पाखी' के सितम्बर अंक को हाथों में लेते हुए बारहवीं में पढ़ने वाली मेरी बेटी ने कहा, 'ये कौन हैं?' बगैर हतप्रभ हुए मैंने कहा, 'संजीव। साहित्यकार हैं, कहानियाँ लिखते हैं ...हिन्दी में! तो कवर पर क्यों फोटो छपी है इनकी? अपनी भौंहे सिंकोड़ते हुए उसने पत्रिाका मेरे हाथों में थमा दी। न तो उसने पृष्ठ पलटने की ८ाहमत उठाई, न यह जानने की, कि संजीव आखिर लिखते कैसे हैं। न आकर्षण, न विकर्षण, एक निर्दोष निष्पक्षता उसके चेहरे पर थी, जिसे उसने छिपाने की भी कोशिश नहीं की। ऐसी बात नहीं कि विज्ञान के सामान्य विद्यार्थियों की तरह उसकी रुचि साहित्य में नहीं।
चेतन भगत के 'वन नाइट ऐट काल सेंटर' उसने एक बैठक में पढ़ डाली थी और कम से कम आधे दर्जन बार मुझे 'फाइव प्वाइंट समवन' लाने की याद दिलाई। पिछले दिनों जब दैनिक हिन्दुस्तान के मध्य पृष्ठ पर चेतन भगत की कहानी छपी तो उसने उसे ढूंढ कर पढ़ा ही नहीं, उस पृष्ठ को सुरक्षित भी रख लिया। इस प्रकरण की चर्चा यहाँ इस लिए कि हिन्दी साहित्यकारों के प्रति निरपेक्षता कोई एक द्घटना नहीं। हम सबके द्घरों में ऐसी द्घटनाएँ होती हैं, जिन पर या तो हम गौर नहीं करते या पिफर सहजता से स्वीकार करते हैं। यह अदभुत विडंबना है कि हिन्दी समाज या हिन्दी साहित्यकार ने कभी अपनी पहचान की चिन्ता ही नहीं की।
कतई आश्चर्य नहीं कि हिन्दी के 'सेलिब्रेटी' कवि अरूण कमल भी पटना के हाई स्कूलों में चले जाएँ तो उन्हें पहचानने वाले छात्राों को तो छोड़ ही दें, शिक्षकों की संख्या भी दो-एक से ज्यादा नहीं हो सकेगी। वह भी संयोग ही होगा कि वे उन्हें एक प्राध्यापक के रूप में नहीं, साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त एक कवि के रूप में पहचान सकें। यह एक अरूण कमल नहीं, कोई भी हो सकते हैं आलोक धन्वा भी, केदारनाथ सिंह भी, राजेश जोशी भी और उदय प्रकाश भी, प्रियवंद भी और अमरकान्त भी। हिन्दी समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता, किस तरह तिल-तिल कर अपने आपको जलाते हुए आपने साहित्य, भाषा या अपनी सामाजिक प्रतिब(ता की मशाल जलाए रखी।
उसके लिए आप हमेशा 'कोई' बने रहते हैं, जो प्रोफेसर हैं, इंजीनियर है, बड़ा बाबू हैं, बैंक में काम करता है और हाँ, कुछ लिखता पढ़ता भी रहता है।
'पाखी' को सलाम, कि उसने साहित्य के साथ साहित्यकारों को सम्मानित करने की अभिनव शुरूआत की है। निश्चय ही इस निर्णय तक पहुँचने के लिए संपादक मंडल को कठिन मानसिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा होगा। विष्णु प्रभाकर, अमर कांत, मंगलेश डबराल और अब संजीव को आवरण पृष्ठ पर लाने का निर्णय वास्तव में हिन्दी साहित्य के लिए एक बड़े परिवर्तन का वाहक बनेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। इसीलिए 'सिने संवाद' जैसे कॉलम के लिए अप्रासांगिक लगते विषय पर मैंने इसी कॉलम में चर्चा की हिम्मत जुटायी है। हिन्दी में 'मार्केटिंग' शब्द किसी गाली से कम नहीं लगता, लेकिन हमें स्वीकार करना चाहिए कि आज के वृहत्तर समाज में यह एक अनिवार्यता है। उपभोक्ता वस्तुओं के लिए मार्केटिंग भले ही खरीद-फरोख्त का मामला हो, बौ(कि सम्पदा के लिए 'मार्केटिंग' कहीं न कहीं हमारे आत्म सम्मान को भी अभिव्यक्त करती है, जिसकी शुरूआत 'पाखी' की कोशिश में झलकती है।
पुरानी कहावत है जब तक आप अपना सम्मान नहीं करोगे, दूसरा भी नहीं करेगा। यशपाल विरले साहित्यकार थे, जो स्पष्ट कहते थे, मुझे साहब बनकर रहना अच्छा लगता है। अज्ञेय अपने सौंदर्य बोध के प्रति सदैव सचेत रहे। निर्मल वर्मा ने किसी अभिनेता की तरह अपनी एक स्टाइल बनाई थी और पाठकों के मन पर उस स्टाइल की छाप छोड़ी। निश्चित रूप से साहित्यकार के लिए आत्मप्रदर्शन एक हेय पक्ष रहा है, लेकिन जब आप आम जन के करीब जाना चाहते हैं तो निश्चित रूप से आपको उनके 'गिमिक्स' अपनाने के लिए भी तैयार होना चाहिए। वास्तव में हिन्दी साहित्यकारों की छवि आजादी के पूर्व से ही एक 'बेचारे भले आदमी' की बना दी गई थी। और कदाचित इस छवि का निर्वाह करते-करते आत्महीनता से हम इस कदर झुके कि अपने को ही सम्मानित निगाह से नहीं देख सके।
इस आत्महीनता ने पाठक से लेकर प्रकाशक के पास तक कभी सम्मान और अधिकार के साथ पहुँचने की आदत हममें विकसित ही नहीं होने दी। यह सुनने में शायद अच्छा नहीं लगे, लेकिन सच यही है कि अधिकांश प्रकाशकों के लिए लेखकों की औकात कभी भिखारियों से ज्यादा नहीं रही। हिन्दी वालों को इस बात पर कभी शर्म का अहसास नहीं होता जब एक ही ग्रुप के अंग्रेजी अखबारों में एक ही शब्द संख्या के लेख के लिए दिए जा रहे पारिश्रमिक में हजार रुपये तक का फर्क होता है। हमें यह भी अपमान नहीं लगता है जब मंहगाई बढ़ने के नाम पर अखबार अपने मानदेय 'द्घटा' देते हैं। हम कभी इस बात की चिन्ता नहीं करते कि आखिर क्यों हिन्दी का सबसे प्रतिष्ठित साप्ताहिक समीक्षा लिखने का मानदेय अपने पहले अंक से ही स्थिर रखे हुए है।
अति उदार हिन्दी साहित्य समुदाय को थोड़ी देर के लिए ये बातें अवश्य अप्रासांगिक लग रही हों, लेकिन सच यही है कि कहीं न कहीं अपने साहित्य के प्रति हमारे सम्मान को प्रतिबिम्बित करती हैं। बातें मुहावरे में कही जाती हैं, दो कौड़ी की नहीं। लेकिन क्या कहा जाए जब वाकई हम अपनी रचनाओं का यही हश्र देखते हैं। हम अपने आपको कभी इस समझ के साथ गौरवान्वित कर ही नहीं पाते कि हम उस भाषा के लेखक हैं जो दुनिया में शायद सबसे ज्यादा बोली जाती है। हम कभी यह तुलना करने की जरूरत ही नहीं समझते कि 'गाड्स ऑफ स्मॉल थिंग्स' में ऐसा क्या था जो अरूंधति राय को पूरे जीवन के लिए आर्थिक दबाव से मुक्त कर देती है, जबकि 'सूत्राधार' के बाद भी संजीव अपनी जिंदगी के बिखरे सूत्रा समेटते रहने को मजबूर रहते हैं।
चेतन भगत अपने सामान्य से उपन्यासों की बदौलत इस कदर चर्चित होते हैं कि हिन्दी का अखबार भी खास तौर से मध्य पृष्ठ पर उनकी कहानी प्रस्तुत करता है। यह कतई आश्चर्य की बात है कि हमें इस बात पर ईर्ष्या भी नहीं होती। झुम्पा लाहिड़ी, अरविन्द अडिग, विकास स्वरूप, खुशवंत सिंह को उनकी कृतियों के लिए हम उससे ज्यादा सम्मान देते हैं, जितना वे चाहते हैं। लेकिन मंगलेश डबराल या आलोक धन्वा या पिफर निर्मल वर्मा को यथोचित सम्मान मिलने की कभी चिन्ता नहीं करते। इस स्थिति के कई कारक हो सकते हैं। निश्चित रूप से आज समय जिस पड़ाव पर है, हमें ठहर कर विचार करना चाहिए। एक अहम कारण जो हमारी बिन्दु बन सकती है, वह है हिन्दी पाठकों के प्रति साहित्यकारों की निरपेक्षता। हिन्दी में आजादी के पहले से ही जब लेखक संद्घों ने पाठकों के प्रतिनिधित्व की जवाबदेही संभाल ली, लेखकों की पाठकों से दूरी बढ़ती गई।
वे लेखक संद्घ और तदन्तर उससे जुड़े आलोचकों के प्रति ज्यादा जवाबदेह हो उठे। संस्करण में प्रतियों की संख्या द्घटते-द्घटते ५०० तक पहुँच गई। लेकिन हमने सोचने की ८ाहमत नहीं उठायी कि इस तकरीबन ५० करोड़ हिन्दी भाषी के मुल्म में ५० हजार भी पाठक क्यों नहीं हैं? ७० के दशक तक लगभग हरेक गाँवों-शहरों में चल रहे सार्वजनिक पुस्तकालय एक-एक कर बंद होते चले गए। साहित्यकार संद्घ और समीक्षक वाह-वाही से आत्ममुग्ध होते रहे। स्कूलों से साहित्य दूर हुआ, अखबारों में साहित्य के पृष्ठ हटे, दूरदर्शन और रेडियो से साहित्य बेदखल हुआ, हमें कोई कमी का अहसास नहीं हुआ। वास्तव में कटु लेकिन सच है कि पाठकों की चिन्ता ही हमने नहीं की। जाहिर है जब साहित्यकारों को समाज की जरूरत नहीं रही तो समाज भी उनके प्रति निरपेक्ष होता चला गया। जब? हमने आलोक धन्वा को पढ़ा ही नहीं, उनके बारे में जाना ही नहीं, उन्हें पहचाना ही नहीं तो क्यों कर उनका सम्मान करें?
कोई भी कला क्या बगैर समाज के चल सकती है? हिन्दी सिनेमा में एक नया अभिनेता आता है आँतिक रौशन। उसकी पिफल्म नहीं आती, लेकिन एक साथ सभी अखबारों में उस पर कवर स्टोरी आने लगती है। लोग उसकी पिफल्म के पहले ही उसके दीवाने हो जाते हैं। ठीक 'हैरी पॉटर' की किताबों की तरह, जिसकी एडवांस बुकिंग होती रही है। नई शब्दावली में यह भले ही मार्केटिंग कही जाने लगी हो, लेकिन क्या समाज से जुड़ने के लिए यह अनिवार्य नहीं? मकबूल पिफदा हुसैन, कुमार गंधर्व, शोभना नारायण के बारे में आज हम इसलिए जानते हैं कि हमें बताया गया। आमिर खान इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
जब वे रचनारत रहते हैं तो एकदम चुप, एकाकी रहते हैं। लेकिन जैसे ही उनकी कृति पूरी हो जाती है वे सीधे 'समाज' से मुखातिब होते हैं। 'गजनी' के समय उन्होंने चौक पर उतरकर लोगों के बाल भी काटे कि लोग उनकी कृति का रसास्वादन कर सकें। वास्तव में यदि सामाजिक स्वीकार्यता चाहिए तो मार्केटिंग अनिवार्य है। एक दौर था जब कला पिफल्मों के नाम से दर्शक दूर भाग खड़े होते थे। आज वही दर्शक सुधीर मिश्रा, मधुर भंडारकर, रजत कपूर की पिफल्मों की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।
देर नहीं हुई, अब हिन्दी साहित्य को भी यह जरूरत महसूस करनी चाहिए। 'पाखी' ने एक राह दिखायी है। समाचार पत्रिाका के आवरण पर राजनीतिज्ञ, पिफल्मी पत्रिाका के आवरण पर अभिनेता, खेल पत्रिाका के आवरण पर खिलाड़ी। लेकिन यह दुर्लभ है कि किसी साहित्य पत्रिाका के आवरण पर जीवित साहित्यकार की छवि दिख जाय। 'हंस' ने रचनाओं के साथ तस्वीर और परिचय की शुरूआत कर साहित्यकारों की मार्केटिंग की शुरूआत जरूर की। लेकिन स्टाम्प साइज की तस्वीर और ओछे से परिचय में वह बात कभी बन ही सकी तो चेतन भगत या अरूंधति राय की ग्लैमरस रंगीन तस्वीर से आती है। आलोक धन्वा की कविताएँ जब 'हंस' में छपी तो बड़ी तस्वीर उनकी शर्त में शामिल थी। वे कहते हैं स्टाम्प साइज की तस्वीर थाने के बाहर लगी अपराधियों के तस्वीरों की याद दिलाती है।
विश्वास है 'पाखी' अपनी इस शुरूआत की गंभीरता से वाकिफ होगी। आग्रह सिपर्फ एक है, क्यों नहीं यशपाल, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, फणिश्वरनाथ रेणु की तरह लेखक भी अपनी सार्वजनिक छवि के प्रति सचेत हो। एक अभिनेता की तरह लेखक का भी सार्वजनिक व्यक्तित्व होता है। संजीव को भी हक है, शाहरुख खान की तरह पाठकों के सामने आते हुए अपने 'लुक' का ख्याल रखें। याद रखें शाहरुख खान अपने लिए नहीं सजते अपने प्रशंसकों के लिए सजते हैं। क्या साहित्यकारो की अपनी प्रशंसकों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं?
लेखक पिफल्म समीक्षा के लिए राष्ट्रीय पिफल्म पुरस्कार से सम्मानित हैं
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