अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
पाखी महोत्सव
नामवर का कन्फेशन

'पाखी' महोत्सव के प्रथम सत्रा में रचनाकारों को सम्मानित किया गया। तमाम सम्मानित रचनाकारों ने आत्मवक्तव्य पढ़े। नामवर सिंह ने उस कथाकार संजीव पर केंद्रित 'पाखी' के अंक का लोकार्पण किया जो अब तक उनके प्रिय लेखकों की सूची में दर्ज नहीं रहे हैं। लेकिन अपने अध्यक्षीय भाषण में नामवर सिंह ने कन्फेशन करते हुए संजीव की उपेक्षा करने की चूक को स्वीकारा। साथ ही भविष्य में उन पर लिखकर प्रायश्चित करने की बात भी कही


डॉ. कुमार विश्वास :
तकरीबन आठ द्घण्टे तक चलने वाले इस पूरे महोत्सव का संचालन बड़ी कुशलता से डॉ. कुमार विश्वास ने किया। अपनी विशेष लक्षणात्मक टिप्पणियों के लिए मशहूर डॉ. कुमार संचालन के दौरान बीच-बीच में अपनी प्रतिभा का परिचय देते रहे। संजीव पर केंद्रित 'पाखी' के अंक का लोकार्पण करने के लिए नामवर सिंह को आमंत्रिात करते हुए कहा-'नामवर जी द्वारा हाल में कई विवादित लोकार्पणों के क्रम में एक और लोकार्पण। 'हंस' और जसवंत सिंह की किताब के बाद हो रहे 'पाखी' के इस अंक के लोकार्पण का क्या हश्र होगा ईश्वर जाने।' इसी तरह अपूर्व जोशी के बारे में उनकी टिप्पणी थी-'इनकी स्थिति द्घर की सबसे छोटी बहू वाली है जिसको सबके पैर छूने पड़ते हैं।'

 
 
अपूर्व जोशी :

'लीक पर वे चलें जिनके चरण दुर्बल और हारे हैं/हमें तो हमारी यात्राा से बने ऐसे अनिर्मित पंथ प्यारे हैं/साक्षी हो राह रोके खड़े पीले बाँस के झुरमुट/कि उनमें गा रही है जो हवा/उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं।' आज से ठीक एक वर्ष पूर्व इसी सभागार में, इसी तारीख, इसी मंच से 'पाखी' के प्रवेशांक के अवसर पर मैंने अपने प्रिय कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की इस कविता को पूरा पढ़ा था। और हो सकता है मुझे भ्रम हो रहा हो मगर मुझे लगता है उस पर कुछ हद तक या यूँ कहूँ काफी हद तक खरा उतरा हूँ। मैं समझता हूँ मैंने बहुत ईमानदारी के साथ बहुत निष्पक्षता के साथ और निष्ठा के साथ 'पाखी' की उड़ान को जिसे कि हमने सृजन की खुली उड़ान का नाम दिया, मुक्त उड़ान की बात कही, इस उड़ान को निर्बाध बनाने के लिए पिछले एक वर्ष से काम किया।

हम हर प्रकार के पूर्वाग्रह, चाहे वह वैचारिक हो या व्यक्ति केंद्रित हो इनसे बचने का प्रयास किया। पिछले वर्ष जब मैं आप सब सुधी जनों को संबोधित कर रहा था तो मैं अपने आपको बाहरी मानता था। पत्राकारिता से साहित्य के क्षेत्रा से आया था। मगर आज एक साल के बाद मैं इसे अपना संसार मानता हूँ। मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस संसार में जिस खेमेबंदी और गुटबाजी का अकसर जिक्र होता है, हमने प्रयास किया जैसा कि नामवर जी ने अपने आशीर्वचन के दौरान पिछले वर्ष कहा कि हम इससे दूर रहें। और हमने प्रयास किया कि हम दूर रहें। जहाँ तक पिछले एक वर्ष की यात्राा का सवाल है हमने 'पीढ़ियाँ आमने-सामने' के रूप में बातचीत की नई श्रृंखला शुरू की और एक नये दौर को सामने लाने का प्रयास किया। हमने नामवर जी से इस मामले में सलाह की, राजेन्द्र यादव जी से भी सलाह की और सबसे पहली वार्ता जो नैनीताल ;उत्तराखण्डद्ध में जहाँ का मैं रहने वाला हूँ, वहाँ की सुंदर वादियों में की। नामवर जी थे प्रभाष जोशी जी मेरे विशेष अनुरोध पर उसमें सम्मिलित हुए थे।

युवा कथाकार २६ वर्षीय चंदन पांडे, ८४ वर्षीय नामवर जी इस वार्ता में थे। और दो पीढ़ियों के बीच में संतुलन का काम मित्रा शैलेय ने किया था। मुझे लगता है कि इस 'पीढ़ियाँ आमने-सामने' के माध्यम से आने वाले समय में हम एक नयी बहस को जन्म दे सकेंगे और शायद एक सार्थक विचार को भी जन्म दे सकेंगे। एक सार्थक विचार को उसके मुकाम तक पहुँचाने में सफल हो सकेंगे। अगली बातचीत नामवर जी के शहर बनारस में होनी तय हुई है। राजेन्द्र यादव जी ने इस बातचीत में शामिल होने के लिए अपनी सहमति दी है। काशीनाथ जी बनारस से हमारे साथ सम्मिलित होंगे। दो युवा कथाकार या आलोचकों के नाम का चयन किया जाना अभी बाकी है।

मुझे लगता है कि वह बातचीत नैनीताल में हुई बातचीत को आगे बढ़ाने का काम करेगी। इसी के साथ 'हमारे दौर के एक महत्वपूर्ण रचनाकार' शीर्षक से हमने विशेषांक निकालने की योजना बनाई और हमें बेहद खुशी है कि इस योजना को हम आज 'पाखी' के एक वर्ष पूरे होने के अवसर पर मूर्त रूप दे पाने में सफल हुए हैं। हमारे दौर के एक बहुत बड़े कथाकार, बहुत बड़े रचनाकार संजीव जी जो 'हंस' के कार्यकारी संपादक भी हैं उन पर आज हमारे दौर के महत्वपूर्ण रचनाकार श्रृंखला के पहले विशेषांक का लोकार्पण होना है। मुझे ऐसा लगता है और जैसा कि राजेन्द्र जी ने 'पाखी' के इस अंक में लिखा है कि शायद इस दौर के सबसे महत्वपूर्ण रचनाकार होने के बावजूद संजीव का लगातार हाशिए पर बने रहने का एक बहुत बड़ा कारण उनका साहित्य के सत्ता केंद्र दिल्ली से दूर रहना रहा।

मैं उम्मीद करूँगा और मुझे पूरा विश्वास भी है कि इस विशेषांक के साथ संजीव जी की सृजन यात्राा पर हम न्याय कर पाए होंगे और इस अंक में संजीव जी के नये पहलू आपके सामने ला पाने में सफल हुए होंगे। मैं विशेषरूप से शिवमूर्ति जी के संस्मरण का उल्लेख करना चाहूँगा जिसने संजीव जी के कई नये पक्ष सामने रखे हैं। अगला विशेषांक हमारा प्रयास है कि हम कवि आलोक धन्वा पर निकालें। उसकी शुरूआत भी हम कर चुके हैं। ऐसे विशेषांक वर्ष में दो बार निकालने की योजना है। यदि सब कुछ ठीक चलता रहा और आप लोगों का सहयोग और आशीर्वाद मिलता रहा तो हम इसको पूर्ण कर पाएँगे।

राजेन्द्र यादव जी हर बार मुझसे मिलते हैं तो पूछते हैं कि कौन सी नयी शरारत कर रहे हो। तो आज मैं अपनी नई शरारत शेयर करना चाहता हूँ। एक नई योजना या नई शरारत दिमाग में आई है हिन्दी साहित्य पर एक बृहद पोर्टल लॉन्च करने की, हिन्दी साहित्य के आदिकाल से आज तक यानी साइबर युग तक जो कुछ भी हिन्दी साहित्य में हुआ उसे समेटते हुए। एक बहुवर्षीय योजना की हम शुरूआत कर रहे हैं। इस पर भी हमारा कार्य शुरू हो चुका है। और जैसा मैंने पहले कहा कि यदि सब ठीक चलता रहा तो हम उस पोर्टल का पहला भाग जल्दी ही लॉन्च कर पाएँगे।

'पाखी' के साथ ही हमने पिछले वर्ष अपने पिता स्व. जगदीश चन्द्र जोशी जी की स्मृति में 'शब्द साधक सम्मान' की द्घोषणा की थी। पहला 'शब्द साधक शिखर सम्मान' हमने आदरणीय विष्णु प्रभाकर जी को दिया था। विष्णु जी साहित्य संसार में एक ऐसे अजातशत्राु रहे जिनके बारे में न कभी विवाद उठा न कभी प्रतिकूल टिप्पणी सुनने को मिली। जब हमने पुरस्कार द्घोषित किया था तो सबने हमारे इस प्रयास को सराहा था। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस वर्ष का द्वितीय 'शब्द साधक शिखर सम्मान' श्रीलाल शुक्ल को देने का निर्णय लिया और मुझे उम्मीद है कि आप सब लोग इसे सराहेंगे। मुझे याद है कि जब मैं स्कूल में था तब पहली बार 'राग दरबारी' पढ़ी। उसके बाद से मैं चार या पाँच बार पढ़ चुका हूँ और हर बार ऐसा लगता है कि आज के समय और आज के दौर की बात हम पढ़ रहे हैं।

वैद्य जी का चरित्रा, रद्घुनाथ का चरित्रा वहाँ के स्थानीय स्कूल के पिं्रसिपल साहब का चरित्रा सब बड़े अद्भुत चरित्रा हैं। ऐसी कालजयी कृति के रचनाकार श्रीलाल शुक्ल को यह पुरस्कार देते हुए हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। इस क्रम में मैं विशेषरूप से धन्यवाद देना चाहता हूँ अखिलेश जी का। हमने बार-बार प्रयास किया श्रीलाल शुक्ल जी से संपर्क करने का। कई बार मेरे सहयोगी एवं लखनऊ से पत्राकार राकेश श्रीवास्तव उनके द्घर गये। मगर उनकी तबीयत खराब होने के चलते कभी भी हम उनसे बात नहीं कर पाए। उनकी सहमति नहीं ले पाए। ऐसे में अखिलेश जी ने हमारा साथ दिया। उन्होंने श्रीलाल शुक्ल जी को इस पत्रिाका के बारे में, इस पुरस्कार के बारे में अवगत कराया और उनकी सहमति ली। इसके अतिरिक्त हमने अन्य सम्मानों की जो द्घोषणा की थी, वह पुरस्कार भी आज यहाँ दिए जा रहे हैं। इसके लिए मैं सर्वप्रथम धन्यवाद देता हूँ जूरी के सदस्यों को।

'शब्द साधक सम्मान' भगवानदास मोरवाल को उनके उपन्यास 'रेत' को दिया जा रहा है। उसके लिए जूरी सदस्य आदरणीय नामवर जी, राजेन्द्र जी, विश्वनाथ त्रिापाठी जी ने उनका चयन किया, मैं इसके लिए कृतज्ञ हूँ। इसी प्रकार एक जूरी सम्मान युवा कविता के लिए रमेश कुमार वर्णवाल को उनकी कविता 'एक पुरातत्वविद् की डायरी से' के लिए दिया जा रहा है। उसके लिए मैं जूरी के सदस्य लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप एवं अनामिका जी का हृदय से आभारी हूँ। एक बात का उल्लेख मैं करना चाहता हूँ। आदरणीय काशीनाथ जी को 'रेहन पर रग्द्घू' के लिए 'जनप्रिय लेखक सम्मान' के लिए हमने चुना था।

यह सम्मान ई-मेल और पत्राों के द्वारा चुने गए सर्वश्रेष्ठ जनप्रिय लेखक को दिया जाना था। काशीनाथ जी आज आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व्याख्यान माला के लिए कलकत्ता में हैं। मेरी उनसे कल दूरभाष में वार्ता हुई थी और उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी कि यह पुरस्कार उनके बजाय किसी युवा कथाकार को दिया जाए। इसके बारे में हम शीद्घ्र निर्णय लेकर उसकी सूचना देंगे।
२३ अगस्त का दिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मैंने पिछली बार भी कहा था कि यह दिन मेरी माँ का जन्मदिन है। 'पाखी' जिसकी प्रेरणा स्रोत वह रहीं। साहित्य के प्रति रुचि हम सब भाइयों में रुचि उन्होंने जगाई थी। हमने माँ के जन्म दिन के अवसर पर ही अपने पिता की स्मृति में सम्मानों की द्घोषणा की थी। हम २३ अगस्त को हर वर्ष 'पाखी' का महोत्सव मना सकें इसमें आप सबके सहयोग की अपेक्षा रहेगी। यहाँ मैं एक बात कहना चाहता हूँ, पता नहीं मुझे कहनी चाहिए या नहीं कहनी चाहिए। मुझे लगता है कि हर पुत्रा और पुत्राी ही नहीं, हम सबकी यह इच्छा रहती है कि हम अपने माँ-पिता के लिए कुछ कर सकें।

हमारे मित्रा आलोचक ने इसी पत्रिाका में आलोचना की थी कि ऐसे पुरस्कारों की वृ(ि होती जा रही है जिसमें माता पिता की स्मृति में पुरस्कार दिए जा रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई बुराई है। मैं एक बात का उल्लेख करना चाहूँगा और मैं एक मित्रा भालचंद जोशी का आभार प्रकट करना चाहूँगा जिनकी कहानी 'पालवा' ज्ञानोदय में पढ़कर 'पाखी' का जन्म हुआ था।

भालचन्द्र जोशी जी अपने तमाम व्यस्त कार्यक्रमों को छोड़कर खरगोन से यहाँ आए हैं उनका आभार व्यक्त करता हूँ। मैं अपनी बात को समाप्त करने से पहले चार्ल्स डिकिंस के शब्दों को पुनः दोहराना चाहता हूँ जो जुनूनी आदमी को प्रेरणा देते हैं और लक्ष्य को पाने की ताकत भी। उन्होंने लिखा है-ॅींज मअमत प् ींअम जतपमक जव कव पद सपमिए प् ींअम जतपमक ूपजी ंसस उल ीमंतज जव कव पज ूमसस ूींजमअमत प् ींअम कमअवजमक उलेमसएि पद हतमंज ंपउे ंदक पद ेउंससए प् ींअम ंसूंले जीवतवनहीसल इममद पद मंतदमेजण् मैं उम्मीद करता हूँ एक वर्ष की 'पाखी' की यात्राा में जो सहयोग आप सब का मुझे मिला है वह आगे भी मिलता रहेगा।

 
 
सूर्यबाला : समकालीन व्यंग्य के शिखर स्तंभ श्री श्रीलाल शुक्ल का मैं अभिनंदन करती हूँ और उनकी अनुपस्थिति में उन्हें बधाई देती हूँ। मैं अभिनंदन करती हूँ अपूर्व जोशी का जिन्होंने इस तरह के शिखर सम्मान की योजना बनाई। अपूर्व जी ने जब मुझे फोन किया और जिस तरह मैं यहां आई उसे लेकर जो कुछ मुझे सूझा और मैंने लिखा, आप अनुमति दें तो मैं उसे पढ़कर सुनाना चाहूँगी। अन्यथा वक्तव्य पढ़ने की मेरी इतनी आदत नहीं है। और दूसरी बात यह कि आज जब शिखर पर व्यंग्य है तो क्यों न मैं व्यंग्य रूप में ही उन्हें आचमनी दूँ। जो कुछ मुझे सूझा है उसे मैं भूमिका के रूप में सुनाना चाहूँगी।

'मुझसे अपूर्व जी ने कहा कि दिल्ली आइए। मैंने सहम कर कहा-नहीं, नहीं मैं दिल्ली आकर क्या करूँगी। मैं तो दिल्ली के नाम से द्घबराती हूँ। किसी तरह पति की पहरेदारी में दिल्ली आती भी हूँ तो चुपचाप अपने 'बेटे के द्घर के अंदर' रहकर, वापस मुम्बई 'अपने द्घर के अंदर' चली जाती हूँ। लेकिन आप यह उल्टी यमुना क्यों बहा रहे हैं? कायदा तो यह है कि दिल्ली वाले ही हमेशा धूमधाम से बाहर बुलाए जाते हैं।.. अपूर्व जी ने कहा कि हम सिस्टम में थोड़ा बदलाव चाहते हैं इसलिए। और जहाँ तक द्घर के अंदर से ऑपरेट करने का सवाल है तो हमारा कार्यक्रम 'हिन्दी-भवन' में है। आप अंदर आकर 'साहित्य और पत्राकारिता में गाँव' विषय पर अपना वक्तव्य दें। मैंने कहा-'वह तो मैं अभी आपको फोन पर बताए देती हूँ। वह यह कि भारत की ८० प्रतिशत जनसंख्या, १५ प्रतिशत साहित्य और ५ प्रतिशत पत्राकारिता, गाँवों में निवास करती है।... इससे ज्यादा बड़ा वक्तव्य और क्या हो सकता है?

'पाखी'-संपादक ने हैरानी से कहा-'आप पीएचडी हैं न?' मैंने कहा-'पीएचडी वालों की छोड़िए, वह तो बहुत से मुझ पर भी कर रहे हैं।'... जोशी जी मुद्दे पर आए, बोले-'खैर! जो कुछ भी हो, बात दिल्ली आने की हो रही है। यूं भी दिल्ली, साहित्यकारों के लिए काबा-कैलाश है। आप को तो मालूम ही होगा लेखकों का चारों धाम तभी पूरा होता है जब वे दिल्ली आ पाते हैं।' मैंने हामी भरी-'हाँ सुना तो बहुत है कि बगैर दिल्ली आए मनुष्य योनि से मुक्ति भले मिल जाए पर लेखक की आत्मा द्घंट-द्घड़ियाल बांधे पीपल से लटकती रहेगी कि कब कोई दिल्ली वाला पिंडदान करे तब उसकी मुक्ति हो।' ...अपूर्व जी ने कहा-'तो पिफर अपने लिए क्या खयाल है आपका? मैंने कहा-६५ की उम्र में क्या खाक मुसलमा होंगे।' जोशी जी ने कहा-'हम हिन्दी के एक बड़े रचनाकार को सम्मानित भी करते हैं।' मैंने कहा, 'जो हॉस्पिटल में एडमिट होते हैं उनको या जो डिस्चार्ज होकर द्घर आ गये होते हैं उनको?' जोशी जी को याद नहीं आया। 'लेकिन क्यों पूछ रही हैं आप यह सब?' मैंने कहा कि दरअसल, साहित्य के बाजार में इतने बड़े-बड़े कट-आउट्स और होर्डिंग टंगे होते हैं कि उनमें हाड़-मांस के जीते जागते रचनाकार, समीक्षक को महसूस कर पाना बहुत मुश्किल होता है।

सत्यनारायण की कथा की पोथी वाले, 'शंख, चक्र, गदा, पद्म वनमाला विभूषितम की तरह, ये लोग भी एकदम ऐसे ही कुर्ता-धोती, सदरी, चश्मे के साथ पैदा हुए लगते हैं। जोशी जी अब तक आधे-अधूरे खब्त हो चुके थे। बोले-'मैं आपको बता दूँ कि हम श्रीलाल शुक्ल को सम्मानित करने जा रहे हैं।' मैंने कहा, 'अच्छा! पिफर तो ठीक है मैं आ ही जाती हूँ।' जोशी जी हैरत में बोले-'कमाल है, अभी तक तो आप कह रही थीं कि आप आदमकद नामों से द्घबराती हैं और अब तुरत-फुरत आने के लिए तैयार हैं। कैसे?' मैंने कहा-'इसलिए कि आप जिन श्रीलाल शुक्ल को सम्मानित करने जा रहे हैं। वे मेरे द्रोणाचार्य हैं। सामना कभी इसलिए नहीं किया क्योंकि मैंने एकलव्य की कहानी पढ़ रखी थी। डरती थी कि कहीं अंगूठा न मांग बैठें। और दूसरी वजह यह थी कि श्रीलाल शुक्ल कभी महान शक्तिमान लेखकों जैसे दिखे ही नहीं, जीवन भर सहज, सामान्य ही बने रहे। ...और.. मैं आ गयी...। आ गयी हूँ तो आपको बता दूँ कि श्रीलाल शुक्ल और उनके व्यंग्य फलक के विभिन्न कोण, उनकी सृजनात्मक दृष्टि, जीवन, व्यापक परिवेश, शिल्पगत सौंदर्य और उनके लेखन में दलित और स्त्राी-विमर्श की दशा-दिशाओं और दुर्दशाओं का कोई आयाम नहीं बता पाऊँगी।... मैं तो मुम्बई से दिल्ली, इतनी दूर चलकर आप लोगों को सिपर्फ ये बताने आई हूँ कि ७० के दशक में जब हिन्दी साहित्य में चारों तरफ 'राग-दरबारी' की तूती बोलती थी ;बकौल श्रीलाल शुक्ल वह जहाँ कहीं भी होती होद्ध और अचानक ही हिन्दी व्यंग्य, प्यादे से वजीर हो जाने वाली चाल चलने लगा था, मैं भी जोश में आकर ये किताब खरीद लाई। लेकिन पढ़ ही नहीं पाई क्योंकि जब भी पढ़ने बैठती और बीच में ठहाके लगाकर जोर से हँसती।

मेरे पति और बच्चे चौंककर मेरी ओर देखने लग जाते। एक माँ और एक पत्नी को ख्िालखिला कर हँसते देखकर उनका चौंक जाना स्वभाविक था। उन दिनों स्त्राी-विमर्श का भी चलन नहीं था। एक सामान्य स्त्राी, बिना स्त्राी-विमर्श के डंके की चोट पर खिलखिलाकर हँस रही है तो कुछ तो वजह होगी... और उन्होंने वजह ढूंढ़ निकाली 'राग दरबारी' के रूप में। क्षमा चाहती हूँ, शुरू में ही मैंने कहा था कि श्रीलाल शुक्ल या और स्त्राी-विमर्श जैसा कुछ नहीं दे पाऊँगी लेकिन गलती हो गयी और स्त्राी-विमर्श आ गया। अब आलम यह था कि आठवीं-दसवीं में पढ़ने वाले मेरे बच्चों समेत आईआईटी का छात्रा मेरा देवर और यहाँ-वहाँ माला फेरते मेरे सास-ससुर, जिसे देखो, मौका लगते ही, जहाँ से जो पृष्ठ खुल जाता है, वहीं से अर्थात्‌ कहीं से भी 'राग दरबारी' पढ़ रहा होता और अब मेरी जगह, वह आदमी बीच-बीच में ठहाके लगा रहा होता।... कहना जरूरी है कि इन सारे पढ़ने वालों में न तो कोई साहित्य-प्रेमी था, न साहित्य का विद्यार्थी न ही कोई धुरंधर पाठक। बावजूद इसके मेरा द्घर उन दिनों शिवपालगंज हो गया था।

छोटे-बेटे को बुखार चढ़कर उतरा है तो बड़ा वाला, छंगा वाला कॉलेज के पिं्रसपली अंदाज में पूछ रहा है 'आपका स्वास्थ तो अब 'टिचन्न' जान पड़ता है।' और आईआईटी में पढ़ने वाले चाचा की बात, बच्चे जरा भी अनसुनी करते दें तो उन्हें फौरन सुनने को मिलता-'जौन हुकुम देत हैं, तौन चुप्पे कैरी आउट करौ, हमका अब पिं्रसपली करे न सिखाओ भइया!'
बच्चे भी कहाँ चूकने वाले थे। एक शाम ठंडाई बनी थी। ग्लास थामने में दुबले-पतले चाचा आनाकानी कर रहे थे। अचानक राग दरबारी के वैद्य जी के बताए बादाम, पिस्ते, मुनक्के जैसे गुणकारी तत्वों की बात याद करते हुए 'छोटा' एकदम से बोल पड़ा-'पी लीजिए, पी लीजिए। छछुंदर जैसे आए हैं गैंडा बनकर जाएँगे।'

अर्थात्‌ जिसे देखो अपने हिसाब से संदर्भों का आभास करता नजर आ रहा था। ऊपरी मसखरियों के बीच, अचानक आवाजों का रुख संजीदा हो जाया करता। एक दिन बाबू जी को कहते सुना-तुम लोगों ने ध्यान दिया है?-पैर में चिथड़े लपेटे, लाठी ठकठकाते लंगड़ को, अर्जी की नकल अंत तक नहीं मिल पाती...' तब मुझे लगा था यह उपन्यास है या व्यंग्य का 'राष्ट्र-चरित्रा-मानस।' जैसे गबन, गोदान के बाद साहित्य, एक सर्वथा एक नये अंदाज में पिफर से जन्मा हो और रंगनाथ की शक्ल में, खादी के कुर्त्ते के साथ थैला लटकाए, कस्बाई आदमी का यह कल्कि-अवतार, शिवपालगंज के सफरनामे पर सामने खड़े उस ट्रक की ओर चल पड़ा है,-'जिसका जन्म ही सड़कों के साथ बलात्कार के लिए हुआ है।'

७० के दशक में यह 'ट्रक की' उत्प्रेक्षा पढ़ते हुए मैं सकपकाई थी। कई स्थानों पर माहौल की क्रूडिटी और कस्बाई उजड्डपने को लफंगई तक पर उतरते देख, दाँतों तले जीभ भी दबा ली थी मैंने। लेकिन बहुत जल्दी पता चल गया था कि इस रचनाकार को, मेरे दाँतों तले दबी जीभ की जरा भी परवाह नहीं है। वह मुझे गूंगा करने पर उतारू है। मर्मज्ञ पाठकों के लिए 'गूंगें का गुड़' है, राग दरबारी। इस लेखक को मेरी जीभ नहीं, अपनी बेलौसी प्यारी है। राष्ट्रीय-चरित्रा के रोम-रोम में ठुंसे विद्रूप को एक अलग ही अंदाज में उतारने पर उतारू, यह लेखक हर किसी के टेस्ट की परवाह करते नहीं चल सकता। वह एक बीहड़ रास्ते और मुश्किल अभियान पर निकला है। चुनौतियाँ झेलने और खतरे उठाने का एहसास है उसे। इसलिए शायद इस स्थिति में ही नहीं, 'राग-विराग', 'विश्रामपुर का संत', और 'मकान' जैसी रचनाओं में भी, जो मंच हमारे सामने खुलता है उसके डाइमेंशन हमें हस्तप्रभ कर देते हैं।

यहाँ दृश्य पर दृश्य, पर्दे पर पर्दे और नेपथ्य पर नेपथ्य इस तरह उजागर होता जाता है कि एक छोटे कस्बे का कथ्य हो या उच्च चिकित्सा-संस्थान या राजभवन का गलियारा... देखते-देखते उस गागर में समूचे देश के भ्रष्टाचार और शातिर चालों का उफनता सागर समाता चला जाता है। हर बार लगता है, अब खुल गया पर्दा। देख ली, इस नाटक की रेंज। लेकिन हर बार इस लेखक की रचनात्मक शातिरी हमारे अनुमानों को मात दे जाती है। 'स्वर्णग्राम और वर्षा' से लेकर 'विश्रामपुर के संत' और राग-विराग तक, बात किसी भी क्षेत्रा की हो, वल्गा, व्यंग्य के ही हाथों में होती है। यही उनके लेखन की शर्त है।.. और मजे की बात यह है कि हर विद्रूप एक नई भंगिमा, एक नई शक्ति में उभर कर सामने आता है।

एक चरित्रा दूसरे चरित्रा को पटखनी दे कर राहत की साँस ले ही रहा होता है कि तत्क्षण उसे भी उसकी औकात समझा दी जाती है। बख्शा कोई भी नहीं गया है। चरित्राों के इस जंगल में निर्द्वंद्व तीर-कमान लिए द्घूमते इस लेखक की तीरंदाजी से। वह चाहे रुप्पन बाबू हों, बद्री पहलवान हो या कुंवर जानकी प्रसाद या दर्शन लाल। इसी जंगल के बीचों-बीच से भ्रष्टसत्ता वाला वैद्य जी का वो मुखौटा भी इन्ट्री लेता है। जो अपनी महीन एवं मजबूत धागों की पकड़ में बंधे पर को उन्हीं की उस्तरों से मुड़वा देने की कूवत रखता है। द्घसियारे शनीचर की ग्राम प्रधानी की ताजपोशी से लेकर खन्ना मास्टर से त्यागपत्रा पर हस्ताक्षर करने की ठंडी नृशंसा तक, सारे वृत्तांत, हमारी आँखों में उंगली डालकर हमे चारों तरफ देखने के लिए बाध्य करते हैं, एक गहरे अवसाद और बेकली में डुबोते हैं।

अपने पतन की पराकाष्ठा तक हमें हँसने के लिए अभिशप्त कर देते हैं। जो लोग राग दरबारी पर पलायन, नकार और शहराती आँखों से देखे हुए गाँव की तमाशबीनी का आरोप लगाते हैं, आश्चर्य है कि कैसे वे पूरे उपन्यास के तल में गहराते अवसाद की धारा को महसूस नहीं कर पाते। अरे! गौर के काबिल तो यह हुआ न कि बिना द्घर आँगन, दालान और रसोई के, एक मुकम्मल उपन्यास ठाठ से पूरा हो जाता है। भारतीय परंपरा के रोम-रोम में छत्तीस करोड़ देवताओं की तरह बसे नाते-रिश्ते, कहीं कुछ नहीं है 'राग दरबारी' में और स्त्रिायों का तो इतना नितांत अभाव कि ३० की कौन कहे १० प्रतिशत भी आरक्षण नहीं। बेला जैसी एक आध स्त्रिायाँ, कोटेशन के लिए ही जैसे इस्तेमाल की गई हैं। ऐसा स्त्राी विहीन, श्रृंगारहीन माहौल.. और मंच सज्जा के नाम पर वैद्य जी का चबूतरा। यह दो-तिहाई कथा उसी पर शूट हो जाती है। इस किस्म की संवेदना की 'उलटवांसी की बंपर कॉप काटता यह उपन्यास, साहित्य के वास्तुशास्त्रा का अजूबा ही लगता है। और कम से कम मुझे तो इस उपन्यास में किसी माँ-बहन या भाई-भौजाई की कमी बिलकुल नहीं खली।

अन्य उपन्यासों की बात करें तो 'सूनी द्घाटी के सूरज की पहली रोशनी' में अंकुरित होने वाले इस व्यंग्य के होनहार बिरवान के पातों में साफ-साफ यह संभावना दिखती है कि एक डेढ़ दशक पूरे होते न होते 'राग दरबारी', 'विश्रामपुर का संत', 'राग-विराग' जैसी परिपक्व कृतियाँ, औपन्यासिक वृत्त का विस्तार द्घेर सकती हैं। सहजता कायम रहती है। क्रमशः अंदरूनी तहें और ज्यादा परतदार होती चली जाती हैं। 'सूनी द्घाटी का सूरज' का एक वाक्य है-'नही मुंशी जी! उनको भी वारदात होने पर मुल्जिम ढूंढ़ने पड़ते हैं।... हम लोग तो मुंशी जी के द्घर की बकरी हैं, जब चाहा गर्दन पर छुरा चला दिया नहीं तो द्घर के सामने चरने दिया।'...

राजनीतिक दृष्टि से विफल भू-दान आंदोलन जैसे बंजर मैदान हो उसके पिटे मोहरों पर बिछी बिसातें हों या छद्म के 'अज्ञातवास' पे पल रही मनोवृत्तियों की गुथमगुत्थ हो, यह रचनाकार बेखौफ डाईव मार लेता है। पहले सतह पर सारे स्ट्रोक आ८ामाता है पिफर गहराइयों को थहाते हुए आपको बीच भंवर की तलहटी तक खींच ले जाता है। आदमी के अंदर के इस तिलिस्म को देखकर आप विस्मित रह जाते हैं। जहाँ प्रेम, शातिरी, सम्मोहन और अंतरद्वंद्वों का माया जाल बिछा है। मानवीय चेतन-अचेतन और अवचेतन के ये चक्रव्यूह, मनोविज्ञान के शोधों के लिए न जाने कितनी संभावनाएँ खोल देते हैं। और फ्रलैशबैक.. फ्रलैशबैकों की तो पूरी एक प्रयोगशाला है। माइक्रोस्कोपिक दृष्टि और फोटोग्रापिफक चित्राण ऐसे कि पेड़, पत्ती, किरण, खंडहर, धूप-छाया, सबके इतने आभास, इतने बारीक एहसास कि बाह्‌य लोक और मानस लोक, दोनों की छोर अछोर विस्तार वाली लैंडस्केपिंग हमारी आँखों में सरकार हो जाए। भाषा शिल्प के सारे औजार इस लेखक के अपने गढ़े हुए हैं।

कोई भी पहले के ईजाद किये हुए नहीं। इस्तेमाल का ढंग भी निराला क्योंकि इनके साँचे गढे़ ही नहीं जाते, बल्कि निर्ममता पूर्वक नष्ट भी कर दिये जाते हैं। स्वयं अपने बनाए साँचों की तोड़-फोड़ में इस लेखक को कमाल हासिल है। जिस इत्तमीनान से वह शिवपालगंज में निद्वंद्व विचरता है, उतना ही रिलैक्स इसके ठीक उलट, सत्ता के मचानों पर बैठे चीफ मिनिस्टर, राज्यपालों के शयनकक्ष में महसूस करता है। खासे यारबाश तरीकों से हमें गर्वनर हाउसों के उन गलियारों में द्घुमाता है जहाँ दंभ और अहं की गुर्राहटें, ब्रह्माण्ड में उल्का पिण्डों की तरह टकराती हैं और जिनकी कालीनों पर सत्ता के कूट खेलों की चौपड़ बिछी होती है। यानी कलम न हुई रोलर कोस्टर हो गयी। उसी की तरह जाने कहाँ-कहाँ से चढ़ाती है और उतारती है।

क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि राग दरबारी का ही रचनाकार 'राग विराग' की निम्न पंक्तियों का भी लेखक है-'सुकन्या वहाँ नहीं है और बु(ि से देखा जाय तो उसके वहाँ होने का कारण भी नहीं है पिफर भी उसकी सारी चेतना इस सवाल पर टिक जाती है कि क्या पिफर सुकन्या यहाँ आयी थी क्या वह लौट गयी है। वह एक जगह स्थिर होकर खामोशी से खड़ा हो जाता है और गहरी साँस लेकर हवा में किसी सुगंध को पकड़ने की कोशिश करता है। वह कई बार गहरी साँस लेता है। सबसे बाद वाली साँस हताशा की होती है।'

जितना जीवन में हम प्रत्यक्ष नंगी आँखों से देख पाते हैं, उससे कहीं ज्यादा प्रमाणिक यह लेखक अपने आख्यानों में है। राग की शु(ता की तरह, इसने आख्यानों की प्रमाणिकता बहुत सम्हाल कर रखी है। उसे पता है कि जरा भी असावधानी या द्घालमेल, कलाकृतियों की पैडिग्री नष्ट कर सकती है। पुरुषराग का अर्थ विकृत राग नहीं होता। न विद्रूप को विरूप करने का हक किसी भी लेखक को होता है।
यह लेखक नहीं, गाड़िया लोहार है। उन लोहारों सा भटकता, पड़ाव दर पड़ाव डालकर यह लेखक, हर समाज के चप्पे-चप्पे पर नजर रखता है, खबर रखता है, उनके अनुरूप औजार गढ़ता है। लोहा बेशक आग में तपाकर लाल करता है लेकिन पाठक को थमाता है उसे ठंडा करने के बाद ही-'आदमी से मैं नहीं डरता मालिक न बाद्घ-बद्घरा से, डर मुझे कागज से लगता है। कागज ने मेरी जमीन कैसे ले ली, नहीं जानता।'

...पूरे भाषाशिल्प में उधेड़ने की क्रिया इकहरी नहीं परतदार होती है। मामूली से ढेले से हथगोले का काम लेने में निष्णात, यह रचनाकार चलाता भी ऐसे है जैसे हथगोला नहीं, ढेला फेंक रहा हो।
'पढ़ाई-लिखाई अब पढ़ाई लिखाई कहाँ होती है।... वह तो पापा के पढ़ने लिखने के बाद खत्म हो गयी।... जब से वे तरक्की पा गये तब से सारी तरक्कियां भी खत्म हो गयीं।'...
इस रचनाकार के पास, कलम के नाम पर एक अलादीनी चिराग है। वह द्घिसता है और सामने हाथ बांधे 'विस्फोटक प्रतिभा' का जिन्न खड़ा नजर आता है-हुक्म मेरे आका! कलम चल पड़ती है तूफानी आवेगों सी आकाश पाताल ढहाती। कोनों अतरों और खोलों में दबी हुई विसंगतियों, विरूपताओं पर छापा मार देती है। लेकिन हम हिन्दी साहित्य वालों का भी जवाब नहीं।

हम लेखक से यह कम पूछते हैं कि आपने यह वाली रचना कैसे लिखी थी और आपने क्या सोचकर लिखी बल्कि हम ज्यादा यह पूछते हैं कि आपने वो और वैसा क्यों नहीं लिखा? या ऐसा ही और क्यों नहीं लिखा? और यदि लेखक वैसा ही लिखता है या ज्यादा ही लिखने लगता है तब हम कहते हैं कि आप तो वैसा ही लिखते चले जा रहे हैं जैसा लिख चुके हैं। 'इस तरह का, ऐसा' या 'उस तरह का वैसा' क्यों नहीं लिखते? अब इसका क्या जवाब दे लेखक? सिवाय इसके 'नहीं लिखता मेरा मन।' ऐसे मनमौजी, फक्कड़, फाकेमस्त और हठीले अंदाज वाले रचनाकार का मैं पुनः अभिवादन करती हूँ। अभिनंदन करती हूँ और आप सबने मुझे इतना समय दिया इसका धन्यवाद भी।...

 
 
श्रीलाल शुक्ल :

प्रिय जोशी जी,
सबसे पहले आप तक बधाई पहुँचाना चाहता हूँ कि 'पाखी' की साहित्य यात्राा का एक वर्ष पूरा हो रहा है। निश्चय ही एक वर्ष की अल्प अवधि में 'पाखी' ने साहित्यिक पत्राकारिता के क्षेत्रा में जो उपलब्धि अर्जित की है, वह मूल्यवान है। यह और भी महत्वपूर्ण है कि इस अवसर पर आप 'पाखी' महोत्सव का आयोजन कर रहे हैं, जिसमें 'पाखी' की वेबसाइट का लोकार्पण तथा 'साहित्य और पत्राकारिता में गाँव' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन होना है। इन सभी की सफलता के लिए बहुत सारी शुभकामनाएँ। मुझे विश्वास है कि इस तरह की गतिविधियों की श्रृंखला आप सतत्‌ जारी रखेंगे।

मैं इस बात के लिए गहरा कृतज्ञता बोध आप तक पहुँचाना चाहता हूँ कि आप लोगों ने अपने इस वर्ष के 'शब्द साधक शिखर सम्मान' से मुझे सम्मानित करने का निर्णय लिया है। यह आत्मीयता और समादर ही किसी लेखक का सबसे बड़ा उपार्जन होता है। निश्चय ही इस अवसर पर 'पाखी' महोत्सव में स्वयं आने और आप सबके बीच रहने का बहुत मन था एवं उचित भी यही होता, किन्तु स्वास्थ्यगत कारणों से ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।

मैं पुनः आपके आयोजन की सफलता के लिए समस्त शुभकामनाएँ व्यक्त करता हूँ।

 
 
भगवानदास मोरवाल :

मित्राो,
सबसे पहले मैं जे.सी. जोशी स्मृति 'शब्द साधक जूरी सम्मान' के माननीय सदस्यों प्रो. नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव और डॉ. विश्वनाथ त्रिापाठी जी के प्रति आभार व कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहता हूँ, जिन्होंने मेवात जैसे उपेक्षित, पिछड़े और हाशिए के समाज के एक लेखक के लेखन पर भरोसा जताते हुए उसके उपन्यास का इस सम्मान के लिए चयन किया है। मेरे लिए यह एक लेखक के लेखन के प्रति इनका यह भरोसा महज हिन्दी के तीन स्तंभों का नहीं है बल्कि पूरे हिन्दी समाज का भरोसा और सामूहिक निर्णय है।

किसी भी लेखक के पुरस्कृत अथवा सम्मानित होने पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इनमें एक हमारे लेखक वृंद के बीच, दूसरी पाठक समुदाय के मध्य और तीसरी स्वयं लेखक के मन में होती है। एक लेखक के रूप में मेरी प्रतिक्रिया खुद को विस्मयकारी बल्कि एक हद तक खुद को दुविधा में डालने वाली और बेचैने करने वाली होती है। बेचैन करने वाली इस रूप में कि यह भीतर ही भीतर एक डर, चुनौती और अपनी जिम्मेदारी के प्रति एक गहरे बोध का एहसास कराने वाली होती है। मेरा निजी मत और अनुभव यह रहा है कि कभी-कभी सम्मान या पुरस्कार लेखक को कुंठित और लेखन को बाधित भी करते हैं। ऐसा इसलिए कि इन्हें हथियाने, पाने और बटोरने की होड़, जोड़-जुगत, मैन्यूपुलेशन्स की अनेक प्रविधियाँ, तकनीक और औ८ाार आविष्कृत और विकसित हो गए हैं कि लेखक की ज्यादातर ऊर्जा और समय इन्हें प्राप्त करने में ८ााया होने लगे हैं।

आज इस सभागार में जे.सी. जोशी स्मृति शब्द साधक जूरी सम्मान को ग्रहण करते हुए लग रहा है जिस जातीय अस्मिता और कृतघ्नता-बोध का आँण मेरे ऊपर है, उससे मैं धीरे-धीरे उआँण हो रहा हूँ। कहते हैं कि किसी भी लेखक के पुरस्कृत अथवा सम्मानित होने के पीछे जो दो भाव काम करते हैं, उनमें से उसे एक के द्वारा यह एहसास कराना होता है कि समाज को उसकी ८ारूरत है। मैं यह तो नहीं कह सकता कि समाज को एक लेखक के रूप में मेरी कितनी ८ारूरत है किन्तु मुझे अपने समाज की बहुत जरूरत है। और इसी ८ारूरत ने मेरे आत्मविश्वास, लेखन के प्रति मेरी जिजीविषा तथा उत्कट आस्था को बचाए रखा है। साथ ही अपने लोक विश्वासों और लोक संद्घर्षों के प्रति मेरी निष्ठा और अटूट श्र(ा को भी बनाए रखा है।

आज जब मैं अतीत की कंदराओं में सहमते हुए देखता हूँ तो एक के बाद एक स्मृतियों के हुचके से, जगह-जगह गाँठ लगी रील खुलती चली जाती है। पता नहीं यहाँ उपस्थित मेरे बंधु-बांधव इस मत से कितने सहमत हैं कि आज हमारे गाँव-देहात, सामंतवाद, झूठे दंभ, कुंठा, जातिवाद और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रयोगशालाएँ बन चुके हैं कि हो सकता है भविष्य में इन विद्रूपताओं और विसंगतियों के चलते हमारे ग्राम्य समाज की अवधारणा ही न बदल जाए। यह बात दूसरी है कि ये तत्व हमें महानगरों या बड़े शहरों में दिखाई न देते हों और कहीं-कहीं दिखाई देते भी हैं तो उन्हें पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है।

मुझे याद है आठवें दशक के मध्य का वह समय जब कनॉट प्लेस स्थित मोहन सिंह प्लेस की खुली छत पर कॉफी हाउस की बहस-मुबाहिसों को मैं मूक दर्शक बन सुनता और गुनता रहा। इसी दौरान मुझे लगा कि स्मृतियों का जो ख़जाना, लोक संद्घर्षों के ताप से रची गई उपकथाओं का जो जटिल संसार, लोक विश्वासों के जितने विविध रूप और किस्सागोई का जो अनुपम कौशल विरासत के तौर पर मेरे पास सुरक्षित है, क्यों न उनमें सामासिक कल्पना के रंग भर उन्हें शब्द प्रदान करूँ। वैसे भी इलियट ने कहा कि 'कल्पना में बहुत अधिक स्मृतियाँ ही होती हैं।' १९९० में प्रकाशित मेरा पहला उपन्यास 'काला पहाड़' इन्हीं लोक विश्वासों और संद्घर्षों का आख्यान है। यह बात दीगर है कि आज हमारे पास सिवाय इन 'विश्वासों' और संद्घर्षों की स्मृतियों की स्मृतियों के बचा भी क्या है। ठीक ही कहा गया है कि 'राष्ट्र लोक विश्वासों पर जीवित रहते हैं।' शायद मेरी सबसे बड़ी ताकत मेरे ये लोक विश्वास ही हैं।

मगर इन दिनों मेरे भीतर एक डर और संशय तेजी से द्घर करता जा रहा है और वह यह कि अपने इन विश्वासों, आस्था और निष्ठा को मैं आखिर कब तक बचाए व बनाए रखूँगा? कब तक अपनी नैतिकता की रक्षा कर पाऊँगा? मेरे इस डर की वजह दिनों-दिन तेजी से हिन्दी का बदलता वह चरित्रा है जहाँ हमारे सरोकारों और चिंताओं के क्षेत्रा व इनकी परिभाषाएँ बदल गई हैं। इन बदलावों के चलते हमारी निष्ठाएँ और आस्थाएँ पूरी तरह दरक चुकी हैं।

बहरहाल, आज इस समारोह में 'शब्द साधक जूरी सम्मान' के लिए चयनित अपने उपन्यास 'रेत' के बारे में कुछ न कहूँ तो यह प्रसंग अधूरा रह जाएगा। इस उपन्यास को लेकर चल रहे विवाद जिसके चलते उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले की एक तहसील में 'रेत' को सार्वजनिक रूप से फांसी लगाने, फांसी के बाद उसे जलाने और स्थानीय अदालत में इसके खिलाफ अवमानना का केस दर्ज करना था। मैं इससे ज्यादा नहीं समझा पाया कि भला दलितों, जनजातियों और अति पिछड़ों यानी हाशिए पर पड़े हुए का भी कहीं कोई इतिहास होता है। इतिहास तो शासकों और सत्ताधारियों का होता है।

मैं व्यक्तिगत रूप से 'रेत' की यही सार्थकता मानता हूँ कि कम से कम इसने एक समुदाय विशेष को अपने अतीत और इतिहास को जानने के प्रति उद्वेलित तो किया। शायद शब्द साधक जूरी के माननीय सदस्यों ने अपना यह भरोसा उपन्यास की इस सार्थकता में भी जताया होगा। मैं एक बार पिफर जे.सी. जोशी स्मृति सम्मान के आयोजकों और विशेष रूप से जूरी के सदस्यों का पुनः आभार व्यक्त करता हूँ तथा अपने पाठकों, आत्मियों और अपने आलोचकों एवं निदंकों को पूरा विश्वास दिलाता हूँ कि उनके इस भरोसे को बनाए रखने का मैं पूरा प्रयास करूँगा-धन्यवाद।

 
 
अपूर्वानंद :

इस पुरस्कार के योग्य समझे जाने के लिए मैं 'पाखी' परिवार का धन्यवाद व्यक्त करता हूँ। आलोचना के पुरस्कार के साथ जनप्रिय शब्द लगा होना एक विडंबना पूर्ण बात लगी क्योंकि आलोचना और जनप्रिय शब्दों में विरोध है। जैसा आलोचना के बारे में कहा जाता है कि वह देखने की प्रक्रिया से जुड़ी हुई है और देखा जाना हर किसी को अच्छा लगता है। इसलिए कोई किसी को देख रहा हो और वह जिसे देखा जा रहा हो उसे पता चले तो उसे अच्छा ही लगेगा। अब मैं इससे इंकार नहीं कर सकता कि जो यह देखा गया है, इसको पुरस्कार के जरिए पुरस्कृत किया गया। यह अच्छा ही है कि आलोचना के पुरस्कारों की द्घोषणा रचना के पुरस्कारों की द्घोषणा के बाद हुई। आलोचना स्वयं रचना की सहचरी है। वह उसके पीछे चलती है। एक सहचर के भाव से यह प्रश्न जरूर आलोचक के सामने रहता है कि वह क्या कर रहा है। कार्ल मार्क्स ने सेंसर के खिलाफ लिखते हुए कहा था कि सेंसर इसलिए बुरी है कि वह न सिपर्फ मुझे यह बताती है कि मैं यहाँ क्या लिखूँ बल्कि मुझसे मेरे लिखने का अंदाज भी छीन लेना चाहती है।

इंसानी जिंदगी की जद्दोजहद न सिपर्फ अपने इस खास अंदाज की खोज की है बल्कि वह उसकी हिफाजत की जद्दोजहद भी है। यह संद्घर्ष अकेले सिपर्फ आपका संद्घर्ष ही रह जाता है। मेरे अपने अंदाज की खासियत तभी जाहिर हो सकती है जब मेरे चारों ओर अलग-अलग अंदाजों की छटाएँ बिखरी हुई हों। यानी मैं जब अपने अंदाज की हिफाजत की लड़ाई लड़ रहा होता हूँ तो मैं अपने आपकी हिफाजत की लड़ाई भी लड़ रहा होता हूँ। और इस तरह एकपन के विरु( संद्घर्ष करना एक तरह से आलोचना के स्वभाव में है। आलोचना रचना की सहचरी है। इसलिए आलोचना हमेशा रचना को समझने का प्रयास करती है। आलोचना में शायद यह दम नहीं होता कि वह रचना पर निर्णय सुना सके। या रचना को लेकर कोई अदालत सजा कर बैठे।

समझने का यह प्रयास आलोचक के प्रारंभ से अंत तक चलता रहता है। और इसलिए जैसा किसी आलोचक ने कहा है कि दरअसल, आलोचना निरंतर चलने वाली भूल सुधार की प्रक्रिया है। बहुत बार मैंने देखा है कि आलोचक से यह कहा जाता है कि आपने १५ वर्ष पहले इस रचना के बारे में यह कहा था और अब यह कह रहे हैं। और ऐसा कहते हुए वह यह भूल जाता है कि कांसटेंसी न तो रचनाकार का गुण है उसी तरह वह आलोचक का गुण भी नहीं हो सकती क्योंकि आलोचना रचना का सह उत्पाद नहीं है। वह स्वयं अपने आप में रचना है। बहुत पहले मुझे याद है कि डॉ. नामवर जी ने यह बात कही थी कि आलोचक किसी और के लिए नहीं लिखता है वह स्वयं अपने लिए लिखता है और इसलिए रचनाकार खुद अपने लिए लिख सकता है। हो सकता है उस समय उसके सामने कोई पाठक न हो। उसी तरह आलोचना भी आलोचक खुद अपनेआप के लिए अपनी एक रचनात्मक एडल्ट को पूरा करने के लिए लिख रहा होता है।

जब मैं यह कह रहा हूँ तो मैं इस बात के लिए सजग हूँ कि आलोचना के अलग-अलग उपयोग अलग-अलग जगहों पर हैं। एक बहुत बड़ा उपयोग शिक्षा के जगत ने विकसित कर लिया है। मैं स्वयं उसका अंग हूँ। वहाँ रहते हुए मुझे इस बात का शिद्दत से एहसास होता है कि कक्षाओं को हमने एक तरह की प्रतिक्रियाओं के समूह में बदल दिया है यानी जो परीक्षा की अवस्था हमारी शिक्षा क्रम ने विकसित की है। वह परीक्षा व्यवस्था प्रत्येक छात्रा को यह कहना चाहती है कि एक सा उत्तर दो, जो सही गलत कुछ भी नहीं होता। साहित्य में सब कुछ अलग-अलग होता है और इस अलग-अलग होने की रक्षा करना आलोचना का एक कर्त्तव्य है। इस कार्यक्रम के इस वक्तव्य के विषय में जब मैं सोच रहा था उस समय मैं कुंवर नारायण के विषय में पढ़ रहा था। और कुंवर नारायण की एक कविता जो कबीर के बारे में है, यह पंक्तियाँ उन्होंने कबीर के बारे में कही हैं, पर यह आलोचना पर भी उतनी ही लागू होती हैं-'वस्तुगत होकर देखना वस्तुवत होकर देखना है/सही को जानना सही हो जाना है/उनका हर एक शब्द जरूरी भेद करता दृष्टि और दृष्टिदोष में है।'

यह कहते हुए आलोचक को एक तरह से तलवार की धार पर चलने के लिए विवश करता है। रचनाकार की भर्त्सना सहना उसकी नियति है। वह इसको सहता है और वह निरंतर अपने आपको परिवर्तित करता रहता है। जैसा मैंने कहा यदि वह सही आलोचक है तो वह यह दावा नहीं करता कि उसका निर्णय अंतिम है और इसे माना जाना चाहिए। वह दूसरे दिन अपने उस निर्णय को बदल सकता है। मैं सिपर्फ अपनी बात यह कहकर खत्म करना चाहता हूँ कि साहित्य दरअसल, एक बहुत पहले से चली आ रही और न खत्म होने वाली खोज है। शमशेर बहादुर सिंह ने एक जगह लिखा-'हम अगर आप ही अपने दिल और नजर का दायरा तंग न कर लें तो देखेंगे कि हम सब की मिलीजुली जिंदगी में कला के रूपों का खजाना हर तरफ बेहिसाब बिखरा चला गया है। मुझे वह पचड़े वाली दुनिया रंगीन अौर सुंदर दिखलाई पड़ती है। उसका एक-एक काम उसके एक-एक भाव, एक-एक संकेत प्रत्येक उलझाव, पांसे, जाल, उसकी हंसी-खुशी और रोना-गाना यह सब राग-रंग साहित्य इसको अभिव्यक्त करता है और आलोचना उसके बारे में।'

 
 
एस आर हरनोट :

मैं एक शांत और सुन्दर पहाड़ी प्रदेश का निवासी हूँ, जहाँ वर्ष भर लाखों लोग सैलानियों के रूप में भ्रमण करते हैं। कोलाहल और आपाधापी से दूर, नितांत एकांत की तलाश में, न जाने कितने लेखकों ने यहाँ आकर कृतियों का सृजन किया है। इसी प्रदेश की एक पिछड़ी पंचायत में मेरा गाँव है जो शिमला से ५० किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ सड़क, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ हाल ही के वर्षों में पहुँची हैं। लिखना अस्सी के अन्त में शुरू हुआ। हिमाचल की संस्कृति, जनजीवन और दुर्गम कठिन जनजातीय क्षेत्राों की यात्रााओं पर कई पुस्तकें लिखने के बाद भीतर जो अभाव, उपेक्षाएँ और जातिदंश की गहरी टीसें थीं, वे सब कहानियों में रूपान्तरित होकर पंजा, आकाशबेल, पीठ पर पहाड़, हिडिम्ब, मापिफया, दारोश से होती हुई जीनकाठी तक पहुँची हैं।

आप जानते हैं कि पहाड़ का जीवन मैदानों की तुलना में काफी कठिन और विकट है। पहले सुविधाओं के अभाव की तकलीफें थीं। आज अति आधुनिक सुखों की अपनी वेदनाएँ हैं। पहले ये पहाड़ और गाँव निरन्तर संद्घर्ष करते रहने को प्रेरित किया करते थे आज विनाश के संकेत देते दिखते हैं। सरकारों और मल्टिनेशनल कंपनियों द्वारा विकास और आमजन की सुविधाओं के लिए, बीसियों परियोजनाएँ कार्यान्वित की जा रही हैं। ये जिनके लिए हैं, वे कई बार बेद्घर होने की कगार पर चले जाते हैं। वे अपनी परंपरा और संस्कृति के साथ, रोजी रोटी बचाने के लिए, छुटपुट आंदोलन तो करते हैं परन्तु उनके साथ न उनके सरपंच हैं न प्रधान, न प्रशासन है न सरकारें। यहाँ तक कि उनके लोक-देवता भी उनके साथ नहीं हैं जिनके बूते वे ढेरों अभावों और असुविधाओं में पले-बढ़े हैं। वे उनके रथों और पालकियों को लेकर, उनसे भिड़ते तो हैं लेकिन लाठियों और गोलियों के आगे बेबस हो जाते हैं।

पहले पहाड़ लोगों को साहस और हिम्मत देते थे.. बादल और नदियों के पानी से, खेतों में फसलें लहलाया करती थीं। लेकिन किसी सुबह जब कोई ग्रामीण अपने खेत या द्घाट के लिए पानी की कूहल फेरने पहुँचता है तो नदी गायब मिलती है। आज पहाड़ खुद असहाय हो रहे हैं। उनके सीने में जब टनों डाइनामाइट फटते हैं तो उनकी चिंद्घाड़े, आसमान को डराती लगती हैं। अचानक बादल फटते हैं तो न जाने कितने गाँव और खेत पलक झपकते ही खंडहर बन जाते हैं। प्रकृति का क्रोध जब आसमान छूता है तो भयंकर तबाही लिए वह धरती पर फूटता है...विडंबना देखिए कि उसमें भी, वही सर्वहारा अपनी जमा-पूंजी के साथ जीवन तक खो बैठता है।

पंजा कहानी संग्रह से लेकर जीनकाठी तक मैंने इसी गाँव, पहाड़ और वहाँ संद्घर्षरत मनुष्य के बीच काम करते और उनकी दुख-लकलीफों में शामिल होते हुए लिखने का प्रयास किया है। क्योंकि मैं उनसे काल्पनिक रूप से नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से जुड़ा रहा हूँ। ये कथाएँ भारत के किसी भी गाँव-कस्बे की हो सकती हैं। लेकिन पहाड़ों में जो गाँव हैं उनकी समस्याएँ, लकलीफें, प्राथमिकताएँ और शोषण के तरीके बिल्कुल अलग हैं। उनकी संस्कृति और परंपराएँ भीतर तक झकझोरती हैं। वहाँ दलित या स्त्राी विमर्श अलग तरह के हैं, जिन्हें हम उन्हीं के बीच बैठ कर समझ सकते हैं। इसके बावजूद, पिछले कई बरसों से, यह सुनते-सुनते मन भर आया है कि अब पहाड़ और गाँव साहित्य से गुम हो गए हैं। पर्यावरण की साहित्य में बात नहीं होती है। मेरी या मेरी तरह के लेखकों की स्थिति, बिल्कुल वैसी हो जाती है, जैसे एक अपंग बच्चा कोने में बैठा कोई फुटबाल का मैच देख रहा हो।

मैंने उन्हीं मिट्टी के लोगों की आपबीतियाँ लिखने का प्रयास किया है जिनकी पीठ पर चढ़ कर साहूकारों, पंचायत प्रधानों, जमीदारों और छोटे से बड़े राजनेताओं ने अपूर्व संपन्नता और शोहरत हासिल की और आज स्वयं समाज और एलीट सोसाइटी में शिखर पर विराजमान हैं। वही सर्वहारा वर्ग जिसने समाज को श्रम के रूप में समृ(ि का वरदान दिया है, आज समाज की प्रगतिशील मुख्यधारा से अलग हाशिए में जी रहा है। उसे महज कागजों और पर्दों पर, दौड़ा-दौड़ा कर हम, आज कितने ग्लोबल हुए हैं, यह प्रश्न मुझे बार-बार झकझोरता रहा है।

हालांकि ये कहानियाँ, हो सकता है वर्तमान अत्याधुनिक आलोचना की परीक्षा में खरी न उतरती हों, लेकिन आप जब उन्हें स्पर्श करेंगे तो उनमें आपको वंचित समुदायों के दुखों का गीलापन, मानवीय संबंधों का जुड़ाव, रिश्तों की टूटन का विरहभाव, ऊँचे वर्गों की निरंकुशता, नये सत्तावादियों का भ्रष्टाचार, 'लोक' का अनुश्रुत सत्य, परितापग्रस्त लोगों की आपबीतियाँ, प्रकृति से मनुष्य का रिश्ता और विशिष्ट ग्रामीण चरित्राों द्वारा अचरज में डाल देने वाला, जानवरों और पक्षियों से संवाद तथा उनके भीतर शोषण के विरु( लड़ने की छटपटाहट जैसे कई दुर्लभ चित्रा तो मिल ही जाएँगे। मैं अपनी कहानियों में, इसी दुर्लभ और हाशिए पर धकेले गए आदमी को बचाए रखना चाहता हूँ। बिल्कुल उसी तरह जैसे गाँव में दादी या अम्मा, आग
को सुबह के लिए उपले में बचा कर रख लेती है।

आज पुरस्कारों से बहुत डर लगता है। खास कर हम लोगों को जो साहित्य के गढ़ों से बहुत दूर कोने में बैठे हैं। हमें यह दुनिया पत्रिाकाओं से देखने-समझने को मिलती है। लेकिन अभी भी बहुत कुछ अच्छा है जो बचा हुआ है। जे.सी.जोशी स्मृति सम्मान इसका एक बड़ा और ईमानदार उदाहरण है। मेरे लिए आज का दिन कई सम्मान प्राप्त करने का दिन है। ऐसा अवसर पहली बार आया है जब एक मंच पर परम श्र(ेय नामवर जी हों और उनके साथ प्रतिष्ठित और प्रसि( लेखक-आलोचक और पाठकगण मौजूद हों। मैं उन क्षणों को कभी नहीं भूला सकता हूँ जब नामवर जी ने मेरे कहानी-संग्रह दारोश पर वर्ष २००३ में दूरदर्शन के कार्यक्रम में चर्चा की थी और पिछले दिनों जीनकाठी संग्रह पर। मैं इसके लिए नामवर जी का हृदय से आभारी हूँ।

मैं श्री अपूर्व जोशी और श्री प्रेम भारद्वाज और समस्त पाखी परिवार का भी हृदय से आभारी हूँ जो साहित्य के लिए इतना बड़ा काम कर रहे हैं, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ! 'पाखी' ने महज एक साल में साहित्य की दुनिया में अपनी उपस्थिति बड़ी शिद्दत से दर्ज की है जो हिन्दी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण बात है। मैं उन सभी साहित्यविदों का भी दिल से आभारी हूँ जिन्होंने जीनकाठी कहानी-संग्रह को सम्मान के योग्य समझा है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आप सभी का पुनः आभार व्यक्त करता हूँ और भविष्य में निरन्तर लिखते रहने के लिए आपके आशीर्वाद और स्नेह की कामना करता हूँ। धन्यवाद।

 
 
शैलेय :

सर्वप्रथम मैं अपने माता-पिता और अपने हरे-भरे पहाड़ी जन्म स्थान जैंती, रानीखेत, जिला अल्मोड़ा को प्रणाम करता हूँ जहाँ मुझे इस शस्य श्यामला धरती और दुनिया को देखने को जीवन मिला। जीवट मिला कि ऊँचाइयों का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, शिखर पर लहराएँगी सदैव ही पगडंडियाँ!
मैं इतिहास, विज्ञान और संस्कृति का आभारी हूँ कि मुझे मानव सभ्यता का विकास क्रम समझ में आया। मैं विचार और प्रयोग की उस अजस्र-अक्षुण्ण धारा को सलाम करता हूँ जिससे मुझे दुनिया-समाज को समझने की वैज्ञानिक जीवन दृष्टि मिली। सार्थक दायित्वबोध मिला।

साहित्य के संदर्भ में मैं अपने गुरुदेव डॉ. राजेन्द्र कुमार-वर्तमान में संपादक-बहुवचन के प्रति हृदयाभारी हूँ जिन्होंने समय-समय पर कभी प्यार-कभी फटकार के साथ मेरी संवेदना और संस्कारों का परिमार्जन किया। जिससे जनान्दोलनों के साथ-साथ साहित्य के प्रति भी मुझमें प्रतिब(ता जगी।
'पाखी' की प्रथम वर्षगांठ और समारोह के इस पुनीत अवसर पर मैं पाखी संपादक अपूर्व जोशी, प्रेम भारद्वाज को बधाई देता हूँ कि तमाम-तमाम शंकाओं, वाद-विवादों और पूर्वाग्रहों से खुद को बचाए और मुक्त रखते हुए रचनाकारों एवं पाठकों को एक स्वस्थ रचनात्मक मंच प्रदान किया है। अल्प समय में ही यह विशिष्ठ ख्याति-अर्जन सचमुच में दुर्लभ व श्लाद्घनीय है।

हम सभी जानते हैं कि आज पूरी दुनिया में हर अच्छे इंसान, विचार और व्यवहार पर छल-छद्म प्रपंच-पाखंड भरी साम्राज्यवादी काली ताकतों का कहर बरपा हुआ है। विश्वग्राम के नकाब के भीतर इस वैश्वीकरण का असली चेहरा और चरित्रा कैसा है, यह तिल-तिल टूटती-बदहाल होती आम आदमी की जिंदगी में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। जाहिर है कि ऐसे आसन्न संकट के दौर में एक सजग, सतर्क और प्रतिब( रचनाकार की जिम्मेदारी कई स्तरों पर व कई-कई गुना बढ़ जाती है। हमें ध्यान रखना है कि वर्तमान में संद्घर्ष के हमारे कार्यभार क्या-क्या होने चाहिए क्योंकि आने वाला समय हमसे हिसाब और जवाब मांगेगा।

मित्राो! मुझे 'जनप्रिय लेखक' का यह प्रतिष्ठित सम्मान कविता के लिए मिला है। चूंकि मैं सकर्मक रचनाधर्मिता का पक्षधर हूँ, इसलिए कविता में मेरी आस्था क्यों है, एक कविता के माध्यम से ही बताना चाहता हूँ -
आखिर/कोई कितनी लड़ाइयाँ लड़ सकता है/इतनी लड़ाइयों के खिलाफ एक साथ/सहोदरों से कहता हूँ कि/चलो मिलकर भिड़ें/वहाँ बैनरों के झगड़े हैं/बिना संवाद/हर कोई दूसरे को/आधा-अधूरा और तंग कह रहा है/बदहाल-लाचार-भोली जनता/अब/प्रारब्ध को ही/निर्णायक न माने तो क्या करे?/आग-पानी लिए/केवल कविता ही हौसला संभाले है कि/एक रोज अंततः/संशय छटेंगे/नये विमर्श में/सभी साथ होंगे और/इसी ८ामीन पर/नये समय के नये सपफ़े लिखेंगे/बस इसीलिए/कविता मेरा कोई शौक नहीं है कि/मन लगा रहे/गाड़े अयाल की गुदगुदी संजोए/जबकि/एक जन कविता के कितने जोखिम हैं/कौन नहीं जानता/मुझे पफ़ है कि/चाहे जितना और जैसा द्घमासान हो/यह कविता/न खुद कभी कोई टेड़ा-मेढ़ा वार करती है/न ही इसके साथ/किसी तरह की कोई लुका-छिपी संभव है।
धन्यवाद। आप सबको मेरा नई सुबह के सूरज सा सुर्ख सलाम।

 
 
रमेश कुमार वर्णवाल :

मैं एक अदना कवि हूँ। मैं साहित्य जगत में बहुत जाना जाऊं इसकी बहुत चिंता भी कभी नहीं रही। हाँ! अच्छी कविताएँ जानी जाएँ इसकी आकांक्षा रही है। मैंने अच्छी कविताएँ बहुत कम लिखी हैं। मेरी कविताओं की संख्या लगभग १५० होगी। लेकिन उनमें अच्छी कविताएँ बहुत कम हैं। शायद इसका कारण मेरा यह बोध है कि कविता सिपर्फ अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि कलात्मक अभिव्यक्ति है। वह हमारे मन की कलात्मक परिणति है। कला सहज और सरल भी हो सकती है और जटिल भी। नागार्जुन और शमशेर दोनों बहुत बड़े कलाकार हैं वे मेरे प्रिय कवि हैं। लेकिन मैंने इन दिनों कवियों से ही नहीं, अपनी भाषा के बहुत से कवियों से बहुत कुछ सीखा है बहुत कुछ समझा है। लेकिन मैं अपनी राह तलाशना चाहता हूँ। हालांकि वह राह अभी तलाश नहीं पाया हूँ। और बार-बार हार जाता हूँ खो जाता हूँ। मेरी कविता एक खोए हुए आदमी की खोई हुई अवस्था में पाई गयी वस्तु है। मुझे अभी कोई मंजिल नहीं मिली है।

मैं यह सच कह रहा हूँ कि मैं अभी कोई बात अंतिम रूप से नहीं जान पाया हूँ। हालांकि सामान्य समझ है मुझमें। इसकी वजह यह है कि कोई भी चीज मुझे बहुत सरल और स्पष्ट नहीं लगती। मैं पिफर कहता हूँ यह बहुत सरल और स्पष्ट नहीं है। क्योंकि जीवन की बहुत परिस्थितियों से इनका गुजरना और इनकी परीक्षा होना बाकी होता है। और यही वजह है कि बहुत स्पष्टता और मुखरता कविता में हमेशा अच्छी नहीं होती। क्योंकि इससे धोखे और दोहरेपन की पहचान बहुत मुश्किल हो जाती है। यह धोखापन और दोहरापन अपना भी हो सकता है। मैं और इस यथार्थ जीवन यात्राा में मेरे जैसे नये-नये साहित्यकार सभी सामयिक द्घटनाओं से, राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय द्घटनाओं से प्रभावित, चिन्ताग्रस्त, विचलित होते हैं। लेकिन एक कविता प्रेमी होने के बावजूद मैं कहता हूँ कि मैं कविता में इसका समाधान नहीं खोजता। कविता में एक सीधा-सीधा समाधान हम खोजते हैं या प्रस्तुत करते हैं तो वो हमें उस सरलता की ओर ले जाती है जो शायद हमें धोखा भी दे रही हो।

इस मोर्चे पर कविता की सशक्त अभिव्यक्ति भी बहुत कमजोर परिणाम पैदा करती है। इसलिए एक कवि के तौर पर हम कविता को अपनी ढाल नहीं बना सकते। कविता जीवन नहीं है। जीवन की छाया है। अंत में मैं श्री अपूर्व जोशी जी को एवं जो निर्णायक गण थे उनका आभार व्यक्त करता हूँ। इस पुरस्कार से इतनी सार्थकता जरूर होगी कि कुछ और अच्छी कविताएँ लिखने का प्रोत्साहन मुझे मिलेगा। मेरे माता-पिता हैं, भाई हैं, मेरी प्रेमिका है और बहुत से रिश्ते हैं। सब मुझमें हैं, सब में मैं हूँ। अंत में एक और बात कि आप मुझे भूल जाएँ लेकिन जो रचना पुरस्कृत हुई है, अवसर मिले तो अवश्य पढ़ें।

 
 
संजीव :
'पाखी' के संपादक अपूर्व जोशी ने मुझ पर केंद्रित अंक निकाला इसके लिए आभार। लेकिन एक शिकायत भी है जोशी जी से मेरी जाती दुश्मनी थी जो उन्होंने मुझ पर अंक निकाला और चित्रा भी ऐसा दिया कि संभवतः मैं तमतमाया हुआ हूँ। विद्रूप चित्रा के साथ मुझे यह अंक स्वीकारना पड़ रहा है। इस चित्रा में विचित्रा क्या है वह शिवमूर्ति जी ही जानें और तमाम लोग जानें। इन सभी ने मेरी बखिया उधेड़ कर खूब नमक मिर्च भरा है। मैं भी समय आने पर अगर जिन्दा रहा तो जवाब दूँगा। इस वादे के साथ आज के 'पाखी' के इस मिश्रित एवं साहित्यिक कार्यक्रम में जो लोग पुरस्कृत हुए हैं सभी को बधाई। 'पाखी' के पूरे परिवार को भी बधाई। जो मशाल जलाई है और इसमें उन्होंने जो नये-नये उपकरण जोड़े हैं उससे उम्मीद है कि हिन्दी उतनी बेचारी नहीं होगी। धन्यवाद।
 
 
विश्वनाथ त्रिापाठी :

मित्राो जब पाखी की शुरूआत हुई थी तभी लग गया था कि पाखी कुछ अलग ढंग की पत्रिाका होगी। इससे मेरा आशय है कि जो हो रहा है उससे बेहतर होगा। मैंने पहले कहा था कि 'पाखी' में प्रूफ की जो गलतियाँ हैं वह दूर होनी चाहिए। मुझे खुशी है कि उसमें सुधार हुआ है। यह कहा जाता है कोई गुटबाजी नहीं है। पर यदि अच्छे लोगों का गुट बने तो बुराई नहीं है। यह अच्छा है कि ऐसा गुट यहाँ पर है। अच्छा काम हो रहा है। कुछ अच्छे लोग बैठकर अच्छी योजनाएँ बनाते हैं। आपके प्रकाशन से एक किताब छपी थी 'सूरज को तो उगना ही था' उसे मैंने पढ़ा था।

पढ़ने से पहले मेरे पास शेखर जोशी का फोन आया और कहा कि मैं उसे पढ़ूँ। अगर उस किताब को पढ़ोगे तो 'कोसी के द्घटवार' को फेंक दोगे। हिन्दी में ऐसे रचनाकार हैं जो यह कहते हैं कि यह नया लेखक आया है जो मुझसे अच्छा लिख रहा है। पिफर मैंने उस रचना को पढ़ा। उसको पढ़ने के बाद मैं बहुत उद्विग्न हुआ, विक्षिप्त भी। मुझे ऐसा लगा कि मैं किताब नहीं पढ़ रहा हूँ समय पढ़ रहा हूँ। यह अवसर मुझे जोशी जी एवं पाखी परिवार ने दिया।
यहाँ सम्मानित सभी रचनाकारों को बधाई देता हूँ धन्यवाद।

 
 
नामवर सिंह :

यह खुशी का विषय है कि पाखी ने एक वर्ष पूरा कर लिया और दूसरे वर्ष में प्रवेश कर गयी। एक वर्ष में ही कोई पत्रिाका अगर पहचान बना लेती है तो ये जता देती है कि आगे चले तो अच्छा है। अपभ्रंश का एक दोहा ऐसे समय में याद आता है-जिसका अर्थ है अगर उगते ही सूर्य ने अपना ताप प्रगट नहीं किया तो द्घटिया है। दिन गिने हुए मिले हैं। अगर कोई पत्रिाका उगते ही अपना ताप प्रकट नहीं करती है तो वह १०० साल तक दीर्द्घायु हो क्या फर्क पड़ता है। 'पाखी' ने जिन्हें आज यहाँ पुरस्कृत किया है वे लगभग मेरे सभी प्रिय लेखक एवं कवि हैं। मुझे खुशी है कि पाखी ने उन्हें पुरस्कृत किया। मेरी इच्छा है कि इन पुरस्कारों के चयन-मंडल प्रत्येक वर्ष बदलता रहे। क्योंकि इन्हीं पुरस्कारों से पाखी की साख बनी है। पुरस्कार पाने वाले पुरस्कार को सार्थक बनाते हैं, देने वाला नहीं। धीरे-धीरे इसकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

'पाखी' ने संजीव पर एक विशेषांक निकाला है। एक महत्वपूर्ण एवं सार्थक कथाकार को उन्होंने चुना जो अंशतः उपेक्षित भी रहा। इस अवसर पर मैं आत्म-स्वीकार करना चाहूँगा कि उनकी एक कहानी 'हंस' में 'आरोहण' पढ़ी थी और बहुत अच्छी लगी थी। उसके बाद उनके कुछ उपन्यास पढ़े। इस बीच वाग्देवी प्रकाशन से इनकी कहानियों का संग्रह छपा है-सागर सीमांत। जब से बातचीत हुई तब तक वे कहानियाँ मैंने नहीं पढ़ी थीं। केवल 'आरोहण' मैंने पढ़ी थी। जब मैंने पढ़ी तब मैं चकित रह गया कि कैसे मैंने इसको नहीं पढ़ा और उसके बाद जो पश्चाताप हुआ उसकी क्षतिपूर्ति तभी होगी जब मैं इस पर लिखूँ और मैं लिखना चाहता हूँ। खासतौर पर इसकी आखिरी कहानी 'सागर सीमांत' पर। यह अद्भुद कहानी है।

एक कहानीकार के रूप में संजीव कैसे उपेक्षित रह गये। वे थोड़े ऐसे कथाकारों में से हैं जिनकी कहानियाँ आत्मकथात्मक नहीं हैं। यह मामूली बात नहीं है। अधिकांश कहानीकार हैं जो कहीं न कहीं कहानी में मौजूद रहते हैं। इतना आत्म निरपेक्ष होकर जीवन और समाज को देखना बड़ी बात है। मैं लिखकर अपनी इस भूल को दुरुस्त करने की कोशिश करूँगा। संजीव पर यह विशेष अंक निकालना पाखी का बहुत महत्वपूर्ण कार्य है। इस अवसर पर यहाँ उपस्थित हूँ, अपने आप को धन्य मानता हूँ। इसके लिए पाखी परिवार का आभार व्यक्त करता हूँ।

 
 
शहरी बनें और खत्म हो जाएँ
 
'पाखी' महोत्सव के दूसरे सत्रा में 'साहित्य और पत्राकारिता में गाँव' विषयक संगोष्ठी का आयोजन हुआ। वक्ताओं ने गाँव के शहरों में तब्दील होने पर गहरी चिंता जताई। लोगों का मन शहरों में भी नहीं। और हम शहर में गाँव की खोज कर रहे हैं। संगोष्ठी में कई नए तथ्य सामने आए और इस बात का अहसास गहरा हुआ कि देश की राजनीति किस तरह गाँव के प्रति संवेदनहीन हो चली है।
 
विद्यासागर नौटियाल :

भारत की ८० प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में रहती है। मुझे नहीं पता कि यह आंकड़ा सही है या गलत है। लेकिन मैं इस तथ्य की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूँगा कि भारत की वह जनता जिसका अधिकांश गाँवों में रहता है उसका दिल अब गाँवों में नहीं रहता। पहले जब जमींदारियां खत्म हुई थीं तो पुराने जमींदारों के बेटे गाँवों से भागकर शहरों में आ गये थे और नौकरियां तलाश करने लगे थे। लोगों को बुरा लगता था कि वे नौकरियों के लिए गाँवों के साथ ही माता-पिता को भी छोड़कर चले गये। उनके माता-पिता ने गाँवों को नहीं छोड़ा।

उनका दिल उन्हीं गाँवों में रहता था। और आज बहुत ही मामूली व्यक्ति का बेटा गाँव छोड़कर गया है उसके पिता का दिल गाँवों में नहीं लगता। उसका दिल न्यूयार्क और वाशिंगटन में रहता है। चाहे वे खुद देहात में रहते हों पर दिल से वे यहाँ नहीं रहते। अगर यह बात सच न होती तो जो मैं समय-समय पर विभिन्न वक्तव्यों को सुनता रहता हूँ उनमें कहीं आपको शिवप्रसाद का नाम या मार्केंडे का नाम सुनाई देता है-देहाती लेखन के क्षेत्रा में। क्योंकि आज जो देहातों के बारे में लिखा जा रहा है उसका वही नॉस्टल्जिक विचार हर कहानी में आता है लेकिन आज भी देहात में रहने वाले लेखक लोग उपेक्षित हैं। अगर एक केंद्र न्यूयार्क और वाशिंगटन बने हैं तो इसका एक केंद्र दिल्ली भी है।

मैं अपने लेखन की शुरूआत बनारस से मानता आया हूँ। और बनारस हिन्दुस्तान के सबसे बड़े गाँव का नाम भी है। बनारस का वह जीवन, बनारस की वह मस्ती आज भी नहीं बदली। यह अलग बात है कि वहाँ के लोग भागकर दिल्ली आ गये हों। और बनारस, इलाहाबाद, भोपाल में जो देहाती लेखन होता था वह आज सब गायब होता जा रहा है। उनके बारे में अब जो लिखा जा रहा है वह निष्प्रयोजित ढंग से लिखा जा रहा है।

पत्राकारिता और साहित्य दोनों को जोड़ते हुए एक विषय बनाना मुझे कुछ अटपटा लग रहा है। पचास साल पहले देहात पत्राकारिता में नहीं था। कभी कोई समाचार आ जाता था पर आज हर अखबार के प्रतिनिधि गाँव के अंदर मौजूद हैं। तो जो साहित्य गाँव से लुप्त हो रहा है वह पत्राकारिता में उभर रहा है। मैं समझता हूँ यह बहुत बड़ा अंतर है। हो सकता है यह दृष्टि भेद हो और आप इससे सहमत न हों। लेकिन पत्राकारिता देहात की तरफ फैली है। जितने समाचार पत्रा पढ़े जाने चाहिए उतने आज नहीं पढ़े जाते, पर जितने समाचार पत्रा आज पढ़े जा रहे हैं उतने पहले कभी नहीं पढ़े जाते थे।

समाचार पत्राों के जरिए देहातों में शब्दावली जो सिखाई जा रही है, बड़ी भयानक है। कोई इस पर विचार नहीं करता। एक का अनेक हुआ, उस अनेक का अनेकों कैसे हो गया। कटरपंथ से तालिबान हुआ अब तालिबानों? क्या हुआ तालिबानों? शु( हिन्दी हुई? मैं इस ओर साहित्यकारों का ध्यान दिलाना चाहूँगा। चूंकि अखबार देहातों के अंदर फैल रहे हैं। बच्चे भी इस से शिक्षा लेते हैं। वे यही भाषा बोलते हुए आपकी देहरी में आएँगे। यह भाषा बड़ी भयानक है। इस भाषा से हिन्दी गायब हो गयी है। केवल यह नहीं कि इसमें शु( हिन्दी नहीं है बल्कि यह हमें भ्रष्ट करने का एक ऐसा उदाहरण पेश करती है। मुझे नहीं लगता कि आजादी के बाद कोई समाचार पत्रा, जो आजादी से पहले जनता के आदर्श थे, ने कोई आदर्श पेश किया हो।

 
 
पुण्य प्रसून वाजपेयी :

'पाखी' का जब उद्द्घाटन हो रहा था तब भी मैं मौजूद था। राजेन्द्र यादव जी ने उस दिन एक बात कही थी कि 'पाखी' तभी चलेगी जब आप कुछ ऐसा करें कि अलग हो जाए और अलग न हो तो सनसनीखेज तरीके से हो जाए। बिना इसके कैसे पत्रिाका चलेगी। पता नहीं वह वक्तव्य सही था या गलत था। उसका फैसला एक साल में हुआ होगा। चूंकि एक साल से इस पत्रिाका में मैं भी लिखता रहा और ये लोग लिखवाते रहे। लेकिन 'पाखी' को देखकर यकीनन कहा जा सकता है कि एक साल में 'पाखी' का सरोकार गाँवों से नहीं रहा है। यहाँ राजेन्द्र यादव जी भी बैठे हुए हैं तो 'हंस' का भी सरोकार उस लेखन से नहीं रहा है। हम चूंकि मीडिया से जुड़े हैं और पत्राकारिता में रहना है। और कहा जाता है कि पत्राकारिता और साहित्य का रिश्ता बहुत करीब का है तो पिफर पत्राकारिता के रिश्ते क्यों हो गये। मीडिया के रिश्ते गाँवों से क्यों होते हैं।

नौटियाल जी ने एक बात कही कि अब लोगों का मन गाँवों में रहा नहीं, मुझे लगता है कि अब लोगों का मन शहर में नहीं रहा। इसीलिए बात गाँवों की हो रही है। क्योंकि जो स्थिति जिस रूप में आयी है और बतौर पत्राकार हम लोग देख रहे हैं उससे एक बात साफ है कि यह सरकार गाँव की सरकार नहीं है। इस सरकार से मतलब वर्तमान सरकार से नहीं है। इस सरकार का अर्थ एक लंबी संसदीय प्रक्रिया से है जो सरकार के मंतव्यों को गाँवों तक पहुँचाती है उसके सरोकार गाँवों से नहीं हैं। बीस करोड़ से अधिक लोगों की जरूरत इस सरकार को नहीं है। आप यक़ीन मानिए कोई मतलब नहीं है कि इस देश का वित्त मंत्राी कौन है, कृषि मंत्राी कौन है, प्रधानमंत्राी कौन है, गाँव चलते रहेंगे। और खासतौर से नदियों के किनारे जिन जगहों पर खेती होती है उसे वाकई कोई मतलब नहीं है कि उसके प्रदेश का मुख्यमंत्राी कौन है, कौन कृषि मंत्राी है। कोई स्थिति उसके साथ जुड़ती ही नहीं है। क्योंकि नीतियां उसके साथ नहीं जुड़ी हैं, सरकार उसके साथ नहीं खड़ी है तो वह व्यक्ति अपनी धुरी से अपने तरीके से न सिपर्फ अन्न उपजा रहा है बल्कि रोजगार की व्यवस्था भी कर रहा है।

एक समूचा ढांचा ग्रामीण जीवन से जुड़ा हुआ है। गाँवों से निकले हुए लोग जो शहर तक आते हैं नौकरीपेशे से उनकी तादात गिनी जा सकती है। वर्ष १९५१ का आंकड़ा बताता है कि इस देश के ५७ प्रतिशत लोग किसान थे। १० साल बाद आंकड़ा खिसक कर ५१ प्रतिशत पर आ गया था। अब २००१ का आंकड़ा बताता है कि किसानों की संख्या द्घटते-द्घटते २८ फीसदी आ गई। ऐसा नहीं है कि बाकी सब बेहतर रोजगार पा गये हैं बल्कि वे मजदूरों में तब्दील हो गये हैं। जमीन पर कब्जा हो गया है। तकरीबन ५ करोड़ लोग इस नई अर्थ व्यवस्था के तहत विस्थापित हो गये हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी स्थिति सुधर गयी है या कमोबेश स्थिति अच्छी हो गयी है या उनको मुआवजे के तौर पर जो राशि दी गयी होगी वो उनको बेहतरीन जीवन दे देगी ऐसा भी नहीं है। उनकी स्थिति बद से बदतर हो रही है।

यह स्थिति मीडिया के भीतर नहीं झलकती है। सवाल है कि मीडिया उस दिशा में क्यों देखेगी जब सरकार नहीं देख रही है। सरकार जिन परिस्थितियों में चैनल का लाइसेंस देती है या अखबार के नामों को लेकर जिस तरह की जद्दोजहद होती है और जिस तरह अखबारों को कागज मिलते हैं और उसके लिए विज्ञापनों की जो मारामारी होती है। हमें नहीं लगता है कि इसमें कहीं गाँवों की जरूरत है मीडिया को। यहाँ से दूसरा सवाल खड़ा होता है। अगर गाँवों को हटा दिया जाए तो इस देश की संसदीय व्यवस्था चल सकती है? यकीनन नहीं चल सकती। राहुल गाँधी को भी कलावती चाहिए। लेकिन कलावती के गाँवों की स्थिति क्या है यह मीडिया को नहीं दिखाई देती। यह किसी भी रूप में सामने नहीं आ पाएगी। या तो कलावती आएगी या राहुल गाँधी आएँगे। हो सकता है वह किसी दलित के यहाँ रात गुजारेंगे तो वह दलित एक शख्स के तौर पर आ जाएगा।

इसका मतलब है कि एक पूरा तंत्रा खड़ा हो रहा है जो भीड़ में सबको अकेला कर रहा है। यानी इस दौर में चालीस हजार किसानों ने आत्महत्या की है तो हम कह सकते हैं कि चालीस हजार अकेले किसानों ने आत्महत्या की है। इसका दूसरा पक्ष अब शुरू होता है। नौटियाल जी ने एक अच्छी बात कही। भाषा के तौर पर हम भाषा की ओर नहीं जा रहे हैं, हम कंटेंट की ओर जा रहे हैं। एक संवादहीनता बनाई जा रही है। स्टेट की भाषा नहीं समझ में आ रही है लोगों को। गाँव की भाषा स्टेट समझने को तैयार नहीं हैं तो मीडिया और साहित्य क्या समझेगा उस भाषा को। एक संवादहीनता ऐसी बना दी जाएगी जहाँ आप एक मानवरूप में महसूस ही नहीं करेंगे किस तादाद में लोग मारे जा रहे हैं और उनके दर्द क्या हैं? हम अपने आपको अलग खड़ा कर लेंगे, खडे़ हैं, लगातार खड़े हैं। हमें कोई मतलब नहीं है ग्रामीण क्षेत्राों में क्या स्थिति बनती जा रही है। क्योंकि हमारी जरूरत हमारे इर्द-गिर्द का वातावरण हमें लगातार न सिपर्फ अकेला कर रहा है बल्कि हमारे अकेलेपन को उन्हीं परिस्थितियों के साथ जोड़ रहा है जो हमारी थी नहीं। हम गुलामी कर रहे हैं परिस्थितियों की। इस ताने-बाने को जोड़ते चले जा रहे हैं। निजी टेलीविजन तो १० साल से है। न्यूज चैनल आने का सिलसिला १९९३ से शुरू हुआ था। उससे पहले नई अर्थव्यवस्था आ गई थी। नई अर्थव्यवस्था नहीं आती तो ये नये चेहरे नहीं होते सामने।

किसी ने टीवी पर न्यूज चैनल को लेकर दरवाजे खोले थे तो वो नरसिम्हा राव की सरकार थी। इस समय प्राइवेट सेक्टर को इजाजत दी गई थी कि आप मेट्रो पर न्यूज ले आइए। उस दौर में 'वर्ल्ड दिस वीक' या 'आजतक' शुरू होता था पर सुबह के जो कार्यक्रम आते थे वे होते थे। उस दौर में मनमोहन सिंह के प्रयोग भी शुरू हो गये थे। जो एक नई अर्थव्यवस्था खड़ी की जा रही थी वह एक नये संकट के साथ खड़ी की जा रही थी, जो संकट गाँवों में बस रहे थे या जो संकट गाँवों से निकल शहर की ओर झांकने जा रहे थे। गुजरात की सरकार खुल्लम खुल्ला एलान करती है कि हमने सबसे ज्यादा शहर बनाए हैं। यकीनन पिछले ८ साल के भीतर ५० नये शहर गुजरात में बन गये हैं।

इसका मतलब है कि वहाँ गाँव खत्म हो गया है। यकीनन गाँव खत्म हो गया है। यानी गाँव का परिवेश खत्म हो गया। गाँव के संबंध खत्म हो गये। उन संबंधों के आधार पर जो जीवन भारतीय संस्कृति का प्रतीक था वह खत्म हो गया। ये तो गुजरात की बात हुयी। पूरे देश में वही पूरी प्रक्रिया चल रही है। गाँव को शहर बना दिया जा रहा है। और विकास की एक मोटी लकीर यहीं से शुरू की जा रही है। विकास का मतलब अगर आप को उपभोक्ता बनाया जा रहा है तो शायद वह विकास नहीं। इस देश में आप बेहतरीन नागरिक तभी हैं जब आप एसी का प्रयोग करते हैं, जब आप गाड़ियों का प्रयोग करते हैं। इस देश में यदि आप उस व्यवस्था से जुड़े हुए हैं जिसमें आप उपभोक्ता हैं ही नहीं तो आप इस देश के निकृष्ट आदमी हैं। यह इस देश के इकोनॉमी का आधार है। उसमें हम खड़े हो गये हैं। बेगुसराय से दरभंगा तक मैंने देखा कि सड़क के किनारे लोग शतरंज खेल रहे हैं। हमने उनसे पूछा कि आप शतरंज क्यों खेल रहे हैं दूसरे खेल भी तो खेल सकते हैं। वे बोले कि शतरंज के खेलों से अधिक दिन खेला जा सकता है।

एक तीन रुपये का अखबार ;बिहार में एक या दो रुपये में अखबार नहीं मिलतेद्ध पढ़ा जा रहा है। एक एक लाइन पढ़ी जा रही है उस पर जद्दोजहद की जा रही है टकराव हो जाता है पर शतरंज खेली जा रही है। अब उसके बीच में अटल बिहारी वाजपेयी की बात कि समूचे देश में कॉरिडोर ;सड़केंद्ध बना दी जाएँ, तो हमने सवाल किया कि आप के यहाँ तक सड़क पहुँच जाएगी तो क्या होगा। कहा कि गाड़ियाँ दौडं़ेगी। हमें भी लगा कि वे दौड़ीं जब सड़कें कुछ-कुछ बनीं। बिहार में परिवर्तन हुआ और हम वहाँ गये। हमने देखा कि सड़कें बनने से उनके परिवेश या उनकी परिस्थितियों में परिवर्तन नहीं आया। आवाजाही जरूर बढ़ गयी। इससे यह यह जरूर लगता है कि व्यापार बढ़ गया है या उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आ गया है, वास्तव में ऐसा बिल्कुल नहीं है। पर कैपिटल इनकम बिहार के गाँवों में गिर गयी है शहरों में बढ़ी है। पटना की प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है। शहरों की प्रति व्यक्ति औसत आय ;पर कैपिटल इनकमद्ध २५०० रुपये आती है। सरकारी दृष्टिकोण से गाँवों की पर कैपिटल इनकम लगातार उठापठक करने के बावजूद १५००/-पार नहीं कर पा रहा है।

यह गैप शहर और गाँवों का है। शहर में मजदूर हैं। गाँवों में छोटे किसान हैं। जो जमीन के मालिक हैं जाहिर है वे खेती करने नहीं जाते। सवाल यह है कि यहाँ से कोई विकल्प निकलता है कि नहीं निकलता। शहर अगर गाँवों को खत्म करके बनाए जा रहे हैं तो साहित्य और पत्राकारिता का नजरिया क्या है? क्या वही होना चाहिए कि इसी तरीके से तमाम माध्यमों के अंदर गाँव के हम जो सपने संजो रहे हैं कि आप भी शहर वाले बन जाइए। और पिफर खत्म हो जाइए। क्या गाँव के भीतर से उसकी अपनी कोई स्थितियाँ खड़ी नहीं की जा सकती हैं। इन स्थितियों के खड़े होने की दिशा में बढ़ा जा सकता है। क्योंकि बड़ी तादाद है, बड़ी इकोनॉमी है, बड़े लोग हैं, मजदूरों की बड़ी संख्या है। थोड़ी सी लाइन को बदल दीजिए। हम पूरे रेड कॉरिडोर में द्घूमे हैं। माओवादियों का पूरा इलाका जो आंध्र प्रदेश से शुरू होता है और बंगाल तक गया है।

हमें यह आज तक समझ में नहीं आया कि उन इलाकों की जो आर्थिक और सामाजिक स्थितियाँ हैं उन आर्थिक-सामाजिक स्थितियों को लेकर सरकार खुद सवाल क्यों नहीं करती या उन इलाकों से आने वाले जनता के नुमाइंदे सवाल क्यों नहीं खड़ा करते। न वे विधानसभा में खड़े हो पाते हैं और न संसद में। हमें बड़ी तादात में बेहतरीन जीप जो दिल्ली पुलिस के पास नहीं मिलती वह वहाँ मिल जाती है। वहाँ बढ़िया हथियार भी दिखाई देते हैं। १९९० में जब शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्राी थे वह अव्वल राज्यों में था। बाद में कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का नाम आया। तब महाराष्ट्र के पूरे राज्य के बजट से अधिक बजट नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए जारी हो रहा था। लेकिन सवाल यह है वहाँ सड़कें इतनी बेहतरीन हैं कि हवाई जहाज भी चल जाए। चन्द्रपुर और गढ़चौली इलाकों में चले जाइए तो आपको यकीन नहीं होगा कि इतनी चौड़ी सड़कें कि हवाई जहाज लैंड कर जाए। लेकिन जरा सा अंदर खिसकें तो आपको लगेगा कि यहाँ के आदिवासियों की स्थिति ऐसी कैसी हो सकती है जो अभी भी भूसा खाते हैं। ऐसे कैसे हो सकता है।

देश के टॉपटेन वहाँ पर इंडस्ट्री लगाते हैं लेकिन स्थिति यह है कि वहाँ उन्ही को रोजगार नहीं मिल रहा है जिनकी जमींने हथिया ली गयी थीं। ये कैसे हो सकता है? यह है इस देश में। वहाँ के मुद्दे उठकर आते हैं या उन मुद्दों के आसरे वहाँ पर बुंदेलखंड में लोग पहुँचना शुरू हो गये हैं।
पहली बार जब बुंदेलखंड को लेकर हंगामा शुरू हुआ था तो हमने टीवी पर एक व्यक्ति को मरते हुए दिखाया था। मरते हुए से मतलब है कि हमारी रिपोर्टर पहले वहाँ गयी थी। उस समय मैं सहारा में था। वह एक द्घंटे की स्टोरी करके लाई। हमने उसे दिखाया। उसके बाद वह दुबारा वहाँ गई तो उसने वहाँ से फोन किया कि जिस शख्स की हम स्टोरी करके लाए थे वह यहाँ अंतिम साँसे ले रहा है। दूसरी बार जब वह गयी तो राहुल गाँधी भी थे। हाथ में विसलरी बोतल भी थी। यह अलग मसला है कि आप किस तरह से गाँव से जुड़ना चाहते हैं। मायावती का भी एक रूप हो सकता है। वह अपनी स्थिति के द्घेरे में दूसरी चीज को लेकर होंगी। राहुल गाँधी अपने द्घेरे में किसी तीसरी चीज को लेकर चल रहे हैं।
कोई भी पॉलिटीशियन चल सकता है। राजनाथ सिंह को अपनी किसान यात्राा निकालते विदर्भ में देखा। वहाँ उन्होंने एलान किया और सीधे बुंदेलखण्ड भी आये।

इन परिस्थितियों में जुड़ाव बिल्कुल नहीं था। राजनीति के आसरे इन जगहों की समस्याओं का समाधान हो नहीं पा रहा है और जिस मीडिया और साहित्य के जरिए वहाँ कि बातें आ नहीं पा रही हैं तो वहाँ की बातें आएँगी कैसे? हमारा कहना है कि उन जगहों पर लोग पहुँचने शुरू हो गये, कुछ एनजीओ गये, कुछ कार्यक्रम शुरू हुए। स्थिति हो सकता है सुधरी हो लेकिन सवाल यह है कि गाँवों को देखने का नजरिया अभी भी मानवीय तौर पर नहीं आया है कि वहाँ स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है तो मानवीय तौर पर देखें। उसे पूरे रेड कॉरिडोर में इतनी बड़ी तादात मिलिट्री में दौड़ती है तो हमें वाकई कश्मीर नजर आता था जो बॉडर का इलाका था, वहाँ हम देखते थे। कश्मीर में लोग जा कर हैरत करते थे। हम कहते थे जाइए। आंध्र और छत्तीसगढ़ के बार्डर पर खड़े होकर देखिए आप समझ पाएँगे।

हमें नहीं समझ में आता है कि छत्तीसगढ़ से अभी लोग क्या अर्थ लगाते हैं कि या सलवा जुडुम है या नक्सलवाद है। वहाँ के ग्रामीण लोगों की स्थिति क्या है जाकर देखिए। लोग भूखे मर रहे हैं। अब आंध्र की स्थिति है कि लोग वहाँ भूखे मर रहे हैं लेकिन कोई खबर नहीं आ रही है। अगर एक इनकाउंटर हो जाए तो मीडिया में खबर आ जाएगी। पॉलिटिशियन खड़े हो जाएँगे। लेकिन लोग आत्महत्या कर रहे हैं तो खबर नहीं है। इसका मतलब है कि एक पूरी प्रक्रिया के तहत संवादहीन किया जा रहा है। इसमें हम आप सहभागी हैं। संसद की भाषा हमें समझ में नहीं आती है। लोकसभा चैनल द्घर-द्घर में आता है। केबल वालों की मजबूरी है कि उसे दिखाना है। आप हैरत में आ जाएँगे कि सूखे पर बात हो रही है वह हंस रहा है, ठहाके लगा रहा है। ऐसा वैसा शख्स ठहाके नहीं लगा रहा है। ऐसा शख्स है जिसके वाकई सरोकार रहे हैं। इसका मतलब है कि इस दौर में जो सरोकार का शब्द आज है हो सकता है वह और दयनीय हो जाए और वह लकीर पतली होती चली जाए।

तब आप क्या कहेंगे। हम और संवेदनहीन होते जाएँगे। तब क्या स्थितियाँ बचेंगी। जुड़ाव कैसे होगा किस रूप में होगा क्या इन परिस्थितियों को हमें खारिज करना होगा मौन धारण करना होगा। अक्सर जिक्र करते हैं कि महाराष्ट्र में हमने तीन आदर्श गाँव बनाए हैं उसमें एक गाँव विदर्भ का भी है। यह वाकई आदर्श गाँव है। सवाल है किस दौर में? एक बात हमारे जहन में आती है कि क्या इस पूरे रेड कॉरिडोर में अपने स्वावलम्बन की स्थिति देखी जा सकती है? नहीं। यह एक फैक्ट है इसलिए यह माना जा रहा है

माओवादी एक धुरी के बाद फेल हो रहे हैं। दूसरा पक्ष यह भी है कि उन्हें बंदूक की तरफ बार-बार ढकेला जा रहा है तो वे अल्टरनेटिव कैसे दे पाएँगे। इसका जिक्र अरुंधती राय ने अपने लेखों में किया भी है। यह एक फैक्ट है लेकिन एक दूसरा हिस्सा भी यहीं से शुरू होता है कि इस देश में लगातार ६० बार ६० बजट आ चुके हैं। १२ पंचवर्षीय योजनाएँ बन चुकी हैं। उस समय से अब तक किसी भी नेता का वक्तव्य या किताब उठाकर पढ़ लीजिए। वह एक ही बात बार-बार कह रहा है कि गाँव खत्म हो रहे हैं। मधुलिमये, मधु दंडवते हों, उससे पहले लोहिया को ले लें वे लगातार कह रहे हैं। आज भी यही बात कही जा रही है। पहले ही मैंने बताया कि गाँवों की जनसंख्या ५७ प्रतिशत से २८ प्रतिशत हो गई है। लोग मजदूरों में तबदील हो गये हैं। क्या मीडिया की यह जरूरत नहीं है। क्या साहित्य की यह जरूरत नहीं है। क्या इसमें लिखा जाना नहीं चाहिए। हमें लगता है कि नहीं है। ठीक कहा नौटियाल जी ने कि इस दौर में चीजें बिकने लगी हैं। लोग पढ़ रहे हैं।

बड़ी तादात में पाठक वर्ग तैयार हो गया है। बड़ी तादात में अखबार छपने लगे हैं। लेकिन सवाल है कि इस पूरी प्रक्रिया में वाकई ऐसी शु(ता है, ऐसे मुद्दे उभरेंगे कि टीवी का टी आर पी नहीं देंगे। अखबार पढ़े नहीं जाएँगे, हम ऐसा नहीं मानते। हमें ऐसा नहीं लगता। हमें लगता है कि शायद एक ऐसी स्थिति देश के भीतर बनाई जा रही है या बना दी गई है या उसमें हम सहभागी होते चले जा रहे हैं। जहाँ पर आप अपनी मौजूदगी का एहसास इस बात को लेकर करें कि आप जहाँ पर खड़े हैं वहाँ पर आप अपराधी हैं। अगर आप उस विजन के साथ जुड़ेंगे तो आपको यह पदवी भी छोड़नी पड़ेगी। यह सुविधाएँ भी त्यागनी पड़ेगीं और इसके बाद आप के सामने मुश्किलें आ जाएँगी और वे मुश्किलें आपको खेल में बनाए रखेंगी। यह स्थिति आ रही है। मीडिया के संपादक हमें नहीं लगता है कि आज की तादात में उन्हें जितने पैसे मिलते हैं या वह जिस सुविधा के साथ सत्ता से जुड़ रहे हैं। मारा मारी चल रही है कि राज्य सभा कौन पत्राकार जाएगा। पत्राकारों का नजरिया है। आपकी स्थिति तो पत्राकारों वालों थी आप तो चौथे खम्भे हैं। आप तो नजर रखेंगे। लेकिन नहीं सरकार में शामिल होने की होड़ मची है।

हम नाम लेकर आपको बताते हैं कि पिछले दिनों की बात है। चन्दन मित्राा तो नॉमिनेटेड हैं। चन्दन मित्राा बेहतरीन पत्राकार हैं। जब जसवंत सिंह को पार्टी ने निकाल दिया गया तो हमने पूछा कि एक टेलीफोन पर किसी को निकाल देना यह कहाँ तक सही है? उन्होंने कहा कि मुझे अभी तक खबर मिली नहीं है। तो मैंने कहा कि जसवंत सिंह ने खुद अपनी प्रेस कोंस में कहा है? यह तो अजीब तानाशाही है। ऐसा नहीं है कि वह नहीं जानते होंगे। वे पार्टी से जुड़े हुए हैं तो उन्हें पार्टी की लाइन लेनी होगी। लेकिन जब आप पत्राकार हैं तो आपको जनता की लाइन लेनी होगी। लेकिन संपादक से आगे का रोल कहाँ जा रहा है। पॉलिटिक्स में जा रहा है। इसका मतलब यह माना जाएगा कि पत्राकारिता एक जगह जा कर स्टैंड हो जा रही है। उसके आगे बढ़ नहीं पा रही है। उसके आगे रास्ता एक राजनीति का निकलता है। और राजनीति जो लगातार अमानवीय होती जा रही है। तमाम विसंगतियों के साथ खड़ी हो रही है। और सुविधाओं को भोग रही है परिस्थितियों को जी रही है। तो क्या यह रास्ता वहाँ जाकर मिलेगा।

मेरे ख्याल से यह सारे सवाल बार-बार हमारे सामने उठते हैं कि आखिर इन स्थितियों को तोड़ने के लिए क्या उन्हीं स्थितियों को अपनाना पड़ेगा, जिन्होंने इन स्थितियों को जन्म दिया है? मुश्किल यह आ रही है कि क्या कोई अल्टरनेटिव किसी रूप में खड़ा करने के तौर तरीके समझ डेवलप हो पाएगा या नहीं हो पाएगा? इस दिशा में हमारे कदम बढ़ पाएँगे या नहीं बढ़ पाएँगे बाहर से कोई नहीं आएगा? यह भी एक फैक्ट है यह हम समझ रहे हैं। हमें उसके बीच में काम करना है। लेकिन हम कभी दबाव समूह होते थे और हम उस स्थिति में भी सामने नहीं आ रहे हैं इस पूरे सिस्टम में और हम उसकी शार्गिदी करते हुए उसे झेला रहे हैं। हमें लगता है कि यह सिवाय धंधे के और कुछ नहीं है। जब स्थितियाँ धंधे में तब्दील हो रही हैं तो मुनाफा देखेंगी और बाजार देखेंगी और उसके जरिए यह बात सामने आएगी कि हमारा अखबार सबसे ज्यादा बिकता है।

देश के दस अखबारों के जितने अधिक पाठक अब हैं आजादी के समय कुल उतने भी नहीं थे। तब क्या करोगे। इस देश में आजादी के दौर में जो स्थिति थी लोग गरीब थे, वैसी ही स्थिति में आजादी के इतने वर्षों बाद भी लोग गरीब हैं। आसमान के नीचे सो रहे हैं। वे विस्थापित हैं। लेकिन वे नेतृत्वहीन हैं, विकल्पहीन हैं। मेरे खयाल से साहित्य और मीडिया का रोल यहाँ से शुरू होता है। हम कुछ कर पाएँ यह बहुत बड़ी बात होगी। बहुत-बहुत शुक्रिया।

 
 
मैनेजर पाण्डे :

यह सही है कि धीरे-धीरे हिन्दी साहित्य की दुनिया शहरों में सिमट गई है। पर एकदम ऐसा नहीं है कि गाँवों की चिंता करने वाले हिन्दी के साहित्यकार नहीं हैं। २००६ में कहानियों का एक संग्रह 'कथा में गाँव' संपादित हुआ था। मैं अपने बड़े भाई नौटियाल जी की इस बात से अपनी असहमति जाहिर करना चाहता हूँ कि गाँव के बारे में जो कुछ लिखा जा रहा है उसमें नॉस्टेल्जिया है, ऐसा एकदम नहीं है। इसी संग्रह में उनकी एक कहानी हैं 'सन्निपात'। इस कहानी में नौटियाल जी ने बताया है कि 'गाँवों में जड़ता, रूढ़िवादिता, स्त्रिायों की तबाही, पराधीनता और उनकी कितनी दुर्गति है। और उसमें स्त्रिायाँ इतनी जागरुक भी हैं कि वे सवाल करती हैं कि आजादी जो देश में आई है वह औरतों के लिए भी है या केवल पुरुषों के लिए ही है।'

यह अकेली कहानी नहीं है जिसमें व्याप्त जड़ता, औरतों की पराधीनता और रूढ़िवादिता की आलोचना है। ऐसा इस संग्रह की अनेक कहानियों में भी है। मैं कहानियों के माध्यम से तीन बातों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। एक बात यह है कि गाँवों में कोई बड़ा आंदोलन नहीं दिखाई देता किसानों का। पर छोटे-छोटे आंदोलन बिहार में, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश में हुए हैं। गाँवों पर जो कहानियाँ लिखी जा रही हैं उनमें छोटे किसान आंदोलन या बड़े आंदोलनों को सामने लाने वाली कहानियाँ नहीं दिखाई दे रही हैं। स्वयं शरद पवार संसद में बयान दे चुके हैं कि डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या की। और इसी विदर्भ में १५ अगस्त को ५ किसानों ने आत्महत्या की। कुल मिलाकर २ लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली। अब तक किसानों की आत्महत्या पर कोई कहानी नहीं प्रकाशित हुई है। तीसरी बात यह है कि गाँवों में अब भी जातिवाद की भयावहता है। उस पर अनेक कहानियाँ मौजूद हैं। दो-तीन कहानियाँ तो इसी संग्रह में हैं जो जातिवाद की जड़ता और अमानवीयता, क्रूरता आदि का विस्तार से चित्राण करती हैं। गाँधी की आकांक्षा के गाँव और गांधियों की आकांक्षाओं के गाँवों में बहुत फर्क है। जब मैं गाँधी की आकांक्षा के गाँव कह रहा हूँ तो मेरा मतलब महात्मा गाँधी से है और गाँधियों से आशय इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी से है।

इन लोगों की गाँवों के बारे में आकांक्षाएँ एकदम भिन्न हैं। गाँधी गाँवों को सजग बनाना चाहते थे। गाँधियों ने गाँवों को बेवकूफ बनाना सीखा है। ऐसी स्थिति में गाँवों का वही हाल होगा जो पुण्यप्रसून विस्तार से बता रहे थे। सवाल यह है कि साहित्य इस पर नजर क्यों नहीं रखता। इसी दिल्ली शहर के बगल में दो क्षेत्राों के गाँव हैं। एक पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दूसरा हरियाणा। वहाँ लड़के-लड़कियों को केवल इसलिए जिन्दा जला दिया जाता है, फांसी दे दी जाती है, सामूहिक हत्या कर दी जाती है कि वे प्रेम करते हैं और विवाह कर लेते हैं। यह १५वीं सदी में होता होगा। यह तो मध्ययुगीनता है दिल्ली की छाती पर। जो चीख-चीखकर कह रही है कि इस पर भी ध्यान दिया जाए। सरकार को कोई चिन्ता नहीं है। हरियाणा में कांग्रेस की सरकार है। बाकी कुछ भी हो पर साहित्यकार कम से कम ऐसा नहीं सोच सकता। यहाँ तो संवेदनशीलता का ठेका लिए बड़े-बड़े साहित्यकार बैठे हुए हैं। लेकिन खबरों के खिलाफ दिल्ली के ५ आदमी भी धरना प्रदर्शन नहीं करते। वे ये भी कहते हैं कि किसी द्घटना पर कविता कहानी लिखने के लिए समय चाहिए। मतलब २२वीं सदी में इस पर कविता और कहानी लिखेंगे। हाल के वर्षों में कहानी के साथ-साथ हिन्दी के उपन्यासों में गाँव दिखाई देता है। गाँवों की दुर्दशा एवं आत्महत्या पर शिवमूर्ति ने लिखा है-'आखिरी छलांग' इसी तरह झारखण्ड के एक लेखक रणेन्द्र ने 'ग्लोबल गाँव के असुर देवता' उपन्यास लिखा है। इसके अलावा भगवानदास मोरवाल ने 'रेत' लिखा है जिस पर उन्हें आज पुरस्कार भी मिल गया है।

अंत में मैं दो कविताओं की चर्चा करूँगा। हिन्दी में बहुत कम कवि ऐसे हैं जो किसानों की आत्महत्या पर भी ध्यान देते हों। बल्कि यहाँ तो ऐसे पार्टीबाज कवि हैं जो नंदीग्राम में किसानों की हत्या करने वाली सरकार की प्रशंसा पर कविता लिखते हैं। राजेश जोशी ने किसानों पर मार्मिक कविताएँ लिखी हैं। ये कविताएँ ऐसी हैं जिनकी व्याख्या की कोई जरूरत नहीं है-संकट बढ़ रहा है/छोटे-छोटे खेत अब नहीं दिखेंगे इस धरती पर/कॉरपोरेट आ रहे हैं/सौंप दो उन्हें अपनी छोटी-छोटी जमींने अपनी मरजी से, नहीं तो जबरदस्ती छीन लेंगे वे/कॉरपोरेट आ रहे हैं/जमीन सौंपने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है तुम्हारे पास/नहीं नहीं यह तो गलत वाक्य बोल गया मैं/विकल्प ही विकल्प है तुम्हारे पास/मसलन भाग सकते हो शहर की ओर/ जहाँ तुम न किसान रहोगे न मजदूर/द्घरेलू नौकर बन सकते हो वहाँ/जैसे महान राजधानी में/झारखण्ड के इलाकों से आने वाली लाखों लड़कियाँ कर रही हैं झाड़ू-वासन के काम/अपराध जगत के दरवाजे पर/नो वैकेंसी का बोर्ड कभी नहीं लगा/अब भी लामबंद न होना चाहो/लड़ना न चाहो अब भी/तो एक सबसे बड़ा विकल्प खुला है आत्महत्या का/किन्तु तुमसे पहले भी चुना है यह विकल्प तुम्हारे कई भाई-बंधुओं ने/लेकिन इतना जान लो/मृत्यु सिपर्फ मर गये आदमी के दुख और तकलीफें दूर करती है/लेकिन बचे हुए की तकलीफों में हो जाता है/थोड़ा और इजाफा।

 
 
राजेन्द्र यादव :

संजीव जी चूंकि मेरे द्घर के पास में ही रहते हैं इसलिए हम एक ही गाड़ी में 'हंस' के दफ्रतर आते-जाते हैं। हमारी सबसे अधिक ज्ञानवर्(क बातें रास्ते के बीच में होती हैं। सुल्तानपुर एक गाँव है जिसने केवल साहित्यकार एवं ड्राइवर पैदा किए हैं। बम्बई में सारे ड्राइवर सुल्तानपुर से हैं। संजीव जी उसी जिले के हैं। उनके हिसाब से तो मैंने गाँव देखा ही नहीं। हालाँकि सात साल मैं गाँव में रहा हूँ। लेकिन मैं प्रमाणिक आदमी नहीं हूँ, गाँव में नहीं रहता हूँ। मैं इस भ्रम का भी मारा हुआ हूँ कि जो भी आज हमारा विकास है वह मध्यवर्ग का किया हुआ है। जितने हमारे समाज को बदलने के, समाज को पहचानने के, समाज को विश्लेषित करने की विचार हैं वह मध्यवर्ग ने दिए हैं।

आज जो हम परिवर्तन देख रहे हैं वह सब मध्यवर्ग ने दिए हैं। वह सारी चीजें जैसी बनी हैं अगर हम बाहर से शहरी धक्का देकर तोड़ने की कोशिश नहीं करते तो गाँव वाले वहीं का वहीं रहते। गाँव के लोग शहर आकर मजदूरी करें, ठेलागिरि करें या दूसरे काम करें। यह एक स्वेच्छा से बनाए हुए संबंध नहीं हैं। क्या हम कोई ऐसा तरीका सोच सकते हैं कि इनके बीच एक सम्मानजनक एवं स्वेच्छा से संबंध बने ताकि दोनों एक दूसरे से लाभान्वित हो सकें। अभी स्थिति यह है जैसा हमारा और संजीव जी का संबंध है-धिक्कार और भर्त्सना का। वे मेरी भर्त्सना करते हैं कि मैं शहरी हूँ, मैं उन्हें धिक्कारता हूँ कि तुम गाँव में ही रहोगे।

ये संबंध आज हैं। जो बहुत स्वस्थ नहीं हैं। और इस पर मैं बहुत कहने लायक और अधिकारी भी नहीं हूँ। मैं मानता हूँ कि इस गोष्ठी को एक लम्बा समय चाहिए था। अगर विस्तार से इस पर बातें होतीं तो ज्यादा अच्छा होता। जैसा कि मैनेजर पाण्डे ने सजेस्ट किया था कि इस पर केंद्रित अंक 'पाखी' क्यों नहीं निकालती। इन्हीं शब्दों के साथ मैं शुभकामना देता हूँ 'पाखी' ने जिस तरह एक साल पूरा किया है, अनेक साल पूरा करे।
प्रस्तुति : प्रतिभा कुशवाहा

 
 
शाम-ए-ग़जल
कार्यक्रम के अंत में सुप्रसि( ग़जल गायक अहमद हुसैन व उस्ताद मोहम्मद हुसैन ने ग़जल प्रस्तुति दी। उन्होंने अपनी मौसिकी एवं आवाज से ऐसा समां बाधा की श्रोता मंत्रामुग्ध हो गए। उन्हें इंडिपेंडेंट मीडिया इनीशिएटिव सोसायटी के प्रबंधक सुनील भारद्वाज ने सम्मानित किया। हुसैन बंधुओं ने प्रमुख रूप से 'हाले गम उनको सुनाते जाइए...', 'चल मेरे साथ चल ए मेरी जाने ग़जलें...' आदि ग़जल सुनायी।
 
 
 
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