मंत्रा' नाम से प्रेमचंद की दो कहानियाँ हैं। एक 'मंत्रा' विवेच्य है। दूसरी 'मंत्रा' ;विशाल भारत, मार्च-१९२८द्ध में डॉ. चड्ढ़ा के इकलौते बेटे कैलाश को सर्पदंश होता है। वह बेहोश पड़ा है। उसके जीवन की आस बुझ गई है। एक बूढ़ा भगत अपनी मंत्रा माया से उसमें प्राण डाल देता है। यह ऐसा जादुई करिश्मा है, बाजीगर पीछे हट जाएँ।
समीक्ष्य कहानी 'मंत्रा' माधुरी फरवरी, १९२६ में प्रकाशित हुई थी। कहानी- अछूतों को हिन्दू धर्म से जोड़े रखने की वकालत है।
उन दिनों छुआछूत और जातपांत के नगाड़े बज रहे थे। हिन्दू लोग अछूतों के साथ पशुवत व्यवहार करते थे। अछूत इस अपमान और उत्पीड़न से बुरी तरह आहत और आतंकित थे। अपने सम्मान की रक्षा के लिए अछूतों के गाँव के गाँव मुसलमान अथवा ईसाई बन रहे थे।
अछूतों के बहुसंख्या में धर्म से अलग हो जाने पर सवर्णों को चिंता हुई। उनके पेट का पानी हिला। हिन्दू अल्पमत हो जाएँगे। अछूतों को धर्म बदलने से रोकना होगा।
हरिद्वार में सन् १९१५ में हिन्दू महासभा का स्थापना हुई थी। महासभा के गठन के रूप में यह पहला अवसर था, जब अछूतों को हिन्दू बनाये रखने की मुहिम का सूत्रापात हुआ।
हिन्दू और हिन्दू संस्कारों के कारण प्रेमचंद की हिन्दूमहासभा में आस्था बन गई थी। 'मंत्रा' कहानी में उनकी आस्था फूट कर बाहर आई है।
अछूतों और आदिवासियों को हिन्दू बनाये रखने के महासभा के मूल एजेण्डा पर प्रेमचंद ने कई कहानियाँ लिखीं। उनमें 'मंत्रा' और 'सौभाग्य का कोड़ा' प्रमुख हैं। महासभा का कार्य अभी प्रारंभिक दौर में था। प्रेमचन्द अपने विचारों और कहानियों के माध्यम से बख्तरबंद सिपाही की भांति महासभा के मंसूबे को फलीभूत करने के लिए मुस्तैद थे।
'मंत्रा' के कथानायक लीलाधर चौबे मार्त्तण्ड हैं। वे हिन्दू महासभा के एक जागरूक नुमाइंदे के रूप में उपस्थित होते हैं। कुछ कथा समीक्षक चौबे जी को गाँधी जी का मिथक मानते हैं। दरअसल गाँधी जी इतने कट्टरवादी हिन्दू नहीं थे, जितने प्रेमचंद थे। चौबे में प्रेमचंद का चरित्रा उज्ज्वल है।
'मंत्रा' के अनुसार-''खबर आई कि मद्रास प्रांत में तबलीग वालों ने तूफान मचा रखा है। हिन्दुओं के गाँव के गाँव मुसलमान होते जाते हैं। मुल्लाओं ने बड़े जोश से तबलीग का काम शुरू किया है। अगर हिन्दुओं ने इस प्रवाह को रोकने का आयोजना नहीं किया तो सारा प्रांत हिन्दुओं से शून्य हो जाएगा। किसी शिखाधारी की सूरत तक न८ार नहीं आएगी।''
मंत्रा कहती है-''हिन्दू महासभा में खलबली मच गई। तुरंत एक विशेष अधिवेशन हुआ और नेताओं के सामने समस्या उत्पन्न हो गई। बहुत सोच-विचार के बाद निश्चय हुआ कि चौबे जी पर इस कार्य का भार रखा जाए। चौबे जी हिन्दू जाति की सेवा के लिए अपने को अर्पण कर चुके थे। हिन्दूसभा ने उन्हें बड़ी धूम से विदाई का भोज दिया।''
कहानी में प्रेमचंद आगे लिखते हैं-''हर एक स्टेशन पर सेवकों का बड़ा सम्मानपूर्ण स्वागत हुआ। कई जगह थैलियाँ मिलीं। रतलाम की रियासत ने एक शामयाना भेंट किया। बड़ौदा ने एक मोटर दी कि सेवकों को पैदल चलने का कष्ट न उठाना पड़े। मद्रास पहुँचते-पहुँचते सेवा दल के पास एक माकूल रकम के अतिरिक्त जरूरत की कितनी चीजें जमा हो गईं।''
पंडित लीलाधर चौबे अपने लाव-लश्कर, लारी और सेवकों के साथ जब तक मद्रास पहुँचें, हम 'मंत्रा' के कथानक की पृष्ठभूमि की ओर कूच करते हैं।
गाँधी जी का राजनीति में जो स्थान है, वही स्थान प्रेमचंद का साहित्य में रहा है। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्रा में महारथ पाई। दोनों की महानता के पार्श्व में मुख्य रूप से दलित रहे हैं। गाँधी जी अछूतो(ार आंदोलन को लेकर महात्मा हुए। प्रेमचंद दलितों पर लिख कर पुरोधा बने। महात्म्य और पुरोधाई दोनों का ध्येय दलितों का हिन्दू बनाए रखना था। गाँधी जी यह कार्य वाक्चातुर्य से कर रहे थे, तो प्रेमचंद कलम की सफाई से।
उन दिनों डॉ. अम्बेडकर विदेशों से विद्याध्ययन कर स्वदेश लौट आये थे। उनके सामने अब दो राहें थीं। अपनी उच्च शिक्षा और तीक्ष्ण मेधा के बूते अंग्रेज सरकार में ऊँचा पद पा लेना। दूसरी राह थी, सदियों से नारकीय जीवन जी रहे शूद्र वर्ण को दासत्व से मुक्ति दिलाना। एक गहन आत्ममंथन के बाद चुनौती भरी दूसरी राह पर उनके कदम बढ़ गये थे।
अस्पृश्यता की नोंचें बालपन से ही डॉ. अम्बेडकर के हृदय पटल पर थीं। छुआछूत के दंश से वे बुरी तरह आहत थे। इस मुकाम तक आते उन्होंने पाया कि दलितों की दयनीयता का हेतु कारण धर्मशास्त्रा और हिन्दू धर्म है। चातुर्वर्ण्यव्यवस्था अस्पृश्यता का बीज है।
इधर गाँधी जी वर्ण व्यवस्था की अमरता की कामना करते अस्पृश्यता-निवारण के लिए अपना अछूतो(ार आंदोलन चला रहे थे। डॉ. अम्बेडकर और गाँधी जी के बीच नैतिक टकराहटें थीं।
डॉ. अम्बेडकर का मंतव्य था, वर्ण व्यवस्था को समाप्त करके ही अस्पृश्यता का खात्मा किया जा सकता है।
गाँधी जी वर्ण व्यवस्था को शास्त्राोक्त मानते हुए उसके प्रति आराध्य भाव रखते थे।
डॉ. अम्बेडकर द्वारा स्वदेश लौटने के बाद से ही अछूतो(ार आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में लेने के पश्चात हिन्दू महासभा को अपना मिशन धूमिल नजर आने लगा। हिन्दू महासभा का ध्येय अछूतों को हिन्दू बनाये रख कर बहुमत तक सीमित था। हिन्दू महासभा का अछूतों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास की ओर तनिक भी ध्यान नहीं है। जबकि डॉ. अम्बेडकर इन्हीं मूलभूत कारणों को लेकर दलितो(ार के अपने आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे। धर्मपरायण प्रेमचंद भी हतप्रभ हुए। उन्होंने 'मंत्रा' और 'सौभाग्य के कोड़े' जैसी कहानियाँ और लेख लिख कर डॉ. अम्बेडकर का प्रतिकार किया।
अपने लाव-लश्कर, लारी सेवकों के साथ 'मंत्रा' के नायक पं. लीलाधर चौबे मद्रास पहुँचते हैं।
कहानी में प्रेमचंद कहते हैं-''तबलीग वालों ने जब से चौबे जी के आने की खबर सुनी थी, इस पिफकर में थे कि किस उपाय से इन सबको यहाँ से दूर करना चाहिए। चौबेजी का नाम दूर-दूर तक प्रसि( था। जानते थे, ये यहाँ जम गये तो हमारी कमाई मेहनत व्यर्थ हो जाएगी। इसके कदम यहाँ नहीं जमने पाएं। मुल्लाओं ने उपाय सोचना शुरू किया। बहुत वाद-विवाद, हुज्जत और दलील के बाद यह निश्चय हुआ कि इस कापिफर को कत्ल कर दिया जाये। ऐसा सवाब लूटने के लिए आदमियों की क्या कमी थी। उनके लिए तो जन्नत का दरवाजा खुल जाएगा। हूरें उसकी बलाएँ लेंगी। फरिश्ते उसके कदमों की खाक का सुरमा बनाएँगे। रसूल उसके सिर पर बरकत का हाथ रखेंगे। खुदा पाक करीम उसे सीने से लगाएँगे और कहेंगे तू मेरा प्यारा दोस्त है। दो हट्टे-कट्टे जवानों ने तुरंत बीड़ा उठा लिया। यह निश्चय हुआ कि कापिफर को कत्ल कर दिया जाए।''
कथाकार की कट्टरता के कारण यहाँ कहानी तत्व में साम्य भाव और बोध गम्यता का हृास हुआ है। कट्टरपन और पूर्वाग्रह प्रोत्साहित हैं। कत्ल को मजहबी जरूरत कायम करना कथा की शुचिता नहीं लेखक की मनःस्थिति है। इससे मजहबी जुनून की लपटें ऊँची हुई हैं। आधुनिक काल के कथा साहित्य के अध्याय देखें तो सांप्रदायिकता की पहली चिनगारी प्रेमचंद की 'मंत्रा'-कहानी में चटकी है। इससे पूर्व पिफरकापरस्ती का ऐसा भयावह चेहरा साहित्य में नहीं था।
एक हिन्दू कापिफर धर्म गुरु को खत्म करने वाले मुसलमान को खुदा का प्यारा बताना सृजन नहीं, सांप्रदायिकता का मंजर है। भारतेन्दु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद और सच्चिदानन्द हीरानंद वात्सयायान अज्ञेय को हिन्दूवादी माना जाता है। लेकिन प्रेमचंद ने इन सबको कई कदम पीछे छोड़ दिया है। वे यहाँ पहले सांप्रदायिक साहित्यकार का खिताब पाते हैं। यदि आज धार्मिक कट्टरता की ऐसी बात कोई करे तो उस पर रासुका ;राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनद्ध लागू होता है।
कहानी आगे बढ़ती है-''हत्यारों ने आकर दरवाजे पर दस्तक दी। पंडित जी द्घबरा गये। वे अपना सोंटा उठाने दौड़े।'' वे गरज कर बोले-''निकल जाओ यहाँ से।''
''बात मुँह से पूरी न निकली थी कि लाठियों का वार पड़ा, पंडित जी मूर्च्छित हो कर गिर पड़े। शत्राुओं ने समीप आकर देखा जीवन का कोई लक्षण नहीं था।''
...प्रातः काल बूढ़ा उधर से निकला तो सन्नाटा छाया था। न आदमी, न आदमजात। छोलदारियाँ भी गायब। जरा और समीप जाकर पंडित लीलाधर की रावटी में झांका तो कलेजा सन्न रह गया। पंडित जी जमीन पर मुर्दे की तरह पड़े हुए थे।''
किसी एक सम्प्रदाय को हत्यारा या शत्राु जैसे शब्दों से संबोधित करना लेखकीय धर्म नहीं, स्वयं के धर्म के प्रति अंधभक्ति की अति है। यह गाँधी जी की सद्भावना का भी विरोध है।
अन्तोन चेखव ने कहानी के विकास के बारे में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी-''कहानी में जो चीज दिखाई जाए, उसका उपयोग होना चाहिए। अगर बंदूक खूंटी से टंगी है, तो वह कहानी में दागी जाएगी।''
प्रेमचंद चेखव के प्रशंसक रहे हैं। लेकिन प्रेमचंद का सृजन चेखव के विपरीत व्यवहृत हैं। 'मंत्रा' कहानी में पूरा लाव लश्कर और लवाजमा, मोटर-गाड़ी, शामयाना, खाद्य पेय सब बाजीगर के कबूतर की भांति छू मंतर हो जाते हैं। और पिटने के लिए पंडित जी अकेले होते हैं। माना कथा में एक सीमा तक नाटकीयता लाई जाती है। उससे कहानी में रोचकता बढ़ती है। और पाठक मन में जिज्ञासा का संचार बराबर रहता है। परंतु यहाँ अनावश्यक ने कहानी के कथ्य और शिल्प दोनों को क्षीण किया है। ;फसल में जब चेपा ज्यादा हो जाता है, तो चेपा चेपे को खाने लगता है।द्ध कहानी की रीढ़ टूट गई है। पैर लाइलाज हैं। कहानी पड़ी रहने को विवश है। लेखक उसके गले में भाषा-शैली का सुनहरी फंदा डाल कर उसे आगे खींचने की चेष्टा करता है।
अछूतों को मुसलमान बनने से रोकने के लिए प्रेमचंद समूचे मुस्लिम वर्ग के प्रति दकियानूस होते हैं। उनकी यह कुंठा हिन्दू-मुस्लिम एकता में बाधक बनी। प्रेमचंद ने मुसलमानों के प्रति अपनी नकारात्मक सोच के चलते 'शतरंज के खिलाड़ी' जैसी कहानी लिखी। एक ओर सैकड़ों हजारों देशभक्त मुसलमान शहीद हो रहे थे। फांसी के तख्ते पर झूल गये थे, वहीं प्रेमचंद 'शतरंज के खिलाड़ी' जैसी कहानी मांड कर मुस्लिमों का राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति विमुख होना प्रदर्शित करते हैं। 'शतरंज के खिलाड़ी' कहानी मुस्लिमों को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग कर उन्हें अंग्रेजी राज का हितैषी स्थापित करती है। 'कफन' और 'सदगति-जैसी कहानियों में जातीय नफरत हैं।
दरअसल मुस्लिम समुदाय प्रेमचंद का इसलिए मुरीद है कि उन्होंने उर्दू में लिखा और उर्दू जबान को तरक्की दी। दलित उन्हें इसलिए अपना हमदर्द मानता है कि उन्होंने उनके बारे में लिखा, परंतु प्रेमचंद के जज्बात और उनके लेखन की जमीनी हकीकत की तहकीकात नहीं हुई।
हाँ, हंस के संपादक राजेन्द्र यादव प्रेमचंद के सृजन संसार की तह तक अवश्य जाते हैं-
''मैं भी उन महान और दिग्गज रचनाकारों की कालजयी रचनाओं को उतना ही श्र(ा और प्रशंसा से देखता हूँ, जितना कोई भी प्राध्यापक देखता है। मगर सवाल तो उठा ही सकता हूँ कि अगर होरी या द्घीसू-माधव अपनी कहानी खुद लिखते, तो क्या उनके रूप यहीं होते? यह भी हमें नहीं भूलना चाहिए कि अपनी सारी सदभावना, सरोकार और सहानुभूति के साथ प्रेमचंद भी उसी वर्ग के थे, जिस वर्ग के उनके पाठक या समीक्षक। एक ने लिखा, दूसरे ने सराहा और तीसरे ने उसे कालजयी सि( कर दिया।''
;''सत्ता विमर्श और दलित''/हंस, अगस्त-२००४/सत्ता की शतरंज और दलित मोहरे/पृष्ठ-७/राजेन्द्र यादवद्ध
धर्म परिवर्तन को लेकर ही मुंशी प्रेमचंद की एक और कहानी ''सौभाग्य के कोड़े'' है। कहानी का यह अंश कहा अनकहा सब कह देता है, जो हिन्दू महासभा के एजेंडे का क्रियान्वयन है।
''नथुवा के माँ-बाप दोनों मर चुके थे। अनाथों की भांति वह रायसाहब भोलानाथ के द्वार पर पड़ा रहता था। रायसाहब दयाशील पुरुष थे। कभी-कभी एक आध पैसा दे देते, खाने को भी द्घर में इतना जूठा बचता था कि ऐसे-ऐसे कई अनाथ अफर सकते थे, पहनने को भी उनके लड़कों के उतारे मिल जाते थे। इसलिए नथुवा अनाथ होने पर भी दुखी नहीं था। रायसाहब ने उसे एक ईसाई के पंजे से छुड़ाया था। इन्हें इसकी परवा न हुई कि मिशन में उसकी शिक्षा होगी, आराम से रहेगा, उन्हें यह मंजूर था कि वह हिन्दू रहे। अपने द्घर के जूठे भोजन को वह मिशन के भोजन से कहीं पवित्रा समझते थे। उनके कमरों की सफाई मिशन पाठशाला की पढ़ाई से कहीं बढ़ कर थी। हिन्दू रहे चाहे किस दिशा में रहे, ईसाई हुआ तो पिफर सदा के लिए हाथ से निकल गया...। द्घर के अन्य नौकर-चाकर उसे ''भंगी'' कहते थे।'
'मंत्रा' कहानी में प्रेमचंद धर्म का अभिषेक करते हैं-''मगर उस नई ज्योति ने मुल्लाओं का रंग फीका कर दिया। वहाँ एक ऐसे देवता का अवतार हुआ था, जो मुर्दों को जिला देता था। जो अपने भक्तों के कल्याण के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर सकता था। मुल्लाओं के यहाँ वह सि(ि कहां! वह विभूति कहाँ? वह चमत्कार कहाँ? इस ज्वलंत उपकार के सामने जन्नत और अखूबत ;भ्रातृत्वद्ध भी कोरी दलीलें कहाँ ठहर सकती थीं?''
प्रेमचंद न केवल अपने हिन्दू होने के प्रति निष्ठावान थे, बल्कि हिन्दुत्व के लिए कार्य कर रही हिन्दू महासभा के 'पी.आर ओ' की भांति जागरूक भी थे-''हिन्दू महासभा के विरोध में जो ब्राह्मण सम्मेलन काशी में किया गया था और जो अभी तक हिन्दू महासभा तथा कांग्रेस की जड़ में कुल्हाड़ी मारने में ही तत्पर हो रहा है, वह भी काशी के एक पंडित के दिमाग की उपज है। और सारे भारत के हिन्दू आँखें फाड़ कर यह देख रहे हैं कि हिन्दू महासभा द्वारा हिन्दुओं का अधिक हित हो रहा है।''
;प्रेमचंद के विचार-२ काशी का कलंक/ पृष्ठ-१४द्ध
''आपने आठ करोड़ हिन्दुओं को मुसलमान बना दिया। यह छह करोड़ अछूत भी आप ही के विद्याबाण से बेंधे हुए हैं। क्या हिन्दू धर्म को संसार से मिटा कर ही दम लेंगे?''
;प्रेमचंद के विचार-२ अछूतों को मंदिर में जाने देना पाप है। पृष्ठ-१८द्ध
'मंत्रा' कहानी में चौबे के रूप में हिन्दुत्व नया जीवन पाता है। एक बूढ़ा अछूत फरिश्ते की भांति पांडाल में आ जाता है। पूरा पांडाल सुनसान है। चंहुओर सन्नाटा पसरा हुआ है। वह पंडित लीलाधर चौबे को मरणासन्न अवस्था में पड़ा देख कर पुनः गाँव लौट जाता है। वह गाँव से अपने साथियों को लाता है और वे उसे गाँव उठा ले जाते हैं। बूढ़ा चौबे जी की जी लगाकर सेवा सुश्रूषा करता है। अच्छे खानपान और आबोहवा से चौबे जी कुछ दिनों में तंदुरूस्त हो जाते हैं।
कहानी अंत की ओर है-''पंडित जी ने शूद्रों और भीलों का आदर करना सीख लिया था। उन्हें छाती से लगाते अब पंडित जी को द्घृणा नहीं होती थी। अपने द्घर अंधेरा पाकर ही ये इस्लामी दीपक की ओर झुके थे। सनातन धर्म की विजय हो गई। गाँव-गाँव में मंदिर बनने लगे और शाम सवेरे मंदिरों में शंख और द्घंटे की ध्वनि सुनाई देने लगी।''
द्घंटे और शंख की ध्वनि की यह गूंज प्रेमचंद के मूल विचारों में भी सुनाई दी है-
''जो लोग अछूतों को हिन्दू बनाए रखते हैं। और इसी में हिन्दू जाति का अच्छा कल्याण समझते हैं। वे प्रतिज्ञापूर्वक अछूतों के लिए अलग मंदिर बनावें...। यदि विश्वनाथ जी का मंदिर अछूतों के लिए नहीं खुलेगा तो अछूत भाइयों के साथ मिलकर करोड़ों हिन्दू इसी काशी में दूसरे मंदिर का निर्माण करके उसी में विश्वनाथ का आवाहन पूजन करेंगे, क्योंकि विश्वनाथ किसी एक जाति या संप्रदाय के देवता नहीं हैं। वे तो प्राणी मात्रा के पिता और नाथ हैं।
;प्रेमचंद के विचार भाग-२/काशी का कलंक/पृष्ठ-१५/अक्टूबर-५, सन् १९३२
''काशी का कलंक'' लेख और मंत्रा कहानी एक ही जुए के दो बैल हैं। एक विचार। दो विधाएँ। मुंशी प्रेमचंद हिन्दू, हिन्दुत्व, शास्त्रा, हिन्दूधर्म और हिन्दू मिथकों के प्रति परायण थे। वे धर्म की काली कंबली ओढ़े हुए थे। उस कंबली पर धर्म निरपेक्षता, मार्क्सवाद, प्रगतिशीलता और जनवाद का रंग खिल ही नहीं सकता था।'
प्रेमचंद हिन्दू थे। उनके संस्कार हिन्दू थे। वे जन्म से मृत्यु तक अपने को हिन्दुत्व से अलग नहीं कर पाए। निःसंदेह वे बु(जिीवी थे। मेधा और विचार दोनों में कुएँ और पानी का संबंध है। विचारधारा प्रतिभा की ईमानदारी का द्योतक हुआ करती है। हमें प्रेमचंद की हिन्दूवादी विचारधारा में कोई बुराई नहीं दिखती। दुख इस बात का है कि हिन्दूवादी संद्घ/संगठन उनसे दूरी बनाए हुए हैं, इसके विपरीत मार्क्सवादी, प्रगतिशील और जनवादी उन्हें अपनाए हुए हैं।
प्रेमचंद ने 'मंत्रा' कहानी में अछूतों और आदिवासियों को उसी धर्म में बनाए रखा। मुल्लाओं को मात दिला दी। सनातन धर्म को विजयी कर दिया। अलग मंदिर बनवा दिए। शंख द्घंटे बजवा दिए। अर्ध्य की गंध उठा दी, लेकिन खेद है वे दलित और आदिवासी विरोधी अपनी दूषित मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए। कहानी का अंत सबूत है-''यह मंत्रा था, जो उन्होंने ;चौबेजीद्ध उन चाण्डालों से सीखा था। और इस बल से वे अपने धर्म की रक्षा करने में सफल हुए थे।''
'चाण्डाल' शब्द जल्लाद का पर्याय है। डॉ. अम्बेडकर के विरोध स्वरूप अंग्रेज सरकार ने चाण्डाल और जल्लाद दोनों शब्दों को द्घोर अपमानसूचक मानते हुए इन पर पाबंदी लगवा दी थी। जैसे आज हरिजन, गिरीजन, चमार और भंगी जैसे शब्द असंसदीय होने के कारण सरकारी काम काज में उनकी प्रयुक्ति निषेध है। परंतु प्रेमचंद समस्त अछूत और आदिवासी समाज के लिए 'चाण्डाल' शब्द का प्रयोग कर उन्हें कलंकित करते नहीं चूके।
'मंत्रा' का तर्पण मुद्राराक्षस की बात से-''हिन्दुत्व कहीं टूट न जाए जैसे गाँधीवादी विचारों का समर्थन करने वाले प्रेमचंद को गाँधी विरोधी कैसे कहा जा सकता है? प्रेमचंद तो गाँधीवादी विचारों के पोषक थे। आखिर प्रेमचंद को अम्बेडकर के ऐतिहासिक आंदोलन, दलितों के उत्थान के लिए चलाया गया वह संद्घर्ष क्यों नहीं दिखाई देता? यह हवाई बातें नहीं, उनके निबंधों की सीधी व्याख्या है। हमारे नेता डॉ. अम्बेडकर ने २५ दिसंबर १९२७ को मनुस्मृति जलाई थी। उसके पीछे भी कारण थे। आज की तारीख में यदि प्रेमचंद जिंदा होते तो आज का दलित उन्हें भी खदेड़-कर भगाने से परहेज नहीं करता।''
;दलित भगवान को भी जला सकता है, प्रेमचंद क्या बड़ी चीज है :-मुद्राराक्षस/अपेक्षा जनवरी-मार्च २००५/पृष्ठ-७३द्ध |