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वे मेरा क्या बिगाड़ लेंगे...? पिफर निशा के कानों में दादी की आवाज गूंजने लगी 'वह-साँड है न जनार्दन... उसने तो अपने भुला ;छोटा भाईद्ध की बहू को गोठ ;पशुओं के रहने का स्थानद्ध में दबोच लिया...! भींगड़ी उठा रही धीरेन्द्र की ब्वारी... लटका दिया बकरियों के नीचे...! तूने कभी... अलेखा ;जाँचद्ध ब्वारी! जमुना बी तो ताऊ पर गई अपने... एकदम! जब रामस्वरूप लाम से वापस आया तो गाँव स्तब्ध... था कि जाने क्या होगा अब...? लेकिन बात दब गयी भीतर ही भीतर!... |
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निशा चुप है... कुछ बोलती ही नहीं। पता नहीं क्या हो गया है उसे! कुछ पूछो तो सिर हिलाकर 'हाँ' 'ना' में उत्तर देती है। बस...। हँसती मुस्कराती भी नहीं! उछलना कूदना तो उसका बहुत पहले ही छूट चुका था। जब दादा जी की नजर खो खो खेलती निशा पर पड़ चुकी थी। चिड़िया सी चहकती निशा अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ नीमा के खलिहान में खेल रही थी। खिल खिल हँसने की आवाज दादा जी के कानों में पड़ी। हुक्का पी रहे थे। एकदम उठे! लड़कियाँ पलभर स्तब्ध रह गईं। उन्हें समझ नहीं आया कि निशा के दादा जी को हुआ क्या है...? मई-जून की धुर दोपहरी का एक-डेढ़ द्घंटे का समय इन लड़कियों का अपना होता था। उस समय उनकी माँयें सुदूर जंगल से पहाड़ जैसे द्घास और लकड़ी के बोझ ढोकर थकी हुई नींद के साम्राज्य में विचरण करती थीं। लड़कियाँ पिंजरे से छूटी हुई चिड़ियों की तरह नीमा के आँगन में फुदकती रहतीं...। कभी छुपमछुपाई खेलतीं कभी पिट्ठू तो कभी बोल मेरी मछली कितना पानी...। लड़कियों के किलकने की आवाज निशा सुनती तो वह भी दादाजी की नजर बचाकर चली आती...। दादा जी नहीं चाहते कि उनकी पोती छेला-पातर ;आवाराद्ध लड़कियों की तरह गाँव भर में फुदकती पिफरे...। दादा जी की दृष्टि में यह सब अशोभनीय था..।
जबकि निशा बड़ी हो रही थी...। जैसे जैसे उसकी छाती का उभार बढ़ने लगा..., दादा जी की नजर में वह बड़ी हो गई थी। निशा को यह भी ठीक से याद नहीं कि वह दादा जी की नजर में कब बच्ची थी। जब वह नौ वर्ष की भी नहीं हुई थी, तब भी दादा जी ने उसे बुआ के गाँव के हौज में तैरते हुए देखकर बहुत डांटा था। तब तो उसकी छाती पर किंचित मात्रा उभार भी नहीं था...। उस समय दादा जी की नाराजगी का कारण उसकी बुआ का हमउम्र बेटा था...। दादा जी के वे कटु वचन निशा को कांटे की तरह चुभते रहे...। 'बेशर्म' छोकरी... भाई के सामने नंगी तैर रही है...! लज्जा नहीं आती तुझे...!' दादा जी ने साँप की फुंफकार छोड़ते हुए उसका हाथ तालाब से खींचा था...! जबकि वह बुआ के बेटे का निकर पहने हुए थी। तेरहवां वर्ष लगते ही वह दादी और माँ की आँख में भी साँप की तरह लोटने लगी। माँ, बेबात उसे डाँटती रहती! जरा सी चुन्नी वक्ष से हटी नहीं कि निशा की खैर नहीं...! इतनी बड़ी ढाट ;धींगड़ीद्ध हो गयी...! बदन भी छुपाना नहीं आता...! ससुराल में इसी तरह रहेगी... तो आग लगा देगा-मालिक... मिट्टी का तेल डालकर और कहेगा स्टोव फट गया था...!
निशा के हृदय पर माँ के शब्द बाण शूल की तरह चुभने लगे-यह माँ है या कसाई! तुरंत जवाब दे मारा 'उसके बाप का राज है क्या...? जो आग लगा देगा!' माँ पर बेटी ने थप्पड़ मारा हो जैसे...! वह दाँत पीसने लगी 'पहले तो तुझे ले जाने को कोई राजी ही नहीं होगा... और हो भी गया तो रास्ते में ही दाब देगा पत्थर से!' माँ की दाढ़ मरमराने लगी... वह माँ को पिफर जवाब... देती, दादी गरजने लगी-कैंची की तरह जुबान... चलाती है तेरी बेटी! मेरी माधुरी ने तो मेरे सामने मुँह भी नहीं खोला कभी! दराँती पैनी करते दादी के हाथ काँपने लगे 'मन होता है इसे थमाली ;दराँतीद्ध से बकरी की तरह रड़का दूँ...!' निशा ने दादी को देखा अब... यदि एक शब्द भी फूटा मुँह से तो वह सचमुच काट देगी उसका गला...! निशा के शरीर में झुरझरी उठी।
वह जुगाली करती हुई भैंस की कटरी को देखने लगी। जिसे कुछ दिनों पहले दादा जी ने दूसरे गाँव से भैंसा लाकर गर्भधारण कराया था। दादी उसकी तुलना अक्सर भैंस से करती 'तुझसे तो अच्छी यह भैंस ही है... जो दूध की उम्मीद तो बंधाती है... तू तो काम की न काज की ढाई सेर अनाज की!' ही ही ही हँसने लगती दादी...
'ए निशा! ले पकड़ अपनी थमाली' दादी की आवाज पर उसने गर्दन मोड़ी। पिफर सिर झटक कर खूंटा देखने लगी-इस पर पिछले साल इसकी माँ बंधी रहती थी, पता नहीं... एक बार उसके मन में क्या आया...? उखाड़ दिया खूंटा...!... और बमकते-बमकते ;उछलते-उछलतेद्ध चल पड़ी...! फंस गई कमबख्त तंग रास्ते पर...! मर जाती यदि लोगों ने उसे सावधानी पूर्वक निकाल न लिया होता...! दादी कहती-औरत की बु(ि भी भैंस की तरह ही होती है...! दादी ने दोनों दराँती माँ को पकड़ाई 'इसे भी ले जा जंगल... कल ससुराल जाएगी तो तुझे ही नाम धरेंगे लोग!' एकाएक दादी के माथे की सिलवटें बढ़ने लगीं, इतनी बड़ी हो गयी! काम कुछ भी नहीं आता! कल धारे ;पनद्घटद्ध पर बीरू की ब्वारी ;बहूद्ध बोल रही थी कि निशा के कुर्ते पर दाग था सच कहूँ ब्वारी... उसने मुझे नीचा दिखाने के लिए सबके सामने कहा...! बदला निकाला उसने... मैंने उसे खेत में द्घास काटते पकड़ लिया था न...! चोरनी को पकडूँ की नी अब!' दादी की मिचमिचाती आँखों में पानी झिलमिलाने लगा...! बूढ़ी सास का रोना माँ से देखा न गया, द्रवित होकर बोली 'तुमने तो अपनी निबटा ही दी... भाग तो मेरे फूटे हैं...! माँ आले में रस्सी खोजने लगी 'इसके लिए खाने को कुछ बाँध दो जी।... भूखी रहेगी तो तुम्हें ही पछतावा होगा पिफर...' दादी ने कुलथ भरी रोटियों में द्घी की डली रखी, साफे पर लपेट कर निशा को थमाई 'जा ए छोकरी! अपने दादा को बुला ला...।'
तीनों जन पहाड़ की उतराई उतरने लगे, जंगल भी कट कट कर रीते होने लगे हैं। अच्छी लकड़ियाँ भी तो नीचे हैं... एकदम अलकनन्दा के किनारे! बीच में इतना लंबा ऊबड़ खाबड़ रास्ता! रास्ते में एक मकान पड़ता है, गाँव से हटकर बनाए गये इस द्घर के आँगन से होकर जाता है रास्ता। कुशल मंगल पूछी जाती है। आते समय बोझा उतार कर थकान उतारते हैं-राहगीर। द्घर के लोग शीतल जल से उनका स्वागत करते हैं, चाय किसी खास को ही पूछी जाती। दादा जी आगे चल रहे थे...। सत्तू की बहू ने दादा जी के पाँव छुए... और निशा को देखकर चिहंकू उठी 'हो!... तो तुमारी नातिण बी जा रही है जंगल!'
दादा जी के हाथ में कुल्हाड़ी होती तो उनकी नजर सीधे जंगल पर होती, उन्होंने उल्लासित स्वर में चलते-चलते गर्दन मोड़ी 'इसे ...बी तो आना चाहिए द्घास लकड़ी काटना...!' तभी सत्तू की बूढ़ी माँ धुएँ से भरी आँखें मिचमिचाती अपनी मोटी धोती का कमरपट पटका बाँधती सीढ़ियाँ उतरी! उसने अन्तिम सीढ़ी पर पाँव जमाकर निशा को द्घूरा 'कितने वर्ष की हुई है ये...?'
'तेरहवें में लगी है...' माँ ने सत्तू की माँ के पाँव छुए वह उसकी कुशल मंगल पूछती इससे पहले सत्तू की माँ ने अपना झुर्रियों भरा हाथ माथे पर दे मारा 'कनू कपाल फुटी।' ;कैसे किस्मत फूटीद्ध उसकी मिचमिचाती आँखे निशा के वक्ष पर पिफसलने लगीं...' लगती तो उन्नीस से कम की नी! हे राम! इतनी जल्दी... कैसे खिली... यह छोरी...!'
सत्तू की बहू निशा को आँखों में तोलने लगी 'हाँ दीदी! अब इसके हाथ पीले कर दो... देख लो कोई गबरू... इसके लिए... ही ही ही'
निशा को उसकी हँसी ने डंक मारा! देखती कैसे है कम्बख्त! जैसे आँखों में पुतलियों की जगह दो पलड़े रखें हों तराजू के एक पलड़े में निशा का यौवन और दूसरे पलड़े में यौवन मापक बाट ;गबरूद्ध
तभी सत्तू की बहू को अचानक कुछ याद आ गया। वह ऊपर के दाँत से निचला होंठ दबाने लगी ...'इसको तो बल वो भी हो गया।'
माँ को काटो तो खून नहीं वाली स्थिति हो गई...! पर बात संभाल ली 'यह कोई अपने वश का है क्या भुली ;बहनद्ध...?' माँ ने एक जलती नजर निशा पर फेंकी...! निशा को लगा धरती फटती तो वह उसमें जरूर समा जाती... लेकिन धरती तो सिपर्फ सीता के लिए ही फटी थी! अपने को उद्घड़ते देखकर उसका चेहरा रूंआसा हो गया! सत्तू की बहू ने उसकी आँखों में डब-डब पानी भरते देखा और विजयी मुस्कान उसके काले सूखे होंठों पर फैल गई 'मुझे तो दीदी पन्द्रहवें वर्ष में हुआ था...! जब शादी को दो वर्ष बीत चुके थे!'
सत्तू की माँ भी मुल-मुल हँसने लगी 'डरा देना इसे... स्कूल बी तो पढ़ती है अबी...! अर गाँव के छोकड़े हैं बिगड़ैल साँड से...!' अब निशा को एक पल भी रुकना असह्य लगने लगा। उसके मन में आया कि कह दे 'तुम्हारा किसी बिगड़ैल साँड से वास्ता नहीं पड़ा? तुम क्या हिंजडी हो? तुम्हें महीना नहीं हुआ?'
किंतु निशा कैसे कहे यह सब...! जो गले में अटका है फांस की तरह... कहेगी तो माँ उसे चीड़ की लकड़ी की तरह चीर... न देगी! वह तो हर वक्त द्घुड़कती ही रहती है 'ऐ! निशा... द्घाडू-माडू ;सीधी सादीद्ध बन...! भली लड़कियाँ ऊँचा नहीं बोलतीं... अपने से बड़े लोग कुछ भी कहें... उन्हें जवाब नी देना... इससे लड़की की ही बदनामी होती है...!' उसने मोड़ से पीछे मुड़कर देखा। माँ दिखाई नहीं दी!... तो क्या माँ... मेरी सीवन उधेड़ रही है। उसके कानों में बुढ़िया की आवाज गूंजने लगी... समझा देना इसे। बिगड़ैल साँड से छोकरे...!
वे मेरा क्या बिगाड़ लेंगे...? पिफर निशा के कानों में दादी की आवाज गूंजने लगी 'वह-साँड है न जनार्दन... उसने तो अपने भुला ;छोटा भाईद्ध की बहू को गोठ ;पशुओं के रहने का स्थानद्ध में दबोच लिया...! भींगड़ी उठा रही धीरेन्द्र की ब्वारी... लटका दिया बकरियों के नीचे...! तूने कभी... अलेखा ;जाँचद्ध ब्वारी! जमुना बी तो ताऊ पर गई अपने... एकदम! जब रामस्वरूप लाम से वापस आया तो गाँव स्तब्ध... था कि जाने क्या होगा अब...? लेकिन बात दब गयी भीतर ही भीतर!... और रामस्वरूप... तो अब भी... नाराज रहता है उससे...! मूर्ख क्या नी जानता औरत जात कर क्या सकती है?
तभी माँ फुफकारी थी 'क्या... नी कर सकती... औरत? काट खेती दाँतों से... चीर देती माँस... हल्ला मचाती' ...पर ब्वारी... बदनामी तो उसी की होती न... मर्द तो उगल कर बच जाता साफ...!
'थूड... ड... निशा ने जर्नादन ताऊ के मुँह पर थूका जैसे' मुझे... ऐसा... कोई 'साँड' मिले तो...? मुकाबला करूँगी... अन्त तक...! पर यदि पंकज कहे कि आओ निशा इन क्षणों की जी लें।... तो वह...! उसने हथेली से लाज के मारे चेहरा ढाप लिया 'पंकज साँड तो नहीं वह शरीफ लड़का है... अपनी कक्षा का सबसे मेधावी छात्रा! उसकी पानीदार स्वप्नीली आँखों में निशा के लिए प्यार और आदर छलकता है...! किंतु उन आँखों की कोई मांग भी है...! उसका गणित उसे उलझा देता है! कभी समझ लेती है वह उन आँखों की भाषा ए! तुम इतनी अनजान तो नहीं...! पिफर...?' सिपर्फ एक बार... कह कर तो देखो... भाग चलें जहाँ कहोगे... काले पानी तक...!'
'ए निशा! तुम... ऐसी क्यों हो...?
कैसी...?
सूरज की किरणों के साथ आँगन में फुदकती गौरया सी...। और तुम... एकदम कृष्ण की तरह... वही साँवला चेहरा बड़ी बड़ी बोलती आँखें... बस ये जो मस्के फूटी हैं न... धत्त... मुझे लाज आती है...।
ए! पंकज... कभी एकांत में मिलो न... द्घिरे रहते हो दोस्तों से हर वक्त...! उस दिन तुम्हारे गाँव के पीली आँख वाले लड़के ने मुझे चूड़ीदार पहने देखकर 'तुर्री' कहा था...! तुमने क्या झन्नाटेदार थप्पड़ जमाया था उसे...! वाह तुम तो बहादुर भी हो! ए! कभी इस जंगल में मिलो न...
'चल... ऐ छोरी! देख तो दादा जी लकड़ी बी काटने लग गये! माँ ने एकाएक आकर उसका इन्द्रधनुषी ख्वाब छिन्न भिन्न कर दिया! कैसी जल्लाद! औरत है यह माँ! इसने भी देखा होगा ख्वाब...? इसके मन में भी उठी होंगी ऐसी तरंगे...? मन ही मन मुस्कराई निशा। तू ही तो चिपक गयी थी वहाँ पर जोंक सी...! हुँ हुँ!
माँ ने निशा का प्रतिकार करना उचित नहीं समझा और तेज तेज कदमों से निशा के आगे निकल गई। निशा धीरे धीरे चलने लगी, जंगल का संगीत उसे अपनी ओर खींचने लगा! पेड़ों पर चहचहाते पंछी देखकर उसका मन खिल उठा। द्घाटी में अलकनन्दा का शोर था...! वह सब को बहने के लिए आमंत्रिात कर रही हो जैसे... एक लय से सभी मानो उसी में बह रहे थे, जल जीवन जंगल सब...! अभिभूत करने वाला दृश्य था वहाँ! अलकनन्दा के ऊपर सर्पीली सड़क पर बसें रेंग रही थीं! यहीं से जाऊँगी मैं...। पिता जी ने कहा था, अगले साल निशा मेरे साथ जाएगी, मैं निशा को ऊँची तालीम दिलाऊँगा... पर माँ कहती है वहाँ लड़कियाँ बिगड़ जाती हैं...! कहीं मैं भी बिगड़ गयी तो...? और दादी! कमाल की औरत है यह भैंस के साथ तोलती है मुझे! कहती है काम की न काज की...! पंकज से पूछूँ 'मैं तेरे किस काम की हूँ पंकज...? मौका मिलते ही चिपका देता है आँखें मुझ पर...'
'ऐ निशा ले बाँध अपना गट्ठर!' माँ ने उसका ख्वाब तोड़ा, पिफर खीझ उठी वह गट्ठर बाँध कर देगी तो ले जाऊँगी।
आते समय निशा मकान के पिछवाड़े नुकीले पत्थरों वाले संकरे रास्ते से आई! उसका पाँव पत्थर से छिल गया...! लहू की बूंदें पत्थरों पर टपकने लगीं, उसका सिर झनझनाने लगा! पहली बार जंगल से इतना बोझ ला रही थी।
'निशा!' माँ हांफते उस तक पहुँची 'बुरा बी मान जाती है कुजात! तेरे भले के लिए ही तो कहा उन्होंने... लड़की जात को जितना सचेत करो उतना ही कम...' निशा ने माँ को कोई उत्तर नहीं दिया। अपने पाँव से गिरती लहू की बूंदों को देखती रही...
जब वह पहली मर्तबा आँतुमती हुई थी, उसे अपनी देह पर क्रोध आया था, विश्वास ही नहीं हुआ...! वह मारे शर्म के ओवरी में ही छुपी रही...! अंधेरा द्घिरने पर जब उसकी खोज हुयी तो उसने कपड़े उतार कर पुराने गुदड़ों में छुपा दिये...! कुछ दिन बाद माँ ने सफाई की तो निशा को खूब डांटा 'शरीर से तो औरत हो गई कुजात। और कर्म अभी भी बच्चों जैसे...! धारे पर धो नहीं सकती थी इन्हें...?' धारे पर लोग देख लेते तो...? सकुचाते हुए निशा बोली।
'तो द्घर ही धो लेती... दो बाल्टी पानी लाकर? छि छि कितनी गन्दी है तू...।' माँ ने बाहर थूका पिच्च...
निशा को लगा माँ ने उसके मुख पर थूका है, उसने कहना चाहा कि द्घर में दादा जी की आँख उसका पीछा करती...! धारे पर औरतों का झुण्ड उसे कोच कोच कर खाने लगता! इसी डर से उसने कपड़े यहाँ छिपा दिये... कि दादा जी जब बाहर गये हों तब धोऊँगी' उसकी छाती से बगूला सा उठा... 'पर तू तो माँ है...! तुझे तो इस रहस्य के बारे में समझाना चाहिए था मुझे...!' किंतु तू तो उल्टा आँख ही दिखा रही है।
काश! कुदरत का यह करिश्मा मुझमें न फूटता। इससे तो अच्छा था कि भगवान मुझे हिजड़ी बनाता, महीना होने का लिजलिजा यह डर भी न होता और... न ही सांडों से खराब होने की आशंका...!
उन तीन दिनों वह बीमारी का बहाना बनाकर द्घर पर ही रही थी...! चौथे दिन नहा धोकर स्कूल गयी, मन पहले की अपेक्षा तरोताजा था...! पिफर दिन में एकाएक दर्द उठने लगा! कृषि पीरियड में वह बीज बो रही थी कि उसे टाँगों पर चिपचिपा सा लगा, देह में हल्का बुखार भी था, अब तो पकड़ी गयी रंगे हाथों! हे भगवान किसी की नजर मुझ पर न पड़े...! लड़कियों से बताने में भी उसे लज्जा आई। कहेंगी-निशा तू तो सभी से छोटी है-दो तीन साल... तुझे ही...! उसने कातर नजरों से मास्टर की ओर देखा 'मास्टर जी! छुट्टी दे दीजिए मुझे... बुखार आने लगा है...'
मास्टर जी ने एक पल सोचा 'जाओ निशा... द्घर जाकर आराम करो...' निशा को लगा मास्टर जी को पता चल चुका है... वरना वह छुट्टी जल्दी नहीं देते! पिफर उसे वही लिजलिजा अहसास हुआ मानो कुछ गलत हो गया उससे...! लेकिन मास्टर जी उसके मुड़ने से पहले ही छात्राों में व्यस्त हो गये थे। उसने चैन की साँस ली, ईश्वर का धन्यवाद किया और खुश होकर द्घर आने लगी... तभी रास्ते में बीरू की औरत मिल गयी वह मायके से आ रही थी और उसने उसके कुर्ते पर दाग देखकर दादी को बता दिया, तब से दादी ने मुहावरा बना दिया बदन संभाला नी जाता इससे! और दूसरा काम की न काम की... ढाई सेर अनाज की। उसने गट्ठर धड़ाम से खलिहान में डाला जैसे अपनी छाती से गुस्से और अपमान से भरा गोला डाल रही हो बम की तरह कि फूट जाए वह द्घर आँगन जहाँ एक लड़की को इतनी जिल्लत सहनी पड़ती हो। उसके पाँव से अभी भी खून रिस रहा था। जैसे ही मिट्टी के फर्श पर उसने पाँव रखे छोटे-छोटे निशान बन गये! माँ आई तो उसे संदेह हुआ। किंतु आज निशा लकड़ी का गट्ठर लाई थी इसलिए थोड़ा नरम हो गयी 'निशू बेटी! वह दाग कपड़े से साफ कर दे...' तभी निशा की कमर में असह्य दर्द होने लगा, बुखार से उसका बदन काँपने लगा दादा जी आएं... इससे पहले उसे कमरे में सुला दिया माँ ने...! दूसरे दिन सोमवार था, स्कूल की छुट्टी कर दी निशा ने, दादाजी ने कह दिया बुखार है। मंगलवार को वह इंतजाम के साथ स्कूल गई, ...पर अपने कुर्ते में धब्बे देखकर अनुमति के बिना ही कक्षा से खिसक गयी...! रास्ते में धरती से फूटते जल स्रोत में उसने कुर्ता साफ किया और संतुष्ट होकर चलने लगी... गाँव के ऊपर पहुँची तो श्यामू की औरत चिल्लाने लगी 'ए निशा! मुझे जाग जा... आ मेरा हाथ खींच...! उसने रास्ते से नीचे वाले खेत में सूखे द्घास का गट्ठर रास्ते में फेंका और निशा को पकड़ाया। सांसों को नियंत्रिात करती हुयी वह सहसा चीख पड़ी 'ऐ निरभागी! निशा... तेरे कुर्ते पर दाग..!
निशा अनजान बनी रही, पिफर जैसे उसे कोई उत्तर सूझा 'अरे चाची! मिट्टी लगी होगी... पानी पिया रास्ते में...' झूठ बोलते हुए उसे किंचित ग्लानि भी हुई...! पर क्या करे जब उसके पूरे इंतजाम के बाद भी दाग दिख गया तो... इस औरत की आँखें चील की तरह हैं! कुछ नहीं छुपता... इससे! और आवाज गुड़ सी मीठी...! पर जब इसकी जेठानी गाँव भर में निशा को 'वो' हो गया है कहती पिफर रही थी तो यह कम्बख्त सो रही थी क्या? आज पिफर वही तीर...! वही अहसास-इतनी जल्दी बन गई तू औरत...! बस... अब गई तू बी...! ही ही ही कम्बख्त। हँसती है तो होंठ बंद करना ही भूल जाती है। लोग कहते हैं इसी हँसी में यह कुंआरी नेपाली मजदूर के साथ जोशीमठ भाग गयी थी। कमाल की औरत है यह...! दिन में पिटती है लठियों से खूब और रात को उसी काले मसाण पर बिच्छी सी चिपक जाती है...! माँ के शब्द कानों में द्घुल रहे हैं।
'ऐ निशा!'
'हो'
'तुझे शर्म लग रही होगी न? दादाजी को पता चला तो लाज आएगी न...?' 'ही ही ही' निशा ने कहना चाहा कि दादा जी को तो लाज नी आती! जब वह हम लड़कियों के सामने गाय भैंस का गर्भाधान कराते हैं। सांड और भैंसा लाकर...! हमारे सामने आपत्तिजनक वाक्य बोलते हैं। 'अच्छा निशा... संभल कर रहना... नाजुक अवस्था है तेरी... ही ही ही' वह मुड़ी तो निशा ने पिच्च थूका जमीन पर 'जा जा... दिन में पिट खूब। रात में भोग उस मसांण को...!' भोग शब्द उसे पिता की डायरी से मिला था बिंदा... तुम्हारे साथ दिन बिताकर... जब मैं द्घर पहुँचा तो राजेश्वरी देवी मेरी प्रतीक्षा में व्याकुल थी... रात्रिा भोग हुआ तो वह आनन्द परमानन्द था! माँ पर क्या प्रतिक्रिया होगी पातर छैला लड़की! पिता की डायरी पढ़ती है...! पाप लगेगा तुझे... या रोने लगेगी सुबुक कर... खिल खिल हँसी निशा मुझे भी तो सताती है... अच्छा हुआ!' ...पर यह पिताजी भी तो कमाल के हैं। उसकी इच्छा हुई वह पिताजी का माथा चूम ले, पिताजी उसके लिए नये-नये फैशन के कपड़े लाते हैं। तरह तरह की खुशबू वाले साबुन, तेल, लाल-पीले हरे रिब्बन खूबसूरत चप्पल! स्कूल में वह अलग पहचानी जाती है, एक छोटी सी सियासत की छोटी सी राजकुमारी जैसी! तभी तो पंकज... पिफर खिल-खिल छलकी हँसी, यह माँ! पिताजी ने विवाह कैसे किया इससे! एकशब्द मीठा नहीं बोलती! जब पिताजी आते हैं तो भी इसके हाथ में कुदाल, फावड़ा, दराँती ही होती है! इधर भाग, उधर भाग...! भागमभाग बस... हाथ पाँव भी कटे फटे, श्रृंगार के नाम पर एक बिन्दी! हूँ हूँ! दोनों को कभी हास परिहास करते नहीं देखा। ऐसे होती है आदमी औरत की जिन्दगी...! एक शाम पिताजी ने चूल्हे पर हाथ सेंकते हुए कहा था 'निशा की माँ तेरी बिटिया मेरे साथ रहेगी अब'। माँ ने कैसे मुँह बिचकाया था 'नाक कटानी है क्या...? इसके तो अभी से... पंख... निकलने लगे हैं...!'
वह द्घर पहुँची तो ऊपर से आवाज आई 'ऐ निशा! चिट्ठी बी लाई तू?'
'न... आज डाकखाने नहीं गई' उसके जवाब से औरत का चेहरा बुझ गया, पति बौडर पर यु( लड़ रहा है, कल जरूर जाना बेटी...?
'हो...' निशा ने रेडियो लगा दिया फुल स्पीड पर...! मधुर गीत हवा में गूंजने लगा 'तेरी आँखों के सिवा इस दुनिया में रखा क्या है' दादाजी प्याज के खेत में थे, अभी-अभी उन्होंने हौज ;पानी का बड़ा तालाब जिसकी दीवारें सीमेंट की होती हैंद्ध से पानी कूल में छोड़ा था..., पानी वेग से कूल में उतर कर खेत को सींचने लगा, दादाजी पानी के साथ-साथ पहाड़ी उतर रहे थे, किंतु पानी उन्हें पीछे. छोड़ कर आगे बढ़ने लगा...। मधुर संगीत कानों में पड़ा तो दादाजी को बिच्छू डंक मार गया, वह ऊपर के खेत में प्याज की गुड़ाई करती भतीजे की बहू को पुकारने लगे 'सुरेश की ब्वारी। ए सुरेश की ब्वारी। जरा देखना तो रेडियो की आवाज कहाँ से आ रही है...? सुरेश की बहू ने कुदाल छोड़ दी, चार फंलाग ऊपर की मेड़ पर पहुँची ''रेडियो और कहाँ बजेगा जी... तुम्हारी निशा है...। तो देखो!' बगल में रेडियो दबाये निशा छज्जे में चहलकदमी कर रही थी... साथ ही साथ उतनी ही जोर से गीत के साथ सहयोग कर रही थी...
दादाजी दबे पाँव पहुँचे... निशा की पीठ दादाजी की तरफ थी, दादाजी ने हवा में हाथ उछाला और निशा की पीठ पर दे मारा 'बदमाश! छोकरी... नाक कटायेगी हमारी...? इसीलिए धरा था तुझे बड़ी स्कूल...?'
पल भर में मिट्टी के फर्श पर रक्त का सैलाब बन गया, चीख सुनकर दादी आई, उसने माथा पीट लिया। ''ऐसे वक्त पर मारा लड़की को...! हे राम! हे राम!'' एकाएक भीड़ इकट्ठी हो गई!
रेडियो अब भी बज रहा था, ...और किसी को सुनाई नहीं पड़ा कि खेत से निशा की चाची चिल्ला रही थी ''ससुर जी! ओ ससुर जी, खेत में मेड़ टूट गई है ...पानी सब... नीचे बहने लगा है...!
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