अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कहानियां
कॉल-मिस कॉल : अनंत कुमार सिंह
''यह खेल है बड़े भाई! इस तरह के, और इससे ज्यादा हैरतअंगेज तमाशे रो८ा ही होते रहते हैं मोबाइल पर, और अंततः उसका ख़ामिया८ाा उपभोक्ता को उठाना पड़ता है-आर्थिक और मानसिक स्तर पर करारा प्रहार, साथ ही श्रम का शोषण... मैं बताऊँ, कल ही मेरे पास तीन मिस कॉल्स आए। मैं अति व्यस्त था, लेकिन टाल नहीं सका। तीनों को मैंने अटेंड किया। दो में लड़कियाँ थीं और एक में बूढ़ा खूसट। मैंने जब कॉल बैक किया तो उधर से एक लड़की ने जवाब दिया, ''नहीं, मैंने आपके नंबर पर डायल नहीं किया है।''

१८१०८७७६-मेरा परिचित नंबर नहीं है यह। लेकिन मेरे मोबाइल पर दुबारा यह नंबर आ रहा है-रिंग हो रही है। किसका कॉल है भाई? ...मन ही मन मैंने सोचा। और पिफर उसका उत्तर भी ढूंढ़ लिया ...किसी का भी हो, बहुत जरूरी कॉल भी हो सकती है। किसी प्रशंसक या किसी पाठक द्वारा किया गया कॉल हो सकता है। ऐसा तो अक्सर होता है ...खासकर तब जब किसी रचना में पते के साथ मोबाइल नंबर भी दर्ज होता है। पिफर भी कोई संपादक, आलोचक रचना के लिए या कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिए कभी ऐसी कृपा करते हैं ...यह सब कुछ सोचते हुए मैंने मोबाइल ऑन कर दिया।

''कौन हो तुम'' उधर से आवाज आई।
''आपने किसे कॉल किया है'' मैंने उनकी आवाज की बेरुखी को महसूस करते हुए पूछा।
''मैंने शौक से या प्रेमवश तुम्हें कॉल नहीं किया है। तुम दूर-दूर तक मेरी पहचान के दायरे में नहीं हो ...लेकिन तुम्हारे मोबाइल से मेरे नंबर पर मिस कॉल आई है... आखिर क्यों?'' उधर से नाराजगी भरा जवाब मिला।
मैंने? ...मैंने तो आपके नंबर पर कॉल नहीं किया है।'' मैंने सच बताया।
''कॉल नहीं किया है, तो तुम्हारा नंबर आया कैसे? यह तो संभव नहीं। तुमने कॉल किया है।'' कड़े तेवर में आरोप लगाया उसने।

''भाई साहब! आप यकीन करें, मैंने नहीं किया है। आप मेरे परिचित नहीं हैं ...आखिर मैं क्यों करूँगा ऐसा'' मैंने सफाई दी।
''तुम कहाँ के हो... कहाँ से बोल रहे हो?''
''भाई साहब, मैं आरा से बोल रहा हूँ।''
''आरा? यह क्या होता है?''
''आरा एक कस्बे का नाम है, भोजपुर जिले का मुख्यालय, जो बिहार राज्य में है'' मैंने जानकारी दी।
''बिहार? हूँ... बिहार, बिहार के हो तब पिफर करते रहो विहार।'' और उस सज्जन ने फोन काट दिया। मैं कुछ बोलना चाहते हुए भी चुप रह गया। कार्यालय का कार्य बाधित हुआ और अभी भी मैं उधेड़बुन में हूँ। क्या करूँ, क्या न करूँ? वे सज्जन अत्यधिक नाराज थे, लेकिन मैं दोषी कहाँ था! मैं उन्हें कैसे यकीन दिलाता कि मैंने मिस कॉल नहीं किया था। अजब-गजब स्थितियों से दो चार होना पड़ रहा है इस मोबाइल के चलते। कभी-कभी तो ऐसा हो जा रहा है, जो मेरी समझ से बाहर की चीज है।

कल ही मैंने कथाकार मित्रा सगीर रहमानी को कॉल किया था। रिंग हुई। उधर से आवाज आयी एक लड़की की, बेहद सेक्सी, बनावटी आवाज... ''कहिए जनाब कैसे हैं? कैसे याद किया मुझे?''
''मैं सगीर जी से बात करना चाहता हूँ।'' मैंने अर्८ा किया।
''सगीर जी? यह कौन-सी बला है? मैं तो मिस मधुबाला हूँ। तुम्हारी स्वीट हार्ट।'' बड़ी बेबाकी से कहा लड़की ने और मैं पूरी तरह अकबका गया। कंठ अवरु(-सा हो गया और मैं हकलाने लगा... थूक सूख गया।
''आप कैसी बातें कर रही हैं... मैं सगीर जी से...''
''सगीर बगीर जो भी हो, उसका नंबर डायल करो, इधर क्यों हाथ मार रहे हो?'' लड़की ने बुरी तरह झिड़क दिया मुझे।
''सगीर का नंबर मेरे मोबाइल में सेव है... मैं उसी नंबर पर बात कर रहा हूँ... उनका नंबर आया है स्क्रीन पर...'' मैंने हकलाते हुए कहा।

''बकवास बंद... मूड खराब नहीं करो मेरा... अगर जेब में रुपए हैं तो आ जाओ अशोका होटल में... साथ-साथ डिनर लेंगे-हल्का फुल्का ड्रिंक्स... और पिफर मजे ही मजे रहेंगे, रात... गुलाबी हो जाएगी, तुम्हारी भी और मेरी भी।'' सुनकर मैंने फोन काट दिया और मोबाइल सेट को देर तक द्घूरता रहा। सगीर से बात करना जरूरी था, लेकिन री-डायल करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। साहस बटोरकर मैंने दुबारा डायल किया। रिंग हुई। मैं कांप-सा रहा था और मोबाइल को कान के पास लाने में सहम रहा था। इतने में सगीर जी की खनकती आवाज से जैसे जान में जान आयी।
''नमस्कार बड़े भाई... कैसे हैं?''
''नमस्कार भाई... मैं तो काफी डिस्टर्ब हूँ।''
''क्यों?''

''कृपया आप बताएँ कि आपका मोबाइल अब से दस मिनट पहले किसके पास था,'' मैंने पूछा।
''मेरे पास-सामने टेबल पर पड़ा था, ऐसा क्यों पूछ रहे हैं आप बड़े भाई?'' सगीर को उत्सुकता हुई।
''आपके साथ कोई और था या थी?'' मैंने पिफर पूछा।
''मेरी बेगम साहिबा थीं... अभी भी हैं साथ में ही।'' ...सगीर ने बताया।
''आप लोग कुछ समय के लिए कमरे से बाहर गए थे क्या?'' मैंने पूछा।
''बड़े भाई... आप आज कैसी बातें कर रहे हैं... क्या बात है आखिर... आपकी आवाज से परेशानी झलक रही है... खैरियत तो है-न?'' सगीर ने पूछा। मैं सगीर जी से बात कर रहा था, लेकिन मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं उनसे बात कर रहा हूँ। थोड़ी देर पहले उनके मोबाइल से हुई बात और अभी हो रही बात... दोनों में सच क्या है...? खैर। मैंने सगीर से अभी हुए वार्तालाप की चर्चा कर दी और सुनते ही सगीर ठहाका मारकर हँसने लगा। लग रहा था, वह हँसते-हँसते लोट-पोट हो रहा है... उसकी बेगम का ठहाका भी सुनाई पड़ रहा था।
''मुबारक हो बड़े भाई! अगर आपकी इजाजत हो तो अशोका में मैं भी आ जाऊँ!'' सगीर ने गंभीर होने का अभिनय करते हुए कहा।

''अरे यार, तुम्हें मजाक सूझ रहा है और यहाँ मेरा दम फूल रहा है। दरअसल, मैं जानना चाहता था कि आपके मोबाइल से किसने ऐसी हरकत की।'' मैंने कहा।
''अरे नहीं बड़े भाई... मेरे मोबाइल से नहीं।''
''सगीर जी, आपका नंबर सेव है ...मैंने नाम और नंबर दोनों देखे हैं...पिफर यह कैसे हुआ?''
''यह खेल है बड़े भाई! इस तरह के, और इससे ज्यादा हैरतअंगेज तमाशे रोज ही होते रहते हैं मोबाइल पर, और अंततः उसका ख़मियाजा उपभोक्ता को उठाना पड़ता है-आर्थिक और मानसिक स्तर पर करारा प्रहार, साथ ही श्रम का शोषण... मैं बताऊँ, कल ही मेरे पास तीन मिस कॉल्स आए। मैं अति व्यस्त था, लेकिन टाल नहीं सका। तीनों को मैंने अटेंड किया। दो में लड़कियाँ थीं और एक में बूढ़ा खूसट। मैंने जब कॉल बैक किया तो उधर से एक लड़की ने जवाब दिया, ''नहीं मैंने आपके नंबर पर डायल नहीं किया है।''
''आप यकीन करें। आपका ही नंबर था।'' मैंने अर्ज किया।
''नहीं भाई साहब...'' और उसने फोन काट दिया। दूसरे कॉल पर लड़की का ही जवाब था... ''फरमाइये!'' ''आपकी मिस कॉल थी? आप कौन हैं? कॉल करने का मकसद? मैंने पूछा

''मैं मिस हूँ... मिस मलाइका खन्ना... अब आप ही बताइए कि एक मिस एक मिस्टर को क्यों मिस कॉल करेगी... वैसे मैं नहीं जानती थी कि तुम इतने चुगद हो... डोल्ट हो... कोल्ड हो... बैकवर्ड हो...'' सुनते-सुनते मैं परेशान हो गया और फोन काट दिया। दुबारा कॉल किया लड़की ने... तीसरी बार भी, और मैंने आजिज आकर स्विच ऑफ कर दिया।'' सगीर बता रहा था। उसने कहा कि काफी देर बाद मैंने तीसरे मिस कॉल को डायल किया कि यह शायद किसी अपने का हो।
''तुम मजनूंगिरि करते हो... खबरदार! अगर आइंदा तुमने ऐसी हरकत की तो मैं तुम्हें बरबाद कर दूँगा।'' बूढ़े ने गर्जना की।
''मैंने ऐसा क्या किया है? आपका नंबर मेरे मोबाइल पर आया, मैंने आपको कॉल किया... इसमें क्या कसूर है मेरा!'' सगीर ने अर्ज किया था।

''तुम गलत हो... मैंने कोई कॉल नहीं किया है तुम्हारे पास। इतना फालतू वक्त नहीं है मेरे पास। कहते हुए बूढ़े ने फोन काट दिया। इन तीन द्घटनाओं की चर्चा के बाद भी सगीर ने मोबाइल से जुड़ी कई अद्भुत-अनजानी स्थितियों का जिक्र किया। मैंने भी अपनी व्यथा सुनायी। सगीर ने अंततः मुझे समझाया... ''बड़े भाई! इससे परेशान मत होइये... यह बदले हुए समय का ...विज्ञान और विकास की आड़ में खेला गया पूँजी का खेल है। कल ही कवि विनोद जी का कॉल आया और कट गया। मैंने डायल किया। उधर से व्यस्त और स्विच ऑफ दोनों एक ही साथ बता रहा था'' सगीर ने बताया और हमारी लंबी बातचीत का अंत हुआ। वह इसलिए कि आज शाम को ही सगीर से मिलने का वादा है। ढेर सारी बातें करनी हैं सगीर से, कई मुद्दों पर-लेकिन 'पूँजी का खेल' इस पर मन ही मन मैं मंथन करने लगा। समय-समाज पर नजर रखते हुए चीजों की, मान्यताओं की, स्थितियों के बदलने की चर्चा रचनाओं में भी करता रहा हूँ।

मैं सोचता हूँ कि मेरे जैसे लोगों के लिए कुछ वर्ष पहले तक लैण्डलाइन फोन का कनेक्शन लेना बहुत बड़ी बात थी शहर का मोहल्ला हो या गाँव का टोला-चर्चा का विषय होता था। लोग विशिष्ट समझने लगते थे। उन दिनों एक मध्य वर्ग के लिए यह विलासिता संबंधी आवश्यकता की श्रेणी में था। देखते-देखते यह आराम संबंधी आवश्यकता में तब्दील हुआ और अब तो यह आवश्यक आवश्यकता बन गया है। उसके बाद मोबाइल... यह तो सीधे विलासिता संबंधी आवश्यकता की श्रेणी से जीवनरक्षक, प्रतिष्ठारक्षक, आवश्यक आवश्यकता-अपरिहार्य चीज बन गया है। अरबपति-खरबपति के लिए भी और ठेले पर सब्जी बेचने वाले के लिए भी यह आवश्यकता बन गया है। प्लेटफार्म, बसस्टैंड और ट्रेन में भीख माँगने वाले, कुलीगिरी करने वाले, सामान गायब करने वाले, जेब का ऑपरेशन करने वाले के पास अक्सर देखी जा रही है यह अति आवश्यक वस्तु। आप इसकी गंदी हरकतों से ऊब सकते हैं, खीज सकते हैं, फेंकने तक की बात सोच सकते हैं... लेकिन, अंततः आप उसकी आंतरिक मंशा के वश में हैं। आपके विचारों को, चेतना को जैसे लकवा मार गया हो। तभी तो ऊटपटांग स्थितियाँ भी सहज स्वीकार्य हो रही हैं।

कल ही एक रिश्तेदार का कॉल आया और कट गया। मैंने कॉल बैक किया। उधर से व्यस्त और स्विच ऑफ दोनों संदेश एक साथ थे। और ताज्जुब कि मेरा तीन रुपया पिचहतर पैसा अकारण हलाल हो गया। हो ही रहा है इस तरह से सभी नेटवर्क पर। कल ही शिवजी बता रहा था, प्रचार-प्रलोभन को नकारने वालों को भी फंसाने का पुख्ता इंतजाम किया है रिलायंस ने। आपके सेल पर मिसकॉल आएगी। आप कॉल बैक करेंगे, उधर से जवाब जाएगा, थैंक्यू... और आपका पाँच छह रुपया कट जाएगा। ऐसी स्थिति में ठिसुआने या पिफर अपने बाल नोचने के सिवा चारा क्या है?

मैंने तो कई बार सोचा इस डिबिया को त्याग दूँ। लेकिन लाचार हूँ। कार्यालय या कहीं अन्य जगह जाने के क्रम में गलती से मोबाइल छूट गया तो चैन हराम हो जाता है। लगता है बहुत कुछ मिस कर रहा हूँ... बहुत जरूरी चीज छूट गई है, जिसके बिना कुछ भी होना संभव नहीं।
और इस डिबिया के अपने नखरे हैं, अंदा८ा हैं, अदाएँ हैं... जिन्हें आपको चाहे-अनचाहे आत्मसात्‌ करना है। इस डिबिया धारक किसी मित्रा से शेयर करने पर तो कई बातें सामने आती हैं... ''आप सेट बदल लें'' कोई राय देगा। ''बी. एस. एन. एल. में ऐसी गड़बड़ी आम है। आप रिलायंस का ले लें।'' रिलायंस धारक की सलाह होती है। ''अरे भाई एयरटेल लेकर देखिए कोई शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। महंगा है, लेकिन काम चोखा और उसमें कई ऑफर भी हैं'', एयरटेल का धारक कह देता है।

...इस तरह की और भी कई किस्म की बातें, लेकिन विकल्प शून्य और खोखला। कस्टमर केयर से शिकायत करने पर परिणाम कुछ नहीं, बातें ऊटपटांग और द्घोषणा के विरु( कभी-कभी बिल भी दर्ज हो जाता है... कई किस्म की अनहोनियाँ हो रही हैं मोबाइल पर-मेरे साथ भी। कहीं नंबर डायल किया तो उधर रिंग नहीं होगी। उधर से नेटवर्क बिजी या कॉल पूरी नहीं हो सकती जैसे जुमले, लेकिन मोबाइल स्क्रीन पर कॉल समरी शुरू...२-५...१०...२०...४०... मैं अकबका कर काटने लगता हूँ... लेकिन कटेगा नहीं। अड़ा रहेगा, तना रहेगा... और कॉल समरी की अवधि बढ़ती रहेगी। ऑफ करते ऊब जाता हूँ... लेकिन बेकार। वह तो जोट खाते गेहुँवन साँप की तरह अपनी मस्ती में डोलता रहेगा।

छेड़ने पर जैसे गेहुँवन सामने वाले को डँसने से नहीं छोड़ता, ठीक उसी तरह मोबाइल भी... काटने में सफल होते-होते बिल १-२-३- रुपये का हो जाएगा... तब पिफर कोशिश करने पर वही बात... तीसरी बार भी वही बात। भागीरथ प्रयास के बाद सफलता मिलती भी है तो पाँच दस रुपये बिना बात किये हुए और बात करने के तीन-चार रुपये। इस तरह बिना बात किये बिल का दर्द शामिल हो जाता है। ऐसा दर्द आए दिन रोज ही झेलता हूँ मैं। अगर दस कॉल करता हूँ तो पाँच में तो ऐसा हो ही जाता है। बिना बात किए बिल उठ जाना कितना पीड़ा दायक है, लेकिन इसका कोई निदान नहीं। जल-भुन कर गुस्से को पी जाना और अपने को तनावग्रस्त कर लेना ही विकल्प है। इस बेबसी का दंश तो सालता है... लेकिन...।

और कहीं जरूरी कॉल करना है तो डायल करने पर उत्तर मिलता है, आपका कॉल अभी प्रतीक्षा में है, नेटवर्क बिजी है, इरर इन कस्टमर सर्विस...कभी-कभी तीनों बातें एक ही बार में... या नॉट रिचेबुल या पिफर मौन का ताप तो आम बात है। प्रचारित ऑफर और सुविधाओं को धता बताती हुई ये स्थितियाँ रुला देती हैं और आँसू जो दिखते नहीं, उन्हें पोंछकर पिफर उसकी आवभगत में लग जाता हूँ मैं।

डायल करने पर रिकॉर्ड किए हुए नारी स्वर की लुभावनी, खनकती, इठलाती आवाज में विभिन्न नेटवर्क से भिन्न जानकारियाँ दी जाती हैं। मसलन आपने जिस ब्यूटीफुल कस्टमर को कॉल किया है, उनका मोबाइल अभी स्विच ऑफ है या डायल किया हुआ नंबर अभी व्यस्त है, आप ७५ पैसे में वॉयस एस. एम. एस. भेज सकते हैं... या अभी कॉल पूरी नहीं हो सकती। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि कार्यालय में किसी जरूरी संचिका निपटाने में लगा होता हूँ और मैसेज की ट्यून सुनाई देती है, उत्सुकता से खोलता हूँ, लेकिन वह किसी अपने का नहीं होता, वह होता है रिंग टोन का प्रचार। कभी-कभी किसी आयोजन में बिना शामिल हुए सेल नंबर को इनाम के लिए चुन लिया जाता है और उसमें कुछ कवायद करने, प्रोसेसिंग चार्ज देने वगैरह की सलाह दी जाती है। जैसे, कांग्रेचुलेशन! आपका नंबर बन गया है सुपर लक्की नंबर। मौका है बीस ी रिंग टोन पाने का, बस डायल कीजिए १२५५५५... पिफर छोटे अक्षरों में लिखा होता है-५ रु. प्रति मिनट।

इससे थोड़ी भिन्न है यह स्थिति। इसमें बाजाब्ता रिंग होती है। गानों के कुछ मुखड़े सुनाये जाते हैं-''जरा-जरा टच मी, लंबी जुदाई, सुनो ना सुनो...'' आदि। पिफर एक आवाज सुनाई पड़ेगी। अपने दोस्तों को सुनाएँ नये पुराने गाने बात करते हुए...अभी सब्सक्रिप्शन के लिए ५ डायल करें। गाने डेडीकेट करने के लिए ९ डायल करें। फलां...फलां। इसी में मित्रा के बेटे ने डिजिट दबा दिया और पचास रुपये कट गए। मित्रा की आँखें फट-सी गईं और बच्चे पर दुश्मन की तरह पिल पड़े।

लगभग इन सारे मामलों में नारी स्वर का मधुर आमंत्राण होता है और वह नारी स्वर विष कन्याओं की याद ताजा कर देता है... दूसरी तरफ चेतावनी की याद आती है-इसके सामीप्य से सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हार्ट, किडनी, लीवर वगैरह सीधे इसके साफ्रट टारगेट में हैं। उसकी द्घातक किरणें प्रभाव डालती हैं। अभी हो रही दुर्द्घटनाओं में ९० प्रतिशत मोबाइल कारण बताया जा रहा है। पिफर भी कहाँ प्रभाव पड़ता है किसी पर, मुझ पर भी नहीं।

एक दिन युवा कवि कुमार वीरेन्द्र ने मेरे पास आते ही आरोप लगाया ''आप हरदम मोबाइल स्विच ऑफ क्यों रखते हैं?
''मैं तो कभी भी स्विच ऑफ नहीं रखता। हाँ अपवाद स्वरूप दो दिन... रात को सोने के पहले स्विच ऑफ किया था। उस समय जोरों का प्रचार था कि कोई खास नंबर आपके मोबाइल पर आएगा, विस्फोट होगा, शक्तिशाली बम या ग्रेनेड की तरह और आग लग जाएगी... मोबाइल तो जलेगा ही, और साथ ही आप अपने परिवार, पड़ोसी समेत जलकर भस्म हो जाएँगे। इस समाचार का प्रभाव दो दिनों तक कायम रहा था मेरे जेहन में। दो दिन तक मैंने ऐसा किया-मोबाइल ऑफ रखा, वह भी रात में...। वैसे तो मेरा मोबाइल ऑफ रहता ही नहीं...'' मैंने विस्तार से बताया कुमार को।

''अभी पाँच मिनट पहले तो मैंने डायल किया था और यही जवाब मिला था। आप अभी देखें... स्विच ऑफ तो नहीं... कहीं भूलवश'' ...कुमार वीरेन्द्र ने कहा।
''आप डायल कीजिए'' मैंने कहा। कुमार ने डायल किया और अपना सेट मेरे कान के पास ले आया-
''आपने जिस कस्टमर को कॉल किया है उनका मोबाइल अभी स्विच ऑफ है।'' मैंने सुना और अपना मोबाइल कुमार को दिखाया। ''कुमार वीरेन्द्र! बताओ कहाँ है स्विच ऑफ?'' ठीक इसी समय मेरे मोबाइल में रिंग हुई। मैंने वीरेन्द्र की तरफ देखा और वह मुस्कराने लगा।

कॉल सुनकर मैंने कुमार वीरेन्द्र का नंबर डायल किया... पिफर परिचित आवाज आई, जो अक्सर उसे डायल करने पर आती है ''यह नंबर मौजूद नहीं है। कृपया नंबर की जाँच कर लें और पुनः डायल करें।'' मैंने अपना मोबाइल कुमार को दे दिया और कहा- सुन लो यार तुम्हारे पास डायल करने पर यही उत्तर मिलता है मुझे, ''दिस नंबर डज नॉट एक्जिस्ट... प्लीज चेक द नंबर एंड डायल अगेन... बताओ वीरेन्द्र मैं क्या करूँ?''-पिफर हम दोनों, बाद में अन्य लोग भी मोबाइल कथा के कई अध्याय कह-सुन गये। और दूसरी जरूरी कई बातें होने से रह गईं।
आज अभी कार्यालय में संचिका का कोई काम ढंग से नहीं हो सका है। आज मेरे जेहन में वही धमकी नगाड़े की तरह बज रही है। मैं उसी में ऊब-डूब रहा हूँ, डूब-उतरा रहा हूँ। जबकि कार्यालय बंद होने का समय भी हो गया है। इक्के-दुक्के लोग अपनी संचिका समेट कर कार्यालय से बाहर होने लगे हैं। अपनी टेबल पर पड़ी संचिकाओं पर मेरी नजर जाती है और मैं उस पर केंद्रित होने और जल्दी से निपटाने की मंशा से संचिका उलटने पलटने लगा हूँ...।

चार जरूरी संचिका करनी थी। अभी एक पर ही माथा पच्ची कर रहा हूँ...। केंद्रीयता बार-बार भंग हो रही है। ...विहार करने की सलाह देने वाले सज्जन की व्यंग्य भरी आवाज सायरन की तरह बज रही है। साथ में ढेर सारे अनचाहे-अनजाने कॉल। इसी में जिस संचिका को एक सप्ताह पहले पूरा हो जाना चाहिए था, वह अभी भी लटकी हुई है। अवरोध पर अवरोध। जैसे ही संचिका की बारीकी में प्रवेश करता हूँ, कोई मैसेज, कोई मिसकॉल, कोई कॉल-वह भी अनचाही, जिससे दूर-दूर तक का संबंध नहीं होता, धमक पड़ती है। समय तो ८ााया हो ही रहा है, पैसे भी जा रहे हैं और ऊपर से बेवजह का तनाव। कितनी बदनामी हो रही है। बॉस की धारणा ही बदल गई है। वे मुझे अगंभीर और लापरवाह समझ रहे हैं।

ओह! पिफर मैं यही सब सोचने लगा। संचिका का क्या होगा? पिफर मैं संचिका को मधुमक्खी की तरह छाप लेता हूँ... कि मोबाइल से रिंग होने लगी है। कुछ समय बाद अचानक मैं चौंक-सा गया और भयभीत भी हो गया। एक सिहरन सी दौड़ गई मेरी नस-नस में। खीज के बावजूद मोबाइल उठाया-ऑन किया। कवि विनोद जी का नंबर था जो ऑन करते कट गया। अब तो डायल करना ही था-मित्रा हैं, रचनाकार हैं। मैंने उनका नंबर दबाया। उधर से नारी स्वर
''कौन? आप कौन बोल रहीं हैं?'' मैंने पूछा।
''हम तोहार बहीन के भतार बोल रहल बानी-भतार''
''अरे! मैं तो विनोद जी को...''
''ना...ना तोर बहीन के भतार'' मैंने खीज कर फोन रख दिया। कुछ ही देर में विनोद जी का फोन आया... आप काट क्यों दे रहे हैं? मुझे बताना था कि १७ तारीख को इलाहाबाद गोष्ठी में चलना है-आरक्षण करवा लें'' मैंने जब अभी हुए वाकये को बताया तो विनोद जी दंग रह गए। ''अरे! यह कैसे?''
विनोद जी से बात के बाद संचिका पर मैं केंद्रित हो गया। मोबाइल से पिफर रिंग हो रही थी। पता नहीं वह कर्ण प्रिय ट्यून मुझे इस समय अत्यधिक कर्कश क्यों लग रही है?

क्या करूँ? काट दूँ? नंबर तो अनजान है... पता नहीं किसका है? मेरे सोचते-सोचते बंद हो गई रिंग...। थोड़ी राहत मिली। लेकिन पिफर बजने लगी। अनायास मैंने मोबाइल ऑन कर दिया। ''हल्लो...'' मैंने कहा।
मैं तुम्हें बर्बाद कर दूँगा'' बड़ी भारी, कर्कश और बेहूदा आवाज थी।
''क्या बकवास है?''
''बकवास मैं कर रहा हूँ? तुम्हारे मोबाइल से कल मेरी पी.ए के पास कॉल आया था। तुम प्रेम का जाल फैला रहे थे। उसने तुम्हें फटकार दिया था और अभी तुमने पी. ए से एक करोड़ रुपये की मांग की है, नहीं तो उसके बेटे का अपहरण करने की धमकी दी है। सुन लो, कान खोलकर सुन लो, मैं नहीं जानता तुम कितने शक्तिशाली हो... लेकिन मैं दावा करता हूँ कि रुपये के बल पर मैं तुम्हारे खानदान का नामोनिशान मिटा दूँगा...''
सुनकर मैं दंग हूँ...कंठ अवरु( हो गया है, बदन में कँपकँपी हो गई है...
''आप गलतफहमी का शिकार हैं। मैं अपराधी नहीं। मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है'' किसी तरह मैंने कंठ खोला और अनुरोध किया।

''तुमने नहीं किया है...तब तुम्हारा नंबर कैसे आ रहा है? ...खैर! वार्निंग के रूप में तुम्हारा नंबर पुलिस में दर्ज कर दिया है। जल्द ही स्वागत करने पहुँचेगी पुलिस...''
अब ज्यादा नहीं सुना गया और न कुछ बोल सका मैं। मैंने मोबाइल ऑफ कर दिया और स्विच ऑफ भी। अभी मोबाइल पर मिली धमकी के भूत से उबर भी नहीं पाया था कि ठीक इसी समय अनुसेवक राजेन्द्र ने मेरे पास आकर कहा- ''एम. डी. साहब बुला रहे हैं''
-एम. डी. साहब का बुलावा? ठीक है बुलावा है तो जाऊँगा। लेकिन किसलिए बुलाया है एम. डी. साहब ने? मुझे-वह भी ऑफ टाइम में?-सोचते-सोचते पता नहीं क्यों मेरा हाड़ कांप गया। लेकिन सहज भाव से मैं राजेन्द्र के साथ बढ़ने लगा
''अभी तक तुम्हारे जिम्मे का प्रतिवेदन मिला नहीं मुझे। मैं तुम्हारे इंतजार में ही बैठा हूँ। कल पटना की प्रमंडलीय बैठक में रिपोर्ट देना है'' चेम्बर में द्घुसते ही एम. डी. ने कहा।
''कल? कल ही है बैठक?''

''हाँ- बिल्कुल। मैंने तो बताया था। नहीं भी बताता तो प्रमंडलीय बैठक की तिथि तो निश्चित है-महीने की सात तारीख'' एम. डी. का तेवर कड़ा था।
''सर... अभी तैयार नहीं हो सका'' मैंने संकोच से कहा।
''क्या? तैयार नहीं हुआ? क्यों?-आखिर क्यों?-सचिव की बैठक में मैं क्या जवाब दूँगा?'' उफन पड़े एम. डी.।
''सर..सर...''
''मैं तुम्हें ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ समझता था... लेकिन मेरी धारणा को तुम्हारी करनी ने ध्वस्त कर दिया। कर्त्तव्य के प्रति ऐसी लापरवाही मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा मिस्टर। मैं छोडूँगा नहीं तुम्हें'' एम. डी. के एक-एक शब्द तपते तीर की तरह मेरे रोम-रोम को छेद रहे थे। मुझे लगा कि मैं पूरी तरह नंगा हो गया हूँ और लात-द्घूसों-कोड़ों से मुझे बिलटा-बिलटा कर पीटा जा रहा है-जीवन में पहली बार। बेचैनी की पराकाष्ठा थी और बोलती बंद। मुझे अपने आप से द्घृणा होने लगी। लगा मुझसे ज्यादा बेहया, कामचोर, पतित, द्घृणित कोई दूसरा नहीं है इस जहाँ में। दोष तो मेरा है और उसका एकमात्रा कारण है मोबाइल-मन ही मन मैंने सोचा और बेचैनी के बवंडर में द्घिर-सा गया।

''सॉरी सर... सारे प्रतिवेदन तो नहीं, लेकिन एक को मैं अभी कर रहा हूँ'' अपनी अक्षमता का खुलासा करते हुए आत्मग्लानि-सी हुई और मैं चेम्बर से बाहर जाने लगा।
''पचीस मिनट में ट्रेन आ रही है। बीस मिनट में तैयार करके लाओ। बीस मिनट से ज्यादा मैं नहीं ठहर सकता'' एम. डी. ने हिदायत दी और मैं तेजी से अपने कक्ष में आ गया। आते ही मैं सीधे कागजात पलटने लगा।
दिसंबर की शीत लहर, हाड़ छेदती ठंड, लेकिन मैं पसीने से भीग गया।

''शिवशंकर। पंखे का स्विच ऑन करो'' मैंने अपने अनुसेवक से कहा। शिवशंकर ने मुझे आश्चर्य से देखा और पिफर पंखे का स्विच ऑन कर दिया। पंखे पर महीनों की जमी धूल कमरे मैं फैलने लगी। तेज हवा से टेबल पर पड़े कागजात उड़ने लगे। उड़ते कागजों पर मैं पेपरवेट रखने लगा। इसी क्रम में टेबल पर रखा मोबाइल मेरे हाथ में आ गया। मैंने उसकी तरफ खतरनाक और द्घिनौनी नजर से देखा और यकायक ऐसा हुआ कि अवांछित, दमद्घोटू, विवाद और तनावों के बीच ढकेलने वाले, अपनी निष्क्रियता के उत्प्रेरक और अभी के अपमान की जड़ मोबाइल को मैंने बेरहमी से फेंक दिया। इसका मुझसे दूर हो जाना ही मेरे लिए बेहतर था।

शिवश्ांकर मुझे और मोबाइल को फटी आँखों से देख रहा था और मैं प्रतिवेदन को पूरा करने के लिए डाटा जमा कर रहा था। लुटा-पिटा-पराजित, अपमानित मनःस्थिति में प्रतिवेदन पर अपने आप को केंद्रित करना बड़ा दूभर हो रहा था।
चार में से सिपर्फ एक प्रतिवेदन-वह भी काम चलाऊ बन सका। एम. डी. को दे आने के लिए मैंने शिवशंकर से कहा।
''एम. डी. साहब तो चले गए। ट्रेन का समय हो गया था।'' शिवशंकर ने झट जवाब दिया और मैंने माथा पकड़ लिया। लगा दर्द से फट जाएगा मेरा सिर और कोरों से बाहर निकल जाएँगी मेरी ये आँखें, जिनमें उड़ रही है रेत।

दीवार द्घड़ी के द्घंटे ने सात बजने का संकेत दिया और अनायास मुझे अपने बेटे की कही बात याद आ गई-''पापा। आप सात बजे अजय साहब को फोन कर देंगे... प्लीज पापा, भूलेंगे नहीं। यह मेरे कैरियर का मामला है। ऐसा मौका पिफर नहीं आएगा। ऑरिजनल एडमिट कार्ड इतनी जल्दी मिल नहीं सकेगा'' ...बेटे की बात याद आते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए-बदन में कंपकपी हो उठी। मैं पागलों की तरह टेबल पर छितराई चीजों को उलट-पलट करने लगा। पंखे की तेज हवा और शीत लहर के बावजूद मैं पसीने से भीग गया। ...उफ!
क्या हो गया? कहाँ रख दिया?-न टेबल पर है, न टेबल के दराज में और न जेब में। यह क्या हो रहा है मेरे साथ। अब कहाँ से नंबर लाऊँ अजय साहब का। उनका नंबर तो उसी में है-मुझे याद भी नहीं-रहता तो-उफ!
''शिवशंकर। कहाँ है... कहाँ है... अरे कहाँ है शिवशंकर?'' अनजाने में मैं बुरी तरह चीख पड़ा। पास ही खड़ा सहमा-सा शिवशंकर मेरे और करीब आया।
''हाँ सर, क्या ढूढ़ रहे हैं, क्या चाहिए सर?''

''मोबाइल, मोबाइल शिवशंकर, कहाँ है मोबाइल, मेरा मोबाइल शिवशंकर...''
''आपके टेबल पर-यहाँ-आपके सामने ही रख दिया है'' शिवशंकर ने कहा। झट मेरी नजर टेबल पर गई। पड़ा हुआ था मेरे सामने ही।
देखते ही अजीब-सा संतोष हुआ और मैं देखता रहा, देखता रहा, एकटक-अपना मोबाइल।

 
 
 
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