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अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
गीत/ग़ज़ल
राकेश भ्रमर

बेखबर होकर खबर ले जाओगे,
शाम देकर तुम सहर ले जाओगे।

आग बहती है, फिजाएँ गर्म हैं,
इन हवाओं को किधर ले जाओगे।

जिन्दगी इक झील है, दरिया नहीं,
क्यों इसे गहरी भंवर दे जाओगे।

पास आकर भी कभी मिलते नहीं,
एक नफरत की नजर दे जाओगे।

ये बुरे हालात भी मिट जाएँगे,
जिन्दगी का जब जहर दे जाओगे।

राह में कुछ भी मुकम्मल हो न हो,
जिन्दगी भर का सफर दे जाओगे।

हादसों से भी निबट लेंगे अगर,
हौसले हमको भ्रमर दे जाओगे।

 
 
 

होश में आए नहीं, बेहोश होकर गिर पड़े,
क्या बताएँ लोग संभले भी, संभलकर गिर पड़े।

लोग सावन की द्घटाओं के लिए रोते रहे,
देख लेते अश्क मेरे खुश्क होकर गिर पड़े।

ख्वाब देखे आसमां के तो उड़ानें भी भरो,
ख्वाहिशें जिनमें नहीं, द्घर में फिसलकर गिर पड़े।

भूल गर हमसे न होती देवता होते कभी,
आज मंदिर में जो आए हम फिसलकर गिर पड़े।

किस्सा-ए-तकदीर में उसकी कहानी भी नहीं,
गैर के पहलू को हम अपना समझकर गिर पड़े।

वो हमारे कारनामें देखकर हँसता रहा,
जाल जो हमने बुने उनमें उलझकर गिर पड़े।

 
 
 
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