अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कविताएं
निलय उपाध्याय
कुटुम्ब के आने पर द्घर

दीदी भाभी के द्घर में सो जाएँगी
भईया छत पर, बाबूजी को भी वहीं आराम होता
पर कोई तो होगा, कुटुम्ब के साथ
वे सो रहेंगे
मम्मी के बॅसखट पर

मुर्गा पकाने की तकनीक होगी
सब्जी में, कड़ाही में तैरकर फूल जाएँगी पूड़ियां
खुल जाएगा मुँह
अचार के ठस्स भरे मर्तबान का

चौका जमेगा
सजेगा पीढ़ा
सबकुछ दिखेगा सबसे अच्छा
किसी को पता नहीं चलेगा कि द्घर में
द्घर के लोगों के लिए नहीं बची जगह

एक पत्थर
खत्म कर देता है नदी का संतुलन
पत्थरों की बारिश में कहां टिकेगा द्घर
उपर से आ ही जाते हैं कुटुम्ब

किसी को नहीं पता
बाहर के कमरे में,
जहाँ उखड़ गया है दीवार का पलस्तर
बहुत करीने से चिपका है मुस्कराता हुआ तेन्दुलकर।

 
उधार
 

मैं नहीं जाऊँगा
दुकान पर, मुझे तो पहचानता भी नहीं
कमबख्त दुकानदार

जाऊँगा
जाऊँगा और कहूँगा उधार दो
दो किलो चावल.. एक किलो प्याज
पूछेगा कौन हैं आप, तो क्या कहूँगा
बिन पहचाने कैसे कोई दे देगा सामान

जाऊँगा और कहूँगा
कहूँगा कि दुकानदार महोदय
वो जो मोटी-मोटी, नाटी-नाटी
और थुल-थुल सी औरत आती हैं, वो जो
ले जाती हैं अक्सर उधार, उन्हीं का पति हूँ मैं
वो द्घर में नहीं हैं आज

नहीं, मैं नहीं जाऊँगा
उस दुकानदार के पास, जाने क्या सोचेगा
ना भी तो कह सकता है कमबख्त, कोई सबूत नहीं
मेरे पास कि मैं ही मरद हूँ उनका

औरत बेवकूफ हो,
तो ऐसा ही होता है... समान रख के जाती तो
क्या बिगड़ जाता.. अब किस मित्रा का
खटखटाऊँ दरवाजा
कहूँ-उधार दो
पत्नी द्घर में नहीं है आज

 
क्या करूँ मैं
 

पत्नी द्घर में नहीं और रुपए भी नहीं
और समान जरूरी-कहीं तो जाना ही होगा
इस द्घर के लिए आज
अरे!
यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था कि
दुकानदार चलकर आएगा मेरे द्घर, कहेगा-नमस्कार
वो जो आपकी मैडम हैं, बोल गई थीं कुछ सामान
रजिस्टर को भी देख लें, इसमें लिखा है
आपका ही नाम...।

 
भोजन की जंग में
 

कुत्तों और गि(ों के बीच छिड़ी
भोजन की जंग में
आदमी
गि(ों के साथ था

सुबह की सुनहरी धूप में
डांगर का मांस
इतना रक्तिम, इतना ताजा लग रहा था
जैसे शिकार किया हो अभी-अभी
सेना कुत्तों की थी तो कम न थी पलटन गि(ों की
थोड़ी देर तक चला सब कुछ ठीक-ठाक
पिफर शुरू हो गई
गि(ों की क्रे...क्रे...कुत्तों की भौं...भौं...

कभी गि( कुत्तों का पीछा करते
कभी कुत्ते गि(ों का

आदम ने डंडा उठाया तो
दूनी ताकत से भौंके कुत्ते,
उत्साह से भरे ...मगर यह क्या
आदमी ने कुत्तों को ही खदेड़ा और
खदेड़ता रहा द्घूम-द्घूमकर दस फीट की परिधि में
डांगर की खाल उतर चुकी थी और उसे जल्दी थी

बहुत मायूस होकर देखा कुत्तों ने
आदमी का न्याय
अब हड्डियों के लिए था
और वह गि(ों के साथ था।

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
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