| नचिकेता |
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रोशनी का संदेश
रोशनी से मिल रहा संदेश चौखट लाँद्घने का
उठो, मत सोये रहो, यह वक्त है खुद जागने का
झर गई खिलकर
सुबह तक महमहाती रातरानी
जिसे हँसने चहचहाने की
पड़ी कीमत चुकानी |
चहक उट्ठा जागकर संसार सोये आँगने का
किवाड़ों पर थाप
देकर अभी गुजरी हैं हवाएँ
द्घोंसले में छिपी चिड़ियों ने
सिकोड़े पर फुलाए
फूल ने खिलकर भरोसा दिया तंद्रा त्यागने का
पेड़ के ऊपर
गिलहरी फिर लगी चढ़ने-उतरने
मुंडेर पर सगुनपंछी गीत में
सुर-तान भरने
आज मौसम कर रहा ठट्ठा दुआएँ मांगने का
जिन्दगी की
हलचलों में खो गयी पगडण्डियाँ हैं
बन गया भूलोक जब से अमरीका
की मण्डियाँ हैं
कर लिया संकल्प जिसने पृथ्वी को धाँगने का।
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| दोनों तटों पर |
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नदी के दोनों तटों पर
बराबर जल-धार लिखना
रात के तन पर सुबह का उजाला
हर बार लिखना
आँख में सपने, अधर पर मखमली मुस्कान लिखना
खुशबुओं के छंद में वनफूल का आख्यान लिखना
बुझे चूल्हों के बदन पर दहकता
अंगार लिखना
दरख्तों की पत्तियों पर हरेपन की ग़८ाल लिखना
चहचहाता गाँव लिखना, लहलहाती फसल लिखना
वनपखेरू के नयन में प्राकृतिक
अभिसार लिखना
क्षीरमुख शिशु-होंठ पर ही स्तनित स्पर्श लिखना
चुहचुहाए पसीने से ही सृजन का उत्कर्ष लिखना
जेठ की तपती धरा पर सावनी
बौछार लिखना
मत लिखो गुजरात बर्बर, अयोध्या भी नहीं लिखना
लिखो जश्ने-गोधरा मत, बामियाँ भी नहीं लिखना
नहीं चीखों-आँसुओं से किसी के
त्योहार लिखना।
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| शंकाएँ |
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फिर सवालों ने
उठाईं कई शंकाएँ
क्यों हरी पत्तियाँ
टूटीं डाल से, सोचो
उड़ गई बतखें अचानक
ताल से, सोचो
क्यों रहा है
समय अपनी लाँद्घ सीमाएँ
फूट आँखें गई
क्यों उजली शुआओं की
और बदली चाल है अंधड़
हवाओं की
क्यों न उत्तर खोज पातीं
सही चर्चाएँ
लग रही हर
रोशनी बेहाल जैसी क्यों
आदमी की शक्ल है कुछ
लाल जैसी क्यों
दे रहीं संकेत किसका
जली उल्काएँ। |
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| कमरे का धुआँ |
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सोचिए
किस दौर में शामिल हुए
खिड़कियाँ खोलीं कि
आएगी हवा
छंटेगा इस बंद
कमरे का धुआँ
क्या खुलेपन से
मगर हासिल हुए
पच्छिमी गोलार्ध से
आकर सुबह
खोल देगी
हर अंधेरे की गिरह
-मान यह
संद्घर्ष से गापिफल हुए
क्या न खुशबू
बाँटने के नाम पर
है हरापन चूसने का
यह हुनर
जो बने रहबर
वही कातिल हुए।
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