अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
चिट्ठी आई है
हमाम में सब एक से
'पाखी' के अगस्त अंक में आप मठाध्ीशों की आलोचना करते दिखते हैं लेकिन आप स्वयं भी तो उन्हीं मठाध्ीशों की शरण लिए हुए हैं। यह शब्द साध्क सम्मान समारोह से स्पष्ट है। सच यह है कि इस देश में उपदेश अध्कि दिया जाता है और जब स्वयं उस पर अमल करने की बात आती है तब लोग स्वयं उसी हमाम में डूबे नजर आते हैं। आप एक ऐसे व्यक्ति को सम्मानित कर रहे हैं जो छः करोड़ रुपयों के विभागीय द्घोटाले में तीन लोगों के साथ शामिल है। आप नहीं जानते रहे होंगे ऐसा नहीं हो सकता है।

बात भगवानदास मोरवाल की है। ये सज्जन उस द्घोटाले का अंग हैं जिसकी जांच चल रही है और चूंकि दलित हैं तो इस कार्ड का इस्तेमाल करके और पुरस्कारों का माध्यम ग्रहण कर उन्हें बचाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन आप राजेन्द्र यादव के समक्ष विवश हैं। जिनके दबाव में लंदन का इन्दु शर्मा सम्मान उन्हें द्घोषित किया गया था। लेकिन आदरणीय मोरवाल जी को लंदन जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। जो एक करोड़ मोरवाल ने हजम किये हैं उसमें कुछ साहित्यकारों के उदर में बोतल के माध्यम से जा चुका है। उस कर्ज को वे चुकता कर रहे हैं और आप उस कर्ज को उतारने का निमित्त बन रहे हैं। भ्रष्ट साहित्यकारों को सम्मानित करना संस्था और सम्मान की गरिमा को नष्ट करना है।

प्रेम विश्वास शर्मा, वाराणसी, उ.प्र.

 
हुंकार तो भरो
 

बचपन की यादों में एक याद यह है कि जब सब बच्चे मिलकर दादी से कहानी सुना करते थे तो सुनाते -सुनाते दादी अचानक रुक जातीं। इस अप्रत्याशित मौन पर सब बच्चों की निगाहें दादी के चेहरे पर होतीं और पिफर वे कुछ झिड़कते हुए कहतीं 'अरे, हुंकार तो भरो।' इसके बाद बीच-बीच में बच्चों के मुख से 'हुम्‌' ध्वनि सुनकर दादी का कथाकथन का अंदाज अध्कि आकर्षक होता जाता। वाचिक परंपरा में जो महत्व श्रोताओं के हुंकारे का है, पत्रिाकाओं के प्रसंग में वही महत्व पाठकों के पत्राों का है। 'पाखी' ने जब से पंख पसारे हैं तभी से पढ़ रहा हूँ, पर 'हुंकार' रूपी पत्रा जो प्रमादवश पहले न लिख पाया, अब लिख रहा हूँ। अपने अर्(पृष्ठीय स्तम्भ को छोड़कर ;अपनी कॉपी खुद नहीं जांचते ना!द्ध बाकी प्रकाशित सामग्री के विषय में पसंद-नापसंद का अनुपात क्रमशः नब्बे दस का है।

अगस्त ०९ के अंक में 'हाशिये पर हपर्फ' स्तंभ में प्रेम भारद्वाज ने आदमी के अकेलेपन की त्राासदी का जो चित्राण किया है वह अंदर तक झकझोरता है। 'अंत भला सो भला' सब जैसी बहूच्यमान उक्ति के दृष्टिगत बुढ़ापे में अकेलेपन की पीड़ा भोगने को निपट अकेले छोड़ दिये गये वृ(जन सभ्यता और संस्कृति की असफलता के सूचक हैं। प्राचीन औपनिषदिक/पौराणिक परंपरा में तो ब्रह्म का अकेलापन ही सिसृक्षा ;सृष्टि रचना की इच्छाद्ध का प्रेरक कारण है-'एको(हं बहु स्याम्‌'। यदि एकत्व से बहुत्व ब्रह्ममेच्छा रही है तो निश्चय ही बहुत्व से एकत्व ;यानि भीड़ में अकेले रहने की विडंबनाद्ध ब्रह्ममेच्छा का विपर्यय है और इसलिए अशुभ है।

'अदबी हयात' स्तम्भ में राजीव रंजन गिरि हर अंक में अच्छा 'फूड फॉर थॉट' परोस रहे हैं। अगस्त अंक में राधा विषयक चर्चा में कई चौकाने वाली सूचनाएँ हैं। जैसे राध का प्रयोग बहुवचन और जातिवाचक संज्ञा के रूप में मिलना। अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन के एक अध्विेशन में 'प्रॉबलम्स इन इण्डोलॉजी' की चर्चा में पत्रालेखक शरीक था। तब उस सूची में राध नहीं थी, अब लगता है होनी चाहिए थी। अतिरहस्यमय है राध की पहचान। भक्ति का विषय बनने पर किसी भी पात्रा की पहचान खो जाना प्राचीन पात्राों के ही नहीं अर्वाचीनों के संदर्भ में भी द्रष्टव्य है, प्रचारित, प्रसारित चमत्कारों के ढेर में से 'व्यक्ति' के रूप में साईं बाबा को पहचानना कितना कठिन है।



डॉ. रामवीर, फरीदाबाद, हरियाणा
 
सार्थक चर्चा
 
'पाखी' के नए अंक को खरीदना ही पड़ा। कलेवर पर वरिष्ठ आलोचक और चिंतक नामवर सिंह के हास्यपूर्ण चित्रा और ये द्घोषणा कि 'नए लेखक उखड़े हुए लोग हैं' मुझे इस अंक को पढ़ने को उकसाते से लगे। इसलिए मैंने सबसे पहले 'पीढ़ियाँ आमने-सामने' को ही पढ़ना शुरू किया। इस प्रथम आयोजन को एक स्वस्थ परंपरा के रूप में अगर आप सतत जारी रख सकें तो ये पत्रिाका अपने समय की नई चेतना से जनसामान्य को जोड़ कर रख सकेगी। नामवर सिंह, प्रभाष जोशी और मैनेजर पाण्डेय कुछ ऐसे आलोचक हैं जिन्हें मैं समय-समय पर पढ़ता रहा हूँ। ये प्रेमचंद की बाद की पीढ़ी के प्रस्फुटन और विकास-यात्राा के ऐसे साक्ष्य हैं जिनसे बातचीत के बाद न सिपर्फ नई कहानी के आंदोलन को ठीक-ठीक समझा जा सकेगा बल्कि उससे नए रचनाकारों का मार्गदर्शन भी हो सकेगा। इस अंक में आप सबने सार्थक चर्चा की है। सुंदर प्रस्तुति के लिए संपादक मंडल के साथ-साथ तमाम लेखकों को साध्ुवाद।


नवनीत कुमार झा, मध्ुाबनी, बिहार
 
स्तरीय पत्रिाका
 

'पाखी' का अगस्त २००९ का अंक पहली बार पढ़ा। आवरण पृष्ठ पर नामवर जी की मनमोहक तस्वीर ने बरबस ही ध्यान आकृष्ट कर लिया। यह अंक पढ़ने के बाद लगा कि यह एक स्तरीय पत्रिाका है। कहानियाँ तो सभी प्रभावशाली हैं पर 'पत्नी की तस्वीर' और 'मैं कैसे हंसूँ' कहानी ने मन को छू लिया। शु(-अशु( स्तंभ के अंतर्गत अक्षर उत्पत्ति ज्ञान कराने के लिए ध्न्यवाद। इस स्तंभ का इंतजार जरूर रहेगा।

'पीढ़ियाँ आमने-सामने' में नामवर जी व अन्य साहित्यकारों की वार्ता रोचक लगी। हाँ! क्या नौ दिन पुराना सौ दिन वाली कहावत वहां जरूर चरितार्थ होती है। संस्मरण के अंतर्गत लियो टॉलस्टाय के बारे में पढ़कर अच्छा लगा। इससे हम एक महान लेखक के देखे-अनदेखे पहलु से परिचित हुए। प्रेम भारद्वाज का लिखा 'आदमी अकेला है' आम आदमी के अकेलेपन के बारे में कम, कथा-कहानी लेखकों के अकेलेपन पर ज्यादा लगा। शीर्षक 'रचनाकार अकेला है' होना चाहिए था। कुल मिलाकर आपके द्वारा संपादित पत्रिाका 'पाखी' मुझे स्तरीय और अच्छी लगी। कृपया अपना ये स्तर बनाए रखें। यह अनुरोध् है क्योंकि हम पाठक स्तरीय लेखन व साहित्य के भूखे होते हैं न कि चलताउफ कथा-कहानी व कविताओं के। 'पाखी' पहली बार पढ़कर अच्छा लगा, ऐसा न हो कि अगला अंक निराश करे इसलिए यह पत्रा लिखने बैठ गई। कविता में मंजरी दुबे व अमित मनोज की कविताएँ बहुत अच्छी हैं। 'पाखी' के इस अंक की जितनी तारीफ हो कम है।

हाँ अंत में यह जरूर कहना चाहूँगी 'हंगामा इसलिए बरपा' कि हम जिन्हें अपना आदर्श मानते हैं या प्यार करते हैं, जिनके जीवन मूल्यों को ग्रहण करने की कोशिश करते हैं उनकी एक गलती से हमारी कोमल भावनाएँ आहत होती हैं और न चाहते हुए भी हंगामा हो ही जाता है।



शिखा सिंह, जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली
 
दोष नहीं, गुण देखें
 
आज मैं अगस्त माह की 'पाखी' नामक पत्रिाका को पाकर इतना खुश हूँ कि जितना एक दो दिन के भूखे व्यक्ति को भरपेट अन्न मिल जाने पर खुशी होती है। इस अनमोल पत्रिाका के इस साहित्यिक योगदान के साथ-साथ विभिन्न अनछुए पहलुओं के बारे में दी गयी जानकारी एवं नये कवियों एवं लेखकों की कृतियों को इस अद्वितीय पत्रिाका में सम्मिलित करने के लिए इसके संपादक अपूर्व जोशी, कार्यकारी संपादक प्रेम भारद्वाज एवं इसकी समस्त सहायक टीम को मैं अपने तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। 'पाखी' में कविता, ग८ाल, कहानी, लद्घुकथा, संस्मरण, यात्राावृत्तांत आदि साहित्यिक विधाओं का सम्मिलन सराहनीय है। इस दृष्टिकोण से यह एक पूर्ण साहित्यिक पत्रिाका कहलाने का गौरव रखती है। और अंत में पाठक बंध्ुओं से हमारा एक अनुरोध् है कि हम किसी की कमी या दोष देखने से अच्छा उसके गुणों का अवलोकन करें।

जुबेर अहमद, सुल्तानपुर, उ.प्र.
 
'पाखी' की धूम
 

अप्रैल २००९ का 'पाखी' अंक बस स्टॉल पर देखा और फौरन खरीद लिया। द्घर जाकर जब 'पाखी' पढ़ी तो इतनी अच्छी पत्रिाका लगी कि खत्म करके ही छोड़ी। इसमें अपने एक परिचित लेखक दिनेश पालीवाल की रचना भी पढ़ी। रात्रिा में पत्नी जगी, देखा मैं पढ़ रहा हूँ। सो नाराज हो गई कि रात्रिा में चैन नहीं। उस दिन से 'पाखी' के प्रति प्रेम हो गया। पिफर मैंने 'पाखी' के पुराने अंक अप्रैल से पहले के मंगाये। जनवरी का अंक छोड़कर बाकी सभी अंक मिल गए। दि संडे पोस्ट का साहित्य विशेषांक भी कहीं से उपलब्ध् करा लिया। वो भी अच्छा लगा। 'पाखी' काफी सस्ती है।

पेज भी काफी अच्छे हैं। साहित्य जगत में ध्ूम मचा रही है। अब मैं पाखी का नियमित पाठक बन गया हूँ। साहित्य पत्रिाकायें जितनी निकल रही हैं सबमें नंबर वन पर हो गई है 'पाखी'। 'हंस' तक को पीछे छोड़ दिया है। आप गुटबंदी से दूर हैं यह खुशी की बात है। आज तक किसी पत्रिाका ने लेखकों के मोबाइल नम्बर नहीं दिये यह कदम आपने उठाया है। 'पाखी' दिनदूनी रात चौगुनी तरक्की करे यही भगवान से प्रार्थना है। 'पाखी' के माध्यम से मुझे बहुत अच्छे मित्रा तथा दया दीक्षित, अमिता नीरव, चन्द्रकांता, रीता सिन्हा, उषा ओझा, बीना दीप जैसी बहिनें मिली। यह खुशी की बात है। 'पाखी' के आगे 'हंस' तथा 'कथादेश' जैसी पुरानी पत्रिाकाएँ फीकी पड़ गई हैं।



रवीन्द्र भदौरिया, शाहदरा, दिल्ली
 
मूर्त रूप लेती उड़ान
 

'पाखी' को प्रवेशांक से अब तक पढ़ रहा हूँ। या ये कह दूँ कि 'पाखी' पढ़ना अब एक मासिक आदत बन गयी तो गलत नहीं होगा। आपकी द्घोषणा 'पाखी' उड़ेगी अपनी उड़ान मूर्त रूप लेती दिख रही है। 'पाखी' का जुलाई अंक हाथ में है और कलम पत्रा लिखने को आतुर। इस संपादकीय में आपके जीवन क्रम के बारे में जाना व्यापार, पत्राकारिता और साहित्य। विविध्ताओं से भरे जीवन क्रम में साहित्यिक रूझान अच्छा लगा। आपके जीवन क्रम के प्रथम दो पड़ाव तो दिमाग से हैं तो तीसरा दिल से। दिल से किये जाने वाले इस कार्य में भावनाओं में डूबकर जो संभावनायें आप तलाश रहें हैं वो सराहनीय है।

शंका भी है कहीं व्यापारी और पत्राकार मन इस कार्य में हावी न हो जाए। हालांकि अभी तक ऐसा दिखा नहीं है। जुलाई अंक में सभी कहानियाँ अच्छी लगीं। विशेषतौर पर 'चाबी' और 'मध्यवर्ती प्रदेश' दिल को छू गयीं। 'पाखी' में लगातार छप रहे स्तंभ 'अदबी हयात' में गवेषणापूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। राजीव रंजन गिरि को एवं उनके समस्त प्रयासों को साध्ूवाद। मीडिया विमर्श और समय समाज स्तंभ भी रोचक और जानकारीपरक होते हैं और 'पाखी' को भीड़ से अलग करते हैं। 'पाखी' की सृजन की उड़ान के सभी मासिक पड़ावों में साक्षी रहूँ यह इच्छा है। 'पाखी' दोपहर के सूर्य की तरह सदा प्रखरता से चमकती रहे यह विश्वास भी है और शुभकामना भी। अंत में इसी अंक से जहीर कुरेशी के शब्द-
दोपहर के सूर्य जैसी प्रखरता को प्राप्त कर
रखता है कौन शाम को ढलने की लालसा?



प्रमोद कुमार चमोली, बीकानेर, राजस्थान
 
असर छोड़ती शैली
 
'पाखी' दिसम्बर २००८ का अंक पढ़ने का सौभाग्य मिला। पत्रिाका एक बैठक में पूरी पढ़ गया। संपादकीय एवं कहानी 'दरवाजे में भिंची उँगली' ने विशेष रूप से प्रभावित किया। अन्य सामग्री भी स्तरीय है जो हृदय को छू जाती है। 'बिना नाल का द्घोड़ा' लद्घुकथा में मध्यम श्रेणी के आमजन की संद्घर्षपूर्ण दिनचर्या सटीक बिम्ब और शब्द संयोजन की सुरुचिपूर्ण शैली भी खासा असर छोड़ती है। कुल मिलाकर 'पाखी' यथार्थ में सृजन की उफँची और सफल उड़ान है।


मनोहर शर्मा 'माया', दमोह, म.प्र.
 
उत्तरोत्तर ऊँची उड़ान
 

वक्त सचमुच परिन्दे की तरह होता है। पीछे मुड़कर नहीं देखता, बस उड़ता ही जाता है और अपने पीछे छोड़ जाता है सहेज कर रखने के लिए ढेरों कटु और मध्ुर स्मृतियाँ। कौन जानता था 'पाखी' पहली साल गिरह अपने लोकार्पण समारोह में प्रथम शब्द-साध्क शिखर सम्मान से सम्मानित होने वाले 'कॉफी हाउस के मसीहा' के बगैर मनायेगी। खैर वो इतना कुछ दे गये हैं हिन्दी साहित्य को कि सदियों तक अपने पाठकों के दिलों में जीवित रहेंगे। दिसंबर के अंक में अमरकांत जी का चित्रा देख और उनके बारे में पढ़कर नेत्रा सजल हो गये थे।

प्रेमचंद, निराला के बाद कितना कुछ बदल गया है वैश्विक परिदृश्य पर साहित्य के लेखक की स्थिति आज भी जस की तस है। 'डिप्टी कलक्टरी', 'दोपहर का भोजन', 'जिंदगी और जोंक' एवं 'हत्यारे' जैसी कालजयी रचनाओं का लेखक जिन अभावों और उपेक्षाओं में जी रहा है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को सुन्न कर देने वाला है। इसके बाद भी उनके 'न मैं शहीद हूँ, न किसी का मोहताज' के जज्बे को मैं सलाम करता हूँ। नई पीढ़ी के लेखकों के लिए ये ध्येय वाक्य हो सकता है।

अमरकांत जी के चित्रा को आवरण पृष्ठ पर छाप कर आपने क्रांतिकारी कार्य तो किया ही है, साथ ही प्रेम भारद्वाज के साथ उनकी पीड़ा को जिस आत्मीयता और शिद्दत के साथ आम आदमी के सामने रखा, उसके लिए ढेरों आशीषें मिली होंगी 'पाखी' को। इसी अंक में वाद-विवाद और विमर्श में 'पूस की रात और प्रेमचंद की अज्ञानता' से बेसिर पैर की बहस को जन्म दिया गया। विकृत मानसिकता और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के सिवाय और कुछ नहीं था यह सब। जनवरी अंक के प्रथम पृष्ठ पर छपे महादेवी के द्घर की दीवार पर अंकित सरस्वती के चित्रा को देख संपादक की बारीक दृष्टि की दाद देनी पड़ेगी। इसी अंक में 'स्नोवा की पर्दादारी' ने साहित्य जगत को विस्मित कर दिया था। लाख टके का सवाल तो यह है कि क्योंकर एक पुरुष कहानीकार को कमसिन बाला की तस्वीर और नाम का सहारा लेना पड़ा?

इस क्षेत्रा में भी सामंतवादी प्रवृत्ति हावी है, कम से कम इससे तो यही जाहिर होता है। कई अंकों में 'गुफ्रतगू', 'सृजक के द्घर संवाद', टॉक ऑन टेबल', और 'पीढ़ियाँ आमने-सामने' के आयोजन से सराहनीय परंपरा स्थापित हुई है। और अब संजीव पर विशेषांक उत्तरोत्तर उफँची उड़ान होती जा रही है 'पाखी' की। देश भर के प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ नवोदित लेखकों को भी स्थान देने से 'अपनी ही चाल चलेगी पाखी' और 'पाखी' की उड़ान हर प्रकार के वैचारिक पूर्वाग्रहों और साहित्यिक मठों की द्घेरेबंदी से मुक्त होगी' की सार्थकता सि( हुई है। आपके कुशल निर्देशन में सफलता की बुलंदियाँ स्पर्श करती 'पाखी' और 'पाखी परिवार' की पहली सालगिरह पर हार्दिक शुभकामनाएँ।



शिवअवतार पाल, इटावा, उ.प्र
 
भूल-सुधार
 
'पाखी' के अगस्त २००९ अंक में पृष्ठ ३९ में प्रकाशित शु(-अशु( कॉलम में श्रीमती शीर्षक से प्रस्तुत लेख की छठवीं पंक्ति में 'अर्थविज्ञान' और 'व्याकरणदर्शन' के स्थान पर कृपया 'पद-पदार्थ-समीक्षा' पढ़ें। इस असावधानी के लिए स्तंभकार ने खेद प्रकट किया है।

 
 
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