अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
दीवाना कहता है
''तू क्या है'' : डॉ. कुमार विश्वास

चचा ग़ालिब किसी से बिदक गए होंगे, लोग भी कहाँ मानते हैं। अजी लगे रहते हैं। जब तक कि भले से भला बैल भी झुंझला कर साँड न हो जाए। सो उन को भी कोई ज्यादा ही बत्ती दे रहा होगा। उस वक़्त तक उर्दू की नवाबी सहिष्णुता ८िान्दा थी सो ज्यादा तो न कह सके, बस इतना कह गए कि ''हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है, तुम्ही कहो कि ये अंदाजे गुफ्रतगू क्या है''। उस दौर में लोग भी कम्युनेलिस्ट नहीं थे, सो समझ भी गए होंगे। पर बेचारे अशोक चक्रधर क्या करें? एक महिला ने उन्हें बिना बरते ही विदूषक कह दिया। यूं तो स्त्रिायों में ये आदत सामान्यतः पाई जाती है कि वे किसी इच्छा के अधिक समय तक लंबित रहने पर उस दोहद के रास्ते में आने वाले हर हरसिंगार को नागफनी समझने लगती हैं। पर यहाँ मामला दूसरा है। संत लोग ''सिकरी'' के फटे जूतों के अलोटमेंट पर पैजार कर रहे हैं।

दिल्ली हिन्दी आका-डमी में जब तक एक कांग्रेसी विराजे रहे, हमारे ये सारे चन्दगीराम सभी सतपालों की प्राथमिकता सूचियाँ अपने अपने मुँह में ठांस कर मौन धरे रहे, पर जब ''जय हो'' के चुनावी कांग्रेसी वर्सन के रचयिता डॉ. अशोक चक्रधर का जीत के बाद वजीफा तय हुआ तो इन के अंदर का कुम्भन दास फूट पड़ा। एक बोलीं की ''विदूषक'' है, दूसरे बोले कि ''इन से अच्छे अनेक पड़े थे'' जैसे ये कोई गिरे-पड़े हों। रही सही कसर एक मरणासन्न दैनिक के समाचार ने पूरी कर दी। पिफर क्या था।

बकौल भाई लोगों के 'देश भर में विरोध और समर्थन' होने लगा। अब चार-पाँच ह८ाार लोगों का तो देश है बेचारों का। शहर, गाँव, कस्बों के, मानवीय-कबाड़ में गिने जाने वाले कुछ शापित मनुष्य नुमा लोग हैं, जो अकारण कुपित रहने के कारण खुद को हिन्दी का भगत सिंह समझने लगे हैं, और बिना किसी बाहरी प्रयास एवं मदद के वक़्त से लेकर खुद तक को नष्ट करने में अहर्निश जुटे हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि उनकी मेहनत से खुश होकर ईश्वर भी उन्हें इच्छित परिणाम दे ही रहा है।
ये तो था कथा बीज। लेकिन मुद्दा कुछ और ही है।

दरअसल आ८ाादी के बाद के बड़े नुकसानों में वे प्रयास भी सम्मिलित हैं जिनमें राज्य के जनहितकारी सांस्कृतिक उपक्रमों का पालित बु(जिीविता के माध्यम से, छिछोरी राजनीति द्वारा नपुंसक उपयोग हुआ है। वो वक़्त हवा हुआ जब सदन में दिनकर जी पार्टी के सदस्य होकर भी उसकी लीक से सिंह जैसा विचलन उबल देते थे, जब बाबा नागार्जुन झूम कर ''राजीव रायिम'' सुनते थे और लाल किले के कवि सम्मेलनों से पुचकार नहीं हुँकार सुनाई देती थी। अब तो दोनों ही खेमों में लिजलिजी महत्वाकांक्षा की कीचड़ में लिसड़े, हंडिया गवाएं कुछ लोथ हैं जो 'यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ है संतोषी माँ' की धुन में अपने-अपने जुगाड़ के खोमचे उठाए बगटुट फेरा लगा रहे हैं।

उनमें जिस का दांव बड़ा लग जाता है उसे ही शेष दूसरे साहित्य का स्वांइन-फ्रलू द्घोषित कर देते हैं। यहाँ पफ़८ाीता भीड़ वाले पफ़८ाीतियों और भाड़ वाले जुगाड़ियों का है। एक खोमचा उन भीड़ धर्मी मलंगों का है जो रात में मजमे को अजगर दिखा कर तालियाँ बजवा लेता है और मौका ए वारदात पर मौजूद राजा साब उन्हें सि( मानकर मनसबदारी न्यौछावर कर देते हैं। डॉ. चक्रधर उस जमात के बड़े वाले औलिया हैं। दूसरा उन खालिस खलीफाओं का है जो भाड़ झोंकते झोंकते भड़भूजे की आँखें फोड़ने की कला में शास्त्राी हो चुके हैं, आ८ाादी के बाद से इन दूसरे वालों की ही ज्यादा चलती रही।

क्यूं की तब सब ही इसी मोहल्ले में थे। बाद में आँगन बंट गया। ये मजमे वाले, ;अजी या मेरे वालेद्ध रोज रात की अपनी ही उर्स पर इतने पिफदायीन तरीके से पिफ़दा हुए कि अक्ल की हर हरकत को अमेरिकी हस्तक्षेप समझने लगे। लिजा८ाा पढ़ाई लिखाई से इनके रिश्ते बदतर होते चले गए। अलबत्ता उधर वालों ने अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा हासिल न देख कर गालियों के गरारे करते हुए कागद कारे करने में ही इति, गति, नियति समझी।

अशोक जी बेहद प्रतिभाशाली और खासकर अद्भुत लगन के धनी हैं। मेरा उन से मंचीय परिचय और साहचर्य पुराना है। वे कठिन बचपन और भ्रमित यौवन की आग से निखरे प्रौढ़ हैं, उन की कविताई पर ज्यादा क्या बोलूं पर हाँ, उन की हर ओर पटा द्घुमाने की सतत्‌ संद्घर्षशील इच्छाशक्ति मुझे प्रारंभ से ही लुभाती रही है। वे पन्त जी की 'चींटी को देखा' कविता के सटीक उदहारण हैं। कोई मौका हो कोई बात हो हिन्दी की हर हलचल पर वे चल पड़ते हैं। यही कारण है जिस वक़्त हिन्दी ये चिल्ला चोट वाले साहित्यकार कॉलम में अपना अस्तित्व नाप रहे थे वे माइक्रोसॉफ्रट की विंडो को हिन्दी की विश्व वेब विस्तार वाली खिड़की बनाने में जुटे थे। उन्हें बिल गेट्स की इस बड़ी दुकान से इस बात का बाकायदा तमगा भी मिला।

हिन्दी के कवि सम्मेलनों से जिन कुछ लोगों ने ;कवियों नहीं कहूँगा नहीं तो सारे द्विवेदी, त्रिावेदी और चतुर्वेदी मिल कर मेरा ''मिश्रा'' बना देंगेद्ध इस संस्था को हर प्रकार का वैभव दिलाया, ;साहित्यिक उत्कर्ष के अलावाद्ध उनमें डॉ. चक्रधर सर्वाधिक बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। दूरदर्शन के अधिकारियों से लेकर सब टी वी के अधिकारी भाइयों तक उन्होंने अपने विस्तार के हर राडार का पूरी मेहनत से प्रयोग किया। समय-समय पर जनता से लेकर शीला दीक्षित तक सभी उन की इस चक्रवर्ती चकाचौंध की चपेट में आये। पूरी एक भारतीय पीढ़ी उनकी चमत्कारिक, चुटीली तुकांत संवाद शैली को कविता मानते-मानते बड़ी हुई है।

उस दौर में उन्होंने अपने प्रारंभिक साम्यवादी विचलन की फीस बड़ी मेहनत से चुकाई। जब उन की गद्दी इस थकाऊ उठापटक के बाद जम गयी तो वे भी उस प्रसाद के आनंद में झपकी लेने लगे। शहर-शहर, देश-देश भागवत जमने लगी। चढ़ावा आने लगा, चेले और भगतिन जुटने लगीं, और मुक्तिबोध पर शोध से शुरू हुआ जनवाद मुक्ति के बोध से पूर्णकाम हो गया। अलबत्ता ताम झाम जमा रहे इस पर मेहनत बदस्तूर जारी रही। यहाँ मंच के सभी कलंदरों को इस हो हल्ले से ये सबक लेना होगा की भाई आखिर क्या कारण है कि चालीस साल तक इस चौक में झक मारने के बाद भी साहित्य के होमगार्ड तुम से आज तक तहबाजारी की पर्ची मांग रहे हैं। डॉ. चक्रधर के आने से अकादमी में क्या होगा ये तो इस मुकदमे के पक्षी-विपक्षी जानें, लेकिन इस बहस ने दो प्रवचन-प्रसंग उपलब्ध करा दिए।

एक तो इस प्रकार के पदों पर अभिषिक्त होने की पात्राता और उस का चयन-क्रम तथा दूसरा कविता के इन दोनों तटों का निरंतर आत्ममुग्ध और असहिष्णु होता भावः पक्ष।
बात पहली, कि इस पीढ़ी की सीढ़ी क्या है। सि( और गि( तो दोनों आज कल दुर्लभ हैं। बीच का ८ामाना है। बु( यही चाहते थे ''मज्जिम निकाय''। इस निकाय के उपाय भी कुछ ऐसे ही हैं। बालस्वरूप राही जी ने कहा है ''यही सत्य है जगती प्रतिभा से डरती है, सत्ता केवल सरल मनुज का ही चुनाव करती है।'' ये सरलता बड़ी असहजता से प्राप्त होती है। इसे बनाये रखने के लिए कुछ सामयिक अनुलोम-विलोम तो करने ही पड़ते हैं, हर ८ारूरी बात पर तटस्थ रहने का दुष्कर प्राणायाम भी साधना पड़ता है।

श्रीमती इंदिरा गाँधी के आपातकालीन अंकुश ने उस वक़्त तो बहुतेरा कोहराम मचवाया पर कालांतर में विषपायी टोली सब्सिडी की सरकारी वोदका सेवन को ही नीलकंठी चेतना का अंतिम प्रयास मानने लगी। जे एन यू के परिसर से बड़े सवालों में उलझाने वाला एक ऐसा बौ(कि सर्कस शुरू हुआ,जिस में सब शेर जंगली से पालतू हो गए। एक आध कोई धूमिल कभी-कभी आ कर कान के पास इस संगीत का खालीपन इंगित कर जाता है बस। राम का मंदिर निर्माण हो या ''अनहद'' का मूर्ख-नाद, पार्षद का चुनावी भाषण हो या इटली वाली बड़ी अम्मा का हिन्दी ट्यूशन, इंडिया हेबिटेट सेंटर का परम प्रलाप हो या विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए अपनी मनरन्जनि मेनकाओं का आरक्षण, पाठ्यक्रमों में अपनी उगलबंदी की प्रविष्टि हो या संसदीय हिन्दी समितियों में द्घुसपैठ, हिन्दी के ये महाराणा प्रताप अपने चेतक दौड़ाये हर संभावित दरबार में कोर्निश मारते मिल ही जाते हैं। और यह हल्दीद्घाटी पूरे फलक पर फैली है।

इस पर तुर्रा यह कि हम सरोकार से जुड़े हैं। इस सरोकार में से हिन्दी के निरालावादी ओद्घड़पन का ओ निकाल लें तो वो सच में सरकार से ही जुड़े हैं। जिन लोगों को डॉ. चक्रधर की नियुक्ति पर आपत्ति है उन्हें इस खेल के मैदान को पूरा समझना पड़ेगा। डॉ. चक्रधर स्वधर्मी हैं। उन्होंने अपना हर काम पूरी निष्ठा से किया है। मंच से लेकर मंडी हाउस तक वे अपनी प्रस्तुति और प्रकृति के विपरीत नहीं गए। जिस का परिणाम है कि वो जनता को भी प्रिय हैं और जनार्दन लोग भी उनसे प्रसन्न हैं। अब उनका मंचीय पराक्रम आप के लिए होगा हेय। उन्होंने तो उसे साधा है, इसलिए उस तरह की कविताई पर उन्हें कोई दूसरी सोच परेशान नहीं करती, पर आप तो आज तक अपनी दुकान का बोर्ड तक भी फाइनल नहीं कर पाए। दलित चिंतन और स्त्राी विमर्श... इन्हें खंगालते रहे और स्त्रौन विमर्श के दलित चिंतन में मिले। अपने कंसीय संपादकीय में भाजपा और उस के कुनबे को पी-पी कर कोसने वाले जब उनकी ही सरकारों के बड़े-बड़े विज्ञापन छाप कर अपनी मृत आत्मा का सिंगार धुंधियाये तो उस धुंए में उनकी कालिख स्पष्ट उभर आती है।

मैं जानता हूँ कि कविसम्मेलनीय बिरादरी से होने के कारण अनेक इस लेख में मेरी रणनीति के अजन्मे पेच ढूढ़ेंगे, लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि इस व्यवस्था में भी मुझे कभी व्यवस्था स्वीकार करेगी, ऐसा संभव नहीं। हम तो सदा से ही इस गन-परिषद् से बाहर थे और बाहर ही रहेंगे। जिस लाल किले के कवि सम्मेलन में सरकारी बुलावे का ख़त इन ताकीदों से भरा हो कि कोई भी चेतना-धर्मी टिप्पणी या कविता मुख से निकलना तो दूर साथ भी न लाना, वहाँ कभी हमारी जाजम बिछेगी, इतना भी लोकतंत्रा नहीं आया पार्टनर! अशोक जी और उनकी वजह से पैदा हुए सद्यजात ''शोक जी'' दोनों को म८ाा लेना चाहिए। जो होगा किसी न किसी के लिए ठीक ही होगा। जब ठीक न हो तब हल्ला करना, अभी से किस अज्ञात की प्रसव पीड़ा में चिल्ला रहे हो। कोई कहता है भाई लोगों ने पूरी दुनिया के अपने चिर्कुट गुरुकुल के लिए दो ढाई करोड़ का ''बहुभात'' जुटाया था, डर है कि अशोक जी हडियाँ गिरा देंगे, इसलिए हल्ला है, कुछ कोई और कारण बता रहे हैं। राम जानें या इन का मार्क्स जाने। हमें तो दोनों ही आज तक नहीं मिले सो किस से पूछें।

मंचीय कविता के अग्रणी हस्ताक्षर डॉ. कुमार विश्वास इन दिनों पिफल्म लेखन की दिशा में सक्रिय हैं। ३/१०८४, वसुंधरा, गाजियाबाद, उ. प्र.

 
 
 
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