स तरह इतिहास में पुरातात्विक उत्खनन होता है, उसी तरह कभी-कभी साहित्य में भी, लेकिन दोनों में एक बड़ा फर्क यह है, कि जहाँ इतिहास में यह काम हजारों साल बाद होता है वहाँ साहित्य में दशकों बाद, लेकिन इतिहास के बीच। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि समय और समाज की कटु सच्चाइयों को सामने लाने के लिए पत्रा-पत्रिाकाओं के संपादकों को बहुरूपिया बनना पड़ता है, कई-कई छद्म नामों से लिखना पड़ता है, ऐसे छद्म नाम तब तक गुप्त रखे जाते हैं, जब तक वे पत्रा-पत्रिाकाएँ इतिहास न बन गईं हों या पिफर संपादक या छद्म लेखक के साथ पूर्ववत संबंध नहीं रह गए हों।
यह ज्ञात है कि कलकत्ता से प्रकाशित 'मतवाला' में उसके संपादक मंडल के सदस्य छद्म नाम से लिखते थे। खुद नामवर सिंह विष्णुचंद शर्मा द्वारा संपादित 'कवि' पत्रिाका में कवि मित्रा लिखते थे। 'कसौटी' के संपादक नंदकिशोर नवल ने पिछले दिनों यह रहस्य उद्द्घाटित किया कि विवेकी सिंह के नाम से वह ही स्तंभ लिखते थे। इसी तरह कुछ और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। लेकिन छद्म नाम रखने के पीछे लेखक या संपादक का कोई स्वार्थ नहीं होता बल्कि सच को सच कहने का नैतिक बल होता है।
अभी-अभी हिन्दी के कथाकार द्रोणवीर कोहली की पुस्तक 'बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली' आई है, जो वस्तुतः धर्मयुग में बुनियाद अली के नाम से निरंतर लिखा जाने वाला एक लोकप्रिय स्तंभ था। इस स्तंभ के शुरूआत की कहानी के बारे में स्तंभकार ने एक संक्षिप्त टिप्पणी पुस्तक के आरंभ में ही की है, साथ ही धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती के ११ जनवरी, १९७८ को लिखे गए पत्रा की प्रतिलिपि है, जिसमें इस स्तंभ को न केवल शुरू करने का प्रस्ताव है बल्कि उसकी सीमा-रेखाएँ भी। दिलचस्प बात यह है कि पत्रिाका के संपादक भारती जी ने बुनियाद अली के छद्म नाम से लिखने वाले असली लेखक का नाम कभी उजागर नहीं किया। स्तंभ में जाने वाली सामग्री के बारे में प्रायः तीखी प्रतिक्रिया होती थी।
साहित्यिक गोष्ठियों वाले लेखों को लेकर कुछ लेखक लाल-पीले भी होने लगते थे। ऐसी स्थिति में स्तंभ लेखक के बारे में तरह-तरह के कयास लगाये जाते थे। लेकिन भारती जी ने लेखक की पहचान को निरंतर गुप्त रखा-इतना कि धर्मयुग में उनके सहयोगी तक नहीं जान पाये कि इसे लिख कौन रहा है। और तो और भारती जी ने इतनी सावधानी बरती कि बुनियाद अली से पत्रा-व्यवहार भी खुद करते थे। बुनियाद अली के बेसुध होने पर उन्हें स्तंभ की किश्त भेजने के लिए याद भी दिलाई जाती थी।
धर्मयुग में इस स्तंभ का आरंभ भारती जी के पत्रा-१९७८ के बाद ही हुआ, लेकिन जब तक वे इस पत्रिाका के संपादक ;१९९०द्ध रहे, यह स्तंभ जारी रहा। वैसे वे इस पुस्तक में संकलित लेखों और टिप्पणियों से दिल्ली की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का सजीव वर्णन करते हैं, लेकिन स्थानाभाव के कारण मैं यहाँ अपने को सिपर्फ साहित्यिक हलचलों के बारे में की गई टिप्पणियों तक सीमित रखना चाहूँगी। इसमें टी हाउस, कॉफी हाउस का इतिहास तो है ही, भीतर की हलचलें भी कम नहीं-विदेशी कहवाद्घरों के आदि निर्मल वर्मा भी यहाँ नमूदार होते थे।
...अक्सर एक दुबला-पतला आर्टिस्ट शाम को पउवा हाथ में लिए यहाँ आ धमकता, जिन्हें द्घर में शराब पीने की मनाही थी, पउवा हाथ में लेकर टी हाउस के बाथरूम में द्घुस जाते और वहाँ पीकर मेज पर आ बैठते। हिन्दी लेखक रमेश गौड़ और उर्दू लेखक बलराज मेनरा के बीच तमाचा रशीद करने की भी दिलचस्प कहानी है। सांझ को छह-साढ़े छह बजते ही बीसियों लौंडे ड्रेन पाइप में उन दिनों इन्हीं का रिवाज था-रेलिंग के सहारे आकर खड़े हो जाते, इस इंतजार में कि रीगल-रिवोली या निकटस्थ 'गैलार्ड' में लुंगी-धारी ललनाएँ निकलेंगी और वे आँख सेकेंगे।
सार्वजनिक साहित्यिक गोष्ठियों, व्यक्तिगत साहित्यिक गोष्ठियों पर विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ हैं। प्रगतिशील लेखक संद्घ के विरोध में जनवादी लेखक संद्घ के जन्म की कहानी, लेखकीय स्वतंत्राता पर भी मनोरंजक टिप्पणी है। साहित्य अकादमी के पुरस्कार समारोह के अवसर पर मंच पर होने वाले अकादमी के पुरस्कार नीति की निन्दा के बारे में भी इसमें उल्लेख है। पुरस्कार वितरण का अंतिम दृश्य बेहद दिलचस्प है-पहली बार विष्णु खरे ;डिफ्रटी सेक्ट्रेरीद्ध ने उत्साह दिखाया। वह लपक कर आये और माइक संभालकर अपनी चिर-परिचित खरखरी आवाज में भरतवाक्यम् की शैली में बोले, 'मेरी दुआ है कि मालिक राम जी ;उर्दू के वयोवृ( पुरस्कृत लेखकद्ध सौ वर्ष जिएं और अब यह जलसा खत्म होता है।'
हिन्दी की नई पीढ़ी, जिसने साप्ताहिक धर्मयुग को प्रकाशित होते नहीं देखा है, उसको इस पुस्तक से बेदिल दिल्ली स्तंभ की लोकप्रियता का थोड़ा आभास जरूर होगा। यही नहीं आज अपने बीच बुनियाद अली ;द्रोणवीर कोहलीद्ध की उपस्थिति का अहसास भी। यह अकारण नहीं है कि धर्मवीर भारती जैसे सुयोग्य संपादक इस स्तंभ में गहरी दिलचस्पी ही नहीं लेते थे बल्कि स्वयं संपादन-संशोधन भी करते थे।
२५/०३/८३ के पत्रा में लिखते हैं-'उमेंहम वित ेीतप ठनदपंक ंसप -दोनों किस्तें मिलीं... बहुत जोरदार और जव जीम च्वपदज हैं। इस बार दिल्ली में बहुत-से लोगों ;सामान्य पाठक तकद्ध ने बेदिल दिल्ली की चर्चा की। ठतंअव! ाममच पज नच।' अच्छी बात यह है कि पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर इंडिया गेट वाली वही तस्वीर है लेकिन वक्त बदलने के साथ इंडिया गेट के आगे दिखने वाला वह कैनोपी ;बंदवचलद्ध अब हटा दिया गया है। यह पुस्तक पाठकों को निराश नहीं करेगी, यह मेरा विश्वास है।
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