ चलूँगी। तेरे दीदा ;बड़े भाईद्ध को तो कोई प्रार्थना भी नहीं आती है। एकदम अनम्यूजिकल! वैसे पर्वत की तो हवा भी सीटी बजाती है।''
श्रीकांत उदास हो कहता, ''आता है पर दीदा डाँटते हैं। कहते हैं कि कोई ढंग का गाना गाया कर, क्या गंवार बनेगा। आखिर मैदान में जा कर नौकरी करनी ही है।''
मिथिला की कल्पना उसे पहाड़ और वादियों में बहाती हुई ले जाती। बपर्फ, जंगल और नदी की धारा छूकर उसे एक स्वर्ग की उपलब्धि महसूस होती। लखनऊ के चमकते हुए हजरतगंज की सुरमई शामें फीकी पड़ जातीं। खिड़की पर दस्तक देती हवा, झाँकता हुआ चाँद और निमंत्राण देती शिलाओं के प्यार में विभोर हो उसे लगता कि शहर में आज तक काटी गयी जिंदगी सिपर्फ एक व्यर्थता का सबूत और निरर्थकता की पहचान भर है। संत्राासों से भरी तह८ाीब को नकली चेहरे लगाकर जीने की दुराकांक्षा। सुकांत को लगता-मिथिला कोरी स्लेट है। सहज ही वह इल्यूजन से भर जाती है। अपनी-अपनी मीमांसा... अपने-अपने दर्शन, बीच में रहता प्यार का दीया।
सांझ ढले जब सुकांत कस्बाई खपरैल तनी लायब्रेरी में वक्त काट रहा था, श्रीकांत ने मिथिला को एक चट्टान पर बैठाकर कहा, ''दूसरी तरफ से गाऊँगा बौ, सामने शर्म लगती है। गाना तुम पर ही है-बौ सुरीली!''
हलके अंधेरे में चट्टानों का जंगल कल्पना कुंज-सा प्रतीत होता। झाँकने भर से दिखाई देते-ऊँचे-ऊँचे पर्वत शिखर, काइया ;काई लगीद्ध वनस्पतियाँ और दूर क्षितिज के अंक में बपर्फीले पहाड़। मिथिला सोचती-शरद में आकर इनका पूर्ण हिमानी रूप भी बार-बार देखने को मिलेगा, तभी श्रीकांत ने मीठी आलाप ली-
''जी जाण नी जाण मेरी बौ सुरीली
सतपुली का सेंण मेरी बौ सुरीली
हे ब्वे पंचमी का म्योला मेरी बौ सुरीली।''
परी देश की मर्यादा में सब कुछ भूल जाती मिथिला। तभी श्रीकांत ने आकर पूछा, ''कैसा लगा, बौ?''
नयनों से आकाश पीती मिथिला कहती, ''द्यूर! जब हम सो जाएँगे-हर पत्थर, आकाश और धरा तुम्हारा गीत दोहराएगी। क्या नवीन और क्या पुरातन-मुझे तो हर पत्थर पर गौरी और शंकर के नृत्य में थिरकते पाँवों के चिन्ह दिखाई देते हैं। कभी उन चरणों को हर पत्थर ने छुआ होगा, अहसासा होगा। आज भी अंधेरे में स्पर्श ताजा हो जाते होंगे। कैसी रहस्यमयी दुनिया है यहाँ की... पहाड़, जंगल, बपर्फ के रेगिस्तान और निर्झर-सी उछलती कुंवारी जलधारा का लाजवंती नदी बन जाना। कॉलेज, रेस्तरां, बगीचे और बंगले केवल कृत्रिाम जीवन के प्रतीक हैं। यहाँ आकर लगा है कि वैभव से परे प्रकृति का विराट क्या है। कितना उदार है पर्वत!''
श्रीकांत कहता, ''पर्वतों पर देवताओं का वासा है, बौ। बदरीनाथ, केदारनाथ, रुद्र और विष्णु प्रयाग। देवी हो या देवता, सबका वासा है पर्वत! वेद व्यास की गद्दी हो या अगस्त्य मुनि की तपस्थली... सब पर्वतों पर हैं। स्वयं भगवान शिव कैलाशवासी हैं। हर चोटी पर एक-न-एक संत या देवता का वासा है। हमारे देवता हैं तुंगनाथ। कभी इस चोटी पर तो कभी उस चोटी पर। जहाँ भक्त ने पुकारा, पहुँच गये। सितंबर-अक्टूबर में द्घाटियां फूलों से भर जाती हैं और आश्चर्य यह है कि दिन में फूल का रंग दूसरा और रात को कोई और रंग। कहते हैं कि परियाँ उन्हें छूकर रंग बदल देती हैं।'' मिथिला परी देश के प्राकृतिक संपदा-कुंज में खो जाती। एक-एक फूल में तितली की तरह झाँकती और पंख फड़फड़ाती।
सुकांत को अपने विवाह का वृत्तांत याद आ जाता, जब भी मिथिला बड़े पंडित और छोटे पंडितवाली बात दोहराती। अखबार में निकली लिस्ट में नाम पढ़ के लखनऊ में जमे रामरतन ने दानकोट का रुख किया था। बड़ी जल्दी में थे कि कहीं सीधा अफसर बना पहाड़ी लड़का कोई और पहले पहुँच न छेंक ले। पालकी से अरखुंड उतरे तो पाँव में पहली कील चुभी। गोविंद महाराज ने सकुचाते हुए कहा था, ''जमाना बदल गया पर बड़े और छोटे पंडित का भेद अभी भी बना हुआ है, भाई! मैं मान भी जाऊँ तो भी क्या गाँव वाले मान जाएँगे? यह ठीक है कि बेटी देकर भी तुम कुछ लोगे नहीं, पर पहाड़ में अब तप से ज्यादा पाखंड है, इसीलिए जिससे भी हुआ, यहाँ से भागा।''
रामरतन ने अपनी दौलत की चाबी द्घुमायी थी, ''गोविंद महाराज, क्या बड़े और क्या छोटे पंडित। भूख में तो शुद्र का दलिया भी लकड़ी के चम्मच से खा जाएँ। ये सब पुराने प्रपंच हैं... रस्सी की झूठी ऐंठन।''
अगस्त्य मुनि के दरबार में सीधे पहुँच पाँच सौ एक टिका पुजारी जी से बोले थे, ''इससे चार गुने पुरोहिताई के दूँगा। हर बराती को पाँच कपड़े, पाँच बर्तन और एक सौ एक नकद।''
दूसरे दिन लड़का रोकने के लिए शगुन पर बुलाया गया तो ठिठकते-ठिठकते बड़े पंडितों के परिवार आ जुड़े थे। मंदिर के पुजारी ने कहा था, ''बड़े छोटे का सवाल था, ऊँचाई-निचाई पर रहने वालों को लेकर। सफाई और वेदज्ञान को लेकर। जिसने हल पकड़ा, कहलाये छोटे पंडित। आज तो बड़े-छोटे दोनों हल चलाते हैं। नौकरी और व्यापार करते हैं तो वो फर्क रहा कहाँ! और फर्क था और है भी तो भात को लेकर। क्या हुआ अगर दो दिन पूड़ी-मिठाई ही खा ली? न खाया भात।''
दान की महिमा सुनाते हुए पुजारी जी ने सबको अभिभूत कर दिया था, ''द से दम! देवताओं के लिए अर्थ है कि शक्ति बनाये रखो। द से दया! राक्षसों के लिए दया का पाठ। और द से दान है, कलियुग में प्राणिमात्रा के लिए। शंका और दुख भूलकर दान दो। सो हमारे रामरतन जी ठहरे दानी... और दानी है ईश्वर का भक्त। भक्त की जाति कौन पूछता है! काशी के पंडित भी रैदास के भजन गाते हैं। अब डिमरी ब्राह्मणों को लो। नंबूदरीपाद हैं केरल के। डिमरी गाँव में बस गये और बन गये गढ़वाली। और ब्राह्मण वह, जिसकी गाँठ में हो पंचाग्नि-तप, त्याग, स्मरण, अष्टांग योग और वेदों का ज्ञान। केवल जनेऊ डालकर पहचान कराने से या भात को लेकर कोई बड़ा-छोटा हुआ है?''
हर द्घर की मिली मिठाई... कोरी धोती! पर जब सुकांत को हीरे की अंगूठी पहनायी रामरतन जी ने तो कलेजे पर भागीरथी तैर गयी... चट्टान काटती रोयां-रोयां सिहराती! चमचमाते स्टील के बर्तनों में खाने से पहले लोग अपना मुँह देखते।
सुकांत जब रजाई लपेटे नींद से बचने के लिए किताब के वर्क टटोल रहा था तब श्रीकांत और सुमन के साथ खेत और चट्टानें पार करती मिथिला बाजार का बड़ा मैदान समेटती पहुँच रही थी पांडव नृत्य-स्थली के पास। सुकांत कुड़कुड़ा रहा था, ''ठंड लग गयी तब पता चलेगा। वैद्य के काले काढ़े के साथ ब्वे की नजर उतारने वाली मिर्चीली झाड़ फूंक भी सहनी होगी। अब लाल मिर्ची आँख में तड़केगी, तब पता चलेगा।''
ढोल, दमनाऊ और मसई का स्वर सुना तो पागल हो उठी मिथिला, चाहा कि दौड़ पड़े। पर चट्टानों पर चढ़ना ही क्या कम कठिन काम है! मंदिर के पुजारी ने देखते ही अलग से मूढ़ियां डलवा दीं। अगस्त्य मंदिर के नये चाँदी के छत्रा के पुण्य पर मिथिला के पिता का ही तो हक था।
पांडवों का नृत्य गैस के प्रकाश में चल रहा था। चारों तरफ भभक रही थीं मशालें। तलवार, ढाल, धनुष-बाण और गदा सब थे वहाँ। द्रौपदी की लहराती चोटी को देख मिथिला ने पूछा था, ''किसकी लड़की है?''... 'टू हूँ' सुमन हँसी थी, पर बताया श्रीकांत ने, ''लड़की कहाँ, बौ? किसन पांडे का छोटू है।'' खिलखिला के हँसी थी मिथिला।
मशालचियों के पीछे-पीछे आधी रात तीनों लौटे थे। द्वार खोलते हुए सुकांत बड़बड़ाया था, ''पूरी पागल हो गयी हो तुम। एक बार ठंड बैठ गयी तो यहाँ न यूनानी दवा मिलेगी और न आयुर्वेदिक। टिंचर से ज्यादा कड़वा काढ़ा बनाते हैं भृगु वैद्य।''
मिथिला हँसी थी-उन्मादित हँसी। जैसे कोई पीतल की गागर धारा से लुढकती हुई भागीरथी में छन्न से जा गिरी हो और हुआ भी वही। धारा तक जाने की जिद में लौटते वक्त जो पैर मुड़ा तो श्रीकांत को सहारा देकर लाना पड़ा, श्रीकांत भाई के मना करने पर भी दौड़ पड़ा था, ''द्घबराती क्यों हो, बौ? अभी लाया अलगू दगड्या को। चुटकी में खींच मोच उतार देगा।''
बूढ़े अलगू को हनुमान की तरह कंधे पर लाद, दौड़ता हुआ लौटा था श्रीकांत। सुकांत ने कहा भी था, ''रहने दो, कल दानकोट ले जाकर एक्सरे के बाद जो होगा सो हो जाएगा।'' पर तब तक अलगू दगड्या ने अंगूठा खींच डाला था। मिथिला चीखी थी, 'अई' माथे की नस तक सनक गयी थी।
''बड़ी पहाड़िन बनने चली थीं।'' सुकांत ने छेड़ा था पर तब तक श्रीकांत का कंधा पकड़ जीभ चिढ़ाती मिथिला रसोई की तरफ चल पड़ी थी। चौके की दहलीज पर बैठ लापरवाह ढंग से हँसी थी, ''तू तो हनुमान है द्यूर! संजीवनी उठा लाया। तेरा दीदा तो बस लाल-पीला होन जाने।''
सुकांत ने द्घोषणा सुना दी थी, ''कल दिल्ली जाना होगा।''
जाने कितनी देर सास-बहू बतियाती रहीं और सुकांत खूंटियों पर टंगे बेहिसाब कपड़ों को फर्श पर फेंकता रहा। श्रीकांत और सुमन को लेकर निकली मिथिला शाम गये ही लौटी। बार-बार नदी की धारा में हाथ-पैर डाल खो जाती सपनों में... परी देश, देवताओं की दुनिया, बपर्फीली चोटियों पर टिके हुए क्षितिज और पार्वती की निर्मल खिलखिलाहट-सी स्निग्ध मचलती हुई गंगा की धारा। मिथिला को लगता कि स्वर्ग बहुत करीब आ गया है उसके।
रात सामान बाँधने की द्घोषणा की सुकांत ने, पर मिथिला उठी नहीं। सुकांत ने अनुनय की, ''अब छोड़ो यहाँ का मोह और दिल्ली की तैयारी करो।''
''ठीक है! तो दिल्ली वाली की तरह बात करूँगी और लखनऊ की आदतों पर चलूँगी। सामान तो मेरे यहाँ नौकर-नौकरानियाँ बाँधते थे। पिफर मैं क्यों बाँधू?'' मानभरी मुद्रा में कहा मिथिला ने।
''ठीक है, मेम शाब,'' एकदम नौकर की मुद्रा और स्वर अपनाया सुकांत ने। मिथिला हँसते हुए हाथ बंटाने लगी। सुकांत बार-बार मिथिला की देहगंध में डूब जाता। स्पर्श होते ही लगता कि मिथिला अंगूरों से लदी बेल है। सामान बाँधकर फुरसत से बैठे तो मिथिला उचक के खड़ी हो गयी। मानो कोई भूला हुआ काम याद आ गया हो। तेज हवा को नकारते हुए खिड़की खोल निहारने लगी। मानो चाँद से जरूरी बातें कर रही हो। सुकांत ठंड से कांपती हुई मिथिला को विभोर देखता रहा। उसे लगा कि प्राणी और प्रकृति का रिश्ता कभी-कभी रक्त और वासना के हर रिश्ते से अधिक मजबूत हो जाता है। कांपती हुई देह को बाँहों में बाँधकर बिस्तर पर ले आया था और कान में कहा था, ''सो जाओ, नहीं तो चाँद पूरी रात एक जगह खड़ा रहेगा।'' द्घर से निकलने से पूर्व ब्वे की गर्दन से लिपट खूब रोई थी। मानो सास से नहीं, अपनी माँ से विदा ले रही हो।
अरखुंड से सामान उठाया मजूरों ने। मिथिला बैठी बरल डांडी ;पालकीद्ध में। एक ओर सुकांत, दूसरी ओर था श्रीकांत। मिथिला श्रीकांत की तरफ का परदा उठाए रही। खेत, पगडंडी और जंगल... चट्टानों के तिल-तिल पर मिथिला की तरसन बरसती रही। सुकांत को लगा कि वृक्ष कहीं भी उपजे, आदि भूमि से संबंध जुड़ा ही रहता है। पहाड़ की बेटी कहीं भी जन्मे या रहे, उसके प्राण नंदी की पीठ जैसे पहाड़ों में ही अटके रहते हैं। दानकोट की नन्ही-सी बस जब हरिद्वार पहुँची तो मिथिला ने साड़ी का पल्ला उलटा कर लिया। मानो कह रही हो कि अब बात करो मैदान वाली। पर मिथिला की आँखों में उग आये पहाड़ी सूरजमुखी बार-बार मुड़ जाते थे। गर्दन मोड़ के पीछे देखने लगती।
द्घर की सजावट रामरतन जी पहले ही करा चुके थे। सुकांत की आँखों में प्रश्न उभरा तो बोले, ''तुम बस मिथिला की देखभाल संभालो। बाकी काम मेरे लिए छोड़ दो, नहीं तो बेकाम हो बूढ़ा होकर जल्दी मर जाऊँगा। जब पहाड़ से उतरा तो पहले चौकीदार बना, पिफर रसोइया, उसके बाद रेस्तरां का मालिक और बाद में व्यापारी। काम करके बस कमाया ही है। अब खर्च का जरिया निकला है। तो रोको मत।''
आराम करने से पहले सुकांत की जेब से कलम निकाल ब्वे और श्रीकांत को पत्रा लिखने बैठ गयी। सुकांत ने कहा तो मुँह पर उंगली रख चुप रहने का संकेत कर दिया। भोला अम्लान रूप सुकांत को अंदर तक छू गया था। प्यार की भरी-पूरी झील लगी थी मिथिला। चाहा था कि उठकर चूम ले। पर सुकांत उठा नहीं, अन्यथा मिथिला लड़ने-मरने पर उतारू हो जाती। श्रीकांत को रोज छह बजे शाम का अलार्म लगा बौ सुरीली गीत गाने की मनुहार लिखी थी। और वाकई छह बजते ही स्वयं मिथिला सारे काम छोड़ गूंगी गुड़िया की तरह बैठ जाती थी। मानो श्रीकांत आस-पास कहीं बैठा गा रहा हो।
अरखुंड में ठटठा शुरू हो गया था-सिपर्फ चार दिनों रंग छो, अब ये पहाड़ तें बिसर जाली न। दो माह और बीते तो हुआ आकाश बैरंग। नीलकंठ देख-देखकर बेटा-बहू का हाल विचारो। नयी बहुएँ कहतीं-उल्टी गंगा...! उहूँ नाटक कर रही थी सासू से...। केशो गौड़ ने तीसरे दिन ही भविष्यवाणी कर दी, ''अब करो डाकिए का इंतजार। पहले चिट्ठी गायब, पिफर मनीऑर्डर अदृश्य। भागीरथी कभी मैदान से पहाड़ चढ़ी है?''
पर गाँव बाहर की नाक पर तितली छाप दी मिथिला ने। हर हफ्रते चिट्ठी और सुकांत के मनीऑर्डर के पीछे कभी कपड़ों का पार्सल और कभी दूसरा मनीऑर्डर। ब्वे सुमन के लिए साड़ी सहेज संदूक में रखती तो श्रीकांत नया स्वेटर पहने टोकता, ''ऐसी साड़ियां बौ तुम्हें शादी के लिए रखने देंगी? पिफर भुली तो अभी दस की है।''
गाँव में मुँह पर तारीफ और पीछे फुसफुसाहट होती-उल्टी गंगा बहा रही है सुकांत की बहू, जरूर कोई अनहोनी द्घटेगी। पर अंदर ही अंदर प्रवासी बेटों की माताएँ कामना से भर जातीं-काश, हमारे बेटा-बहू भी ऐसे ही हों! मिथिला के पत्राों में प्यार बढ़ता ही जाता और अटपटे प्रश्न तोतली मिठास भर देते-द्यूर अब तो गऊ ने बग्गी ;बछड़ाद्ध या थोरी ;बछड़ीद्ध जन दी होगी। खूब चाटती होगी बच्चे को। सुकांत ने संकेत दिया था। इसीलिए ब्वे हँसी थी, ''बवारी के अंदर माँ जाग रही है।'' मिथिला श्रीकांत को लिखती-''तुम्हारा दीदा तो दिल्ली में रम गया पर मेरा मन तो तड़पता है। अब तो आस-पास की चोटियों पर भी बपर्फ जम गई होगी। सूरज की किरणें उसे कुरेदती होंगी, कभी-कभार। शायद ऊँचे पर्वतों का सफेद रीछ भी नीचे तक द्घूमने आ जाता होगा। कितना कहा कि बपर्फ देखूँगी करीब से पर तुम्हारी दीदा। माना नहीं। हर हफ्रते नर्सिंग होम का चक्कर, सिनेमा और किताबें-बस, तीन काम के लिए फुर्त रहता है।''
जाड़ा तो बीता पर गर्मी के आरंभ में ही आ गया तार जैसा खत बुंबा का-'तुम्हारी ब्वे बीमार है बहुत। तुम दोनों को देखना चाहती है।' सुकांत ऑपिफस से लौटकर खत पढ़ता, उससे पूर्व ही मिथिला ने सामान बाँध लिया था। सुकांत ने कहा, ''तुम कहाँ जाओगी... पाँचवाँ लग चुका है।'' धनुष की प्रत्यंचा-सी कांपी थी मिथिला, ''जाना तो होगा ही। वहीं से लखनऊ चली जाऊँगी।'' सुकांत टाल नहीं सका। आँषिकेश से ब्यासी पर रुकी थी बस, नाक में नथुला और बुलाक, गले में चाँदी का चंद्रहार और गुलूबंद पहने औरतों को देख मुस्कुरायी थी। मोड़ से दिखाई देने वाली अलकनन्दा और मंदाकिनी की दो सरल धाराओं के, राह में अचानक ही उद्वेलित मिलन को देख विभोर हो उठी थी। वैसे रुद्रप्रयोग तक तीन बार खिड़की से मुँह निकाल उल्टी कर चुकी थी। सुकांत द्घबरा उठा था। मिथिला ने हर बार बड़े आराम से अमृतधारा मिला पानी पीकर स्वयं को संभाल लिया था। सुकांत का हाथ थाम कहा था, ''डरो नहीं, और न डराओ। और औरतें भी तो उल्टी कर रही हैं।'' सुकांत अचानक ही नाक पर रूमाल रख बाहर देखने लगा। मिथिला हँसी, ''गुड़ खाये, गुलगुलों से परहेज।''
अनायास सुकांत को भी याद आ गया था बचपन। मिथिला को सुनायी थी अगस्त्य मंदिर और बाजार की कथा-''वह मंदिर बड़ा प्राचीन है। अगस्त्य मुनि ने अखंड तप किया था वहाँ। सागर पीकर राक्षसों के विनाश में देवताओं की सहायता की पिफर पर्वत शिखर पर आ बैठे थे। तब यहाँ सिपर्फ पहाड़ थे और जंगल था। बांझ-बुरुंस का नाम नहीं था। पूरा वन पीपल से भरा था। १९६२ में चीनी आक्रमण के कारण सरकार ने वहाँ हवाई पट्टी बनानी चाही। मुनि ने राईड़ी की एक बूढ़ी को और पुजारी को एक साथ स्वप्न दिया-जंगल न कटे, यहाँ हवाई पट्टी नहीं बन सकेगी।''
मिथिला सम्मोहित श्रोता की भांति सुन रही थी-''इंजीनियर, ठेकेदार और अन्य अफसरों से कहा बूढ़ी और पुजारी ने। पर किसी ने नहीं माना। बोले कि सब अंधविश्वास है। पेड़ कटे तो उनसे चू पड़ा श्वेत रक्त। मजदूर उखड़ गये तो इंजीनियर ने बिजली का आरा लगवा दिया। चंद दिनों में ही जंगल साफ। पहली पट्टी बनी और पहला डकोटा उतरा। पर अनहोनी हो गयी। उड़ान ले ही नहीं सका। पहिये उठने की जगह पसर गये और जहाज लुढ़कता हुआ भागीरथी में जा गिरा। दूसरी कोशिश हुई पर पिफर निष्फलता... सरकार ने हवाई पट्टी का विचार छोड़ दिया। जंगल जो साफ हुआ तो वहाँ बाजार लगने लगा।''
''सच! सच बात है यह?'' मिथिला ने सुकांत की हथेली अपने हाथों में दबा ली थी... मुस्कुरा उठा सुकांत, ''सच तो है! पर डकोटा क्यों गिरा, यह भगवान जाने!'' ठीक सड़क के नीचे वादी में फैले खेत से उभरता स्वर मिथिला को सम्मोहित कर देता है-नन पदान दिलूप भी यैत जोड़ दे भागी, तू मेरी मन की प्यारी तू यैत नाज भगी...;स्त्राी पिता को देखने जाना चाहती है, पति कहता है कि तू मेरी हृदयेश्वरी है। तेरे पिता को यहीं बुला दूँगा। मायके न जा।
बरल डंडी से उतरी तो अमरबेल की तरह जू से लिपट गयी थी। ब्वे को भी लगा कि बवारी नहीं, उसकी बेटी ही लिपटी हुई है देह से। कई द्घरों में बहुएँ भड़की थीं-आ गयी नटनी।
एक माह रहकर जापे के लिए लखनऊ जाएगी मिथिला। ब्वे किसी भी तरह ब्वारी को चार दिन बाद नहीं लौटने देंगी। झुंझलाता हुआ सुकांत नौकरी पर लौट गया था, ब्वे की हालत जो सुधर गयी थी। श्रीकांत और सुमन के साथ किस्से-कहानियों की चकल्लस शुरू हो गयी थी। मिथिला ने खोद-खोदकर पूछी थी एक-एक बात। श्रीकांत ने कहा था, ''झूठ नहीं है, बौ! तुंगनाथ सच्चे देवता हैं। गाँव, पहाड़, इस पार और उस पार खुद जाकर सबकी देखभाल करते हैं। राईडी में पुजते हैं जाख देवता और अरखुंड में तुंगनाथ।''
तभी भरी दोपहर ढोल और दमानाऊ का क्षीण स्वर द्घर के अंदर आ गया था। भुली बेतार के तार की खबर लायी थी, ''नदी पार हैं देवता।'' औरों की तरह बिना चप्पल चल पड़ी थी मिथिला। श्रीकांत बुंबा से पूछ आया था। टेढ़े-मेढ़े ऊँचे-नीचे रास्तों पर सहारा देकर ले गया श्रीकांत-कहीं पैर-वैर मुड़ गया तो ब्वे मुझे खा जाएँगी। उस रस्सी और लकड़ी के झूलते पुल से आ-जा रहे थे लोग। देवता कंधे पर छोटी-सी पालकी में डोल रहे थे। पुल पर जाते ही बैठ जाते जवान पुजारी। लोग चिल्ला रहे थे-पुल से नहीं जाएँगे देवता। मुख्य पुजारी ने ध्यान लगाया और नदी में उतरकर पार करने की आज्ञा सुना दी।
मिथिला कांप उठी थी नदी की मचलन देखकर। पर यह क्या, आराम से नदी पार कर रहे थे देवता। और मूर्ति झूम रही थी। पाँवों पर टकराता जल उछल-उछलकर कंधों पर गिर रहा था। लोग चिल्ला रहे थे-तुंगनाथ महाराज की जय। मिथिला को लगा कि जहाँ सरलता और सत्य है, वहाँ देवता अभी भी हैं। बिना विश्वास के देवता प्राणवान नहीं हो सकते हैं।
श्रीकांत ने पास पड़े पत्थर की ओर इंगित कर कहा, ''ऐरण पत्थर है, बौ! यहाँ के लोहार लोहे के द्घन की जगह इसे रखकर लोहा पीटते हैं। इस पर चाहे जितने हथौड़े मारो, दरार नहीं पड़ेगी।''
देवता की डांडी गाँव-गाँव द्घूम रही थी। द्घर लौटी मिथिला सहसा सहम उठी। ब्वे की साँस उखड़ रही थी। केशो महाराज जमीन पर उतारने के लिए कह रहे थे। नसें तन उठी थीं मिथिला की। हाथ में दस रुपये का नोट मुट्ठी में बन्द कर समाधि में खड़ी हो गयी थी। अरखुंड में द्घूमते देवता जोर से हिलने लगे थे। बड़े पुजारी ने अचानक ही रास्ता बदलने की आज्ञा दी।
मिथिला सुन रही थी आवाजें! देवता की सवारी मकान के अंदर द्घुस रही थी। मिथिला ने कांपकर आँखें बंद कर ली थीं। उसे क्या पता था कि देवता उसके ठीक सामने डांडी में झूम रहे थे। अचानक नोट वाले हाथ में देवता का क्षत्रा चुभा। मिथिला ने मुट्ठी खोल दी। प्रमुख पुजारी ने नोट डांडी में देवता के आगे रख दिया और मिथिला का भाल छूकर कहा, ''मनौती पूरी हुई तेरी।'' कांपती हुई मिथिला देवता की जाती हुई सवारी देख रही थी। अनायास हर्ष तरंग नस-नस में व्याप्त हो उठी। दौड़ती हुई सास के कमरे में पहुँची। बुंबा तुलसीदल मिला गंगाजल धरती पर लेटी ब्वे के मुख में डाल रहे थे। मिथिला ने भविष्यवाणी की, ''यमराज भी ब्वे को नहीं ले जा सकते हैं।''
अचानक ब्वे कराह उठीं। द्घिरे हुए लोगों की पुतलियां अचरज से द्घूमने लगीं-कैसा व्यापार? धरती पर उतरी देह कहीं बिस्तर पर जाती है?
मिथिला क्रु( दृष्टि से भीड़ को देखती हुई ब्वे को सहलाती है। डॉक्टर नब्ज देख कहता है, ''नॉर्मल हो रही हैं...''
''मर सकती ही नहीं थी डॉक्टर!'' मिथिला के स्वर में दृढ़ता थी। डॉक्टर भी आश्चर्य में डूब जाता है।
रात बिस्तर पर लेटी सास को पथ्य देती मिथिला देवता का किस्सा सुनाती है। गाँव में अफवाह उड़ती है-यम को बवारी ने अपनी खाट के पाये से बाँध दिया था। स्वयं देवता ने आकर छुटकारा दिलाया।
ब्वे ने ब्वारी को छाती से चिपका लिया था, ''तू साक्षात दुर्गा है।''
सुकांत को लगता है कि मिथिला का हृदय फोटो की नयी रील की तरह था। पवित्रा, निष्कलुष... वहाँ जो छप गया, विश्वास बन गया। ऐसी पवित्रा नारी कैसे किसी की गृहस्थी और देहसुख के लिए जी सकती थी।
पांडव नृत्य की तैयारी जोरों पर है, मिथिला खुशामद करती है श्रीकांत की, ''आज दिखा दे द्यूर पिफर कभी तंग न करूँगी।''
कब पिफर तंग किया मिथिला ने! श्रीकांत की आँखों में बौ को याद कर टीस उभर आती और आर्त स्वर में गा उठता-जी जाण नी जाण मेरी बौ सुरीली... श्रीकांत पांडव नृत्य दिखाने के लिए तैयार हो जाता है। नणद सुमन को मिलता है दो का लाल नोट, मूंगफली और चना-मुरमुरा खाने की रिश्वत...। मिथिला को स्वयं महसूस होता कि हजरतगंज की रंगीन शाम भी उसे कभी नशे में नहीं डुबा सकी थी। पिफर कैसा नशा चढ़ता है, पर्वत की हवा साँस में खींचते ही बड़ी कठिनाई से नाच देखने की इजाजत मिली थी। श्रीकांत बताता है, ''नृत्य के अस्त्रा असली होते हैं।'' चारों तरफ मशालें जल रही थीं। बीच में थीं गैस की बत्तियां। नृत्य खूब सजीले रूप में चल रहा था। तभी मिथिला ने श्रीकांत को टोहा, ''तू क्यों नहीं नाचे, द्यूर?''
''धत्! मैं क्यों? अफसर का भाई कहीं नाचे है?'' श्रीकांत बनावटी गुस्से के साथ बोला।
''क्यों अफसर का भाई क्यों न नाचे!'' चौड़े बॉर्डर का पल्लू गिर गया था।
''क्योंकि अफसर की बहू नहीं नाचे!'' श्रीकांत ने मजाक का उत्तर मजाक में दिया। औरतें नृत्य के साथ मिथिला को भी बीच-बीच में निरख लेती थीं-आह, कैसा प्यारा रूप है!
श्रीकांत कहता है, ''संभल के चलो बौ, मशालची तो पीछे रह गये।'' स्वयं आगे बढ़ता है। मिथिला चाँद से बात करती हुई चलती है। श्रीकांत तभी चिल्ला उठता है, ''बौ, बाद्घ!'' बाद्घ सुमन की ओर बढ़ता है। श्रीकांत चीखता है, ''बौ, भागो!''
मशालची दौड़ते हैं। बाद्घ द्घिर जाता है-मिथिला सुमन को अपने पीछे कर लेती है। बाद्घ छलांग लगाता है, मिथिला को छू नहीं पाता है। सिपर्फ गंध का हल्का स्पर्श नाक तक आता है पर पाँव डगमगा जाते हैं। दो मीटर नीचे गिरती है देह, जाँद्घ और गाल पर चुभती है पत्थरों की नोक! गाल में छेद हो गया था। श्रीकांत बौ की ओर झपटता है। लोग नब्ज टटोलते हैं-साँस चल रही है पर रक्त पेटीकोट से बाहर निकलने लगा था, साड़ी को तर करता हुआ। बदहवास, श्रीकांत पहाड़ों को गाली देता हुआ बरल डंडी के इंतजाम के लिए दौड़ता है-बेहोश है मिथिला। श्रीकांत के आँसू नहीं रुकते हैं, खुद तार नहीं लिख पाता है। एक रात बाद, होश आने से पहले आ गया था टैक्सी से सुकांत। बेहोशी में भी पट्टी से ढ़का चेहरा मुस्कुराता हुआ लगा सुकांत को।
ब्वे सिसकते हुए कहतीं, ''मर जाने देती इस सुमन को, अपने प्राण क्यों संकट में डाल दिये।''
अफवाह दानकोट तक पहुँच गयी है-''साक्षात भगवती दुर्गा है बवारी।''
बाद्घ भी शायद छलांग के साथ लुढ़का था। गुलाटी खाता रहा और गिरा जा के भागीरथी के संकरे तट पर। एक दिन बाद मिला उसका मुर्दा शरीर। रिटायर्ड सूबेदार चौहान ने दातून करते हुए खबर दी थी सबको, ''छोड़ा नहीं बाद्घ को! साक्षात दुर्गा है।''
रमेश की ब्वे ने बीमार पति के सिरहाने शेर पर सवार देखा मिथिला को। दूसरे दिन बीमारी खत्म! रमेश की ब्वे दानकोट जाकर मिथिला के चरण छू आयी थी।
सुकांत कहता, ''रविश!''
डॉक्टर ने सुकांत को समझाया, ''एबॉर्शन से उपजा खतरा तो टल गया। पर गाल को सिलाई खुलने के बाद प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत पड़ेगी। टाँग के प्लास्टर में तो समय लगेगा।''
रास्ते में ससुर से पूछा था सुकांत ने, ''क्या शुरू से बहुत भावुक थी मिथिला?''
गहरे दुख में डूबे रामरतन कहते हैं, ''हाँ! रामायण पढ़ी तो अयोध्या जाना पड़ा। वृंदावन गये तो रात सबकी आँख बचा मधुवन में द्घुस गयी। पूरी रात पुलिस के साथ तलाशता रहा।'' पिता की जाँद्घ पर सिर रखे लेटी मिथिला मुस्कुरा उठी थी... अंदर कोई हिमालय पर कविता बोल रहा था-मेरे नगपति मेरे विशाल... ये नदी का बहता जल कितना निर्मल, कितना वत्सल! पूरे चार महीने लगे उठने में। टाँग पर प्लास्टर दो बार लगवाना पड़ा। डॉक्टर ने कहा था, ''प्लास्टिक सर्जरी के लिए बंबई या पिफर न्यूयॉर्क ले जाइए, मिस्टर सुकांत!''
''प्लास्टिक सर्जरी क्यों, डॉक्टर? जो नैसर्गिक है, वही स्वाभाविक है।'' मिथिला ने बात काटी थी।
रामरतन जी ने थपथपाते हुए कहा था, ''तू खुद महसूस न करे इसलिए, और पिफर इसी बहाने हम तीनों अमरीका द्घूम आएँगे।''
आद्घात-सा लगा मिथिला को, ''मैं क्या महसूस करती हूँ, यह तो मैं बेहतर जानूँगी। पर लोगों की भी मैं पिफक्र नहीं करूँगी। कुरूपता और दुख अभी तक दूसरों को देखकर अहसासे थे, अब अपने से अनुभव करूँगी।''
''मेरे लिए भी नहीं मानोगी?'' आजि८ा हो पूछा था सुकांत ने।
''मानूँगी, पर तब अपनी जिंदगी नहीं जी सकूँगी। अचेतन बन के जी सकूँगी या स्वयं को विस्थापित करके। अहल्या को शापमुक्त किया था राम ने। कौमार्य नहीं प्रदान किया था। गौतम आँषि ने भी वैसे ही स्वीकार कर लिया था। चेहरे का एक दाग क्या संबंधों के स्थायित्व को जड़ से हिला सकेगा?''
कृत्रिाम कैनवास की तरह रात बेडरूम में द्घिर आयी थी। श्रृंगार किया था मिथिला ने। मांग में कालीबाड़ी का लाल उद्दीप्त सिंदूर डाला था। बाँहों में जाते हुए गहरी मुस्कान के बाद सिसक उठी थी। सुकांत ने सहलाया था, ''क्या हुआ था मिथि तुम्हें?''
वक्ष में मुँह छुपा फफक उठी थी मिथिला, ''क्या करूँ, सुकांत? पहाड़, पहाड़ के श्वेत शिखर, भूरे और काइया आँचल, विभोर करती हवा और भागीरथी की गुनगुनाहट मेरी आत्मा से लिपट गयी है। मैं तुमको, खुद को और दांपत्य को भूल जाती हूँ। महुआ गंध की तरह नशे की लकीर अंदर-ही-अंदर तैरती रहती है...मैं...मैं नहीं रहती हूँ। मेरे अक्षांश, देशांतर बदल जाते हैं।'' सुकांत ने थपथपाया था। कहीं भी तो उन्माद और प्यास में अंतर नहीं आया था। पर साफ रास्ते पर कोई भी पत्थर फेंक देता, ''ये क्या सुकांत! प्लास्टिक सर्जरी क्यों नहीं करा देते हो?''
सुकांत के बॉस सपरिवार आये थे द्घर। अनचाहा द्घट ही गया। मिथिला ने अव्यग्र भाव से कटु वार किया था, ''दाग तो प्लास्टिक सर्जरी से ढक जाएगा। बाल आपने भी रंग रखे हैं। झुर्रियां फाउंडेशन से छुप जाएँगी पर मौत का मुअक्षयन दिन क्या सरक सकेगा? रूप और कीर्ति के पैमाने में जो महत्वपूर्ण है, उसी की पिफक्र करना मेरे लिए ठीक है।''
खिसिया उठा था सुकांत। बॉस की पत्नी तमकी थी। उनके जाते ही बरस पड़ा था सुकांत। जीवन का पहला आवेश शाप बन के फूट उठा था, ''कितना सहूँ, मिथि? तुम्हारी शक्ल गयी, बच्चा गया। डॉक्टर कहता है कि दूसरा होगा भी नहीं। तुम एबनॉर्मल रहो, पर सहज बात का उत्तर कटु तत्वज्ञान से दो, यह तो ठीक नहीं है।''
जीवन में पहली बार फटकार का सामना किया था मिथिला ने। लगा कि प्यार का फेनिल दरिया, जो दूध से लबालब था अचानक ही फटास से भर क्या है। उस रात वाकई रात हुई थी। एक ही बेडरूम में, एक ही पलंग पर अलग-अलग पाटियों से चिपक मुँह फेरकर सोये थे दोनों। मिथिला सिसकती रही थी, ''श्रीकांत, तुम्हारे दीदा ने पशु की तरह मुझे बरता है। पहाड़ पर गाय के दाग पड़ते ही उसे अगस्त्य मुनि के मंदिर के सामने छोड़ देते हैं, मैं भी खुद की वैसी ही गऊ की तरह महसूस करती हूँ।''
श्रीकांत को लगा कि कड़वे सत्य से परिचय प्राप्त किये बिना आदमी व्यावहारिक नहीं बन पाता है। अस्तित्व और व्यक्तित्व के विश्लेषण और संश्लेषण केवल काल्पनिक प्रतीक ही थमाते हैं। सुबह जब सुकांत नाश्ता कर निकल गया तब उठी मिथिला। बैंक से काफी रुपया निकाला, अटैची तैयार की और खत छोड़ निकल पड़ी। सुकांत ने सीधे लखनऊ फोन किया था और अरखुंड भेजा था तार। पर प्रतीक्षा के क्षण कहाँ टूटे?
अरखुंड और राईड़ी में अफवाह फैली हुई थी-तुंगनाथ के पीछे मुँह ढांपे दौड़ती औरत ही है मिथिला! कोई कहता कि जंगल में मरे हुए बाद्घ के बच्चे पाल रही है एक औरत... वही तो है मिथिला! पिफर लोग प्रश्न करते-अब क्या करेगा सुकांत?
कनखल से छह कि. मी. दूर वनिता आश्रम में बैंक से निकाली राशि आश्रम की बहन जी को थमा बोली थी मिथिला ''चोरी नहीं की है और न निकाली गयी हूँ...''
''पिफर?'' बहन जी पूछती हैं।
''बंजर हूँ! दगीला बंजर! जहाँ पानी देने से भी सिपर्फ बबूल वन पनप सकता है, इसलिए चली आयी हूँ। सिपर्फ अज्ञातवास में जी सकूँ, इतना ही चाहती हूँ। लड़कियों को पढ़ाऊँगी, एकाउंट्स देख लूँगी और आर्थिक बोझ भी नहीं बनूँगी।'' मिथिला ने अकंपित स्वर में कहा था। बहन जी ने उसका सिर सहला दिया था। कहीं अपनी व्यथा का प्रतिबिंब ही देखा हो?
बहन जी ने पूछा, ''अच्छा, नाम तो बताओ।''
''नाम! जिसकी संज्ञा का कत्ल हो जाता है, उसका सर्वनाम भी अधूरा रह जाता है। आप लोग सुरीली कह लिया करें।'' मिथिला ने दार्शनिक भाव से कहा था।
''सच! बोली भी तुम्हारी सुरीली है। बड़ा सार्थक नाम है।''
''हाँ!'' मिथिला ने एक गहरी निश्वास खींची थी। पर बताया नहीं था कि सुरीली नामक अधूरे सर्वनाम के पहले क्या था। जब शेष संबंध ही कट गये तो उस संबंध द्योतक शब्द को रखकर ही क्या करती मिथिला।
काम खत्म कर मिथिला गंगा के तीर जा बैठती। अनेक प्रश्न चारों तरफ से द्घेर लेते-क्या तुंगनाथ आएँगे इस मैदानी क्षेत्रा में? क्या सुकांत उसे भूल जाएगा? क्या श्रीकांत आज भी बौ सुरीली गाता होगा? क्या ब्वे की छाती में रिक्तता के कैक्टस नहीं चुभते होंगे? और गाँव वाले?
सूरज नदी में निरंतर गोते लगाकर पहाड़ों के पीछे अदृश्य हो जाता। मिथिला को लगता कि श्रीकांत की स्वर लहरी जलधारा के साथ बहती हुई आ रही है। तभी चाँद निकल आता और चाँद में अंकित दाग के साथ अपने कपोल पर अंकित दाग का स्मरण उसे आकुल कर देता। मंथर गति से मिथिला आश्रम की ओर लौट पड़ती-एक अनंतर आते रहने वाले बैरंग और ब्लैंक दिन के इंतजार के लिए, किस्त-दर-किस्त निरर्थकता के सबूत की तरह। |