अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
प्रेमचंद पर विशेष
प्रेमचंद के उपन्यास और... : उन्मेष कुमार सिन्हा

अपने समय के सत्ता-विमर्श को आयोजित करने वाले प्रेमचंद हिन्दी के पहले उपन्यासकार हैं। इस विमर्श का मुख्य सवाल है हाशिये की जनता की शोषण से मुक्ति। यह सवाल अंग्रेजों से सत्ता हासिल कर लेने भर से हल नहीं होगा, बल्कि उसके लिए राजनीतिक सत्ता के चरित्रा में बदलाव लाना होगा, उसके पहले उत्पादन संबंधों को बराबरी पर आधारित करना होगा तथा धर्म और इतिहास के दलदलों को भी पाटना होगा। वह स्थापित करते हैं कि कोई भी आन्दोलन आमूल-चूल परिवर्तन तभी कर सकेगा जबकि सबसे निचले पायदान की जनता और उसकी वास्तविक समस्याएँ उसके केन्द्र में हों।

प्रेमचंद के उपन्यासों पर गाँधीवाद का प्रभाव है, इसमें कोई सन्देह नहीं, लेकिन महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि वह गाँधीवाद का अतिक्रमण कहाँ करते हैं। उसी अतिक्रमित बिन्दु पर गाँधी जी की राजनीतिक दृष्टि की सीमाएँ समझ में आती हैं और प्रेमचंद के सत्ता-विमर्श की अपनी ८ामीन भी। प्रेमचंद ने गाँधी जी के चिन्तन और नीतियों को एक हद तक स्वीकार ८ारूर किया। लेकिन चश्मे की तरह नहीं। इसीलिए उनकी यथार्थान्वेषी दृष्टि ने समकालीन भारतीय राजनीतिक-आर्थिक परिदृश्य में कुछ और भी देख लिया जो गाँधीवाद में नहीं अट पाया था।
जिन्हें प्रेमचंद से यह शिकायत है कि उनके उपन्यासों में 'स्वाधीनता संग्राम का सीधा चित्राण बहुत कम मिलता है, इसका कारण प्रेमचंद का जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण भी हो सकता है।'१ उन्हें ठहरकर यह सोचना चाहिए कि क्या राष्ट्रीय स्वाधीनता-आन्दोलन का स्थूल चित्राण ही राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति है? प्रेमचंद ने उससे आगे बढ़कर काम किया। उन्होंने मनुष्य, केन्द्रित राष्ट्रीय भावना के विकास की वास्तविक ८ामीन की तलाश की, जो गाँधी जी और कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता-आन्दोलन के दायरे में ठीक ढंग से नहीं आ पायी थी। यह ८ामीन ८ामींदारों, ताल्लुकेदारों, साहूकारों और पूंजीपतियों की चट्टानों और झाड़-झंखाड़ों को निर्ममतापूर्वक हटाकर तैयार की जाने वाली उर्वर समाजवाद की ज़मीन थी।

गौरतलब है कि गाँधी जी ने बहुत भावुकतापूर्ण ढंग से इन ८ामींदारों-रजवाड़ों-ताल्लुकेदारों-साहूकारों एवं जनता के विषम संबंध को द्घरेलू मामला मानकर, उसे विदेशी सत्ता से मुक्ति के प्रश्न से अलग कर लिया था। संभवतः वह यह मान बैठे थे कि अंग्रेजों से सत्ता हासिल करने की लड़ाई ही इनमें अपने किसानों, खेत-मजदूरों के प्रति लगाव उत्पन्न कर देगा और वे उनके दुख-दर्द को दूर करने में तत्पर होकर एकताब( होंगे। जबकि वास्तविकता यह थी कि इनका और अंग्रेज शासकों का मूल वर्गीय चरित्रा समान था। इसलिए वास्तविक आ८ाादी के लिए इन सबके विरु( एक संयुक्त आन्दोलन की आवश्यकता थी। अंग्रेजी हुकूमत को कम८ाोर करने के लिए भी यह ८ारूरी था, क्योंकि ८ामीदारी प्रणाली उसका एक मजबूत आधार थी। लेकिन गाँधी जी ने इस ऐतिहासिक सच को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने लिखा है-'समय आने पर हमें किसानों से यह कहने में जरा भी हिचकिचाहट न होगी कि वे सरकार को लगान देना मुल्तवी कर दें। लेकिन असहयोग के किसी भी दौर में हम जमींदारों को उनके लगान से वंचित करने की तो कोई भी बात नहीं सोचते। इसलिए किसान-आन्दोलन को किसानों की दशा सुधारने और किसान-जमींदार संबंध को बेहतर बनाने तक ही सीमित रखना चाहिए।'२ यही कारण था कि बीसवीं शताब्दी के दूसरे-तीसरे दशक मे ८ामींदारों-ताल्लुकेदारों के विरु( चलने वाले कई स्वतःस्फूर्त किसान-संद्घर्षों को कांग्रेस द्वारा समर्थन कौन कहे, सीमित करने या दबाने की चेष्टा की गयी।

लेकिन प्रेमचंद ने इस संद्घर्ष की ८ारूरत को गहराई से महसूस किया। रामविलास शर्मा लिखते हैं, 'प्रेमचंद के लिए राष्ट्रीय स्वाधीनता का आन्दोलन तभी सफल हो सकता था जब वह करोड़ों किसानों की अपनी माँगों का आन्दोलन बन जाए।'३ कुँवरपाल सिंह इसे स्पष्ट करते हैं कि, 'प्रेमचंद के लिए राष्ट्रीय मुक्ति का अर्थ केवल विदेशी साम्राज्यवाद से छुटकारा पाने में नहीं है, वे किसानों और मजदूरों को सामंतों और पूँजीपतियों के शोषण से पूर्ण मुक्ति को ही असली स्वराज्य मानते हैं।'४ इसी वि८ान की रचनात्मक उपलब्धि है 'प्रेमाश्रम' ;१९२२द्ध, जो इस ढंग का हिन्दी का पहला उपन्यास है। शोषित-पीड़ित किसानों और खेत मजदूरों की अभूतपूर्व केन्द्रीयता वाला यह उपन्यास अपने समय के तापमान को दर्ज किये हुए है। इसकी रचना के दौरान, यानी बीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्ष में अवध में रामचन्द्र आदि के नेतृत्व में चलने वाले ताल्लुकेदार विरोधी उग्र संद्घर्ष, उसके प्रति गाँधी जी और नेहरू की उपेक्षापूर्ण नीति तथा कांग्रेस द्वारा उसे कमजोर किये जाने की कोशिशों को प्रेमचंद करीब से देख रहे थे। ;इस विडंबनात्मक ऐतिहासिक सच की 'बेदखल' उपन्यास के रूप में कलात्मक पुनर्रचना कमलाकान्त त्रिापाठी ने १९९७ में कीद्ध। उन्हीं दिनों, यानी १९१९ में वह '८ामाना' में 'पुराना ८ामानाः नया ८ामाना' शीर्षक लेख में लिख रहे थे-'आने वाला ८ामाना अब किसानों और मजदूरों का है। दुनिया की रफ्रतार इसका साफ सबूत दे रही है, हिन्दुस्तान इस हवा से बेअसर नहीं रह सकता।'५

पत्नी के पूछने पर कि क्रान्ति हुई तो किसका साथ देंगे, प्रेमचंद ने कहा था-'मजदूरों और काश्तकारों का। मैं पहले ही सबसे कह दूँगा कि मैं तो मजदूर हूँ। तुम फावड़ा चलाते हो, मैं कलम चलाता हूँ। हम दोनों बराबर हैं।'६ कहना न होगा कि प्रेमचंद ने यहाँ बौ(कि श्रम से शारीरिक श्रम को हीन मानने वाली सामंती-पूंँजीवादी दृष्टि को खारिज किया है।
प्रेमाश्रम का नायक वह 'लखनपुर' गाँव है, जिसके शोषित-पीड़ित किसानों में अन्याय के प्रतिकार की चेतना सुगबुगा रही है। 'बलराज' इस नयी चेतना की दमकती लौ है। वह उस नयी पीढ़ी का प्रतिनिधि पात्रा है जो सामंती व्यवस्था से टकराने का तर्क एवं शक्ति, नयी विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद से ग्रहण करने लगी थी। वह 'लखनपुर' के किसानों के नियतिवाद पर चोट करते हुए कहता है-'तुम लोग तो ऐसी हँसी उड़ाते हो, जानो काश्तकार कुछ होता ही नहीं। वह जमींदार की बेगार ही भरने के लिए बनाया गया है। लेकिन मेरे पास जो पत्रा आता है, उसमें लिखा है कि रूस में काश्तकारों ही का राज है, वह जो चाहते हैं करते हैं। उसी के पास कोई देश बलगारी है। वहाँ हाल की बात है, काश्तकारों ने राजा को गद्दी से उतार दिया है और अब किसानों और मजदूरों की पंचायत राज करती है।'७ जब वह भोज के समय अपने लोगों के बीच कहता है कि, 'जो हमसे अधिक काम करता है उसे हमसे अधिक खाना चाहिए।'८ तो वास्तव में एक स्वाभाविक तर्क प(ति पर उस पूरी व्यवस्था को चुनौती देता है जिसमें श्रम करने वाले किसानों के पास कुछ नहीं है और श्रम न करने वाले ८ामींदारों के पास सब कुछ है।

'गौस खाँ' द्वारा बेदखली की धमकी दिये जाने पर 'मनोहर' सीधे चेतावनी देता है-'बेदखली की धमकी दूसरों को दें, यहाँ हमारे खेतों के मेड़ पर कोई आया तो उसके बाल-बच्चे उसके नाम को रोएँगे।'९
उपन्यास में ८ामींदार 'ज्ञानशंकर' और उसकी सहयोगी अंग्रेजी पुलिस के विरु( 'बलराज', 'मनोहर' आदि किसानों के संद्घर्ष का विस्तार से चित्राण किया गया है। ये किसान जीतकर भी हारते हैं और हार कर भी जीतते हैं। 'गौस खाँ' की 'मनोहर' द्वारा हत्या दिखाकर प्रेमचंद यह संकेत देते हैं कि यदि शोषण और अत्याचार रुका नहीं तो परिणाम विस्फोटक हो सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि प्रेमचंद उस 'कादिर खाँ' का व्यक्तित्वांतरण दिखाते हैं जो सदैव 'बलराज', 'मनोहर' आदि किसानों को ८ामींदार से संद्घर्ष करने से रोकता था और प्रेमपूर्वक बातचीत के जरिए समस्या के समाधान का पक्षधर था। वही 'कादिर खाँ' 'गौस खाँ' की हत्या करने वाले 'मनोहर' के लिए कहता है-'हम सब के सब कायर हैं। वही एक मर्द है।'१० यह बदलाव स्पष्ट करता है कि शांति और अहिंसा का दर्शन एक सीमा के बाद शोषितों-पीड़ितों को चुप रखने में असमर्थ हो जाएगा। सर्वथा रिक्त हस्त हो चुके किसानों पर लगान वसूली के लिए 'ज्ञानशंकर' के भीषण अत्याचार का वर्णन करते हुए उपन्यासकार टिप्पणी करता है-'इन अत्याचारों को रोकने वाला अब कौन था? सत्याग्रह में अन्याय को दमन करने की शक्ति है, यह सि(ान्त भ्रांतिपूर्ण सि( हो गया।'११

प्रेमचंद जिस किसान-क्रान्ति का खाका खींचते हैं उसमें स्त्राी भी शामिल है। व्यवस्था को आमूल चूल बदलने का कोई भी आन्दोलन आधी दुनिया को छोड़कर सफल नहीं हो सकता। बरसों से जिस ८ामीन पर लखनपुर का पंचायती अधिकार था और जिसका इस्तेमाल चरागाह के रूप में हो रहा था, जब 'गौस खाँ' उसे अपने कब्जे में लेकर पशुओं के चरने पर रोक लगा देता है तो 'बलराज' की माँ 'बिलासी' आक्रोशित हो उठती है-'कैसा सरकारी हुकुम? सरकार की ८ामीन नहीं है। हमारे मवेशी सदा से यहाँ चरते आए हैं और सदा यहीं चरेंगे। अच्छा सरकारी हुकुम है, आज कह दिया चरावर छोड़ दो, कल कहेंगे अपना-अपना द्घर छोड़ो, पेड़ तले जाकर रहो। ऐसा कोई अंधेर है?'१२ 'गौस खाँ' के अत्याचार के विरु( उसकी आक्रामकता और दृढ़ता से ही वह स्थिति उत्पन्न होती है कि 'मनोहर' को 'गौस खाँ' की हत्या करनी पड़ती है। स्त्राी ही वह शक्ति है जो शोषण के विरु( किसी भी संद्घर्ष को धार देती है।

'प्रेमाश्रम' में अन्ततः किसानों का प्रतिरोध कम८ाोर पड़कर बिखर जाता है और ८ामींदार की स्वेच्छाचारिता और अत्याचार ज्यों-का-त्यों जारी रहता है। बीस के दशक के आखिरी वर्षों से शुरू हुए किसान-८ामींदार संद्घर्षों की यही करुण परिणति हुई थी, जिससे यथार्थ-आग्रही प्रेमचंद मुँह नहीं मोड़ सकते थे। लेकिन वह स्वप्न भी नहीं छोड़ सकते थे। प्रेमाश्रम के रूप में 'लखनपुर' का निर्माण यही स्वप्न है। हालाँकि यह स्वप्न अतार्किक है। शोषण की सामंती शक्तियों के रहते हुए 'लखनपुर' जैसे किसी गाँव की शोषण-मुक्ति, चतुर्मुखी उन्नति और खुशहाली कैसे संभव है? प्रेमचंद की दृष्टि इस बिन्दु पर अन्तर्विरोधों में फँसती दिखायी देती है।

शिवदान सिंह चौहान लिखते हैं कि, 'वे ;प्रेमचंदद्ध श्रेणी संद्घर्ष को अस्वीकार कर उच्च श्रेणियों के विशेष 'हक' मानकर अन्त में समझौता करा देते हैं। यह समझौता सुधारवादी होता है, जिसमें गाँधी जी के रामराज्य की तरह एक राजकुमार और नरकंकाल के हक सुरक्षित किये जाते हैं।... कर्ज और नौकरशाही के आतंक में रहने वाले किसानों के लिए 'प्रेमाश्रम' खोलकर वे संतुष्ट हैं।'१३ यह ठीक है कि प्रेमचंद अन्त में समझौते की नींव पर 'प्रेमाश्रम' बनाते हैं लेकिन यह कहना कि वह वर्ग-संद्घर्ष को अस्वीकार करते हैं तथा उच्च वर्ग के विशेषाधिकारों को स्वीकार कर लेते हैं, अनुचित है। यह उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है। पूरी कथा में अत्याचार सहते हुए संद्घर्षरत किसान ही पाठक की सहानुभूति हासिल करते हैं। शिवदान सिंह चौहान का प्रेमचंद को 'पूँजीवादी यथार्थ' का लेखक कहना, दरअसल दृष्टि का धुँधलापन है। उनके इस आरोप का विस्तार से जवाब रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक 'प्रेमचंद और उनका युग' में दिया है। शिवदान सिंह चौहान को प्रेमचंद द्वारा १९१९ में '८ामाना' में यह लिखा देखना चाहिए था कि, 'पूँजी और संपत्ति से खूनी लड़ाइयाँ लड़नी पड़ेंगी।'१४
प्रेमचंद औपनिवेशिक भारत में शुरू होने वाले तथाकथित औद्योगिक विकास को भी परख रहे थे, जिसका संबंध राज सत्ता के चरित्रा से था, जिससे आम आदमी की नियति बँधी होती है। 'रंगभूमि' ;१९२४द्ध उपन्यास इसी परख की निष्पत्ति है। इसमें प्रेमचंद ने उस दुरभिसन्धि से परदा उठाया है जो औपनिवेशिक भारत में साम्राज्यवादी-पूँजीवादी अंग्रेजी हुकूमत, सामंती शक्तियों तथा देसी पूँजीवाद के बीच विकसित हुआ था। हितों की साझेदारी ने इनमें यह समझदारी विकसित कर दी थी कि एक दूसरे को मजबूत बनाते हुए उस बड़े शिकार को द्घेरना चाहिए, जिससे सबका उदर-पोषण हो सकता है। वह शिकार थी जनता। इस समीकरण ने भारतीय जनता के मुक्ति-संद्घर्ष को जटिल और कठिन बना दिया। कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले स्वाधीनता आन्दोलन के भीतर इसे ठीक से पहचानने की जरूरत थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

'रंगभूमि' में 'जनसेवक' अकेले नहीं है, ताल्लुकेदार 'कुँवर भरत सिंह', 'राजा महेन्द्र कुमार सिंह' और अंग्रेज अधिकारी 'क्लार्क' आदि से उसकी गहरी साँठ-गाँठ है। इसीलिए औद्योगिक विकास द्वारा देश की उन्नति करने के उसके सद्प्रयासों ;?द्ध के लिए बलिदान निरीह अंधे 'सूरदास' को देना पड़ता है। 'कुँवर भरत सिंह' या 'राजा महेन्द्र कुमार सिंह' के हितों पर उसका तनिक भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। यदि 'जानसेवक' और उसके साथी वास्तव में कारखाना लगाकर क्षेत्राीय जनता का आर्थिक उन्नयन करना चाहते तो 'सूरदास' की जमीन न हड़पते, बल्कि कहीं और क्रय कर लेते। लेकिन वहाँ तो मामला यह था कि 'सूरदास' की ८ामीन से सस्ती ८ामीन और कहाँ मिलती। इस लाभदायी 'प्रोजेक्ट' को पूरा करने के लिए अमानवीयता की सारी हदें तोड़ दी जाती है। मिल-मजदूरों के प्रति 'जॉनसेवक' का रवैया भी उसके वास्तविक चरित्रा को बेपर्दा कर देता है। संसदीय लोकतंत्रा में राजसत्ता के संरक्षण में व्यक्तिगतपूँजी के विकास का जो खेल आज चल रहा है, जिसका 'साइड इफेक्ट्स' केवल आम आदमी झेलता है, उसे उसके उद्भव काल में ही प्रेमचंद ने देख लिया था। 'जॉनसेवक' को मिल के लिए 'सूरदास' की ८ामीन दिलवाने के प्रस्ताव को म्युनिसिपल बोर्ड की मंजूरी उसके अध्यक्ष 'राजा महेन्द्र कुमार सिंह' की ही वजह से मिलती है।

प्रेमचंद ने 'राजा महेन्द्र कुमार सिंह' के रूप में उन लोगों की शिनाख्त की है जो बदल रहे वक्त को देखते हुए अपने सामंती चरित्रा पर जनवाद का चोला डालने के लिए तत्पर थे। 'राजा महेन्द्र कुमार सिंह' स्वयं को 'जनवादी' बताते हैं लेकिन 'सूरदास' उन्हें 'छँटा हुआ बदमाश' और 'धूर्त' लगता है। कभी उन्होंने 'सूरदास' का पक्ष लिया था, लेकिन उसकी माँग के औचित्य को समझकर नहीं, बल्कि उसकी 'दीनता पर तरस खाकर।' लेकिन अब जबकि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए वह तनकर खड़ा होता है तो उन्हें अशांति फैलाने वाला दिखता है। ८ााहिर है ऐसे अराजक तत्वों को दण्ड मिलना ही चाहिए। वह 'जॉनसेवक' से कहते हैं-'यों मैं स्वयं जनवादी हूँ और उस नीति का हृदय से समर्थन करता हूँ। पर जनवाद के नाम पर देश में जो अशांति फैली हुई है उसका मैं द्घोर विरोधी हूँ। ऐसे जनवाद से तो धनवाद, एकवाद सभी वाद अच्छे हैं।'१५ प्रेमचंद ऐसे जनवादियों के प्रति आगाह करते हैं जो जनहित के निर्धारण का अधिकार अपने पास रखना चाहते हैं और जनता द्वारा आवा८ा उठाने को अशांति तथा अनुशासनहीनता मानते हैं।

जिन आलोचकों को सूरदास द्वारा मिल के विरोध में दिये गये तर्क, गैर ८ारूरी और अगम्भीर लगते हैं उन्हें यह देखना चाहिए कि सूरदास की पृष्ठभूमि क्या है? तीस के दशक में एक ठेठ देहाती व्यक्ति के मानसिक दायरे में वही तर्क उपज सकते थे। वैसे भी ये तर्क, आज की भाषा में कहें तो उपभोक्तावाद की संस्कृति के ख़तरे से आगाह करने वाले हैं। मन्मथनाथ गुप्त की इस टिप्पणी पर कि 'सूरदास पूँजीवाद के विरु( असंगठित, भावुकता पर आधारित धर्म का मुलम्मायुक्त विद्रोह का प्रतीक है',१६ रामविलास शर्मा लिखते हैं कि, 'क्या प्रेमचंद के समय में पूँजीवाद के विरु( कहीं संगठित क्रान्ति की तैयारी हो रही थी जो वे उसे छोड़कर भावुकतापूर्ण असंगठित विद्रोह की ओर बढ़ गये?'१७ यह ठीक है लेकिन यह भी सच है कि '१९२० में ही 'अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस' का गठन हो गया था, जिसमें सौ से अधिक यूनियनें थीं और जो पाँच लाख कामगारों का प्रतिनिधित्व करती थी'१८ और १८६२ में हुई पहली औद्योगिक कामगार हड़ताल से लेकर रंगभूमि के प्रकाशन वर्ष ;१९२४द्ध तक छः बड़े मजदूर-आन्दोलन हो चुके थे।

'सूरदास' को प्रतिक्रियावादी या पिफर मजदूर-आन्दोलन को संगठित-तीव्र करने के लिए आवश्यक औद्योगीकरण का विरोधी चरित्रा भी नहीं माना जा सकता है, जैसा कि कुछ आलोचक मानते हैं। यह क्यों होता कि वह क्रान्ति मजदूर वर्ग द्वारा ही होगी। इस क्रान्ति-दर्शन को समझते हुए किसान से मजदूर बनने का रास्ता पकड़ लेता और 'जॉनसेवक' को अन्यायपूर्ण ढंग से अपनी ८ामीन हड़पने देता। गाँवों में बसने वाले कृषि प्रधान भारत में यह रास्ता व्यावहारिक नहीं हो सकता। यहाँ किसी भी क्रान्ति में किसान की महत्वपूर्ण भूमिका होगी, जो मजदूर का ही दूसरा रूप है। प्रेमचंद दरअसल भारतीय परिस्थिति में शोषण के प्रतिकार की चेतना, जो आगे होने वाली किसी भी क्रान्ति का आधार बनेगी, की पहचान कर रहे थे। और इस दृष्टि से 'सूरदास' की भूमिका सही ठहरती है। इसीलिए हंसराज रहबर का यह कहना भी उचित नहीं कि, 'सूरदास पैत्रिाक संपत्ति-अपनी भूमि की रक्षा के लिए एकाकी और व्यक्तिगत ढंग से लड़ता है। ...प्रेमचंद उसे सच्चा सत्याग्रही और आदर्श व्यक्ति कहते हैं।... यह आदर्श, संपत्ति के संरक्षण का आदर्श है।'१९ तो क्या 'जॉनसेवक' उसकी जमीन पर मिल लगाकर अपनी निजी संपत्ति का विस्तार नहीं कर रहा था? क्या उसकी योजना सहकारी उपक्रम की योजना थी जो सूरदास का प्रतिरोध, निजी संपत्ति के संरक्षण के प्रयास के रूप में दिखायी देता है? हाँ, यह ८ारूर है कि प्रेमचंद मिल-मजदूरों और पाण्डेपुर के निवासियों के टकराव को अनावश्यक रूप से दिखाते हैं।

गौरतलब है कि साम्राज्यवादी अंग्रेजी हुकूमत, सामंती शक्तियों तथा देशी पूँजीवाद के बीच विकसित हो रहे ख़तरनाक गठजोड़ की समझ पाठक के भीतर विकसित होती है, 'पाण्डेपुर' वालों में नहीं, जिसके जरिए प्रेमचंद मजदूर और किसान के बीच के अनावश्यक गैप को पाट सकते थे और भारतीय परिस्थिति के बीच शोषकों के गठबंधन के विरु( शोषितों के भविष्यगामी संयुक्त मोर्चे का चित्रा उपस्थित कर सकते थे। वह मजदूर-आन्दोलन और उसके गोल की एक छवि अलग से भी उभार सकते थे, जो उनके विचारों के अनुरूप ही होता। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है कि, 'रंगभूमि में नैतिक जीत भी नहीं है। नैतिक जीत हम तभी मानते जब हारकर भी पाण्डेपुर वालों का संगठन हो जाता। वे इस बात को समझ जाते कि स्वदेशी पूँजीवाद और साम्राज्यवाद एक दूसरे के मित्रा हैं और इस बात को समझकर वे आगे के संग्राम के लिए तैयार हो जाते।''२० लेकिन 'पाण्डेपुर' के लोगों में आयी नयी चेतना से इन्कार नहीं किया जा सकता। उनमें यह समझ तो विकसित हो ही गयी थी कि 'वर्तमान व्यवस्था' ही 'विपत्तियों' का कारण है, जिसका 'अंत' कर देना चाहिए। यह ८ारूर है कि वे संगठित हो नहीं पाते हैं।

जिन्हें 'रंगभूमि' गाँधीवाद के 'भरपूर नशे में विभोर अवस्था में लिखित उपन्यास' दिखता है उन्हें सत्याग्रह कर रहे 'सूरदास' के गोली लगने पर उपन्यासकार की यह टिप्पणी याद करनी चाहिए-'आत्मबल पशुबल का प्रतिकार न कर सका।'२१ यह वाक्य 'प्रेमाश्रम' में कथाकार की इस टिप्पणी से अलग नहीं है कि, 'सत्याग्रह में अन्याय को दमन करने की शक्ति है, यह सि(ान्त भ्रान्तिपूर्ण सि( हो गया।' पिफर विकल्प क्या है? यह सवाल 'रंगभूमि' चुपचाप छोड़ जाता है। उदारतावादी राजनीति से प्रेमचंद की असहमति के साक्षी रहे दयानारायण निगम ने लिखा है कि, 'प्रेमचंद का राजनीतिक रुझान गर्म दल की ओर था।'२२
'रंगभूमि' इसलिए भी विशिष्ट है कि वह हिन्दुत्ववाद या पुनरुत्थानवाद को सामंतवाद के रक्षक एवं पोषक के रूप में रेखांकित करता है। 'विनय' को प्रेमचंद ने इसी वास्तविकता का आईना बनाया है। वह बहुत आसानी से हिन्दू जाति के गौरव-रक्षकों के नाम पर, अधिकारों की माँग करने वाले लोगों पर भीषण अत्याचार करने वाली शक्तियों के साथ हो जाता है।

प्रेमचंद 'कायाकल्प' ;१९२६द्ध में यह प्रश्न उठाते हैं कि यथास्थितिवादी शक्तियाँ व्यामोहित करने वाले भव्य आदर्शों का मुखौटा पहनकर कैसे किसी संद्घर्ष को ठोस परिणति तक पहुँचने से पहले ही कम८ाोर कर देती हैं। 'चक्रधर' इन्हीं शक्तियों का प्रतिनिधि पात्रा है। पोलो के खेल वाले द्घोड़ों को द्घास न पहुँचाने पर जब राजा और उसके आदमी, मजदूरों पर अत्याचार करते हैं तो मजदूर संगठित होकर प्रतिरोध करते हैं और उन्हें पीछे धकेल देते हैं। यह देखकर अंग्रेज सिपाही भी गोली चलाने लगते हैं। संगठित मजदूर उन पर भी भारी पड़ते। यदि 'चक्रधर' उन्हें शांति का पाठ न पढ़ाता, तब तस्वीर दूसरी होती। लेकिन यही तत्कालीन भारतीय राजनीति का सच था। ठोस मुद्दों पर स्वाभाविक रूप से भड़के आक्रोश को अस्वाभाविक रूप से शांत कर दिया गया। इसीलिए १९२३ में प्रेमचंद ने दयानारायण निगम को लिखा था कि, 'मैं तो उस आने वाली पार्टी का मेम्बर हूँ जो कोतहुन्नास ;छोटे लोगोंद्ध की सियासी तालीम को अपना दस्तूर-उल-अमल ;कार्य-प्रणालीद्ध बनाये।'२३

प्रेमचंद गाँधीवाद को पूरी तरह खारिज नहीं करते, बल्कि उसकी विसंगतियों और सीमाओं की शिनाख़्त करते हैं। आचरण की सभ्यता के रूप में तो उससे मुँह मोड़ा ही नहीं जा सकता। प्रेमचंद साम्राज्यवादी शक्ति के कब्जे से राजनीतिक-आर्थिक सत्ता प्राप्त करने के जन-संद्घर्ष में, एक मात्रा रणनीति के रूप में सत्याग्रह की सीमा ८ारूर बताते हैं ;'सत्याग्रह में न्याय को दमन करने की शक्ति है, यह सि(ान्त भ्रान्तिपूर्ण सि( हो गया'-'प्रेमाश्रम'द्ध, लेकिन संद्घर्ष के एक चरण में, उसकी महत्ता को भी स्वीकार करते हैं। यह बात 'गबन' ;१९३१द्ध में दीख पड़ती है। 'देवीदीन', जो केन्द्रीय पात्रा तो नहीं लेकिन सर्वाधिक शक्तिशाली और अपील करने वाला पुरुष पात्रा है। 'रमा' से अपने पुत्राों के सत्याग्रह को गौरव-भाव से बताता है। उसके दोनों पुत्रा विदेशी कपड़ों के विरोध में सत्याग्रह करते हुए अंग्रेज पुलिस का भीषण अत्याचार सहते हैं लेकिन अपनी जगह से हिलते नहीं हैं। अन्ततः प्राणों से हाथ धोना पड़ता है। पिफर उनकी जगह 'देवीदीन' ले लेता है, और तब तक सत्याग्रह समाप्त नहीं करता जब तक दुकानदार विदेशी कपड़ा न बेचने की शपथ नहीं ले लेते। 'रमा' कहता है-'दादा, तुम सच्चे यो(ा हो।'२४

लेकिन प्रेमचंद ने सामंती शक्तियों को पालती-पोसती कांग्रेस को हर समय निशाने पर रखा। उन्होंने उस मध्यवर्ग की व्यक्तिगत स्वार्थों पर आधारित राजनीति का सदैव विरोध किया, जिसने राष्ट्रीय आन्दोलन में हर क्रान्तिकारी मोड़ को समझौते की राजनीति में बड़ी कुशलता से बदल दिया।२५ उन्हें यह विश्वास नहीं रह गया था कि अंग्रेजों से सत्ता हासिल करने के बाद कांग्रेस आम आदमी को सत्ता के केन्द्र में रख पाएगी। इसीलिए स्वराज्य की माँग को वे अर्थहीन मान रहे थे। १९१९ में उन्होंने '८ामाना' में लिखा था-'हमारे स्वराज्य के नेताओं में वकील और ८ामींदार ही सबसे ज्यादा हैं।......मगर कितने शर्म और अफसोस की बात है कि उन दोनों में से एक भी जनता का हमदर्द नहीं।.... जो रैयत अपने अत्याचारी और लालची ८ामींदारों के मुँह में दबी हुई है, जिन अधिकार-संपन्न लोगों के अत्याचार और बेगार से उसका हृदय छलनी हो रहा है, उनको हाकिमों के रूप में देखने की कोई इच्छा उसे नहीं हो सकती।'२६ 'गबन' में 'देवीदीन', 'रमा' से बताता है कि एक बार उसने स्वराज्य का नारा बुलंद करने वाले नेता से क्या कहा था-'साहब सच बताओ जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन सा रूप तुम्हारे सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंग्रेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंग्रेजी ठाट बनाओगे। इस सुराज पर देश का क्या कल्याण होगा?... अभी तो तुम्हारा राज नहीं है तब तो तुम भोग विलास पर इतना मरते हो, तुम्हारा राज हो जाएगा, तब तो तुम गरीबों को पीस कर पी जाओगे।'२७ आ८ाादी के बाद नागार्जुन ने इस बात को सच होते हुए देखा था। अपने 'बलचनमा' उपन्यास ;१९५२द्ध के केन्द्रीय पात्रा 'बलचनमा' द्वारा ८ामींदारी छोड़ कर कांग्रेसी हो गये 'फूल बाबू' के बारे में यही सच उद्द्घटित करवाते हैं।

'रमानाथ' को यह विश्वास है कि 'आगे चलकर बहुमत किसानों और मजदूरों ही का हो जाएगा।'२८ 'देवीदीन' यह विचार सुनकर उल्लास से भर जाता है। कहता है- 'मेरा पहला सवाल यह होगा कि विलायती चीजों पर दुगना महसूल लगाया जाए और मोटरों पर चौगुना।'२९ देशी उद्योगों के फलने-फूलने की यह आधारभूत शर्त प्रेमचंद अच्छी तरह समझ रहे थे।
'कर्मभूमि' ;१९३२द्ध 'प्रेमाश्रम' की ही तरह उत्पीड़न और शोषण से गरीब किसानों की मुक्ति के सवाल से टकराता है। उल्लेखनीय यह है कि ये किसान अछूत भी हैं, यानी इनकी लड़ाई अधिक जटिल है। नेतृत्व करने वाले दो पात्रा हैं-'अमरकांत' और 'आत्मानन्द'। 'अमरकान्त' सेठ 'समरकान्त' का पुत्रा है। गाँधी जी के प्रभाव से द्घर-द्वार छोड़कर समाज-सेवा में लग गया है और लगान की समस्या के समाधान के लिए वह सत्य और अहिंसा के रास्ते पर विश्वास करता है। जबकि 'आत्मानन्द' का विचार है कि जमींदार 'महन्त' को द्घेर लिया जाए और जब तक वह लगान न छोड़ दे तब तक वहाँ कोई उत्सव न होने दिया जाए। यह है सत्ता-चरित्रा-निर्माण की दो दृष्टियाँ। १९३३ में प्रेमचंद ने 'भविष्य' शीर्षक लेख में लिखा कि 'सत्याग्रही नीति से हमें अपने उद्देश्य प्राप्ति की आशा नहीं।'३०
प्रेमचंद ने इस उपन्यास में 'अमरकान्त' को केन्द्र में रखा है, लेकिन निरापद रूप में नहीं, प्रश्नांकित करते हुए। उसके जरिए उन्होंने बड़े कांग्रेसी नेताओं के अन्तर्विरोधों और कम८ाोरियों को सामने रखा है।
'अमरकान्त' के राजनीतिक व्यक्तित्व की पोल 'सुखदा' खोलती है कि, उसके सार्वजनिक जीवन के मूल में नेता होने की वासना ही है, जनता से लगाव नहीं। इसीलिए जनता की पीड़ा उसमें करो या मरो की मनःस्थिति नहीं उत्पन्न कर पाती। वह ढुलमुल नीति अपनाता है। वह समझौते से रास्ता निकालना चाहता है। किसान इसी रास्ते की भूलभुलैया में भटक कर रह जाते हैं। 'अमरकान्त' 'महन्त' के विरु( किसानों के आक्रोश को और गर्म नहीं करता। जो किसी ठोस परिवर्तन की ओर ले जा सकता था, बल्कि 'महंत' की 'सज्जनता' की एकदम झूठी तस्वीर सामने रखकर उसे ठण्डा कर देता है। उन्हें डराता है कि फरियादी रास्ते के अलावा दूसरे रास्ते में केवल उत्पीड़न ही है। मिलना कुछ नहीं। जबकि यही, उसके रास्ते का सच बनकर किसानों के सामने आता है। पुलिस का भीषण दमन-चक्र, जिसमें हत्या और बलात्कार किये जाते हैं, लगान में चार आने की छूट को हास्यास्पद बनाकर रख देता है। प्रधान कथा का अन्त गाँव की अछोर तकलीफ की इबारत के रूप में सामने आता है- 'आतंक ने सारे गाँव को पिशाच की भाँति छिपा लिया था। लोग शोक से मौन और आतंक के भार से दबे मरने वालों की लाशें उठा रहे थे।'३१
इस दमन-चक्र के दौरान स्वामी 'आत्मानन्द' एक ऐसे यो(ा के रूप में सामने आता है जो हर समय किसानों के साथ होता है, पूरे मन से। ब्रिटिश पुलिस-प्रशासन भी 'अमर' से अधिक उसी से डरती है। जिले का हाकिम 'गजनवी' 'अमरकान्त' से यही कहता है। यानी प्रभावी रास्ता 'आत्मानन्द' का ही है, और 'अमरकान्त' है कि उसके साथ वैचारिक मतभेद ही नहीं, प्रतिद्वन्द्विता का भाव भी रखता है। एक गहरी कूटनीतिक चाल के तहत 'गजनवी' के साथ मीटिंग में 'अमरकान्त' द्वारा 'आत्मानन्द' के प्रति अपने विरोध-भाव को सदाशयता की चाँदी के वर्क में लपेटकर प्रस्तुत किये जाने और अप्रत्यक्ष रूप से 'गजनवी' को उससे अपने ढंग से निपटने के लिए मौन सहमति दिये जाने के पूरे प्रकरण में, १९३१ में हुए गाँधी-इरविन समझौते की झलक मौजूद है। जिसमें गाँधी जी ने, क्रान्तिकारियों को जेलों से मुक्त करने के लिए तैयार न होने पर भी इरविन से समझौता कर लिया था। जिसका परिणाम यह हुआ कि राजनीतिक बन्दी तो छोड़ दिये गये लेकिन क्रान्तिकारियों पर अत्याचार बढ़ गये। कई को फाँसी दे दी गयी, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु शामिल थे।
बकाया वसूली में करिन्दों द्वारा सख्ती करने पर आक्रोशित किसानों को एकदम लगान न देने तथा उनके आक्रोश को और तीव्र करने वाला जो भाषण 'अमरकान्त' देता है, वह उसकी विचारधारा में बदलाव का परिणाम नहीं है। बल्कि पत्नी की गिरफ्रतारी की अचानक आयी ख़बर से पैदा हुई अस्त-व्यस्त मानसिकता का परिणाम था। इसीलिए जब एक पुलिस अफसर के रूप में 'सलीम' उसके सामने आता है तो वह सरासर झूठ बोलते हुए कहता है कि 'आत्मानन्द' ने उसे भाषण के लिए मजबूर किया था।
हंसराज रहबर लिखते हैं कि, 'लुत्फ की बात यह है कि उसका ;अमरकान्तद्ध धन का लोभी बाप भी हृदय परिवर्तन के चूरन से शु( होकर जेल में आ जाता है। वहाँ से रिहा होकर बेटा बाप के हाथ में हाथ डालकर उसी द्घर में लौट आता है जहाँ से विद्रोह करके वह व्यापक क्रान्ति करने और जीवन के मिथ्या आदर्शों का अन्त करने निकला था।'३२ वह आगे लिखते हैं कि, 'सत्याग्रह की लड़ाई इसी प्रकार लड़ी जाती थी कि द्घर भी बना रहे और जेल यात्राा भी हो जाए।'३३ हंसराज रहबर जैसे यहाँ यह बताना चाह रहे हों कि देखिए, प्रेमचंद जिस गाँधीवाद में अडिग निष्ठा रखते थे, उसकी असलियत यह थी। निःसन्देह यही असलियत थी, लेकिन प्रेमचंद उसे समझ नहीं रहे थे, ऐसा नहीं है। सत्याग्रहियों के अन्तर्विरोधों को सामने रखने के ही उद्देश्य से उन्होंने 'अमरकान्त' जैसे चरित्रा की योजना की है। वह केन्द्र में इसलिए है क्योंकि तब स्वाधीनता-आन्दोलन का वही प्रधान रास्ता बना हुआ था, लेकिन पे्रमचंद पूर्णतः उस रास्ते के कायल थे, ऐसा नहीं था।
प्रेमचंद राज्य के वर्गीय चरित्रा की मार्क्सवादी व्याख्या से अच्छी तरह परिचित थे। 'डॉ. शान्ति कुमार' से वह कहलवाते हैं-'गवर्नमेण्ट कोई ८ारूरी चीज नहीं है। पढ़े-लिखे आदमियों ने गरीबों को दबाए रखने के लिए एक संगठन बना लिया है। उसी का नाम गवर्नमेण्ट है। गरीबी और अमीरी का पफ़र्क मिटा दो गवर्नमेण्ट का खात्मा हो जाता है।'३४ यह समझ अपने समय की राज्य सत्ता के स्वरूप को देखकर भी बनी होगी, जो भीषण आर्थिक असमानता पर आधारित थी और उसे पुष्ट भी कर रही थी।
प्रेमचंद 'प्रेमाश्रम' ;१९२२द्ध में किसानों को ८ामींदार से संद्घर्ष करते हुए दिखाते हैं। 'गोदान' ;१९३६द्ध में, स्वाभाविक क्रम यह होता है कि वह किसान को संद्घर्ष के पथ पर दो कदम और आगे ले जाते। लेकिन ऐसा नहीं होता है। क्यों? 'बलराज', 'मनोहर' आदि की जागरूकता और आक्रामकता 'होरी' में एकदम नहीं है। 'प्रेमाश्रम' में 'लखनपुर' गाँव संद्घर्ष में अकेले था। लेकिन स्वयं में एकजुट था। 'गोदान' में इस एकजुटता का प्रसार गाँवों के बीच दिखाया जा सकता था। लेकिन यहाँ तो 'होरी' अपने ही गाँव में अकेला था। क्यों? क्योंकि तब तक परिस्थितियों में नयी जटिलताएँ आ गयी थीं। पहली बात यह कि तब तक सामंती शक्तियाँ और अधिक एकजुट हो गयी थीं। तथा प्रायः सत्याग्रह कर और जेल जाकर देशभक्ति का आवरण ओढ़ने की तरकीब समझ चुकी थीं, जो शोषितों के आक्रोश को श्र(ा और सहानुभूति में बदलने में कारगर थी। दूसरी बात, यद्यपि तीस के दशक में कुछ जगहों पर ८ामींदारों-ताल्लुकेदारों के विरु( ऐसे किसान-आन्दोलन हुए जो गाँधी जी के अहिंसा-दर्शन पर आधारित नहीं थे, लेकिन प्रायः बुर्जुवा वर्ग के नियंत्राण वाली कांग्रेस के चलते शोषितों में यह भाव द्घना हो गया था कि ८ामींदारों को नष्ट कर नहीं, ८ामींदार-किसान संबंध को बेहतर बनाकर ही समस्या का समाधान किया जा सकता है।
'गोदान' में 'राय साहब' एक ऐसे ८ामींदार हैं जो पक्के राष्ट्रवादी हैं। सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेकर बहुत 'यश' कमाया है। कौंसिल की सदस्यता छोड़कर जेल भी गये थे। तभी से असामियों में उनके प्रति बहुत श्र(ा उत्पन्न हो गयी। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि उनके इलाके में किसानों का शोषण कुछ कम हो जाता है। वह तो ज्यों का त्यों जारी रहता है। प्रेमचंद लिखते हैं-'यह नहीं कि उनके इलाके में असामियों के साथ कोई खास रियायत की जाती हो, या डाँड़ और बेगार की कड़ाई कुछ कम हो। मगर यह सारी बदनामी मुख्तारों के सिर जाती थी। राय साहब की कीर्ति पर कोई कलंक न लग सकता था।'३५ राष्ट्रवादी होने पर भी 'राय साहब' का अंग्रेजी हुक्काम से 'मेल-जोल' बना रहता है।
यानी 'राय साहब' का चोला बदला। चरित्रा नहीं। 'होरी' से द्घुल-मिल कर बात करने का भेद यह है कि उन्हें पाँच-सात दिनों में 'बीस हजार' रुपये की व्यवस्था करनी है और 'होरी' के गाँव से 'कम-से-कम पाँच-सात सौ' की आशा है। वह अच्छी तरह जानते हैं कि इस काम में 'होरी' उनकी भरपूर मदद कर सकता है। क्योंकि 'असामी जितने मन से असामी की बात सुनता है, कारकुन की नहीं सुनता।' इसीलिए वह उसके समक्ष अपने कल्पित दुखों का ढूह खड़ा कर एवं अपनी मनुष्यता को विवशताओं के दलदल में फँसे बछड़े की तरह प्रस्तुत कर उसकी सहानुभूति पाने का प्रयास करते हैं-'मेरे दुख को दुख समझने वाला कोई नहीं।... जो हुक्काम के तलवे चाटता हो और अपने अधीनों का खून चूसता हो, मैं उसे सुखी नहीं कहता। वह तो संसार का सबसे अभागा प्राणी है। ...लक्षण कह रहे हैं कि बहुत जल्द हमारे वर्ग की हस्ती मिटने वाली है। मैं उस दिन का स्वागत करने को तैयार बैठा हूँ।'३६ क्या इतना सुनने के बाद भी 'होरी' के मन में 'राय साहब' के प्रति तनिक भी आक्रोश उपज सकता है ?
प्रेमचंद ने व्यंग्यपूर्ण नाटकीयता से 'राय साहब' के चरित्रा की वास्तविकता को खोला है। जैसे ही उनका प्रवचन समाप्त होता है, एक चपरासी आकर उन्हें बताता कि बेगारों ने खाना न मिलने के कारण काम करना बन्द कर दिया है। 'राय साहब' क्रोधित हो उठते हैं। कहते हैं-'चलो, मैं इन दुष्टों को ठीक करता हूँ। जब कभी खाने को नहीं दिया, तो आज यह नई बात क्यों?'३७ और आगे 'मेहता' से कहते हैं-'मैं इसे स्वीकार करता हूँ कि किसी को भी दूसरे के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं है।'३८
प्रेमचंद ने 'गोबर' और 'मेहता', दोनों से 'राय साहब' के मुखौटे को उतरवाया है। 'होरी' जब द्घर आकर 'राय साहब' के दुख का वर्णन करता है तो 'गोबर' असलियत बताता है-'जिसे दुख होता है, वह दर्जनों मोटरें नहीं रखता, महलों में नहीं रहता, हलवा-पूरी नहीं खाता और न नाच-रंग में लिप्त रहता है। म८ो से राज का सुख भोग रहे हैं, उस पर दुखी हैं।'३९ 'मेहता' दो टूक लहजे में 'राय साहब' से कहते हैं-'मुझे उन लोगों से ८ारा भी हमदर्दी नहीं, जो बातें तो करते हैं कम्युनिस्टों की-सी, मगर जीवन है रईसों का-सा, उतना ही विलासमय, उतना ही स्वार्थ से भरा हुआ।'४०
भीषण आर्थिक और सामाजिक असमानता के कारण भारत में संसदीय लोकतन्त्रा के भीतर जो राजनीति की धंधई विकसित हुई है। तथा सत्ता पर पूँजीवादी-सामंती शक्तियों की जो पकड़ मजबूत हुई है, उसकी शुरुआत प्रेमचंद के ही समय में हो गयी थी। प्रेमचंद उसे पहचान कर 'गोदान' में 'मिर्जा खुर्शीद' से कहलवाते हैं-'जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं, वह व्यवहार में बड़े-बड़े व्यापारियों और जमींदारों का राज्य है, और कुछ नहीं। चुनाव में वही बा८ाी ले जाता है, जिसके पास रुपये हैं। रुपये के ८ाोर से उसके लिए सभी सुविधाएँ तैयार हो जाती हैं।'४१
प्रेमचंद 'मिस्टर तंखा' को इस राजनीतिक धंधई के दलाल के रूप में सामने लाते हैं। वह कांग्रेस की लहर के समय कांग्रेसी उम्मीदवार की सहायता करता है और जब हिन्दू महासभा का प्रभाव बढ़ता है तो उसके लिए काम करने लगता है। वह 'मिर्जा खुर्शीद' पर इस बात के लिए दबाव डालता है कि वह चाहे चुनाव न लड़ें, लेकिन जाहिर यह करें कि 'ख़्वाजा जमाल ताहिर' के लिए बैठ रहे हैं और इसके एव८ा में उनसे 'दस हजार' रुपये वसूल कर लें। 'राय साहब कौंसिल के लिए दो बार निर्वाचित हो चुके थे लेकिन दोनों बार उन पर एक-एक लाख की चपत पड़ी थी। इस बार वह शायद न उठते। लेकिन इसी 'तंखा' ने उन्हें विश्वास दिलाया था कि आप पहले खड़े हो जाइए, बाद में प्रतिद्वंद्वी 'राजा साहब' से 'एक लाख की थैली' लेकर बैठ जाइएगा। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। 'राजा साहब' 'राय साहब' को परास्त करने का गौरव छोड़ने को तैयार न हुए। उन्होंने द्घोषणा कर दी कि 'चाहे हर एक वोटर को एक-एक हजार ही क्यों न देना पड़े, वह राय अमरपाल सिंह को कौंसिल में न जाने देंगे।'४२ यही वह यथार्थ है जिसके आधार पर प्रेमचंद यह निष्कर्ष निकाल रहे थे कि लोकतन्त्रा 'व्यापारियों और ८ामींदारों का राज्य है।' यही सब देखकर डॉ. अम्बेडकर ने भी दिसंबर १९४२ के एक रेडियो भाषण में कहा था-'संसदीय लोकतन्त्रा शासन का ऐसा रूप है जिसमें जनता का काम अपने मालिकों के लिए वोट देना और उन्हें हुकूमत करने के लिए छोड़ देना होता है।'४३
'राय साहब' की बैंक के मैनेजर और शक्कर मिल के मैनेजिंग डाइरेक्टर 'मिस्टर खन्ना' से वैसी ही साँठ-गाँठ है, जैसी 'रंगभूमि' में 'राजा महेन्द्र कुमार सिंह' की 'जानसेवक' से होती है। 'खन्ना' वैसे ही देशभक्त हैं। जैसे देशभक्तों को 'गबन' में 'देवीदीन' अपने व्यंग्य का निशाना बनाता है। वे दो बार जेल हो आए हैं, खद्दर पहनते हैं और ांस की शराब पीते हैं। वे 'अहिंसावादी' हैं और 'असामियों के शिकार से फुर्सत नहीं!'४४ उनका यह निरन्तर प्रयास चलता है कि 'राय साहब' उनके व्यापार में हिस्सेदार हो जाएँ। यही गठबंधन गाँव के किसानों और शहर के मजदूरों की बदहाली को और गाढ़ा करने वाला साबित हुआ। प्रेमचंद 'मेहता' द्वारा 'खन्ना' को कटद्घरे में खड़ा करवाते हैं-'आप उनकी ;मजदूरों कीद्ध रोटियाँ छीनकर अपने हिस्सेदारों का पेट भरना चाहते हैं...।'४५ 'मेहता' म८ादूरों की माँगों का एक प्रबल औचित्य सामने रखते हैं-'जो अपनी जान खपाते हैं, उनका हक़ उन लोगों से ज्यादा है, जो केवल रुपया लगाते हैं।'४६
लेकिन उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद यह विश्वास रखते हुए भी कि 'आने वाला ८ामाना किसानों और मजदूरों का होगा', 'गोदान' में एक शक्तिशाली और व्यापक मजदूर-आन्दोलन का रूप नहीं उभार पाते हैं। जबकि उस समय तक भारत में मजदूर-आन्दोलन जोर पकड़ चुका था और वह बड़े शहरी केन्द्रों से निकलकर देश के अन्य स्थानों तक फैल चुका था।४७ यह प्रेमचंद का एक अन्तर्विरोध है। 'गोदान' में किसान ;होरीद्ध की अगली पीढ़ी ;गोबरद्ध मजदूर तो बनती है लेकिन कोई क्रान्तिकारी कदम नहीं उठा पाती। शक्कर मिल के मजदूर हड़ताल तो करते हैं लेकिन अन्त में हार जाते हैं।
रामविलास शर्मा लिखते हैं कि, 'गोदान की दुनिया वही है जो प्रेमाश्रम की है पर इस बीच साम्राज्यवादी शोषण का द्घनत्व और बढ़ा है। इसे बढ़ाने के उपकरण हैं महाजन।'४८ 'गोदान' में इस महाजनी कारोबार के पूरे मकड़जाल को तथा उसमें फँसकर दम तोड़ते किसानों के यथार्थ को फोकस किया गया है। 'बेलारी' के सबसे बड़े महाजन हैं 'झिंगुरी सिंह'। वह स्वयं शहर के एक बड़े महाजन के एजेण्ट हैं तथा उनके नीचे लेन-देन का काम करने वाले कई आदमी हैं। उनकी मिल के मैनेजर से साँठ-गाँठ है और उसी बल पर वह ऊँख तौलवाने के लिए पहुँचे किसानों से जबरन अपना सूद समेत कर्ज वसूल कर लेते हैं। 'दातादीन' केवल बीज उधार देकर होरी के खेत की आधी फसल के अधिकारी हो जाते हैं। यह सब कुछ अंग्रेजी हुकुमत के संरक्षण में चलता है, प्रेमचंद यह स्पष्ट करते हैं। इसीलिए वह वास्तविक आजादी के लिए ८ामीदारी-प्रणाली के साथ-साथ महाजनी व्यवस्था का उन्मूलन भी जरूरी समझते हैं। धनिया कहती है-'ये हत्यारे गाँव के मुखिया हैं, गरीबों का खून चूसने वाले। सूद-ब्याज, डेढ़ी-सवाई, नजर-नजराना, द्घूस-द्घास जैसे भी हो। गरीबों को लूटो। उस पर सुराज चाहिए। जेहल आने से सुराज न मिलेगा। सुराज मिलेगा धरम से, न्याय से।'४९ यहाँ प्रेमचंद ने राष्ट्रीय स्वाधीनता-आन्दोलन के नेताओं को यह बताना चाहा है कि इस शोषण से किसानों की मुक्ति के सवाल को केन्द्र में रखकर ही आन्दोलन को सही दिशा में अग्रसर किया जा सकेगा। ऐसा नहीं हुआ, इसीलिए आज भी महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में सैकड़ों 'झिंगुरी सिंह', 'दातादीन' आदि मौजूद हैं और सैकड़ों 'होरी' आत्महत्या कर रहे हैं।
अपने समय के सत्ता-विमर्श को आयोजित करने वाले प्रेमचंद हिन्दी के पहले उपन्यासकार हैं। इस विमर्श का मुख्य सवाल है हाशिये की जनता की शोषण से मुक्ति। यह सवाल अंग्रेजों से सत्ता हासिल कर लेने भर से हल नहीं होगा, बल्कि उसके लिए राजनीतिक सत्ता के चरित्रा में बदलाव लाना होगा। उसके पहले उत्पादन संबंधों को बराबरी पर आधारित करना होगा तथा धर्म और इतिहास की दलदलों को भी पाटना होगा। इस संदर्भ में वह गाँधी जी और कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले स्वाधीनता-आन्दोलन के मूल चरित्रा और रास्ते को बार-बार प्रश्नांकित करते हैं। वह स्थापित करते हैं कि कोई भी आन्दोलन आमूल-चूल परिवर्तन तभी कर सकेगा जबकि सबसे निचले पायदान की जनता और उसकी वास्तविक समस्याएँ उसके केन्द्र में हों। यह जनता है किसान, मजदूर और स्त्राी। यह सत्ता विमर्श आज भी इसलिए महत्वपूर्ण है कि मौजूदा समय में देश की जन विरोधी राजनीति की जड़ों को जानने का रास्ता देता है।

 
 
 
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