अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
मीडिया विमर्श
युवा प्रतिभा की कद्र जरूरी : हिमांशु शेखर

सवाल उठता है कि आखिर इस हालात को पैदा करने के लिए दोषी कौन है? सिपर्फ युवाओं को इसके लिए दोषी ठहरा देना, अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ देने सरीखा होगा। सबसे पहली बात तो यह कि इन युवाओं को भ्रमित करने में अहम भूमिका निजी मीडिया शिक्षण संस्थानों ने निभाई। इन संस्थानों ने छात्राों को बड़े-बड़े सपने तो दिखाए लेकिन पत्राकारिता के बारे में बुनियादी बात भी नहीं बताई। क्योंकि इनका मकसद ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना है। ये संस्थान मोटी फीस तब ही वसूल सकते हैं जब अपने यहाँ आने वाले युवाओं को बड़े-बड़े सपने दिखाएँ और पिफर उन सपनों की कीमत के तौर पर मोटी रकम वसूलें।

बड़े चैनलों के प्रमुख और बड़े अखबारों के संपादकों के मुँह से यह सुना जा सकता है कि आजकल जो नए लोग मीडिया में आ रहे हैं, वे अपेक्षा के मुताबिक नहीं हैं। उनका कहने का तात्पर्य यह होता है कि जो भी नए युवा मीडिया में आ रहे हैं, वे सक्षम नहीं है। मीडिया में शीर्ष पर बैठे हुए इन संपादकों की बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इसे एक सामान्य प्रतिक्रिया मानकर छोड़ देना ठीक नहीं है।

क्योंकि यह एक बेहद गंभीर बात है। गंभीर और अहम इसलिए भी है कि यह एक पूरी पीढ़ी की क्षमता पर सवालिया निशान लगाता है। इसलिए भी इसकी पड़ताल आवश्यक हो जाती है।
जो भी संपादक इस तरह की बात कह रहे हैं, सही मायने में उनकी बात को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है। क्योंकि वे जो कह रहे हैं उसमें सच का कुछ हिस्सा तो कम से कम है ही। इसलिए पहले इसी की चर्चा। इस चर्चा के क्रम में यह देखना बेहद जरूरी है कि आखिर वह कौन सा दौर था जब से युवा पत्राकारिता के क्षेत्रा में आने को तेजी से प्रेरित हुए। सही मायने में सामान्य युवाओं को इस क्षेत्रा के प्रति आकर्षित करने का काम खबरिया चैनलों ने किया है।

दूूरदर्शन मार्का समाचारों से जब लोगों को मुक्ति मिली और देखते ही देखते निजी खबरिया चैनलों की बाढ़ आ गई तो आम दर्शकों को एक खास तरह का अनुभव हुआ। लोगों ने समाचार का एक नया चेहरा देखा। साथ ही खबरों को लेकर आने वालों का चेहरा भी बेहद अलग और ताजा था। देखते ही देखते इन खबरिया चैनलों के कई पत्राकार हीरो बन गए और कम से कम उनकी चर्चा उन द्घरों में तो की ही जाने लगी जहाँ केबल था और जिस परिवार में खबरों को देखा जाता था।

इस तरह के परिवारों की संख्या दर्जनों या सैकड़ों में नहीं थी बल्कि इस तरह के परिवारों की संख्या हजारों में थी या उससे भी कहीं ज्यादा। इन्हीं परिवारों के युवाओं ने भी सपना देखा। इन्हें लगा कि खबर बोलने में क्या है? अगर एंकरिंग करेंगे तो सामने टेलीप्रिंटर पर लिखा हुआ आता है, उसे पढ़कर बोल देना है। इन्होंने यह भी सोचा कि अगर रिपोर्टिंग करनी हुई तो द्घटनास्थल पर जाना है और वहाँ जो चल रहा है उसे उसी तरह से बता देना है। बाजार ने भी ऐसे संभावित ग्राहक को पहचान लिया था। इस का परिणाम यह हुआ कि हर शहर में मीडिया शिक्षण संस्थान खुल गए। बड़े शहरों में तो ऐसे संस्थान गली-मोहल्ले के स्तर पर पहुँच गए।

यह वर्ग मीडिया में कैरियर बनाने की चाह लिए द्घर से निकला। इस वर्ग ने यही सोचा कि पत्राकार होने का सीधा सा मतलब है टीवी पर दिखना। इसमें से बड़ी संख्या वैसे युवाओं की रही जिन्हें देश के चोटी के पत्राकारिता शिक्षण संस्थानों में दाखिला नहीं मिला। क्योंकि वहाँ सीटें बहुत कम थीं। लेकिन ऐसे लोगों ने निजी संस्थानों में दाखिला ले लिया। वहाँ इन युवाओं से फीस के नाम पर मोटी रकम वसूली गई। इन्हें दाखिले के वक्त से ही सपना दिखाया गया कि इस संस्थान में आने का सीधा सा मतलब है कि यहाँ से निकलते ही किसी चोटी के खबरिया चैनल के स्क्रीन पर दिखेंगे।

इन दो टके के संस्थानों से बेहतर प्रशिक्षण की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती है और वैसा ही हो रहा है। इन संस्थानों से जो युवा पढ़कर निकल रहे हैं, उन्हें पत्राकारिता की बुनियादी बात भी नहीं पता है। देश और अपने समाज के बारे में बुनियादी जानकारियाँ उनके पास नहीं हैं। उन्हें भारत के इतिहास और यहां के अलग-अलग धर्मों के बारे में जानकारी नहीं है। जाहिर है कि जब ऐसे लोग मीडिया में आएँगे तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। उनसे किसी संवेदनशील मसले पर गंभीर लेख की उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती है। न ही उनसे किसी बेहद अहम मसले पर गंभीर रिपोर्टिंग की उम्मीद की जा सकती है।

अब सवाल उठता है कि आखिर इस हालात को पैदा करने के लिए दोषी कौन है? सिपर्फ युवाओं को इसके लिए दोषी ठहरा देना, अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ देने सरीखा होगा। सबसे पहली बात तो यह कि इन युवाओं को भ्रमित करने में अहम भूमिका निजी मीडिया शिक्षण संस्थानों ने निभाई। इन संस्थानों ने छात्राों को बड़े-बड़े सपने तो दिखाए लेकिन पत्राकारिता के बारे में बुनियादी बात भी नहीं बताई। क्योंकि इनका मकसद ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना है। ये संस्थान मोटी फीस तब ही वसूल सकते हैं जब अपने यहाँ आने वाले युवाओं को बड़े-बड़े सपने दिखाएँ और पिफर उन सपनों की कीमत के तौर पर मोटी रकम वसूलें।

जो लोग आज मीडिया में आ रहे युवाओं की प्रतिभा को लेकर स्यापा कर रहे हैं, वे उस दिन कहाँ थे जब मीडिया स्टार बनाने का सपना बेचा जा रहा था। किसी चैनल ने यह क्यों नहीं दिखाया कि मीडिया शिक्षण के नाम पर भी गोरखधंधा चल रहा है? यही खबरिया चैनल निजी कोचिंग संस्थान, फर्जी इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज, मैनेजमेंट कॉलेज और डेंटल कॉलेज के खिलाफ मुहिम चलाते हैं। लेकिन आखिर आज तक क्यों किसी ऐसे संस्थान के गोरखधंधे की खबर सामने नहीं आई जो मीडिया के महारथी तैयार करने का दावा करता हो?

जो संपादक आज युवाओं के प्रतिभाहीन होने की बात करते हैं उन्हें यह भी तो सोचना चाहिए कि इस दौरान मीडिया का चरित्रा किस तेजी से बदला। उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि जो भी प्रतिभाशाली युवा इस क्षेत्रा में आए उनके साथ उन्होंने कैसा बर्ताव किया? उन्हें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि जिन युवाओं की पहली प्राथमिकता पत्राकारिता है, जो पत्राकारिता को एक पेशे के तौर पर नहीं बल्कि एक जीवन की तरह लेते हैं, उनके साथ उन्होंने क्या किया? ऐसे युवाओं को क्यों नहीं पर्याप्त मौके दिए गए? वैसे ही लोग जिन्हें आज ये संपादक उलाहना दे रहे हैं, आखिर क्यों आगे बढ़ते गए? ऐसे लोगों को ही अहम पद आखिर क्यों मिल गए? आखिर क्यों बड़ी संख्या में वैसे युवा पत्राकारिता छोड़ रहे हैं जो इसे अपनी पहली प्राथमिकता मानते थे? उन्हें यह क्षेत्रा आखिर क्यों नहीं रोक पाया?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनसे टकराए बिना किसी नतीजे पर पहुँचना ठीक नहीं है। क्योंकि ऐसा करना एक पक्ष की बात सुनकर ही किसी मुकदमे पर फैसला सुना देने सरीखा होगा। इन सवालों से टकराने का साहस जो भी करेगा वह कम से कम इस नतीजे पर तो पहुँचेगा ही यह सिपर्फ युवाओं की नाकामी का मामला नहीं बल्कि मीडिया की पूरी व्यवस्था की नाकामी का मामला है। दरअसल, इस देश में मीडिया का तेजी से विकास तो हुआ लेकिन इस विकास को सही दिशा में बनाए रखने के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा यहाँ नहीं था। यह कभी नहीं सोचा गया कि जिस तेजी से मीडिया का विकास हो रहा है, उसी तेजी से इस क्षेत्रा में काम करने वाले सक्षम लोग कैसे तैयार किए जाएँ। इसका फायदा कारोबारियों और पूंजीपतियों ने मीडिया शिक्षण संस्थान खोलकर उठाया। लेकिन इसका नुकसान सिपर्फ वहाँ से पढ़कर निकलने वाले युवाओं का ही नहीं हुआ बल्कि पूरी पत्राकारिता का ही हुआ। इसलिए इस बदहाली के लिए पत्राकारिता में शीर्ष पर बैठे हुए लोग भी जिम्मेदार हैं।

दूसरी बात यह कि कितने मीडिया संस्थानों में पत्राकारों के चयन की प्रक्रिया पारदर्शी है? हालांकि, यह बहुत पुरानी बात है और इस पर बहुत चर्चा हो चुकी है लेकिन पिफर भी इस पर बातचीत बेहद जरूरी है। क्योंकि इसने भी युवाओं को पथभ्रष्ट करने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे मीडिया संस्थानों की संख्या न के बराबर है जहाँ पत्राकारों की भर्ती में पूरी तरह से पारदर्शिता बरती जाती है। ज्यादातर संस्थानों में जान-पहचान और चाचा-भतीजा वाला फार्मूला ही काम करता है। इस फार्मूले को अमली जामा वही पत्राकार पहनाते हैं जो राजनीति में परिवारवाद और जोड़तोड़ को गरियाते हुए नहीं अद्घाते। मीडिया का चरित्रा बदला तो गलत लोगों को आगे बढ़ाया और ऐसा करने वाले लोग ही युवाओं की क्षमता पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।

जब पत्राकारिता का चरित्रा, मीडिया मालिक और बाजार बदल रहे थे तो उस वक्त युवाओं की क्षमता पर सवाल उठाने वाले लोगों ने आखिर क्यों ऐसा होने दिया?
बहरहाल, इस प्रवृत्ति ने पत्राकारिता का बहुत ज्यादा नुकसान किया है। इस क्षेत्रा में आने वाले सक्षम युवाओं को ऐसा लगा कि यहाँ तो प्रतिभाशाली होने का कोई मतलब ही नहीं बनता। क्योंकि इस आधार पर तो मौका बहुत मुश्किल से मिलेगा। ऐसे युवाओं ने भी तिकड़म की राह ले ली और जाहिर है कि एक बार जब भटकाव होगा तो उसे सही रास्ते पर लाना बेहद मुश्किल होता है। इसके अलावा युवाओं का साबका भी मीडिया के बदलते हुए चेहरे से होने लगा। चैनल की मीटिंग में उन्होंने देखा कि कैसे टीआरपी के नाम पर सबकी क्लास लगाई जा रही है। युवाओं ने यह भी देखा कि जिसके कार्यक्रम की टीआरपी सबसे ज्यादा है, उसे वाहवाही मिल रही है।

चाहे वह कितना भी कूड़ा कार्यक्रम क्यों नहीं हो।
बजाहिर, इसका नकारात्मक असर पड़ा है। जो लोग पत्राकारिता को एक जीवन प(ति मानकर आए थे उनके लिए बेहद विकट स्थिति पैदा हो गई। इनके सामने दो ही रास्ते हैं। पहला रास्ता तो यह है कि पत्राकारिता के बदले हुए चरित्रा के हिसाब से अपना चरित्रा भी बदल दें। वहीं दूसरा रास्ता यह है कि किसी दूसरे क्षेत्रा में चले जाएँ। पहले रास्ते को ज्यादातर युवा अपना रहे हैं लेकिन दूसरे रास्ते पर चलने वाले भी कम नहीं हैं। इस दूसरे रास्ते पर चलने वाले लोग दूसरे क्षेत्रा में जाकर सफल भी हो रहे हैं।

 

लेखक उभरते हुए युवा टिप्पणीकार हैं
एस-२४ बी, तृतीय तल
पाण्डव नगर, नई दिल्ली, मो. ०९८९१३२३३८७

 
 
 
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