अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
प्रेमचंद पर विशेष
प्रगतिशीलता के निकष पर प्रेमचंद : प्रो. ओम रा८ा

हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद शीर्ष पर विराजमान हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उनकी सीमाएँ नहीं थीं जो किसी भी लेखक की होती हैं। प्रेमचंद के जीवन काल से अब तक उनकी प्रगतिशीलता और उनकी कमजोरियों को 'माइक्रोस्कोप' लेकर ढूंढ़ने की कोशिश की जाती रही है।

प्रेमचंद के बेटे अमृत राय ने 'प्रेमचंद की प्रासंगिकता' में ठीक ही लिखा- 'प्रेमचंद के जीवन काल में ही उन्हें ओछा सि( करने की मुहिम चलाई गई थी।' बकौल नामवर सिंह-'चुनौती दरअसल प्रेमचंद के ऐतिहासिक महत्व को दी भी नहीं जाती। छोटे-मोटे तथ्यों के मतभेद के बावजूद प्रेमचंद के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार किया जाता है।' लेकिनवादियों की सुदीर्द्घ परंपरा और प्रतिरोध के बावजूद प्रेमचंद की प्रासंगिकता अक्षुण्ण है। हम उनकी पुण्यतिथि ८ अक्टूबर पर कुछ आलेखों के जरिए उन्हें याद कर रहे हैं जो अगर-मगर की राह से होकर गुजरते हैं।


थाकार को खेत जोतते हुए द्घोड़े और आलोचकों को उसे अपने कार्य में बाधा पहुँचाने वाली कुकुरमाछीयों से चेख़ोव द्वारा की गई तुलना से अधिक सार्थक गढ़ंत यह होगा कि कथाकार वह निर्भीक और साहसी नायक है जो आलोचक रूपी हर साँड को यह कहकर ललकारता है-'आ! मुझे मार'! नए और पुराने साँड उससे लड़ते हैं और अंत में परास्त होकर दुम दबाकर भाग जाते हैं, और कथाकार अपनी जगह स्थिर खड़ा हँसता हुआ नजर आता है।
विगत वर्षों में जहाँ प्रेमचंदांध भक्तों की संख्या में अपार वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर कथाजगत के देवतुल्य सम्राट की भव्य प्रतिमा को खण्डित करने वाले शपथब( मूर्तिभंजकों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है।

निकट भविष्य में ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेमचंद के अतिशय प्रशंसावादी भक्त उनके नाम से कोई नया पंथ या सिलसिला स्थापित न कर लें, जिस में मठाधीश या सज्जादःनशीन पीढ़ी दर पीढ़ी पैदा होते रहें तथा प्रेमचंद की आलोचना करने वालों के विरु( कोई लश्कर बना लें तथा उनके विरुद्ध जिहाद का पफ़तवा जारी कर दें। प्रेमचंद ने स्वयं यह दावा कभी नहीं किया कि वह कथाजगत के पहुँचे हुए पीर हैं, उन में देवत्व के अंश विद्यमान हैं तथा उनकी रचनाएँ अंतिम ईश्वरीय कृति हैं। इस संबंध में कथाकार स्वयंप्रकाश का सुझाव है, 'हम प्रेमचंद के भक्त नहीं हो सकते, उन्हें आज के परिप्रेक्ष्य में ठीक से समझने के लिए उनका पुनर्मूल्यांकन करना होगा, न कि उन्हें देव की तरह पूजा जाए' ;हंस, अक्टूबर, २००२, पृ. ८२द्ध

प्रेमचंद, निसंदेह, जनवादी थे। टूटे, फूटे, हारे, थके, दलित, दमित, शोषित वर्ग का अपनी रचनाओं द्वारा प्रतिनिधित्व करने वाले कथालोक के जननायक। चंद्रकांता की संतति को पर्दे के पीछे धकेल कर उन्होंने होरी, धनिया की गोबर संतति को कथा मंच पर प्रतिष्ठापित किया। 'साइमन कमीशन रिपोर्ट्‌स' जैसे सरकारी दस्तावेजों में दर्ज ऐतिहासिक सत्यता के अनुरूप उन्होंने जमीदारों, ठेकेदारों, महाजनों और साहूकारों के अमानवीय शोषण से त्रास्त किसानों का ऐसा सजीव वर्णन किया कि जिसका कोई सानी नहीं है। किन्तु क्या प्रेमचंद प्रगतिशील भी थे?

साहित्य में प्रगतिशील लेखन का चिथीकरण विशुद्ध भारतीय प्रतीत होता है, क्योंकि कार्लबेक्सन तथा आर्थर गैंज द्वारा संपादित-'लिटरेरी टर्मस : ए डिक्शनरी' में प्रोग्रेसिव लेखन जैसी किसी विधा अथवा साहित्यिक आंदोलन का उल्लेख नहीं है। अंग्रे८ाी शब्दकोश में प्रोग्रेसिव अथवा प्रगतिशील होने के जो लक्षण दिए हैं उनके अनुसार प्रगतिशील नए विचारों, सुधारों, सामाजिक परिवर्तन का आकांक्षी तथा रूढ़ियों, व पुरातन सामाजिक सोच और परंपराओं का द्घोर विरोधी होता है। भारतीय संदर्भ में प्रगतिशील कथाकार को वर्णव्यवस्था का द्घोर निंदक और शपथबद्ध शत्राु होना चाहिए। इस संदर्भ में प्रेमचंद की कहानी 'परीक्षा' वह कहानी 'परीक्षा' नहीं जो नादिरशाह के हमले की पृष्ठभूमि पर आधारित है का आलोचनात्मक परीक्षण आवश्यक प्रतीत होता है।

रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजान सिंह अपनी वृ(ावस्था के कारण राजकाज से मुक्त होना चाहते हैं। राजा की यह शर्त है कि वह अपने जैसा दीवान खोज कर ही सेवामुक्त हों। दूसरे दिन देश के प्रसि( पत्राों में यह विज्ञापन निकला कि देवगढ़ के लिए सुयोग्य दीवान की जरूरत है। प्रत्याशी की विद्या पर कम, कर्तव्य का अधिक विचार किया जाएगा। विज्ञापन के प्रत्युत्तर में देवगढ़ में नए-नए, रंग-बिरंगे मनुष्य दिखाई देने लगे। प्रत्येक रेलगाड़ी से उम्मीदवारों का एक मेला सा उतरने लगा। 'पंडित और मौलवियों को भी अपने भाग्य की परीक्षा करने का अवसर मिला।'

उम्मीदवारों में से नए फैशन वाले हॉकी के खिलाड़ी हॉकी खेलने के बाद बैठे दम ले रहे थे। एक किसान की अनाज से भरी गाड़ी नाले की कीचड़ में फँस जाती है। सारे खिलाड़ी पास से गु८ार जाते हैं, लेकिन उन में सहानुभूति नहीं है। उसी समूह में एक ऐसा मनुष्य है जिसने किसान की गाड़ी को ऊपर निकाल दिया। परीक्षा पूरी हो जाती है, परीक्षक किसान के वेश में दीवान जी स्वयं हैं और 'रंग-बिरंगे' खिलाड़ियों के समूह में सफल परीक्षार्थी अकेले पंडित जानकीनाथ हैं। पंडित जानकीनाथ के हृदय में ही 'दया, साहस, आत्मबल और उदारता' ;दीवान के पद के लिए वांछित गुणद्ध पाए जाते हैं।

'परीक्षा' के प्लाट की नींव में प्रेमचंद ने प्रजातांत्रिाक फारमूले के भट्टे में पकी ईंटें प्रयोग की हैं। नियुक्ति हेतु देश के समाचार पत्राों में विज्ञापन, रेलगाड़ी से उम्मीदवारों का मेला उतरना, देवगढ़ में रंग-बिरंगे मनुष्यों की उपस्थिति, चयन प्रक्रिया को-'करियर ओपेन टू टेलेण्ट्स इररेसपेक्टिव कलर, कास्ट एण्ड क्रीड'-का धरातल प्रदान करते हैं। कहानी में इस स्थल तक कहानीकार की लेखकीय चेतना में 'इगेलिटेरियनिज्म' की भावना का उत्तेजनात्मक प्रवाह जारी है। किन्तु यकायक कहानीकार का जातीय पूर्वाग्रह सचेत होकर कहानी के इच्छित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु कहानी के तीसरे पैराग्राफ में ही एक 'स्लूसगेट' का निर्माण कर लेता है। जिससे होकर कथात्मक उद्देश्य की धारा सीधी पंडित जानकीनाथ के दीवान के रूप में चयन में विसर्जित हो जाती है। यह 'स्लूसगेट' है-'पंडितों और मौलवियों को भी अपने भाग्य की परीक्षा करने का अवसर मिला ;प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ, मनोज प्रकाशन, दिल्ली, २००५, पृ. ४३द्ध

केवल ब्राह्मणों में निहित शासनकला में प्रवीणता तथा दक्षता का प्रदर्शन प्रेमचंद ने उपरोक्त कहानी 'परीक्षा' में ही नहीं, अन्यत्रा भी किया है। 'शाप' शीर्षक कहानी में रानी प्रियवंदा कहती हैं-'मैंने सारा प्रबंध पंडित श्रीधर के हाथों में दे दिया है। इस विचार से नहीं कि उनका सम्मान करना मेरा अभीष्ट था, बल्कि मेरी दृष्टि में कोई अन्य पुरुष ऐसा कर्तव्यपरायण, ऐसा निस्पृह, ऐसा सचरित्रा न था।' अभी प्रेमचंद की ब्राह्मण प्रशंसा पूरी नहीं हुई है। उनका 'माऊथपीस' रानी प्रियबंदा ब्राह्मण महिमा का यशोगान पुनः करते हुए कहता हैं-'ऐसा बहुत कम हुआ है कि एक विद्वान पंडित, जिसका सारा जीवन पठन-पाठन में व्यतीत हुआ हो, एक रियासत का बोझ सँभाले, किन्तु राजा बीरबल की भांति पंडित श्रीधर भी सब कुछ कर सकते हैं। मैंने परीक्षार्थ उन्हें यह काम सौंपा था। अनुभव ने सि( कर दिया कि वह इस कार्य के लिए सर्वथा योग्य हैं। ऐसा जान पड़ता है कि कुल परंपरा ने उन्हें अभ्यस्त कर दिया' ;मानसरोवर, भाग-६, राजा पाकेट बुक्स, दिल्ली, २००४, पृ. ५०द्ध

उपरोक्त दोनों कहानियों ;परीक्षा तथा शापद्ध में मात्रा द्घटनाएँ, समय और पात्रा बदले दिखाई देते हैं, अन्यथा दोनों कहानियों में ब्राह्मण प्रशंसा का मूल भाव एक सा है, और एक दूसरे का पूरक प्रतीत होता है।
'शाप' में इंगित 'कुल परंपरा' का विचार 'पशु से मनुष्य' कहानी में सि(ांत रूप में अवतरित हुआ है। कहानी यूं तो दो बु(जिीवियों, डॉ. मेहरा तथा प्रेमशंकर के माध्यम से प्रेमचंद के साम्यवाद, सोशलि८म तथा डेमोक्रेसी के पक्ष और विपक्ष में अपने स्वयं के विचारों के कथात्मक कलाबा८ाी की अभिव्यक्ति है। कहानी में अर्थशास्त्राीय श्रम विभाजन का मुखौटा लगाए चिरपरिचित आँग्वेद के दसवें मण्डल का आदि पुरुष खड़ा दिखाई देता है, जिसके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिाय, उदर से वैश्य तथा जंद्घाओं से शूद्र की उत्पत्ति हुई है।

'किसान भूमि जोतेंगे, जुलाहे कपड़े बुनेंगे, बढ़ई, लोहार, राज, चर्मकार, सब के सब पूर्ववत अपना काम करेंगे। उनकी पंचायतें उनके झगड़ों का निबटारा करेंगी। प्रकृति ने प्राणियों को भिन्न-भिन्न शक्तियाँ प्रदान की हैं, और उनके विकास के लिए भिन्न भिन्न दशाओं की आवश्यकता है। हमारे अस्वाभाविक जीवन का एक परिणाम यह भी है कि हम बलात कवि और शिक्षक बन जाते हैं ;मानसरोवर, भाग-८, उपरोक्त, पृ. ७१द्ध क्या कथा सम्राट के अंतिम शब्दों से यह अर्थ भी निकलता है कि जुलाहे, बढ़ई, लोहार, राज, चर्मकार आदि को वर्ण-व्यवस्था द्वारा निर्धारित विशिष्ट सामाजिक स्थिति में स्थिर रहना चाहिए? क्या स्थिति से उबरने का प्रयास सामाजिक अपराध होगा? क्या किसी जुलाहे या चर्मकार का कवि या शिक्षक बन जाना अस्वाभाविक जीवन का कुपरिणाम होगा? कहानी का 'डिनाऊमेण्ट' अथवा अंतिम निष्कर्ष 'रक्त की शु(ता' की संस्थापना में समाप्त होता है। डॉ. मेहरा प्रेमशंकर को संबोधित करते हुए कहते हैं-'मैं आपके सि(ांतों का कायल नहीं हुआ, पर इस में कोई संदेह नहीं कि आपने एक पशु को मनुष्य बना दिया।

यह आपके सत्संग का फल है, लेकिन क्षमा कीजिएगा, मैं पिफर यही कहूँगा कि आप इस से होशियार रहिएगा। 'यूजेनिक्स' ;सुप्रजनन शास्त्राद्ध अभी तक किसी ऐसे प्रयोग का आविष्कार नहीं कर सका है, जो जन्म के संस्कारों को मिटा दे' ;वही, पृ. ७२द्ध प्रेमचंद सुप्रजनन में अपने व्यक्तिगत विश्वास को 'दूध का दाम' शीर्षक कहानी के पात्रा महेशनाथ के माध्यम से पुष्टि प्रदान करते हुए कहते हैं-'दुनिया में कुछ भी हो जाए, यह यह ही रहेंगे। इन्हें आदमी बनाना कठिन है' ;मानसरोवर, भाग-२, उपरोक्त, पृ. १२५द्ध

प्रेमचंद ने 'हंस', जनवरी १९३४ में 'क्या हम राष्ट्रवादी हैं'-शीर्षक के अन्तर्गत ज्योति प्रसाद निर्मल द्वारा उनकी दो कहानियों-'ब्रह्म का स्वांग' तथा 'सत्याग्रह' को ब्राह्मण विरोधी बताए जाने पर उन्होंने प्रत्युत्तर में यह तर्क दिया था, 'इन कहानियों को छापने वाले सभी संपादक ब्राह्मण हैं' ;तेज सिंह का लेख-प्रेमचंद के दलित, पहल-८०, पृ. २४द्ध प्रेमचंद के ब्राह्मण समर्थक होने का इससे अधिक प्रबल प्रमाण और क्या होगा कि उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा पोषित 'वर्ण-व्यवस्था' तथा 'रक्त की शु(ता' को सामाजिक विकास के लिए श्रेष्ठतर सि( कर दिया था। गुणी और विद्वान ब्राह्मण साहित्यालोचकों द्वारा प्रेमचंद को उपन्यास सम्राट की उपाधि से विभूषित किया जाना, वास्तव में उनके ब्राह्मण समर्थक दृष्टिकोण को पुरस्कृत करना था।

जहाँ तक प्रेमचंद की कहानी 'ब्रह्म का स्वांग' का प्रश्न है, यह कहानी वर्ण-व्यवस्था के प्रति 'पॉजिटिव एप्रोच' की कहानी है, क्योंकि अंतिम रूप से कहानी में 'पति' के माध्यम से विजय शूद्र विरोधी मानसिकता की ही होती है। यह कहानी ब्राह्मण विरोधी अथवा शूद्र समर्थक तो तब होती, जब यह पति के इन उदारवादी विचारों के साथ समाप्त होती-'यह कितना द्घोर अन्याय है कि हम सब एक ही पिता की संतान होते हुए, एक दूसरे से द्घृणा करें, ऊँच-नीच की व्यवस्था में मग्न रहें', किन्तु कहानी के अंत में वर्ण-व्यवस्था विरोधी यह भावना पराजित और निराश दिखाई देती है। कहानी द्वारा प्रतिष्ठापित संदेश कहानी के इन शब्दों में निहित प्रतीत होता है कि, 'एक चमार के पीछे एक ८ामीदार से बैर करूँ, साम्य जैसे दर्शन का एक सि(ांत ही रहा और रहेगा- इनका उपयोग करना असंभव है।

यदि ईश्वर की इच्छा होती कि प्राणीमात्रा को समान सुख प्राप्त हो तो उसे सब को एक ही दशा में रखने से किसने रोका था? वह ऊँच-नीच में भेद ही क्यों देता है? जब उसकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, तो इतनी महान सामाजिक व्यवस्था उसकी आज्ञा के बिना क्यूँकर भंग हो सकती है? जब वह सर्वव्यापी है तो वह अपने ही को ऐसे ऐसे द्घृणोत्पादक अवस्थाओं में क्यूँ रखता है?' ;प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ, कहानियाँ, वही, पृ. १०५ व १०७द्ध इसका सीधा और सपाट अर्थ यह कि वर्ण-व्यवस्था ईश्वर निर्मित अथवा दैविक व अपरिवर्तनीय है, इसे साम्यवादी दर्शन भी नहीं बदल सकता तथा गाडइ८ा इन हैवन एण्ड आल इज राईट विद दा वर्लड।

'सत्याग्रह' में निसंदेह प्रेमचंद ने मोटे राम शास्त्राी को उपहास का पात्रा बनाया है, तथापि वह उनके जातीय गुणों का बखान करने से नहीं चूके हैं-'वह विद्वान है, धर्मकर्म से रहता है, चतुर है।' वास्तव में 'सत्याग्रह' 'पं. मोटेराम की डायरी' तथा 'मोटेराम शास्त्राी' कहानियाँ 'रोमनेक्लेफ' हैं ;जिसमें हास्य व व्यंग्य हो तथा वास्तविक व्यक्तियों को काल्पनिक नामों से चित्रिात किया गया होद्ध मोटेराम शास्त्राी प्रेमचंद के नितांत व्यक्तिशः पात्रा हैं। कुल मिलाकर तीनों कहानियाँ व्यक्ति प्रधान हैं, जाति प्रधान नहीं। प्रेमचंद स्वयं स्वीकार करते हैं कि 'पाठक के मन में उनके ;मोटेराम शास्त्राीद्ध प्रति द्वेष उत्पन्न न हो, हाँ परिहास द्वारा उनकी मनोवृत्ति दिखाई है।'

'अपेक्षा' के संपादक तेजसिंह ने पूर्वोक्त लेख में लिखा है-'अंततः उन्होंने यह निष्कर्ष निकाल ही लिया कि वर्ण-व्यवस्था पर आधारित हिन्दुत्व उनके अणु अणु में भरा है';पहल, वही, पृ. २०६द्ध
काशी विश्वनाथ के मंदिर में अछूतों के प्रवेश का पुरजोर समर्थन ;काशीस्थ ब्राह्मणों द्वारा उनका विरोधद्ध उनकी अपनी ईमानदाराना नीयत और शूद्र समर्थक स्वतंत्रा विचारधारा की अभिव्यक्ति नहीं, अपने 'मैटिनी आइडल' महात्मा गाँधी के कैरिस्मेटिक प्रभाव से ग्रस्त एक गाँधी भक्त की स्वाभाविक प्रतिक्रिया था।

प्रेमचंद की कहानियों के आधार पर मेरा आलोचनात्मक विश्लेषण एक निष्पक्ष आलोचक का है, वर्तमान साहित्य में दलित विमर्श के प्रति राग अथवा द्वेष की अभिव्यक्ति नहीं। मेरी कही बातों की काट करने के लिए प्रेमचंद के कतिपय निर्वाचित भाषणों, लेखों व पात्राों का हवाला दिया जा सकता है। जयशंकर प्रसाद को लिखे एक पत्रा में प्रेमचंद ने लिखा था, 'किस बात पर गर्व करें, वर्णाश्रम धर्म पर जिसने हमारी जड़ खोद डाली।' ;रायकृष्णदास : सन्नाटे में संवाद, इंडिया टूडे वार्षिकी, ९३-३४, पृ. ५द्ध प्रगतिशील लेखक संद्घ के मंच से दिए गए भाषणों, महाजनी सभ्यता के विरु( साम्यवादी चटख लिए लेखों में बहुत से तर्क वर्ण-व्यवस्था के विरोध में दिए गए होंगे, किन्तु इनको प्रस्तुत लेख में उ(ृत कहानियों द्वारा प्रतिपादित विचारों से संब( करके प्रेमचंद के कथाकार की वकालत करना हास्यास्पद प्रयास होगा।

दार्शनिक और कहानीकार एक ही व्यक्ति के दो भिन्न वैचारिक पक्ष हैं। भाषण अथवा वक्तव्य, मंच के उद्देश्य, सि(ांतों और आदर्शों के अनुरूप बोलने की प्रतिबद्धता है तथा वक्ता के रूप में अपनी संस्थापित हैसियत को बरकरार रखने की बौद्धिक कला। अस्पृश्यता के विरुद्ध भाषण देने वाले, श्रोताओं द्वारा तालियाँ पिटवाने के बाद अपने द्घर की चाय की प्यालियों पर अलग-अलग लेबल लगा कर रखते हैं। व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक रूप से द्घोर कट्टरपंथी भी मंच से मंत्रामुग्ध करने वाला धर्मसमभाव पर भाषण झाड़ देते हैं।

जहाँ तक पत्राों का प्रश्न है, साहित्यकारों द्वारा एक दूसरे को लिखे गए साहित्यिक पत्रा 'लव लेटर्स' नहीं होते जिन में प्रेमी अथवा प्रेमिका अपने मन के गुप्त रहस्यों को भावना के प्रवाह में उद्द्घाटित कर दे। साहित्यकारों के पत्रा साहित्य के विशिष्ट विषय तथा विशेष विमर्श पर केंद्रित होते हैं, जिन में बौद्धिक प्रखरता, साहित्यिक व शाब्दिक कलाबा८ाी तथा विषय से संबंधित अर्जित ज्ञान के वार और पलटवार चलते रहते हैं। भाषण और वक्तव्य में हम पूर्व निर्धारित वैचारिक अभिमत को प्रस्तुत करते हैं।

समाचार पत्राों में अपने पक्ष में गढ़ा गया सपफ़ेद झूठ अभिव्यक्त करते हैं। मात्रा कहानी मन की भावनाओं की एक ऐसी अभिव्यक्ति है, जिस में कल्पना की चिड़िया चाहे जिस जंगल और उपवन में भटक ले, लेकिन कहानी रूपी वृक्ष की जिस शीर्ष टहनी पर सुस्ताने बैठती है, वहाँ से उसकी बेइरादा टपकने वाली बीट के अचेतन में व्याप्त सत्य का रंग साफ दिखाई देता है। शेक्सपियर के अनुसार, 'पैसन्स स्पिन दा प्लाट, वी आर बीट्रेड बाइ व्हाट इज फाल्स विद इन'।

अरस्तू की पुस्तक 'पोएटिक्स' के पच्चीसवें अध्याय में आलोचना के सि(ांत के अन्तर्गत परंपरागत सत्य तथा आदर्शात्मक सत्य के मध्य विभेद को स्पष्ट करते हुए सोफोक्लिस तथा यूरीपाइडेस के बीच एक संवाद है। सोफोक्लिस : 'मैं मनुष्यों को जैसा होना चाहिए, का चित्राण करता हूँ।' यूरीपाइडेसः 'और मैं, जैसा वह हैं।' यदि विशुद्ध यथार्थपरक कथा साहित्य रचा जाएगा, तो जर्जर रूढ़ियों, अमानुषिक परंपराओं तथा तर्कहीन अमानवीय व्यवहार की बेड़ियों में जकड़े समाज को साहित्य द्वारा सुधारने तथा परिवर्तित करने की समस्त संभावनाएँ मर जाएँगी। प्रगतिशील और क्रांतिकारी कथा साहित्य में कल्पित आदर्श की प्रतिस्थापना भी आवश्यक है। प्रगतिशील लेखन वही है, जो लेखक के व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों की प्रेतछाया से पूर्णतया मुक्त हो।

ऐसा नहीं कि प्रेमचंद के कहानीकार मन में समाज परिवर्तन की लहर न उठी हो। पुरातन अमानवीय रूढ़ियों तथा सामाजिक परंपराओं के राजमहल को ध्वस्त करके उसके अवशेषों पर मानव समानता और सामाजिक न्याय की ईंटों और गारे से नए स्मारक के निर्माण का जोश न जागा हो, किन्तु यह भी सच है कि वह भारतीय हिन्दू सामाजिक व्यवस्था की सतह पर पसरी वर्ण-व्यवस्था की विशालकाय व्हेल को अपनी जादुई तलवार से कत्ल नहीं कर सके। रायकृष्णदास का मत है कि, 'वैचारिक स्तर पर प्रेमचंद वर्णाश्रम धर्म न मानते हों, लेकिन पठनीय सर्वग्राह्यता और जनमानस की इच्छा के प्रतिकूल कहानियों में विद्रोह नहीं किया।' निसंदेह, वर्ण-व्यवस्था के विरु( प्रेमचंद प्रोमोथियन साहस नहीं जुटा सके। प्रोमोथियस वही है जो देवताओं की भव्य पाकशाला से आग चुरा कर दमित और दलित इंसानों के सर्द चूल्हों में लाकर रख दे।

 
 
 
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