दलित को लेकर प्रेमचंद पर कुछ प्रश्न हैं। खासकर उस समकालीनता के प्रश्न जब यह सब लिखा गया। प्रेमचंद के दलित चरित्रा, उस सामाजिक अन्याय से जूझते हैं जो बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अपने सद्घनतम रूप में था। उन चरित्राों की परिणति, परिस्थिति का विरोध करने या लड़ने वाली नहीं है। 'सद्गति', 'पूस की रात', 'ठाकुर का कुंआ' या अन्य कुछ कहानियों और उपन्यासों में ऐसा मुख्य है और कई जगह वे एक ही तरह के यथास्थितिवाद से पीडित बताए गये हैं जैसे 'कफन' और 'पूस की रात' में वे कोई प्रतिक्रिया नहीं करते हैं और एक त्राासदी हो जाती है। इस अक्रिया की अपनी-अपनी वजहें कहानियों में हैं।
पर वह जो समय था, उसमें इससे काफी उलट द्घटित हो रहा था। वह दलित आंदोलनों के चरम का समय था। स्वतंत्राता के बाद और आज तक इतनी विशाल दलित प्रतिक्रिया नहीं हुई जो उस समय थी। उन्नीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों से लेकर १९४०-५० का समय जो प्रेमचंद का समय भी है, इस समय रमाबाई और गोदावरी पारुलेकर की अगुवाई में चलने वाले दलित प्रयास थे। महात्मा फुले का आंदोलन था। दक्षिण में ई.वी रामस्वामी नायकर थे। दलितों का पक्षधर आत्मसम्मान आंदोलन दक्षिण को उद्वेलित कर रहा था और पर्लियर समाज ने जातिवाद के विरु( एक गंभीर प्रतिक्रियावादी आंदोलन २० सालों तक चलाया था। इसी समय मंदिर प्रवेश को लेकर सत्याग्रह हुए। लोगों ने लाठियाँ खाईं। वैकाम सत्याग्रह बेहद चर्चित हुआ था।
इसी समय बाबा अंबेडकर ने दलित समाज को उद्देश्यपरक आंदोलनों के लिए इकट्ठा किया। नास्तिकता की वकालत और परंपरा के क्रूर विरोध का जो दलित मूड उस समय था, वह पिफर नहीं रहा। वह बिरसा मुण्डा, साबुंदान और अल्लूरी सीताराम राजू की अंग्रेजों से हुई भिडंत का समय था। वह गाँधी के दलितो(ार का समय था, जब उनका पेपर 'हरिजन' खूब पढ़ा जाता था और यह आंदोलन इतने उग्र थे कि अंग्रेज मानते थे कि जिस तरह हिन्दू मुस्लिम तोड़े जा सकते हैं वैसे ही दलित और गैर दलित भी और गाँधी ने तब अंबेडकर से समझौता किया था। ...पर प्रेमचंद की कहानियों में वह प्रतिक्रियावादी और सच्चाई के लिए लड़ने वाला दलित कहीं नहीं है। 'पूस की रात' की गंगी मानती है कि बड़े लोग उनसे भी ज्यादा पतित हैं, पर उसका विरोध नहीं है। वह कमजोर है, विरोध नहीं कर सकती तो वे लोग कौन थे जो लड़े। वह आम लोगों की लड़ाई थी, उन लोगों की जिनके पास हथियार नहीं थे और ना ही सामाजिक समर्थन।
यह जरूरी नहीं कि गंगी वैसी ही हो, पर जब एक पूरा कालखण्ड ही गायब हो तब क्या कहा जाय? आम दलितों की लड़ाई के समय में यह सब लिखा गया। प्रेमचंद के चरित्रा इससे काफी उलट हैं। ऐसा क्यों? यह प्रश्न दो वजहों से जरूरी लगता है। प्रथम तो यह कि प्रेमचंद के प्रिय लेखक मैक्सिम गोर्की, जिसकी मृत्यु पर अपनी गंभीर बीमारी और लगभग मृत्यु शैक्षया पर होने के बाद भी उन्होंने लिखा था और जैसा कि शिवरानी द्वारा लिखित प्रेमचंद की जीवनी में उल्लिखित है कि इसके बावजूद वे शोकसभा में गये, पर पढ़ नहीं पाये और प्रेमचंद की जगह किसी और ने उनका शोक प्रस्ताव पढ़ा था। इसमें यह भी है कि प्रेमचंद ने उसे अपना सबसे प्रिय लेखक माना था। पर वह एक अलग तरह से अपनी समकालीनता का ही लेखक होता है। गोर्की में मजदूरों के संद्घर्ष से लेकर बदलते पूर्वी यूरोप की छवियां जिसका अंत वोल्शेविक क्रांति के रूप में हुआ, केन्द्र में है।
यह इतना वैविध्यपूर्ण है कि समाज अर्थ और राजनीति की सारी समकालीनता दिखती है। यह इतना सामान्य है कि उस तरह से अलग नहीं दिखता जैसा कि प्रेमचंद में। प्रेमचंद में समकालीनता इससे काफी भिन्न है। दलित के मुद्दे पर वह काफी एकतरफा है। उसमें सामाजिक विद्रूपता तो है, पर उससे भिड़ने वाला जनमानस नहीं, खासकर समकालीन दलित संद्घर्ष। गोर्की से इतनी निकटता के बाद भी यह है। दूसरी बात यह कि, यह लोप, इसे लोप ही कहूँगा, गाँधी से प्रेमचंद की निकटता के साथ है। उस राष्ट्रीय आंदोलन के साथ है, जिसके वर्णन 'कर्मभूमि' और 'प्रेमाश्रम' में हैं। गाँधी की दूसरी बड़ी चिंता दलित ही थे, पहली चिंता थी स्त्राी।
'यंग इण्डिया' में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने इसे भारत की गंभीरतम दिक्कत बताया था और यह बात गाँधी पिफल्म में भी है, पर वहाँ गाँधी इसे गुलामी कहते हैं। हमारे यहाँ दो तरह की गुलामी है, स्त्रिायों की और हरिजनों की। अपने-अपने तरह से स्त्राी और दलितों की गुलामी और बाद में उन्होंने इसके ज्यादा वृहद आर्थिक और राजनैतिक पक्षों की पडताल की थी। इस पर उनके सिलसिलेवार आलेख भी इसी पेपर यंग इंडिया में आए थे। गाँधी ने इस बात की गंभीर चिंता की थी, इससे संबंधित उनके दर्जनों लेख हैं। अंबेडकर से समझौते के बाद ही, दलितों के लिए विशेष कानून बनाने और संरक्षण देने की बात उठी थी। जिसे माना गया और जब संविधान बना तो वह इसका एक अहम हिस्सा हुआ। इसी ने आज के तमाम दलितो(ार के सरकारी प्रयासों की नींव रखी थी। इसके बावजूद दलित के मुद्दे पर प्रेमचंद में यह पूरा कालखण्ड नहीं है।
जब भी हम किसी लेखक की बात करते हैं, हम उसके मनोविज्ञान से बचते हैं। पश्चिम में साहित्य को प्री और पोस्ट ायड में बांटकर देखा गया। ायड ने हमारे मनोविज्ञान को टटोला और कुछ बेहद संभावित तर्क दिए, कुछ इस तरह कि वह मनोविज्ञान का आधार बन गया है। साहित्य को इस तरह से देखा गया कि वह मानव के आचार विचार को और द्घटनाओं को उस तरह कैसे देखते हैं, जो ायड ने तय किया, उससे प्रभावित होकर या उससे विश्लेषित होकर। यद्यपि साहित्य के अपने मापदण्ड ज्यादा प्रभावी रहे और मनोविज्ञान उतना प्रभावी कारक नहीं रखा गया। पर पिफर भी यह एक अच्छी बात थी। हमारे यहाँ यह सब नहीं हुआ और ऐसा होने की संभावना भी काफी कम है, क्योंकि तब लेखकीय मानसिकता का प्रश्न आता है और कई वर्जनाएँ भी जैसे सेक्स जो हमारी मनःस्थिति का केंद्र है। सामाजिक रूप से सेक्स इतना बड़ा कारक रहा कि कुछ समाजशास्त्राी मानते हैं कि आधुनिक समाज की नींव इसी कारक ने रखी। उतना ही प्रभावी जितनी हमारी आर्थिक जरूरतें।
तो एक तरह की वर्जना यानी यथास्थितिवाद है। यथास्थिति, संरक्षणवाद का उत्पाद है। जो चल रहा है, उसकी एकतरफा और कठोर मुखालफत संरक्षणवाद है। संरक्षणवाद इसी चीज की उपज है। यह एक तरह की वर्जना से ही उपजता है। मानवता की जरूरत ज्यादा से ज्यादा चीजों को चलायमान और संरक्षण से मुक्त करने की होती है। बहस भी मुक्ति का मानवीय तरीका है। इस यथास्थितिवाद का मुख्य वाहक माध्यम वर्ग होता है, न कि सर्वहारा। हमारे यहाँ दलित सर्वहारा ही है, आज अगर कुछ परिवर्तन है तो प्रेमचंद के काल में तो यह उस तरह रहा ही। यह बात दीगर है कि मार्क्स के सर्वहारा से वह कई मायनों में अलग दिखता है। पर प्रेमचंद में यह बात उल्टी नजर आती है। वहाँ यथास्थितिवाद और समर्पण दलित चरित्रा है और परिवर्तनकारी समूह मध्यम वर्ग है।
यह एक विरोधाभास है। भूख उस व्यक्ति के लिए ज्यादा बड़ा प्रश्न होगा जिसे भूखे रहने की आदत नहीं, पर 'कफन' में यह उस वर्ग का चरित्रा है जो भूख का आदी है। जिसके पूरे संद्घर्ष में भूख की चेतना रह आई और वह उससे बेतरह जूझता रहा। 'कफन' एक द्घटना के रूप में हो सकता है, पर यह आम चरित्रा नहीं होगा। जो नास्तिकता की वकालत कर गंभीर प्रतिक्रियावादी होता है, जो समाज के सच को सिरे से नकारने की मानसिकता रखता है, जिसकी लड़ाई की परिणति अंग्रेजों का यह मान लेना और गाँधी का यह भय था कि भारत को उसी तरह दलित और गैर दलित में बांटा जा सकता है, जैसे कि हिन्दू और मुस्लिम को और अगर गाँधी अम्बेडकर समझौता न होता तो स्थितियाँ कहीं ज्यादा विकराल होतीं, वह सब कुछ रुका हुआ है, जो बरसों पहले से चली आ रही सामाजिक कुरीतियों का वाहक है और यथास्थितिवादी है, वह परिवर्तनकारी है। ऐसा क्यों? क्यों 'निर्मला' और 'कर्मभूमि' के चरित्रा विरोध करते हैं और क्यों दलित समर्पण। जबकि इसका उल्टा होना चाहिए, प्रेमचंद का समय खुद गवाह है कि उल्टा होना चाहिए। पर नहीं है।
सामाजिक मूल्यों और वर्जनाओं से लेखक भी मुक्त नहीं होता। प्रेमचंद को भी इस वर्जना से मुक्त मानकर बैठ जाना ठीक नहीं है, क्योंकि यह बहस की गुंजाइश के, जो हमारे यहाँ बहुत कम है, विपरीत और अंततः मानव के भी विपरीत है। उस मनोविज्ञान की पड़ताल भी उतनी ही सामान्य है, जितनी कोई दूसरी साहित्यिक चर्चा। हम अगर यह न भी मानें तो इस ओर आगे तो बढ़ा ही जा सकता है। यह सब दूर है। दक्षिण अीकी चर्चित नोबल पुरस्कार पाने वाली श्वेत लेखिका नादिम गार्डिमर का लेखन जिस तरह अश्वेतों की करुणा को उठाता है, उतनी प्रबलता उनका विरोध उठाने में नहीं है। लगभग दो सौ सालों की कठिन लड़ाई वहाँ नहीं है। वहाँ बेंजामिन मोलाइसे नहीं है, वहाँ नेल्सन मंडेला नहीं है।
हाँ एक दया जरूर है। वह अश्वेतों के समाज के साथ खरा नहीं उतर सकता। क्या इसका कारण गार्डनर का श्वेत होना है? यह शायद एक तरीका हो सकता है, पर इसका मूल उन परंपराओं और यथास्थितिवाद में ज्यादा है, जिससे किसी लेखक के मुक्त होने की वकालत करना काफी एकतरफा होगा। मैं मानता हूँ यह एक स्वस्थ बहस की परंपरा का विरोध भी है। जो लोग पे्रमचंद को लेकर दलित आलोचना पर एकदम से प्रेमचंद को बचाने के लिए जुट जाते हैं, वह लगभग यही करते हैं।
प्रेमचंद को लेकर संरक्षणवाद और यथास्थितिवाद का मैं विरोधी हूँ। संरक्षणवाद हमारा बेहद खराब सांस्कृतिक चरित्रा रहा है, जिसने आगे के रास्ते बंद किए। यह मूर्तिपूजा का ही दूसरा रूप है।
मनोविज्ञान मानता है कि इगो हमारा मुख्य चरित्रा है। सब कुछ इगो है। कहना, हर कहना एक जवाब है और हर लिखना एक प्रतिक्रिया। यानी खुद के विपरीत होकर ही यह होता है। यह इगो वृहद रूप से एक जड़ जैसी चीज भी हो सकता है, जिससे बच पाना नामुमकिन है। यह उसका बेहद सामान्य चरित्रा है। मतलब इगोसेंट्रिक। विभिन्न सामाजिक वर्ग एक दूसरे को जिस तरह देखते हैं, वह एक तरह का इगोसेंट्रिक पिफनामिना है, क्योंकि वहाँ देखना उसी सीमा तक हो पाता है, जहाँ तक वे दोनों समाज इंटरेक्ट करते हैं, टकराते हैं या साथ-साथ चलते हैं। हाँ यह हो सकता है कि कोई व्यक्ति विशेष उसे किसी और तरह से देखे। जैसे अनुसंधान करना। परंतु पिफर भी वह उससे मुक्त नहीं हो सकता।
इस तरह एक वर्जना होती है। यह इगो इतना प्रभावी होता है कि हमारी हर सचेष्ट कोशिश के बाद भी हावी रहता है, इतना कि यही आदमी के व्यवहार का पर्याय माना गया है। आदमी का व्यवहार यानी उसका इगो। मनोविज्ञान मानता है, इगो एक तरह से रोकता है और यह जो रुकना है वही व्यवहार है। जब एक तथाकथित उच्च वर्ग किसी दलित समाज को देखता है, तो वह एक तरह की बौ(कि वर्जना से देखता है। वह वर्जना दूसरे समाज को एक हद तक ही समझा पाती है, वे उससे आगे नहीं बढ़ती क्योंकि वहाँ इंटरेक्शन नहीं है, वहाँ इसकी गुंजाइश भी नहीं है। समाज की समझ का मनोविज्ञान इस इंटरेक्शन के बिना नहीं हो सकता है और जब भी इन इंटरेक्टिव लक्षणों के बिना देखा-समझा जाता है, तो कुछ कमियां रह जाती हैं। हाँ एक सचेष्ट कोशिश हो सकती है, पर इससे बचना मुश्किल है।
न चाहकर भी वह वर्जना अपना खेल करती है। 'कफन' को पिफर से लें। दलित को लेकर भूख की मध्यमवर्गीय वर्जना करुणा, दया और दर्द तक जाती है। उसका इंटरेक्शन यहीं तक है और मध्यम वर्ग में भूख की तकलीफ इसका एक तरह का अंतिम बिंदु है। हाँ देखा जा सकता है, पर बौ(कि वर्जना रोकती है। यह बात वैसी ही है कि पुरुषों के कपड़ों में जेबें होती हैं, जबकि महिलाओं के में नहीं। पर यह खयाल शायद ही आए कि यह आदिम शिकार की जरूरत थी और सिपर्फ पुरुष के साथ रह आई, हमारे प्रागैतिहासिक शिकारी होने का प्रमाण। अत्यंत प्रचलित पर उसकी जड़ का पता नहीं चलता, खयाल ही नहीं आता कि वह है। 'कफन' में भूख की करुणा भी यही है। जबकि दलित के लिए भूख एक तकलीफ से कहीं ज्यादा आगे की चीज रही है। उसका इतिहास भूख से लड़ने का इतिहास है, भूख वहाँ एक चेतना और असहमति की चीज है। भूख का उसका निदान, दुःख से ज्यादा, भिड़ने और भिड़कर जीवन को बचा लेने का इतिहास है।
भूख का ऐतिहासिक निदान उसके पास रह आया, हर तकलीफ और पीड़ा के बाद भी। भूख उसे इस तरह तोड़ नहीं पाएगी जैसा कि वह 'कफन' में करती है। कथानक ऐसा हो सकता है, पर यह बहुसंख्य चरित्रा नहीं है। एक दलित के अनुभव से तो शायद ही हो। अर्थात् भूख की चेतना में, उसकी सोच में एक अंतर है। दलित और गैर दलित हों या न हों, पर यह चेतना चलेगी, ठीक उसी तरह जैसे पुरुषों के कपड़े में जेबें सर्वाधिक फैशन्ड हैं, सर्वाधिक चलताऊ हैं, पर हम प्रागैतिहासिक शिकारी नहीं हैं और हमें उसका खयाल भी नहीं है। मेरा मतलब उस बात से है जिसकी चेतना वर्जनाएँ बना देती है, और जो हमसे उसके अनुरूप काम करवाता है। हमारी हर सचेष्ट कोशिश के बाद भी वह इगो हमारे व्यवहार को चलाता है। वही जो दो समाजों में बिल्कुल अलग है और एक भिन्न समाज के लेखक के लिखे जाने से उस सच से दूर हो जाता है, जो वास्तव में है। 'कफन' में अगर ऐसा होता कि वह भूख से लड़कर बीमार औरत को बचा लेता या ऐसा ही कुछ और तो वह उस बौ(कि वर्जना को तोड़ पाता जो दलितों को लेकर मध्यम वर्ग में काम करती है। और जो ऐसा लेखन करते समय प्रेमचंद में भी काम करती हुई दिखती है। क्योंकि वह इस तरह लड़ना जानता है और यह उसका सामान्य चरित्रा है। पर कहानी में ऐसा नहीं होता है।
मुद्दा कथानक के गलत होने का नहीं है, बात उस इगोसेंट्रिक पिफनामिना की है, जो प्रेमचंद ही नहीं दुनिया में बहुतेरे लेखकों को रोकता रहता है और वे उसके शिकार होते हैं। यह एक बात है एक प्रश्न भी। हर सचेष्ट कोशिश के बाद भी प्रेमचंद के दलित चरित्रा इस वर्जना से मुक्त नहीं हैं या एक तरह से नहीं हो सकते थे। यह वर्जनात्मक यथास्थिति कई जगह है, 'सद्गति' में है, 'पूस की रात' में है। यही वह बात है, जो प्रश्न खड़ा करती है। इसके कारण भी हैं।
ऐसी ही एक वर्जना उस यथास्थितिवाद का कारण भी है, जो उस समय के एक बेहद क्रियाशील वर्ग का लोप कर उसे सामाजिक स्थिति के सामने समर्पण करता हुआ बताती है। कहानियों में जो चल रहा है, वह चलता रहेगा का एक मूक भाव है। जोखू ठाकुर के कुएं का गंदा पानी पिएगा और एक दलित पण्डित की लकड़ियाँ काटते हुए मरकर सद्गति पाएगा। यथास्थितिवाद की वर्जना एक भिन्न किस्म का इगो है। यथास्थितिवाद अर्थात यही आदि है और यही अंत के विचार के बेहद अन्यायपूर्ण निहितार्थ। क्योंकि अगर कुछ बदलेगा तो हित प्रभावित होंगे।
नये धार्मिक विचार होंगे तो वे बु( और महावीर की तरह हटा दिए जाएँगे, हाँ गीता पर लिखा भाष्य मान लिया जाएगा, क्योंकि उसमें नया कुछ भी नहीं और वह उसी यथास्थितिवाद का विस्तार है, जो चला आया और जिसके न हटने से लाभदायक संतुलन बना रहता है, भले ही वह कितना ही गलत क्यों न हो। यह तथाकथित संस्कारों में पगी मध्यमवर्गीय वर्जना है, जिसने चीजों को बढ़ने से रोका। जबकि दलित तो प्रतिक्रियावादी रहा। उसका पूरा इतिहास संद्घर्ष का इतिहास है। विरोध उसकी मनःस्थिति से कहीं आगे बढ़कर एक चेतना की तरह है, यह दीगर है कि मसल पावर न होने और सामाजिक समर्थन न होने से वह भोगने को अभिशप्त था। प्रेमचंद के दलित चरित्राों में यह यथास्थितिवाद समकालीन इतिहास का लोप करके आता है, इसीलिए मैंने उन आंदोलनों की बात की जो उस समय थे, और उस समय की सबसे महत्वपूर्ण द्घटना की तरह थे। पर प्रेमचंद में वे लुप्त हो गये। गाँधी और गोर्की की प्रेमचंद से निकटता के बाद भी लुप्त हो गये।
यह एक बड़ी बात है कि हमारे समय का हिन्दी का सबसे चर्चित जाना माना लेखक ऐसी चूक क्यों करता है? यह वर्जना एक समाज की दूसरे की समझ वाली वर्जना नहीं है। इसे एक ऐतिहासिक इगो या परंपराओं से जड़ हो चुका इगो कह सकते हैं, जो अपना प्रभाव दिखाता है। एक बात और भी है कि इस सबका दुष्परिणाम समकालीन यथार्थ की अनदेखी करके होता रहा। जहाँ यथास्थितिवाद होगा वहाँ समकालीन यथार्थ तिरस्कृत होगा ही। हिन्दी का यह बड़ा संकट है। यहाँ बहुत सारा समकालीन यथार्थ नहीं है, विज्ञान कथाएँ नहीं हैं, प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं, अंतरराष्ट्रीय विषय नहीं हैं, बाल कथाएँ लुप्तप्राय हैं, जिस सिनेमा को हम रोज देखते हैं वह नहीं है, ...बहुत सारा हमारा आज या तो नहीं है या अत्यल्प है, बहुसंख्य चरित्रा के संकट के साथ।
समकालीनता से यह भटकाव, जो एक तरह की उससे वितृष्णा है, अनायास नहीं है। यह उसी यथास्थितिवाद का परिणाम है, जो तमाम चीजों को स्टीरियोटाइप बनाए रखता है। यह वही है, यही प्रारंभ है और यही अंत। 'पाखी' में एक कहानी आई 'कफन'। अच्छी है। पर काफी लोगों ने उसे इसी तरह सराहा कि वह प्रेमचंद के कफन का आधुनिक रूपांतरण है। वे गद्गद् हुए कि 'कफन' पिफर से लिखी गई। मैं जिस मानसिकता की बात कर रहा हूँ वह यही है कि गीता का भाष्य ठीक है, पर बु( नहीं चलेगा, क्योंकि वह एक नई बात कहता है। प्रेमचंद पर टिप्पणियों का विरोध इसी मानसिकता का परिणाम है, जिसने हिन्दी को एक बंधे बंधाए ेम में ही समझने का चरित्रा विकसित कर रखा है। प्रेमचंद पर जो प्रश्न हैं, उनसे बचकर नहीं निकला जा सकता है। इसकी जरूरत भी नहीं होनी चाहिए |