|
तेईस अगस्त। दिन रविवार। 'पाखी' की पहली वर्षगाँठ। सैकड़ों लोगों के बीच एक शख्स ऐसा भी आया जिसकी किसी ने न आने की नोटिस ली। न जाने की। वह इतना साधारण व्यक्ति भी नहीं था कि उसकी ओर मुखातिब न हुआ जाए। लेकिन हुआ ऐसा ही। उसके नाम से यह शहर तो क्या पूरा देश ही वाकिफ है। कई लोगों के लिए उसका जीवन रोल मॉडल है। उस भीड़ में अधिकतर ने उसे पहचाना नहीं। जिन्होंने पहचाना उन्होंने मिलना मुनासिब नहीं समझा।
वह जिस खामोशी से आया उससे गहरी खामोशी से चला गया। उस शख्स का कार्यक्रम में आना इसलिए बड़ी बात थी कि वह ऐसे और ऐसे किसी कार्यक्रमों में नहीं जाता। समारोहों से परहेज है उसे। 'रुतबे' शब्द से वह रू-ब-रू नहीं है। हमारे प्रिय मित्रा गुंजन के विशेष आग्रह पर वह शख्स आया था। और जब दो द्घण्टे बाद जा रहा था तो गेट पर मैं और गुंजन ही थे। गुंजन ने पूछा-'कैसे जाएँगे?' जवाब था-'बस टहलते हुए।' मैं उसके बारे में कुछ सोचने लगा। इससे पहले कि कुछ बोलता, वह लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ हमसे बहुत दूर जा चुका था। संभवतः किसी ऑटो या बस की तलाश में। उसे जाते हुए विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता की दो पंक्ति याद आयी
वह चला गया
गर्म कोट पहनकर
किसी विचार की तरह।
जिस शख्स के बारे मैंने इतनी भूमिका गढ़ी उसका नाम एक है-पहचान कई। इमरोज नाम है-एक चित्राकार, प्रेमी, अमृता प्रीतम के साथी, प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ने वाला व्यक्ति, कवि सबसे बड़ी पहचान प्रेमी और चित्राकार की। वे इस देश के बड़े चित्राकार हैं। किसी गिरोह, आर्ट गैलरियों की राजनीति यहाँ तक कि बाजार की बाजीगरी से भी वह बहुत दूर अपनी ही धुन में मगन। अपनी ही दुनिया। इसी देश के एक बड़े चित्राकार हैं मकबूल पिफदा हुसैन-नाम बिकता है, एक अंतरराष्ट्रीय ब्रान्ड। एक पेटिंग करोड़ों में बिकती है। बोली लगती है। किसी न किसी वजह से हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं। एक इमरोज हैं-अपने चित्राों पर अपना नाम नहीं मुद्रित करते। दलील देते हैं-नाम पेटिंग का हिस्सा नहीं होता। वह उसकी खूबसूरती को छिपा लेता है। पेटिंग को डिस्टर्ब करता है नाम। तो ऐसे हैं इमरोज। न काम पाने के लिए कसरत, न काम को बेचने की बेचैनी।
मैं कई बार उनके द्घर गया हूँ। अपने संपादक अपूर्व जोशी के साथ। हौज खास के के-२५ वाले इस मकान में द्घुसते ही यह अहसास हो जाता है कि यहाँ कोई सामान्य व्यक्ति नहीं रहता। सामान्यता के लिबास में एक विशिष्ट व्यक्ति रहता है। पहली मंजिल का सफर तय करती सीढ़ियां ही इमरोज के कला मिजाज का पता दे देती हैं। उस द्घर में अदबी हयात का नया लोक खुलता है। कला का एक नया संसार। यहाँ अमृता प्रीतम हैं, इमरोज हैं। उनके मिलन की साक्षी दरो-दीवार हैं। यहाँ वक्त जैसे ठहरा हुआ है। रोक लिया गया हो उसे। इमरोज से द्घण्टों बातचीत में अमृता कभी भी भूतकाल में तब्दील नहीं हुयी हैं। वह वर्तमान में द्घुली हुयी हैं। इमरोज उनके लिए 'था' या 'थी' का प्रयोग नहीं करते। रात को दो बजे अमृता को चाय चाहिए होती है। अक्सर वह लिखने-पढ़ने में इतनी मशगूल होती है कि उसे समय का अहसास नहीं रहता। मेरे दिमाग में अलार्म पिफट है। ठीक दो बजे उठकर चाय बनाता हूँ।
उसके कमरे में रख देता हूँ। बिना कुछ बोले। बिना उसे डिस्टर्ब किए। वहाँ पर दो बड़े-बड़े कमरे हैं जो अमृता और इमरोज के हैं। इमरोज वाले कमरे में पेंटिग्स। अमृता वाले में किताबें। दोनों की अपनी दुनिया। कलाकार मन। संवेदना का समंदर। कल्पना की उड़ान। प्रेम की पगडंडी। इस पगडंडी पर वह साथ-साथ चलते रहे। बिना संतुलन खोए। पगडंडी पर चलने का अपना सुख है। प्रेम का कोई राजपथ नहीं होता। राजपथ तक पहुँचकर प्रेम अपना अर्थ खो देता है। वह पगडंडी भी मर-बिला जाती है। इमरोज प्रेम की पगडंडी पर ही चलते रहे। राजपथ के वैभव, भीड़-भाड़ से बहुत दूर अकेले में। अपनी ही दुनिया में खोये।
जीते सब हैं। अपने ढंग से जीना, वो भी बिना किसी को दुःख पहुँचाए बड़ी बात होती है। इमरोज-अमृता ने जिंदगी को अपने ढंग से जिया है। अमृता की प्रेम के लिए एक भटकन थी जो इमरोज को पाने के साथ ही खत्म हुई। और इमरोज तो बने ही अमृता के लिए थे। पहली बार पचास के दशक में अमृता प्रीतम की एक किताब 'आखरी खत' का आवरण बनाने के क्रम में इमरोज का मिलना हुआ था। इसके बाद इमरोज अमृता की जिंदगी की ही किताब बन गए। और तब अमृता के प्रेमी साहिर लुधियानवी के लिए लिखी वह किताब दोनों के बीच भी जैसे आखरी खत साबित हुई। अमृता की बचपन में ही शादी हो गयी। दो बच्चे भी हुए। मगर पति के सान्निध्य में वह उस प्यार को नहीं पा सकीं जिसके लिए उनकी आत्मा प्यासी थी।
प्यास देह की नहीं रूह की थी। साहिर जिंदगी में आए। अमृता और साहिर का प्यार परवान चढ़ा। लगभग दो दशकों तक दोनों मिलते रहे। लेकिन न जाने क्यों दोनों प्यार को एक अंजाम तक नहीं पहुँचा सके। लिहाजा एक 'खूबसूरत' मोड़ देकर छोड़ दिया। बाद में इसी मनः स्थिति पर साहिर ने पिफल्म गुमराह में एक गीत लिखा-'चलो एक बार पिफर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों.... वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन...उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।' दीगर बात है इस खूबसूरत मोड़ के बाद भी जिंदगी का सफर जारी रहा और आगे के रास्ते में साहिर दर्द को जीते और यह गीत गुनगुनाते रहे-'मेरे साथी खाली जाम...'। एक बार मजाक में इमरोज ने साहिर की नज्म 'आओ कोई ख्वाब बुने' का टाइटिल बनाते वक्त अमृता से कहा-'साला ख्वाब बुनने की बात करता है। बनने के नहीं। साला जुलाहा सारी उम्र ख्वाब ही बुनता रहा, किसी का ख्वाब नहीं बन सका।'
अमृता के लिए साहिर एक खयाल थे-हवा में चमकता हुआ शायद अपने ही खयालों का एक जादू, पर इमरोज के साथ बिताई जिंदगी, शुरू के बरसों को छोड़ दें, एक बेखुदी के आलम तक पहुँच गयी। जिस प्यार में बेखुदी नहीं, शायद वह प्यार ही नहीं। इमरोज की आँखों में वह बेखुदी आज भी महफूज है। अमृता ने इमरोज के बारे में लिखा था-''इमरोज जानता है। मैंने साहिर से मुहब्बत की थी। यह जानकारी अपने आप में बड़ी बात नहीं है, इसके आगे जो सचमुच बड़ी बात है वह है मेरी असफलताओं को अपनी असफलता समझ लेना। इमरोज को विश्वास हो गया कि इस दुनिया में उसे केवल मेरी आवश्यकता है.... अगर कोई इन्सान किसी दिन का चिन्ह बन सकता हो तो कहना चाहिए कि तू मेरा पन्द्रह अगस्त है, मेरे मस्तिष्क की और मेरे मन की अवस्था की स्वतंत्राता का दिन''
आमतौर पर रिश्ते एक दूसरे को बाँधते हैं। लेकिन अमृता-इमरोज के बंधन में भी एक आजादी रही। एक ऐसी आजादी जिसने एक दूसरे की भावनाओं और रिश्तों की लक्ष्मण रेखा कभी नहीं लांद्घी। यह एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा थी जो दोनों ने खींची नहीं थी। वह उनकी समझ और आपसी प्यार से बन गयी।
भरोसे की ईंट से। दोनों ने विवाह नहीं किया। प्रेम किया और उसे धमनियों में उतारा। विवाह के बारे में अमृता की सोच सिमोन दि बऊआर से मिलती थी।-हमारी दुनिया में एक वह बाजार होता है जहाँ जिस्मों का सौदा रात की स्याहियों में होता है। और दूसरा बाजार होता है विवाह संस्था जहाँ यह सौदा दिन-दहाड़े होता है। इमरोज आज भी कहते हैं-अमृता मेरा समाज है, मैं उसका। समाज अलग से कुछ नहीं होता। होता है तो उसका पता बताओ, फोन नंबर दो।
अमृता प्रीतम राधा नहीं बनीं, उनकी राह पर जरूर चलीं। इमरोज भी खुद को कृष्ण मानने के मुगालते में कभी नहीं पड़े। न हीर-रांझा, सीरी-फरहाद जैसा कुछ बनने का दम्भ आया मन में। मगर वे प्रेम की नदी बन गए। नदी भी ऐसी जो किसी हिमालय की कोख से नहीं, भावनाओं से प्रस्फुटित हुयी।
इन दोनों के जीवन में प्यार था, प्यार का प्रचार, दर्द का दिखावा नहीं। दोनों ने पचास साल तक साथ रहते कभी आई लव यू नहीं कहा। न इनके बीच 'क्यों' आया। सब कुछ पर सहमति। रजामंदी। एक दूसरे पर भरोसे की रोशनी इस कदर तेज हुई कि वहाँ असहमति के अंधेरे के लिए गुंजाइश ही नहीं बची।
अज्ञेय लिखते हैं-वेदना में एक शक्ति है जो दृष्टि देती है। जो यातना में है-वह दृष्टा हो सकता है। इस विचार को इमरोज-अमृता ने उलट दिया। इनके आंगन में प्रेम का अमृत है। वेदना के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है। प्रेम में लिपटकर पीड़ा भी मधुर हो जाती है। अलबत्ता कहा यह जा सकता है कि प्रेम एक अद्भुत शक्ति देता है। जो प्रेम में है वो दृष्टा हो सकता है। बीसवीं सदी की महान नर्तकी इजाडोरा डंकन ने भी अपने अनुभवों से लिखा-'प्रेम अक्सर कला को बर्बाद करता रहा है और कला अक्सर प्रेम का दर्दनाक अंत करती रही है। इन दोनों में कोई समझौता नहीं। सिपर्फ निरंतर एक संद्घर्ष है।' इमरोज इस बात के अपवाद बनकर यह प्रमाणित करते हैं कि प्रेम तो कला को निखारता है। वे प्रेम में डूबे हैं और कला को भी बखूबी साधा। लेकिन न तो कला, न ही प्रेम में हिसाब-किताब लगाया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी मानते थे कि प्रेम हिसाब-किताब नहीं है। हिसाब-किताब करने वाले भाड़े पर मिल सकते हैं पर प्रेम करने वाले नहीं।
इमरोज का प्रेम देह से परे है। वे उन लोगों में नहीं हैं जो प्रेम में देह की उपस्थिति अनिवार्य मान लेते हैं। देह पर देह जीने और उससे होकर गुजरने के बाद भी प्रेम का एक फांक भी उनके हिस्से नहीं आता। राजेन्द्र सिंह बेदी कहा करते थे-देह को जगाना आसान है लेकिन उसे सुकून के साथ सुलाना आसान नहीं है। अक्सर देह जागती रहती है-प्रेम सोता रहता है। इमरोज-अमृता के मामले में देह ही सोती रही है और प्रेम जागता रहा।
कहीं पढ़ा था-किसी आदमी को शिद्दत के साथ प्यार कर लेने के बाद ईश्वर को प्यार करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इमरोज ने अमृता को प्यार किया। बेइन्तहा। और इस क्रम में मन में इस भाव ने आकार ग्रहण नहीं किया कि वो प्यार कर रहे हैं। मौजूदा दौर में जहाँ हर कोई प्यार का भिखारी है-हर किसी को प्यार चाहिए। देने में कोई विश्वास नहीं रखता। एक तराजू है जिस पर तेरा-मेरा का हिसाब होता है। आकर्षण की धुंध में दो कदम चलते हैं। यथार्थ की तेज धूप में तिलमिलाहट होती है-अब तुम पहले जैसे प्यार नहीं करते। मन भर जाता है। नई देह का आकर्षण। पिफर प्यार के लिए परिभाषा। मन है कि मानता नहीं। किसी भी देह पर नहीं। देह कितनी भी खूबसूरत हो उसका जादू टूटता जरूर है। देह के पीछे मन है। रूह है। उससे लोग क्यों नहीं जुड़ते जैसे इमरोज-अमृता से जुड़े हैं और समय के आसमान पर लिख दिया-प्यार। |