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दरअसल, पिता द्वारा सख्ती बरतने के कारण वे और-और कट्टर उद्दंड होते चले गये। जो भी उनका विरोध करता वे उसे तोड़मरोड़ देते। इस बीच उन्होंने कुछ आदिवासी और हरिजन हमउम्रों से जोड़-तोड़ बिठाकर पाँच छः मित्राों का एक सुदृढ़ संगठन तैयार कर लिया था। इस संगठन के गठजोड़ से धरपकड़ के हमउम्र लड़के दहशत खाने लगे थे। अब वे धरपकड़ की चाटुकारिता में ही अपनी भलमंसाहत समझते। संगठन बन जाने से धरपकड़ और दबंग होते चले गये। इस दबंगता का सबूत उन्होंने उस वक्त दे दिया जब वे आठवीं में पढ़ते थे। |
कहानी कहाँ से शुरू करूँ इस पसोपेश में हूँ। यह कहानी मैंने अपने दादा-दादी अथवा नाना-नानी से नहीं सुनी। काश सुनी होती तो रू-ब-रू अपनी जुबान में बयान कर जाता। दरअसल, जब विधायक विद्याधर शर्मा की कहानी का जन्म हुआ था। तब इस दुनिया से मेरे दादा-दादी और नाना-नानी अलविदा हो चुके थे। मैंने अपनी आँखों से ही इस कहानी को पल्लवित-पुष्पित होते देखा है और यदि दुर्भाग्य से कुछ भाग नहीं भी देखा है तो मैंने उसे प्रत्यक्षदर्शियों से चश्मदीद गवाह की तरह सुना है। बहरहाल, कुछ अपनी तरफ से जोड़-तोड़ बिठाकर कुछ प्रत्यक्षदर्शियों की तरफ से गुणा-भाग कर विधायक विद्याधर शर्मा की कहानी की शुभ शुरूआत करता हूँ...।
कहानी कहाँ से आरंभ करूँ...? चलिए, विधायक विद्याधर शर्मा के पिता से आरंभ करता हूँ...। आखिर थे भी तो वे अपने पिता का ही प्रोडक्शन...! प्रोडक्शन नम्बर चार। विधायक...माफ कीजिए जिस काल से कहानी की शुरूआत है, उस काल में विद्याधर शर्मा विधायक थे ही नहीं। तब वे थे सिपर्फ विद्याधर...। उनके परिवार वाले उन्हें इसी नाम से पुकारते। स्कूल में उनका नाम था विद्याधर शर्मा। पर, उनके दिलअजीज मित्राों को यह नाम कभी नहीं सुहाया। पूरा विद्याधर नाम लेने से उनकी जुबान को कष्ट होता था इसलिए वे मात्रा 'विद्या' कहते थे। पर इस नाम में पूरे सौ प्रतिशत स्त्राीलिंग का आभास होता था इसलिए 'विद्या' नाम से विद्याधर को पुकारना विद्याधर को भी अखरता और यार दोस्तों को भी।
तब यार दोस्तों ने नये नाम की खोज कर डाली विद्याधर में से 'विद्या' गायब कर दिया और 'धर' के साथ जोड़ दिया 'पकड़' और इस तरह नया नामकरण हुआ 'धरपकड़'। सच पूछा जाए तो यह नाम धरपकड़ को नहीं जंचा था। बावजूद, दोस्तों ने धरपकड़ नाम ही चलन में ला दिया।
तो जनाब धरपकड़ थे अपने पिता की चौथी सन्तान। लगातार तीन पुत्राों के बाद चौथी सन्तान भी पुत्रा हो यह धरपकड़ के माता-पिता नहीं चाहते थे। उन्हें एक कन्यारत्न की इच्छा थी, जिससे कन्यादान कर स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। पर तुलसीदास तो पहले ही कह गये हैं, 'होय वही जो राम रचि राखा।' अनच्छित संतान होने के कारण धरपकड़ को माता-पिता से वह स्नेह नहीं मिला जो उनके तीन बड़े भाईयों को मिला था। जैसे कि प्रसि( कहावत है, 'पूत के लक्षण पालने में दिखते हैं' सो धरपकड़ पर यह कहावत यूँ लागू हुई कि 'कपूत के लक्षण भी पालने में दिखते हैं।'
जब धरपकड़ तीन वर्ष के थे तब उन्हें पिता ने बीड़ियों के टोटे पीते हुए पकड़ा। पिता के तो जैसे सब किये-कराये पर पानी पिफर गया। बेटे ने बीड़ी पी वह भी जूठी। पिता ने उस दिन धरपकड़ की जमकर पिटाई की। खैर जिसने लाद ली उसे शर्म कैसी? सो किस्सा धरपकड़ का था। उस द्घटना के बाद धरपकड़ ने पिता के पीटे जाने के भय से बीड़ी तो नहीं पी, पर एक दिन जब पिता अपने हम उम्रों के साथ हुक्का गुड़गुड़ाकर उठे तो पीछे से धरपकड़ आकर नवाबी ठाठ से लोड़ से टिककर हुक्का गुड़गुड़ाने लगे। पिता ने पलटकर देखा तो सिर पीटकर रह गये। उनके हुक्म की परिवार में तो क्या पूरे गाँव में कोई अवहेलना करे यह हिम्मत किसी में नहीं थी। अपने गाँव और उसके इलाके के वे बेताज बादशाह थे। उनके नाम की पूरे क्षेत्रा में तूती बोलती थी। उन्होंने जो कुछ कर या कह दिया वह सरकारी फरमान से भी ज्यादा अहमियत रखता था। पर अब उन्हें लगने लगा कि उनका अपना बेटा ही उनकी प्रतिष्ठा और रौब-रुतबे की सारी चूलें हिलाकर रख देगा। बाद में उनके सिर कोई आक्षेप न लगे इसलिए उन्होंने धरपकड़ के बारे में द्घोषणा कर दी कि 'यह लड़का तो सारे खानदान का नाम डुबोकर रख देगा।' उन्होंने पूत, सपूत, कपूत की परिभाषाएँ निर्धारित कर रखी थीं, जो इलाके में सर्वमान्य थीं। पूत वह जो पिता से एक कदम आगे निकल जाए, सपूत वह जो पिता के बराबर ही रहे और कपूत वह जो पिता से पीछे रह जाए। उन्होंने निसंकोच धरपकड़ के बारे में यह द्घोषणा भी कर दी थी कि यह कपूत की श्रेणी से भी नीचे जाएगा।
इस तरह धरपकड़ जैसे-जैसे उम्र के सोपान चढ़ रहे थे वैसे-वैसे वे पुरानी शराब के नशे की तरह जिंदादिल होते चले गये। उनका मिजाज एक खास किस्म का था। उनकी प्रवृत्ति जितनी खुशमिजाज एवं हरफनमौला थी उतनी ही सख्त एवं विद्रोही। ढकोसली परंपराओं को तोड़ने की शुरूआत गाँव में पहले-पहल धरपकड़ ने ही की। जब वे बारह वर्ष के थे तब उनका यज्ञोपवीत संस्कार किया गया। अपने शरीर पर किसी भी प्रकार का बंधन और उसके नियम का पालन करना भला उनके स्वभाव में कैसे शुमार होता? सो उन्होंने उसी दिन शाम को पतंग की डोर के साथ जनेऊ का धागा इकहरा करके जोड़ दिया और ठाठ के साथ बेपिफक्र होकर शाम ढलने तक पतंग उड़ाने का आनंद लूटा। पतंग और हिचका लेकर जब धरपकड़ द्घर पहुँचे तो उनके पिता किसी जिम्मेदार सैनिक की तरह कमर कसे धरपकड़ से निपटने के लिए मुस्तैद खड़े थे। दरअसल, पतंग उड़ाते वक्त, आसमान को चूमती हुई पतंग को सधे हुए हाथों से गोता खिलाते वक्त धरपकड़ के जो मित्रा, धरपकड़ की वाह... वाही... कर रहे थे उन्होंने ही जाकर पिता से चुगलखोरी कर दी थी। धरपकड़ को देखते ही पिता का क्रोध गलिहारे में ही उबल पड़ा। बाँस की संटी से जब धरपकड़ की पिटाई होने लगी तो उन्हें नानी याद आ गई। अंततः अम्मा को बाहर निकलकर बीच-बचाव करना पड़ा। बेचारी अम्मा को भी दो-चार संटियों की मार व्यर्थ झेलनी पड़ीं।
और दूसरे दिन पिता का यह सोचना कि अब विद्याधर ठीक हो जाएगा उस समय दरक गया, जब उन्हें खबर मिली कि विद्याधर ने शिकायत करने वाले मित्रा कल्लू की तलैया पर जमकर पिटाई की और पिफर उसे कीचड़ में पटक दिया।
दरअसल, पिता द्वारा सख्ती बरतने के कारण वे और-और कट्टर उद्दंड होते चले गये। जो भी उनका विरोध करता वे उसे तोड़मरोड़ देते। इस बीच उन्होंने कुछ आदिवासी और हरिजन हमउम्रों से जोड़-तोड़ बिठाकर पाँच छः मित्राों का एक सुदृढ़ संगठन तैयार कर लिया था। इस संगठन के गठजोड़ से धरपकड़ के हमउम्र लड़के दहशत खाने लगे थे। अब वे धरपकड़ की चाटुकारिता में ही अपनी भलमंसाहत समझते। संगठन बन जाने से धरपकड़ और दबंग होते चले गये। इस दबंगता का सबूत उन्होंने उस वक्त दे दिया जब वे आठवीं में पढ़ते थे। डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिन 'शिक्षक दिवस' के रूप में स्कूल में मनाया गया। जिला शिक्षा अधिकारी बतौर मुख्य अतिथि जिला मुख्यालय से बुलाये गये। दो-चार शिक्षकों द्वारा भाषण देने के बाद जब मुख्य अतिथि ने अपने भाषण की शुरूआत की, डॉ. राधाकृष्णन शिक्षकों के लिए गौरव का विषय थे, वे साधारण शिक्षक से बढ़कर देश के राष्ट्रपति बने...।'' ठीक इसी वक्त धरपकड़ अपने स्थान पर खड़े होकर बिना कोई औपचारिकता व्यक्त किये बुलंदी के साथ हवा में हाथ हिलाकर बोले, डॉ. राधाकृष्णन का शिक्षक से राष्ट्रपति बनना डॉ. राधाकृष्णन के लिए तो गौरव की बात है, पर शिक्षकों के लिए गौरव की बात तब होती जब डॉ. राधाकृष्णनन् राष्ट्रपति पद छोड़कर साधारण शिक्षक बन जाते।''
पूरी सभा दंग रह गई। सभी दत्तचित्त धरपकड़ को द्घूर रहे थे। धरपकड़ के बैठने के साथ ही उनके मित्राों ने जोरदार तालियाँ बजाकर भाषण को सार्थकता दे दी। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि पहली ताली धरपकड़ ने ही बजाई थी और कोहनियों से आजू-बाजू बैठे मित्राों को कोंचकर तालियाँ बजाने का इशारा किया था।
खैर, आरोपों की परवाह करना तो उनके स्वभाव में था ही नहीं। इसलिए वे तड़ातड़ उन परंपराओं को तोड़ते चले गये जो उन्हें तर्कसंगत नहीं लगीं। इसीलिए धरपकड़ को बुजुर्गों द्वारा दिया गया निकम्मा, नाकारा का खिताब ओढ़ना पड़ा। लेकिन धरपकड़ बेअसर ही रहे। उन्हें जो करना है, सो करना है, पिफर चाहे परिणाम अनुकूल रहे या प्रतिकूल। अच्छे परिणाम की चिंता वह करे जिसे भविष्य की चिंता हो? धरपकड़ ने तो कभी एकचित्त होकर भविष्य के बारे में कुछ निश्चित सोचा ही नहीं। और अनिश्चितता के इस प्रवाह में उनके जीवन के अठारह वर्ष गुजर गए। अब तक वे हायर सेकेंड्री की परीक्षा में दो बार फेल हो चुके थे और तीसरी मर्तबा परीक्षा देकर पास होने की ट्राई कर रहे थे। इस बीच उनके तीनों बड़े भाइयों ने सपूत होने का परिचय प्रस्तुत कर पिता का सीना गर्व से तान दिया था।
सबसे बड़ा भाई रामरतन शर्मा हायर सेकेंड्री परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होकर शिक्षाकर्मी बन गया था और पिता ने बगल के गाँव के प्रसि( ब्राह्मण परिवार की मीडिल पास नाबालिग कन्या के पिता से भरपूर दहेज लेकर शादी भी कर दी थी। उससे छोटा लखन पटवारियान की ट्रेनिंग पास कर पटवारी हो गया और तीसरे ने ग्राम सेवक बनकर अपने सपूत होने का परिचय दे दिया था। इन दोनों भाइयों की भी पिता ने प्रतिष्ठित परिवारों की मामूली पढ़ी लिखी कन्याओं से मनचाहा दहेज लेकर शादियाँ कर दी थीं।
अब चिंता थी तो विद्याधर की? विद्याधर की करतूतों की वजह से कई बार समाज में उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा था। यहाँ तक की अपराधी भाव से विद्याधर की ओर से उन्हें एक-दो बार लोगों से माफी भी मांगनी पड़ी थी। लेकिन अब वे किसी भी तरह बेटे की करतूतों से निजात पा लेने की पिफक्र में थे। कुछ बुजुर्गों ने इसका उपाय सुझाया कि धरपकड़ का विवाह कर उसके सिर गृहस्थी का बोझ लाद दिया जाए। पिता तैयार भी हो गये। पर विद्याधर तो थे पूरी बिरादरी समाज में बदनाम! ऐसे दुश्चरित्रा नाकारा को कौन माँ-बाप आसानी से अपनी बिटिया ब्याह दे? ऐसे बेपेंदी के लड़के का क्या भरोसा कहीं ब्याह के बाद पत्नी को छोड़कर नौ दो ग्यारह ही हो जाए?
खैर, इधर पिता विद्याधर का ब्याह रचाने के लिए जुगत-जुगाड़ बैठाने में लगे थे, उधर विद्याधर अपना राग अलग ही अलाप रहे थे।
ठाकुर हरदेव सिंह से भयंकर झड़प होने के बाद धरपकड़ कुछ शांत हो गये थे। इसका मतलब यह मत समझ लीजिए कि धरपकड़ ठाकुर से मात खा गये थे अथवा डर व सहम गये थे। ठाकुर हरदेवसिंह भले ही अपनी सरपंची को बपौती समझते हों पर धरपकड़ ने सरपंच हरदेवसिंह को छिंगली अंगुलिया पर ही गिना। एक दिन पिता की तबीयत खराब हो जाने के कारण धरपकड़ को ठाकुर के मंदिर की पूजा करने जाना पड़ा। धरपकड़ के पिता ठाकुरों के मंदिर के खानदानी पुजारी थे। पूजा के बदले दस बीद्घा माफी की जमीन जमींदारी के समय से ही मिली हुई थी और पूजा के वक्त रोज सुबह एक थाली में सीधा दिया जाता। सीधे में एक खोरा आटा, एक कटोरी दाल, दो नमक के डेले, एक लाल मिर्च और एक चम्मच द्घी मिलता, उसी द्घी से भगवान को भोग लगता।
धरपकड़ जब पूजा करने के लिए सीधे की थाली हाथ में लिए मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे तब ठाकुर हरदेवसिंह ने वैसे ही चिढ़ाने के लहजे में कह दिया, ''काहे मोढ़ा नहा-धो आयो के वैसेई वासे मोड़े उठके पूजा करने चलो आओ?''
नाक पर सदा गुस्सा रखकर चलने वाले धरपकड़ भला ठाकुर की इतनी बात कैसे सुनते? एक तो वैसे ही उनकी पूजा-अर्चना में श्र(ा नहीं थी। दूसरे, पिता की चार-छह गालियाँ सुनने के बाद वे जबरदस्ती पूजा के लिए आये थे। जिस पर ठाकुर ने कटाक्ष कसकर जले पर नमक छिड़क दिया था। पिफर क्या था... धरपकड़ ने सीधे की थाली मंदिर की देहरी पर दे मारी, भगवान को नहलाने के लिए रखी हुई बाल्टी में लात दे मारी और ठाकुर की ओर मुखातिब होकर उबल पड़े, ''थोड़ा-सा सीधा क्या दे देते हो...? रौब पेलते हो...। रखो अपना सीधा अपने द्घर। जिसे सीधे की भूख हो उससे पूजा करा लेना। धरपकड़ किसी के दानों का मोहताज नहीं है।''
खैर, गाँव के बड़े बुजुर्गों ने धरपकड़ के सिर पर ''सिर पिफर जाने'' का आरोप लगाकर ठाकुर और ब्राह्मण के संबंधों को बिगड़ने से संभाल लिया, पर धरपकड़ सरपंची के चुनाव में ठाकुर का विरोध करना न भूले। जी-जान लगाकर उन्होंने ठाकुर का विरोध किया। धरपकड़ अपने इस प्रयास में सफल तो नहीं हुए पर वे ठाकुर के स्थायी प्रतिद्वंद्वी अवश्य हो गये। ठाकुर से विरोध मोल लेने के कारण धरपकड़ ने राजनीति का पहला पाठ सीखा था।
बहरहाल, इस द्घटना के बाद धरपकड़ एकांत तलाशने लगे। द्घर में तो उनका मन पहले भी कभी नहीं रमा था, सो अब कैसे रमता? अब तो धरपकड़ पर फब्तियाँ फेंकने वाली तीन-तीन भाभियाँ थीं। जब कभी भी धरपकड़ भाभियों की आँखों के सामने आते तो एक भाभी दूसरी भाभी को संबोधित कर प्रतीकात्मक ढंग से धरपकड़ पर व्यंग्बाण फेंकती। इन बाणों से धरपकड़ तिलमिलाते तो जरूर पर प्रतिकार स्वरूप कहते कुछ नहीं। परिवार के लोगों से मुँह चलाना उनकी आदत में शुमार था ही नहीं। पिता और भाई कितनी भी गालियाँ दे लें, कुछ भी कह लें उन्होंने कभी बराबर मुँह नहीं चलाया।
इतने दुष्कृत्य करते चले आने के बावजूद परिवार से साथ निभाये चले आने का यही एक मात्रा राज था। खैर, धरपकड़ चुपचाप अटा पर चढ़ जाते। अम्मा वहीं उन्हें खाना पानी दे जाती। धरपकड़ ने कितना कुछ भी किया हो अम्मा की नजरों में वे कभी नहीं गिरे। अम्मा का स्नेहिल बरदहस्त सदा ही धरपकड़ के सिर पर रहता। एक अम्मा ही थीं जिनके सामने जाने क्यों धरपकड़ के हृदय की कठोरता मोम के मापिफक पिद्घलने लगती और वे अम्मा की गोद में सिर छुपाकर नन्हें बच्चे की तरह सुबकने लगते। लेकिन सच यह कुछ भी नहीं था। सच यह था कि इस एकांत में धरपकड़ अपनी जवानी की हंडिया में विधवा बिमला के साथ प्यार की दाल पका रहे थे। यानि कैशोर्य की हंडिया में खदबदाने के काबिल हो रहे थे...।
धरपकड़ के पिता बिमला को बेटी और भाई जीजी कहते। पर धरपकड़ इन रिश्तों की ओट में नया रिश्ता कायम करने के लिए बिमला के संग निराला खेल, खेल रहे थे। उन्होंने दूर के रिश्तों को कभी महत्व नहीं दिया। उनकी नजर में सगे रिश्ते ही सगे थे। पिफर बिमला के पिता के पिता, दादा, परदादा के पिता भाई-भाई थे। खैर, अब आपको पीढ़ियों के इतिहास से क्या लेना देना? श्ाायद आप ऊब गये होंगे, आइए मुख्य पहलू पर पहुँचते हैं...।
हाँ तो इस रिश्ते को तोड़ने की शत-प्रतिशत पहल धरपकड़ ने ही नहीं की थी, बल्कि बिमला भी अंदरूनी पहल कर रही थी। अब बेचारी बिमला भी क्या करे? भरी जवानी में उसे वैधव्य भोगना पड़ा। ससुराल वालों की तरफ से तो इतना तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसे ससुराल ही छोड़नी पड़ी। और यहाँ मायके में यह समझिये कि उसे आश्रय भर मिल गया था। काकी और भाभियों के तिलमिला देने वाले तानों के बीच बस जैसे-तैसे जी रही थी। या यह समझिये नारी जाति के लिए वैधव्य एक अपराध है जिसका वह दंड भोग रही थी। उसे उस अटा में आश्रय दिया गया था जो सीलन और अंधेरे से भरा था। बरसात में खपरैल लगातार चुचाते रहते। ऐसे में वह किसी एक कोने में चटाई पर कम्बल ओढ़े पड़ी अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाती रहती। उसे खाने को मिलता दाल का पानी और रूखी रोटियाँ।
यह थी आँखों को आर्द्र कर देने वाली दारुण व्यथा-कथा जो उसने अटा की खिड़की से, आँखों की भाषा से धरपकड़ को सुनाई, पढ़ाई थी। यही मर्म बन गया दोनों के प्रेम का आधार... संबल...।
बुजुर्गों का कहना है, प्यार अंधा होता है, प्यार पागल होता है, प्यार आग होता है। सो बुजुर्गों के इस अनुभवी कथन के अनुरूप दोनों अंधे हो गये। पागल हो गये। और लोक-लाज, मान-मर्यादा, नाते-रिश्ते सब ताक पर रख मौका पाकर मंदिर की परकम्मा में अभिसार करने लगे। धरपकड़ ने तो कभी अपने भविष्य को ही गंभीरता से नहीं लिया था पिफर भला वे बिमला के भविष्य के बारे में इज्जत आबरू की क्या परवाह करते? उन्हें तो परकम्पा में अवतरित होने वाले क्षण दुनियादारी की आँखों से प्रच्छन्न लगते। पर यही भ्रम था उनका। उन क्षणों में कुछ आँणात्मक पूर्वाभास नहीं होने के बावजूद भी... दीवारों के कान थे... हवा में भी जुबान थी... वक्त की आँखे थीं। वक्त ने करवट बदली और धरपकड़ एवं बिमला मंदिर के परकम्मे में..., हाय...! हाय...! धार्मिक स्थान पर...! राम...राम... साक्षात् प्रभु की आँखों के सामने द्घोर जद्घन्य अपराध करते हुए पकड़ लिए गये। पकड़ने वाली थीं बिमला की काकी और भाभी। जो आठों प्रहर चौबीसों द्घंटे उस पर खार खाये बैठी रहती थीं। और इधर धरपकड़ की तीनों भाभियाँ जो धरपकड़ को हमेशा-हमेशा के लिए द्घर से बेदखल करने का उपाय खोज रही थीं। अब गत तो दोनों की ही बुरी होनी थी। बिमला की काकी और भाभियों ने बिमला की वहीं लातों, द्घूसों से रांड, चुड़ैल, रंडी के संबोधन देते हुए कुटाई-पिटाई करनी शुरू कर दी। मामला पूरी तरह बिगड़ते देख धरपकड़ अपनी भाभियों को धक्का-मुक्का देते हुए, हाथ में चड्डी लिए नंगे पैर भाग खड़े हुए।
देखते-सुनते गाँव के सारे लोग मंदिर के आस-पास आ खड़े हुए। शर्म और थू-थू की ग्लानि से सबके चेहरे लज्जा से झुके थे। गाँव के इतिहास में वह हो गया था जो पहले कभी नहीं हुआ था। धरपकड़ और बिमला के माँ-बाप की नाक तो कट ही गई थी। वे किसी को मुँह दिखाने के लायक नहीं रह गये थे। यदि उन्हें ऐसा पूर्वाभास होता कि उनकी संतानें इस हद तक नीच निकलेंगी तो संभवतः वे जन्मते ही गला द्घोंट देते। यहाँ चरितार्थ हो गई थी धरपकड़ के पिता की वह टिप्पणी जो उन्होंने धरपकड़ को कपूत सि( करने के लिए दी थी।
इस कथा के प्रमुख पात्रा हैं... विद्याधर शर्मा उपर्फ धरपकड़ तो आलतू-फालतू की बातें यहीं छोड़ मुख्य चरित्रा का ही पारायण करते हैं...
धरपकड़ एक बजरंगबली के मंदिर में शरण पाने में सफल हो गये। यहाँ कोई विशेष काम-धाम तो था नहीं, बस अल सुबह उठकर मंदिर को कुएँ से पानी खींचकर धोना पड़ता। पिफर जब सूरज चढ़ आता तब पुजारी जी की थुलथुल देह की मालिश करनी पड़ती। इस कार्य के बदले, पुजारी ने धरपकड़ के खाने-पीने की जिम्मेदारी ले ली थी। मंगलवार और शनिवार को मेवा-मिष्ठान का भोग लगता, कुछ भक्तजन दूध भी दे जाते। यहीं सीखे थे धरपकड़ बमबम भोले, हर-हर महादेव और जय भवानी शंकर के रणभेरी उच्चारणों के बीच भांग का गोला गटकना, गाँजे की चिलमों के कश खींचना। अब उनकी सेहत बन चली थी। गाँव में माता-पिता का जो थोड़ा-बहुत अंकुश था वह यहाँ बिलकुल समाप्त हो गया था। याद भी उन्हें किसी की न सताती। हाँ कभी अम्मा का निर्मल निश्छल चेहरा उनकी आँखों के सामने झूल जाता। पर वे अम्मा से मिलने के लिए छटपटाये कभी नहीं। हाँ बिमला की याद जरूर जब कभी उन्हें बेहद सता जाती लेकिन बिमला की ओर से वे इतने निश्ंिचत थे कि उन्होंने गाँव से पलायन करने के बाद, 'बिमला का क्या हश्र हुआ होगा?' इस प्रश्न पर कभी गौर ही नहीं किया था।
इधर उनके आश्चर्य की तब सीमा नहीं रही जब उन्होंने अखबारों में प्रकाशित हुए परीक्षा-फल में तृतीय श्रेणी के राेल नम्बरों में अपना रोल नम्बर देख लिया। उन्हें तो कभी अपने पर यह विश्वास ही नहीं हुआ था कि वे जीवन में इंटर पास भी कर पाएँगे? आज के दिन उन्होंने प्रभु के चरणों में दंडवत प्रणाम किया और आने वाले मंगलवार के दिन पुजारी की आँखों से बचकर, चढ़ोत्तरी में से पैसे चुराकर इक्कीस रुपए का गुड़-चने का भोग भी लगाया तथा संकल्प लिया कि अब कॉलेज में भर्ती होकर मन लगाकर पढ़ेंगे। अब जीवन को कुछ बना देने के बारे में धरपकड़ गंभीर थे।
गर्मियों की छुट्टियाँ समाप्त होने के बाद जब कॉलेज में प्रवेश आरंभ हुए तब उनके गाँव के लड़के भी कॉलेज में प्रवेश लेने के लिए आए। हालांकि वे लड़के धरपकड़ के दोस्त नहीं थे। धरपकड़ ने अपने खिलाफ जाने के जुर्म में एक दो की धुनाई भी की थी। पर इस वक्त वे भेद-भाव सब भूलकर उनके निकट पहुँचकर उनसे गाँव के हालचाल की कैपिफयत तलब करने लगे, बहुत नम्रता-विनम्रता के साथ।
उस द्घटना के बाद लगभग एक हफ्रते गाँव की हवा बिमला और धरपकड़ की चर्चाओं से गरम रही थी। धरपकड़ तो मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए थे और गाँव की नंगी-नंगी गालियों से जलील हुई बेचारी बिमला! बिमला को ताला बन्द कमरे में रखा जाने लगा था। बस दाना-पानी और टट्टी-पेशाब के लिए उसे छूट दी जाती। इस वक्त भी उसकी एक न एक भाभी पहरेदार की तरह उसके संग रहती। अब उसकी देह भी सूखकर कांटा हो गई थी।
धरपकड़ के पिता ने इस द्घटना की सारी जिम्मेदारी धरपकड़ की माँ पर लादकर उनकी बेसाख्ता पिटाई लगाई थी। यहाँ तक की उनके शरीर से लहू रिसने लगा था।
उन्होंने बहुओं को भी खूब खरी-खाटी सुनाई थी, 'आखिर जब उन्हें इस कुकर्म का पता चल ही गया था तो सरेआम डंका पीटने की क्या जरूरत थी? खानदान की सारी इज्जत-आबरू खड़े-खड़े दो टके में ही नीलाम कर दी। बड़े-बूढ़ों से कह दिया होता तो द्घर की बात द्घर में ही निपटा-सुलझा लेते और उस हरामी का काला मुँह कर चुपचाप द्घर से निकाल देते। वह तो पैदा ही ऐसे अशुभ नक्षत्राों में हुआ है कि सारे कुल की लाज डूबनी ही थी? अपनी ही करनी में खोट था दोष किसे दें। न जाने पूर्व जन्म में कौन से पाप किये थे जो आज यह दिन देखने पड़ रहे हैं। अब तो मौत के आये ही जी को चैन मिलेगा?' धरपकड़ को सबसे ज्यादा आद्घात देने वाली बात लगी कि अब अम्मा का विश्वास भी उनसे उठ गया है। उनकी अम्मा ने यह कभी नहीं सोचा था कि यह नासपीटा जिस थाली में खाएगा उसी में छेद कर कुल की नाक कटा देगा?
इस वक्त धरपकड़ को अपनी कारगुजारी पर बहुत पश्चाताप हुआ। बरबस ही उनकी आँखों में आँसू छलछला आए। धरपकड़ ने अपने मित्राों को मंदिर में लाकर रहने और खाने-पीने की उचित व्यवस्था की जानकारी दी। वहीं उन्हें चाय पिलाते-पिलाते अपने गाँधी डिवीजन से पास हो जाने की खबर भी दी। पिफर उन लोगों से स्कूल से किसी भी तरीके से अंक सूची निकाल लाने की याचना की। और बाद में उनके तथा स्वयं का कॉलेज में प्रवेश से लेकर किराए का मकान दिलाने की जिम्मेदारी स्वयं ले ली। तब जाकर उन्होंने बड़े ही आत्मीय भाव से मित्राों को गाँव जाने वाली मोटर में बिठाकर विदा ली।
शहर में आने के बाद से धरपकड़ को धरपकड़ नाम से कोई नहीं जानता था। सब उन्हें विद्याधर नाम से ही जानते। गाँव से जो लड़के पढ़ने आए थे वे भी उन्हें विद्याधर नाम से ही पुकारते। उन लोगों की विद्याधर ने बड़ी सहायता की। भागदौड़ करके कमरे किराए पर दिलाए। वे लोग भी विद्याधर की अंकसूची स्कूल से निकलवा लाए थे। अब विद्याधर राजकीय महाविद्यालय में बी.ए. प्रथम वर्ष के छात्रा थे। कॉलेज में प्रवेश लेते ही उन्होंने वरिष्ठ छात्राों से तालमेल बिठा दोस्ती कायम कर ली थी। नतीजतन वे वरिष्ठ छात्राों के जरिए नवोदित छात्राों के ऑफीशियल कार्य बड़ी सुगमता से निपटवा देते।
इस कारण वे जल्दी ही लोकप्रिय हो गए। जब तक वे कॉलेज में रहते उनके आजू-बाजू चार-छः छात्राों की भीड़ लगी रहती। कॉलेज खुलने से लेकर बंद होने तक कॉलेज में ही मंडराते रहते। उपस्थिति बनाए रखने के कारण ही वे छात्रा नेता और छात्रा गुंडों के भी निकट आ गये थे। वे सबसे भैया-दादा कहकर मिलते और अपनी सेवाएँ अर्पित करने की जिज्ञासा प्रगट करते। प्रतिदिन कोई न कोई उदार हृदय छात्रा उन्हें चाय नाश्ता करा जाता। सिगरेट के दौर तो सारे दिन दरियादिली की तरह चलते। अब उन्हें सिगरेट पिलाने के लिए काम कराने आये छात्रा से अनुरोध करने में कतई संकोच न लगता। सिगरेट पीते हुए किसी भी छात्रा से सिगरेट मांग लेना वे अपना हक समझने लगे थे। वे अंदर ही अंदर एहसास कर रहे थे कि वे अब मुखर, बुलंद एवं निःसंकोची होते जा रहे हैं।
विद्याधर ने अब मंदिर से छुट्टी पा ली थी। वहाँ के मर्यादित नियमों का पालन करना वैसे भी उनके बूते की बात नहीं थी। जिस पर उन्हें पुजारी की रगड़-रगड़कर बेनागा चंपी करनी पड़ती। ऊपर से जी हुजूरी और खुट्टेबरदारी अलग। वह तो मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी है सो वे इतने दिन वहाँ रमे रहे वरना रौब-रुतबे वाले विद्याधर तो एक भी दिन वहाँ न टिकते।
मंदिर को तिलांजलि दे वे टिक गये थे अपने ही गाँव के लड़के डालचंद के कमरे में। डालचंद बनिये का लड़का था। स्वभाव से वह डरपोक एवं बुजदिल था। अतः वह भी अपनी सुरक्षा के लिए किसी का सहारा चाहता था और उसे इत्तफाकन ही मजबूत रक्षा कवच के रूप में मिल गया विद्याधर। विद्याधर की अहमियत से वह परिचित था ही, विद्याधर के साथ-साथ कॉलेज आते या जाते समय छात्रा विद्याधर के साथ उसे भी सलाम ठोकते और अपनत्व प्रगट करते हुए सख्ती से हाथ मिलाते। ऐसे रूम-मेट को पाकर डालचंद निहाल हो गया था। अपने पल्ले से विद्याधर को खाना खिलाने की जिम्मेदारी भी डालचंद ने ले ली थी। विद्याधर जानता था, लक्ष्मी-पुत्रा के पास दौलत की कमी हो ही नहीं सकती। हालांकि डालचंद के पिता हिसाब-किताब से ही खर्च के लिए धन भेजते और पाई-पाई डालचंद के पढ़ाई खर्चे के नाम खोले गये खाते में दर्ज कर देते, जिससे शादी के वक्त एक-एक पैसा दहेज के रूप में वसूल लिया जाए। लेकिन विद्याधर जानता था कि डालचंद जब भी गाँव जाया करेगा तब दो-चार दिन गल्ले पर बैठकर हजार-पाँच सौ रुपये सहज ही उड़ा दिया करेगा। इसके अलावा अपनी अम्मा को पुट्याकर अलग से कुछ न कुछ रुपये ले आया करेगा। उसकी अम्मा भी भला चार लड़कियों पर एक मात्रा पुत्रा के खर्चे-वर्चे में कमी कैसे बरदाश्त कर सकती थी?
होते हवाते कॉलेज में चुनावी महौल की सरगर्मी तैर गई। मित्राों के आग्रह पर विद्याधर भी कक्षा प्रतिनिधि के लिए खड़े हो गये। लोकप्रियता की पहली सीड़ी तो वे कॉलेज में प्रवेश लेने के दौर में ही चढ़ गये थे। इसी कारण उन्हें छात्रा संद्घ के भूतपूर्व नेताओं का भरपूर समर्थन मिला। कॉलेज राजनीति के साथ कूटनीति का पाठ भी उन्हीं से विद्याधर ने सीख लिया। इस दौर में विद्याधर उन छात्रााओं के भी पैर छूने से नहीं चूके जिन्हें वे कॉलेज कैम्पस में सिगरेट के छल्ले उड़ाकर गंदी गंदी फब्तियां कस, छेड़ने से नहीं चूके थे। आचार्य चाणक्य के अर्थशास्त्रा की चारों नीतियों-साम, दाम, दण्ड, भेद को खूब अपनाया-भुनाया। और अंततः विद्याधर सगर्व चुनाव जीत गये। इस तरह महाविद्यालय के प्रमुख छात्राों में उनकी गिनती हो गई। चुनाव में विजयी होने के बाद विद्याधर कुछ रईस छात्राों के निकट आ गये थे। उनकी निकटता पाकर विद्याधर मांस-मछली खाना एवं मयखानों में हलाहल मदिरा भरकर हलक के नीचे गटागट उतारना सीख गये।
कुछ समय पश्चात विद्याधर को खबर मिली कि बिमला ने गाँव के खारे कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली। सुनी-सुनी यह भी खबर मिली कि बिमला को तीन माह का गर्भ था। ऐसा नहीं था कि बिमला की मृत्यु की खबर सुनकर विद्याधर को दुख न हुआ हो। वे बेहद दुखी हुए। प्रत्यक्षदर्शी डालचंद का कहना था कि खबर वाली रात, रात भर रोते रहे थे।
समय की नियति है गुजरते रहना, सो समय गुजरता गया। और विद्याधर थर्ड डिवीजन से बीए पास कर गये। एम.ए. में अध्यक्ष पद के उम्मीदवार बने। वहाँ तक आते-आते विद्याधर बहुत परिपक्व हो गये थे। कॉलेज राजनीति वे एक साधारण खेल की तरह खेल रहे थे। मंजे हुए राजनीतिज्ञ की तरह वे अध्यक्ष पद के चुनाव में भारी बहुमत से विजयी द्घोषित हुए। यहाँ राजनैतिक पार्टियों का उन्हें खुला समर्थन मिला। इसी वजह से वे शहर के प्रमुख राजनीतिज्ञों के निकट आ गये। अब विद्याधर ज्यादातर उन्हीं के साथ बैठते उठते थे।
विद्याधर अब चौबीसवें वर्ष में सफर कर रहे थे। वे एम.ए. कर चुके थे और रोजी रोटी के जुगाड़ में किसी धंधे की जुगत बिठाने के चक्कर में थे। नौकरी उन्हें आसानी से मिल जाए इतनी योग्यता वे खुद में नहीं पाते थे। तब धंधे के लिए मुद्रा संकट उनके सामने मुँहबाए खड़ा था। स्थानीय नेताओं से दबाव डलवाकर नगर पालिका से एक गुमटी उन्होंने हथिया ली थी। पिफर अपनी बूते का सारा जोर लगाकर बैंक से पच्चीस हजार रुपये का कर्ज भी ले लेने में वे सफल हो गये। अब क्या था, विद्याधर पान के पत्तों पर कत्था-चूना रगड़ने लगे। पर कुछ ही दिनों बाद उन्हें लगने लगा कि वे इस धंधे में जम नहीं पाएँगे। सुबह से लेकर रात दस बजे तक कमर तिरछी करके बैठे रहना उनकी औकात से बाहर की बात थी।
खैर, दुकान पर जमे रहने के लिए उन्होंने भांग की गोलियों का सहारा लेना शुरू कर दिया। रोज ही वे पाँच से लेकर पन्द्रह गोलियां गटक जाते। कुछ दिन तो वे सहज रहे, पर कुछ ही दिनों में उन्हें महसूस होने लगा कि दोपहर बाद उनका मस्तिष्क चटकने लगता है और सारे शरीर में जैसे गर्मी भर जाती है। तब वे दुकान में ताला डाल देते और द्घंटों नदी की धारा में लेटे रहते। पानी की शीतलता से उन्हें शांति मिलती। मस्तिष्क में तरावट की अनुभूति होती। पर यह कोई स्थाई इलाज नहीं था। रोज दोपहर के बाद मस्तिष्क की नसें फटने लगतीं। ऐसी विषम परिस्थिति में विद्याधर कोई काम न कर पाते। उनके मस्तिष्क में बु(ि जैसे उस वक्त गायब हो जाती। सिर में जैसे कोई सनक सवार होकर उन्हें अनर्गल हरकतें करने को बाध्य करने लगती। बु(ि अनियंत्रिात होने लगती। उन्हें लगता कि मनमुताबिक कोई काम हाथ नहीं होने के कारण वे जिंदगी की गति से कदमताल नहीं मिला पा रहे हैं। शायद इसी का दुष्परिणाम है कि वे मनोरोगी होते जा रहे हैं। आखिर इस समस्या के स्थायी उपचार के लिए मित्राों की सलाह पर उन्होंने मनोचिकित्सक का रुख किया। मनोचिकित्सक ने उन्हें कुछ बिजली के झटके दिए और एक माह के लिए खाने की गोलियों का कोर्स दिया।
इस संयुक्त उपचार के बाद उन्हें लगने लगा कि दिमागी तंत्रा में कोई ऐसी रासायनिक प्रक्रिया शुरू होने लगी है जो उन्हें अवसाद से उबारने के काम में जुटी है।
प्रिय पाठकों यहाँ हम आपको बता दें कि यह वह समय है जब आपातकाल की काली छाया से मुक्त होने के बाद देश आम चुनाव के दौर से गुजर रहा है। आपातकाल का उद्द्घोषक दल और उसके नेता बदलते हालातों से हैरानी में हैं और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उभार में आया गैर कांग्रेसवाद उफान मार रहा है। अपनी अकूत धन-संपत्ति को बचाने के लिए कई पूर्व राजा-महाराजा, सामंत नियोजित योजना के अंतर्गत हित-सुरक्षा की विलक्षण नीति अपना रहे हैं। माँ, भाजपा में सिरसौर है तो बेटे ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है। ऐसा ही कुछ तमाशा इस क्षेत्रा में परवान चढ़ रहा है, जिस क्षेत्रा में विद्याधर जैसे परिवार व समाज से नकार व बिसार दिए गए पात्रा चरित्रा विकास और वैयक्तिक उत्थान में लगे हैं।
श्रीमंत और महाराज जैसे अप्रजातांत्रिाक संबोधनों से संबोधित किए जाने वाले महाराजा इस इलाके के कांग्रेस समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार हैं। वे कांग्रेस समर्थित इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने जब यह अनुभव किया कि कांग्रेस के विपरीत लहर है तो उन्होंने कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने की बजाय अपने राजवंश के प्रतीक चिन्ह ''उगते सूरज'' पर चुनाव लड़ा। महाराजा को कांग्रेस समर्थित प्रत्यशी बनाए जाने से, जो बुनियादी कांग्रेसी, स्वतंत्राता संग्राम सेनानी और वैचारिकता से जुड़े थे, उनकी नाराजगी स्वभाविक थी, क्योंकि ये कांग्रेसी एकाएक उस राजवंश के वंशज से कैसे तालमेल बिठाते, जिनकी राजशाही के विरु( उन्होंने संग्राम लड़ा। जेल गए। बहरहाल महाराजा ने कुटिल चतुराई से काम लेते हुए युवाओं को अपने वैभव से लुभाने के लिए शतरंजी चालें चलना शुरू कर दीं। उन्हें अपनी विदेशी आलीशान कार में ही नहीं हेलिकॉप्टर में भी एक-एक कर बिठाना शुरू कर दिया। युवा प्रमुखों को प्रचार के लिए जीपें तो दी ही गईं, उन्हें मुक्त हस्त से खर्चे के लिए नकद राशि भी दी गई। रात्रिा में लौटने पर कार्यकर्ताओं को भोजन की उत्तम व्यवस्था के साथ शराब के भी इंतजामात कर दिए गए। इस इलाके में चुनाव के दौरान वैभव प्रदर्शन और पिफजूलखर्ची के हालात पहली बार निर्मित हो रहे थे।
इस वैभव और पिफजूलखर्ची के समक्ष प्रतिद्वंद्वी स्वतंत्राता संग्राम से जुड़े जनता दल प्रत्याशी लाचारी की स्थिति में थे। उनकी स्थिति तब और बिगड़ गई जब महाराजा के पारिवारिक संबंधों का लिहाज करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और विजयाराजे सिंधिया जैसे आला नेताओं ने इस क्षेत्रा में चुनाव प्रचार के लिए आने से ही इनकार कर दिया।
हमारे नायक विद्याधर ऐसे ही किसी अचूक मौके की तलाश में थे। वे अपनी कॉलेज अध्यक्षी जैसी उपलब्धि और वाक् चातुर्य के चलते महाराजा के निकट आ गए। अपनी कॉलेज टीम को भी विद्याधर ने प्रचार अभियान से जोड़ लिया। एक जीप भी उन्हें प्रचार के लिए दे दी गर्ई। लौटने पर रात्रिा में थकान मिटाने का इंतजाम पूर्व से थे ही। अब क्या था विद्याधर मौज में थे। शराब के मुफ्रत सेवन की दिनचर्या से उनकी भांग की लत जाती रही।
विद्याधर महाराज की नजरों में बने रहने के लिए यह चतुराई हमेशा बरतते कि महाराज का आसपास के जिस किसी भी गाँव अथवा कस्बे में दौरा कार्यक्रम, सभा, नुक्कड़ सभा होती तो वे वहाँ हरहाल में उपस्थित बने रहकर अग्रणी बने रहते। माल्यार्पण में भी आगे रहने के साथ महाराज के चरणों में सिर रखने से विद्याधर कभी नहीं चूकते।
ऐसे ही एक अवसर पर एक कस्बे में जब महाराज नुक्कड़ सभा ले रहे थे तब अनायास अनहोनी द्घट गई। विरोधी दल के कुछ हुडदंग एकाएक प्रकट होकर चिल्लाने लगे, ''देश के गद्दारों... भागों...। रानी झाँसी और तात्याटोपे के हत्यारों भागो...।'' और पिफर महाराजा पर ईंट-पत्थर पिफकना शुरू हो गए। सभा में भगदड़ मच गई। सभा भंग हो गई।
विद्याधर के लिए जैसे चुनौती भरा यह एक शुभ अवसर था। वे मौके की नजाकत समझ महाराज की तरफ भीड़ को धकियाते दौड़ पड़े। पिफर महाराज के ठीक आगे आकर महाराज का हाथ पकड़ उन्हें लगभग खींचते हुए कार की तरफ चल पड़े। चालक पहले से ही कार स्टार्ट किए व फाटक खोले खड़ा था। विद्याधर ने तुरंत महाराज को कार के भीतर ठेला और पिफर खुद भी जब कार में द्घुसने लगे तो एक पत्थर उनकी कनपटी में लगा। विद्याधर ने फुर्ती से फाटक बंद कर दिया और चालक को हुक्म दिया, ''भगा गाड़ी, जितनी तेज भगा सके...।'' विद्याधर ने जैसे महाराज को मौत के बंवडर से निकालने में कामयाबी हासिल कर ली हो...? कार की एक खिड़की और पीछे का काँच पत्थर लगने से चटक गए थे।
जब कस्बे की सरहद छोड़ कार खुले में आई तो महाराज की दुश्चिंता दूर हुई और विद्याधर को कनपटी में लगे पत्थर का अहसास हुआ। विद्याधर ने जब चोट लगी जगह पर अंगुली लगाई तो गीलेपन की अनुभूति हुई। और पिफर जब अंगुली आँखों के सामने लाकर देखी तो खून से लाल थी। महाराज की निगाह भी खून पर पड़ी। वे एकाएक बोले, ''अरे विद्याधर तुम्हें तो चोट लगी है, खून बह रहा है। यह रुमाल लगा लो...।'' महाराज ने कुर्ते की जेब से रुमाल निकालकर विद्याधर को दिया।
विद्याधर रुमाल लेते हुए बोले, ''महाराज ऐसी चोटें तो मनमान लगती रहती हैं, आपको खरोंच भी आ जाती तो मुश्किल थी...।''
''तुम्हारी वजह से मैं बच गया। वरना पत्थर मुझे भी लगते। मैं तुम्हारी इस वफादारी का हमेशा खयाल रखूँगा विद्याधर...।''
''हमें तो आपका वरद्हस्त चाहिए महाराज..., कभी भी आजमा लेना, रामभक्त हनुमान की तरह आप मेरी छाती में बसे मिलेंगे...।''
''मुझसे दिल्ली आकर भी मिलते रहना, मैं तुम्हारे लिए कुछ सोचूँगा...।''
''जी महाराज...। आपका जो हुक्म, सिर माथे!'' और विद्याधर ने महाराज के द्घुटनों में सिर रख दिया।
चुनाव परिणाम द्घोषित हुए तब महाराज तो जीत गए, लेकिन उनका दल हार गया। केंद्र और ज्यादातर राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें वजूद में आईं। महाराज ने सरकारी बैठकों में हिस्सेदारी के लिए विद्याधर को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया। विद्याधर की पूरे जिले में जैसे हैसियत बढ़ गई।
महाराज के कांग्रेस में आगमन और लोकसभा चुनाव के जीतने के बाद कांग्रेस पूरे लोकसभा क्षेत्रा में दो फांक हो गई। एक में वे बुजुर्ग और वरिष्ठ कांग्रेसी थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई के दौरान सामंतशाही की जड़ों में मट्ठा डालने का काम किया था। इसके विपरीत एक दूसरी कांग्रेस भी वजूद में आ गई थी, जिसमें बीस साल की उम्र से लेकर पैंतीस साल का युवा तबका था। अब यह तबका बुनियादी व असली कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहा था। इसका नेतृत्व महाराज के लोकसभा प्रतिनिधि होने के नाते विद्याधर जिंदादिली से कर रहे थे।
चलिए अब हम आपको कांग्रेस भवन ले चलते हैं, जहाँ २८ दिसंबर होने के कारण कांग्रेस दिवस मनाने की तैयारी में असली कांग्रेस जुटी है। विद्याधर को कांग्रेस दिवस मनाए जाने की खबर लग गई। वे फौरन अपने दर्जन भर विश्वस्तों के साथ कांग्रेस भवन पहुँच गए। विद्याधर ने देखा मंच पर महात्मा गाँधी, पं. नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस की तस्वीरें रखी थीं और स्वतंत्राता संग्राम सेनानी व अन्य बुजुर्ग कांग्रेसी कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी में थे, तभी विद्याधर ने अपनी आमद ही दर्ज नहीं कराई हस्तक्षेप करते हुए एक सवाल उछाल दिया, ''हमारे इलाके के सांसद महाराज हैं, और वे कांग्रेसी हैं। इसलिए उनकी तस्वीर भी मंच पर रखनी चाहिए...?''
''ऐसा होता है क्या, कहाँ महाराज और कहाँ कांग्रेस के तपस्वी..., बलिदानी...नेता...।'' स्वतंत्राता संग्राम सेनानी पं. नरहरिप्रसाद शर्मा बोले थे।
''हमने माना कि मंच पर जिन महान नेताओं की तस्वीरें रखी हैं वे बलिदानी हैं..., तपस्वी हैं... लेकिन अब महाराज भी कांग्रेस में आकर इन्हीं नेताओं की परंपरा में चल रहे हैं और हमारे क्षेत्रा के सबसे बड़े नेता होने के साथ इलाके के विकास में लगे हैं..., वे विकास के मसीहा हैं। पूरे मध्य प्रदेश में अकेले कांग्रेस के सांसद हैं, इसलिए उनके सम्मान का खयाल रखते हुए उनकी तस्वीर दिग्गजों के साथ रखनी ही चाहिए। अन्यथा हम कांग्रेस दिवस मनाने नहीं देंगे...।'' विद्याधर ने चुनौती दे डाली।
''अबे कल के छोरे हमें अल्टीमेटम दे रहा है जिन्होंने कांग्रेस अपने खून पसीने से सींची...। सालों जेल में कैद रहे। अंग्रेजों के कोढ़े खाए... शर्म आनी चाहिए तुझे...!'' इस बार तैश में आकर स्वतंत्राता संग्राम सेनानी संगठन के अध्यक्ष पं. रामसिंह वशिष्ठ बोले थे।
''तो लो मना लो कांग्रेस दिवस...।'' और विद्याधर ने आगे बढ़कर वह चादर खींच दी जिस पर महात्मा गाँधी, पं. नेहरू और सुभाषचंद्र बोस की तस्वीरें ईंटों से टिकाकर रखी गईं थी। पलभर में ही सब कुछ छितराकर विद्याधर महाराज के जयकारे लगाते हुए अपनी टीम के साथ कांग्रेस भवन से वापिस हो लिए।
और पिफर तत्काल विद्याधर ने दूरभाष केंद्र पहुँचकर अपनी इस हरकत को उपलब्धि मानते हुए महाराज से अर्जेंट कॉल बुक कर दिल्ली बात की। महाराज की बाँछें खिल गईं वे बोले, ''तुमने ठीक किया विद्याधर, मुझे तुम जैसे ही फॉलोवर चाहिए।''
देखते-देखते ढाई-पौने तीन साल में गठबंधन से केंद्र में अस्तित्व में आई जनता दल सरकार गिर गई। और पिफर लोकसभा के हुए उपचुनाव में कांग्रेस बहुमत में आ गई। महाराज भी अच्छे मतों से जीते। इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्राी बनते ही प्रांतों की गैर कांग्रेसी सरकारों को भंग कर दिया।
पिफर क्या था युवाओं के लिए राजनीति में वर्चस्व हासिल कर लेने के रास्ते खुल गए। इस क्षेत्रा के सारे टिकट बाँटे जाने की जिम्मेदारी हाईकमान ने महाराज को सौंप दी। विद्याधर को जब यह खबर लगी तो उनके अंतःकरण को न जाने कहाँ अंतः प्रेरणा मिली कि वे अपने पाँच-सात भरोसे मंद नुमाईंदों के साथ महाराज से टिकट मांगने राजधानी जा पहुँचे। अब महाराज भी ऐसे निष्ठावान अनुयायी को टिकट देने से कैसे चूकते जिसने अपनी जान की बाजी लगाकर उनकी जान बचाई थी और कांग्रेस दिवस के दिन महाराज को सम्मान दिलाने के लिए मूल कांग्रेसियों से भिड़ गया था। अंततः विद्याधर का महाविद्यालयीन रिकॉर्ड देखकर महाराज हाईकमान से विद्याधर को टिकट दिलाने में सफल हो गए। और पिफर जब चुनाव परिणाम द्घोषित हुए तो विद्याधर तो जीते ही प्रदेश में उन्हीं की पार्टी की सरकार बनी।
और जब विद्याधर विधायक बनने के बाद पहली बार अपनी टीम के साथ अपने गाँव पहुँचे तो उनके पिता ने विद्याधर की ग्रामीणों के साथ आवभगत करते हुए कहा,
लीक-लीक गाड़ी चले, लीकय चले कपूत। ये तीनों छाड़ि चले, शायर, सिंह, सपूत।
और पिफर मूल्य, सदाचरण व नैतिकता को ठेंगा दिखाकर निरंतर सोपान चढ़ रहे विद्याधर ने पिफर कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। |