नक्सली संगठनों के चालीस साल के इतिहास में पहला मौका है कि केन्द्र स्तर पर आखिरी लड़ाई का एलान सरकार कर रही है और दूसरी तरफ तमाम नक्सली संगठन एकजुट होकर सरकार की नीतियों को खारिज कर रहे हैं। लेकिन इन चालीस साल के दौर में बीते पाँच साल के दौरान पहली बार मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी जिस तरह एकजुट हुए हैं वह सरकार के लिए खतरे की द्घंटी जरूर है। क्योंकि ठीक पाँच साल पहले सीपीआई ;एमएलद्ध पीपुल्स वार और एमसीसी ने तालमेल कर देश के नक्शे पर ना सिपर्फ अपने प्रभावित इलाकों की लकीर को बड़ा कर लिया बल्कि वार जोन में होने वाले आपसी संद्घर्ष को खत्म कर सरकार के सामने सीधे चुनौती रखी। लेकिन चालीस साल के दौर में तमाम एमएल संगठनों के दस्तावेज १९९१ में आर्थिक सुधार के बाद अपनी महत्ता की एक अलग लकीर खींचते हैं। ७० के दशक में नक्सलियों का बंटना और ८० के दशक में संद्घर्ष करते हुए अपनी मजबूती को बाँधना, लेकिन ९० के दशक में आर्थिक नीतियों की वजह से देश में बढ़ती असमानता ने खुद ब खुद नक्सलियों के संगठनों को ऑक्सीजन दे दिया।
बीते १८ साल के दौरान पीपुल्स वार और एमसीसी के खिलाफ केन्द्र और राज्य सरकारों ने जो भी मुहिम चलायी उससे इन संगठनों का कितना नुकसान हुआ इसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि दोनों संगठनों को अपनी जमीन से ही विदा होना पड़ा। एक ने आंध्र प्रदेश छोड़ा तो दूसरे ने बिहार। लेकिन आर्थिक नीतियों का जो खाका देश में अपनाया गया उसने नक्सली संगठनों को दोहरा लाभ दिया। एक तरफ विकास का मतलब एक तबके के फायदे की नीतियों की वजह से बहुसंख्य ग्रामीण समाज में आक्रोश आया, जिसको भुनाने के लिए कोई राजनीति तैयार नहीं थी। और आर्थिक नीतियों ने संसदीय राजनीति को भी जिस तरह बाजार और मुनाफे के द्घेरे में लाया उससे सरोकार की राजनीति सत्ता की राजनीति में बदल गयी।
इन दोनों परिस्थितियों का लाभ नक्सली माओवादियों को मिला। लेकिन इसी दौर में नक्सलियों के आपसी तालमेल ने एक नयी स्थिति पैदा कर दी। क्योंकि सत्ता के लिए राजनीतिक गठबंधन के दौर में नक्सलियों के गठबंधन के पाँच साल पूरे होने के मौके पर अगर यह सवाल उठाया जाए कि राजनीतिक गठबंधन ने माओवादियों को ढील दे दी और माओवादियों के गठबंधन ने राजनीतिक सत्ता को कटद्घरे में खड़ा कर दिया, तो कुछ गलत नहीं होगा। ठीक पाँच साल पहले सीपीई एमएल, पीपुल्स वार और एमसीसीआई ने मिलकर सीपीआई माओवादी का गठन किया। और इसके बाद रेड कॉरिडोर की जो लकीर आंध्र प्रदेश के नल्लामला के जंगलों से होते हुए बस्तर में रुक जाती थी और एक नयी लकीर उड़ीसा से शुरू होकर बिहार झारखंड होते हुए बंगाल तक एक नयी रेखा खींचती थी, दोनों न सिपर्फ एक हो गयी बल्कि माओवादियों के इस गठबंधन ने राजनीतिक तौर पर राज्य सत्ता को भी किस तरह कटद्घरे में खड़ा किया यह बार-बार उभरा।
जहानाबाद जेल ब्रेक से लेकर लालगढ़ के दौर में न सिपर्फ माओवादियों की मारक क्षमता बढ़ती हुई दिखाई दी बल्कि संसदीय राजनीति और राज्य व्यवस्था माओवादी प्रभावित इलाकों में प्रभावहीन होकर उभरी। इस गठबंधन ने एकतरफ जहाँ पीपुल्स वार को एमसीसी में आम लोगों की भागेदारी के साथ सांगठनिक तौर तरीकों को सिखाया वहीं एमसीसी को पीपुल्स वार की तर्ज पर गुरिल्ला यु( की ट्रेनिंग मिल गयी। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों को गठबंधन के जरिए सत्ता तो मिली लेकिन माओवादियों के खिलाफ अलग-अलग समझ रखने की वजह से कोई ठोस नीति कहीं नहीं बन सकी।
वर्ष २००४ में ही आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के साथ टीआरएस जुड़ी। तेलंगाना इलाके में पैठ बनाने वाली टीआरएस ने माओवादियों के खिलाफ कांग्रेस को कोई ठोस नीति नहीं बनाने दी। छत्तीसगढ़ में भाजपा ने सलवाजुडुम का नायाब प्रयोग कर जिस तरह आदिवासियों के हाथ में हथियार थमा दिए उससे कांग्रेस माओवादियों से ज्यादा भाजपा की नीतियों के खिलाफ हो गयी या कहें राजनीतिक तौर पर निशाना साधने लगी। वहीं उड़ीसा में भाजपा जो कार्रवाई माओवादियों के खिलाफ करना चाहती थी उससे बीजू जनता दल इत्तेफाक नहीं रखता। झारखंड में कांग्रेस और झामुमो के बीच माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कोई सहमति नहीं बनी। बंगाल में सीपीएम की राय और रणनीति दोनों से ना तो सीपीआई ने कभी इत्तेफाक किया और न ही फॉर्रवर्ड ब्लॉक ने सहमति जताई। ऐसी ही उलझनें केन्द्र स्तर पर भी रही।
लेकिन माओवादियों के गठबंधन ने इस दौर में पहली बार संसदीय राजनीति में हाथ जलाए बगैर राजनीतिक दलों को भी अपने प्रयोग में मोहरा बनाया। इसका सबसे ताजा उदाहरण अगर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस है तो २००४ में पहला उदाहरण चन्द्रशेखर राव की टीआरएस थी। २१ सितंबर २००४ को जब दोनों माओवादी संगठनों ने गठबंधन का एलान किया था तो उस वक्त एमसीसी के महासचिव कामरेड किशन से जब यह सवाल पूछा गया था कि इस गठबंधन का असर क्या होगा तो किशन का जवाब था कि, ''इसका प्रभाव मजदूरों, किसानों और मेहनतकश जनसमुदाय समेत समूची जनता पर पड़ेगा। क्योंकि आज तमाम गाँधीवादी, वोटबाज और नकली कम्युनिस्ट पार्टियों का जनप्रेमी मुखौटा काफी हद तक उतर चुका है।
ऐसी परिस्थिति में जनता भी एक ऐसी पार्टी का इंतजार कर रही है जो उनके मुक्ति संद्घर्ष को नेतृत्व प्रदान कर सके। और आने वाले दिनों में इसका सकारात्मक प्रभाव नये तरीके से वोटबाज राजनीति में मेहनतकश समुदाय महसूस करेगा। क्योंकि गठबंधन के बाद सीपीआई माओवादी क्रांतिकारी वर्ग संद्घर्ष के साथ-साथ कृर्षि क्रांतिकारी गुरिल्ला यु( के जरिए भी बदलाव का नया रूप दिखेगी'' दरअसल, एमसीसी के महासचिव पाँच साल पहले जब यह बात कह रहे थे उससे पहले एमसीसी की पहल बंगाल में थी जरूर लेकिन वाममोर्चा सरकार के सामने उसने कभी ऐसी चुनौती किसी मुद्दे के आसरे नहीं रखी जिससे नक्सलबाड़ी संद्घर्ष या आम जनता की भागीदारी का कोई एहसास माओवादियों के साथ जागे। लेकिन गठबंधन के बाद जिस तर्ज पर बंगाल में सिंगूर, नंदीग्राम और लालगढ़ में माओवादियों की मौजूदगी नजर आयी और जमीन अधिग्रहण के मुद्दों को खेत मजदूर और आदिवासियों के हक में करने के लिए उसी संसदीय राजनीति को औजार बना लिया जिसकी नीतियां इसके खिलाफ शुरू से रही, वह गौरतलब है।
रणनीति के तौर पर बंगाल में पहली बार आंध्र प्रदेश के माओवादियों ने अगुवाई की और सांगठनिक या कहें प्रभावित लोगों को गोलबंद करने में जिस तरह एमसीसी का कैडर जुटा उसने राजनीतिक तौर पर गठबंधन के महत्व को सामने रखा। सिंगूर, नंदीग्राम के बाद लालगढ़ में पीपुल्स वार के पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव जिस तरह मीडिया के सामने खुल कर लाए गए उसने राजनीतिक दलों के गठबंधन में सत्ता की खींचतान को ही एक सीख दी कि गठबंधन के जरिए ताकत बढ़ाने का मतलब अपनी जमीन पर साथी को बड़े कद में रखना भी होता है।
संसदीय राजनीति के गठबंधन में महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक, खासकर बंगाल में कभी अपनी जमीन पर किसी राजनीतिक दल ने अपने सहयोगी को आगे बढ़ने नहीं दिया उल्टे साथी की राजनीति को भी हड़पने का मंत्रा जरूर फूंका। असल में राजनीतिक दलों में जब खुद का कद बड़ा और बड़ा करने दिखाने की होड़ है ऐसे वक्त अगर बीते पाँच साल के दौर में उसी पीपुल्स वार की पहल को देखें जो उससे पहले के ३५ साल में कभी एमएल के वार जोन में माओवादियों को द्घुसने नहीं देता था और वैचारिक तौर पर संद्घर्ष से ज्यादा एक-दूसरे के कैडर को खत्म करने की दिशा में ही बढ़ता चला गया। गठबंधन का नया नाम सीपीआई माओवादी पर ही सहमति नहीं बनायी बल्कि एमसीसी को गुरिल्ला जोन विकसित करने की जो ट्रेनिंग दी उसी का असर है कि देश का गृहमंत्राालय आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे को सबसे गंभीर मान रहा है। क्योंकि रिपोर्ट साफ बतलाती है कि देश में पहली बार गुरिल्ला जोन न सिपर्फ विकसित किए गए हैं बल्कि रणनीति के तौर पर इस जोन को दो स्तरों पर बांटा गया है जिसमें आधार क्षेत्रा में जन राजनीतिक सत्ता स्थापित करते हुए नये निर्माण क्षेत्रा को विकसित करने की दिशा में माओवादी बढ़ रहे हैं।
असल में २००४ में पीपुल्स वार के महासचिव गणपति से यही सवाल किया गया था कि जंगल से बाहर माओवादियों की पकड़-पहुँच को लेकर गठबंधन की रणनीति क्या होगी? उस वक्त गणपति ने कहा था, ''शत्राु के साथ छोटी झड़पों से बड़ी लड़ाइयों में विकास, छोटे सैन्य रूपों से बड़े सैन्य रूपों का निर्माण, थोड़ी संख्या से बड़ी संख्या बनना, कमान और कमीशनों के रूप से ज्यादा व्यवस्थित ढांचों में विकास और शत्राु से हथियार छीनते हुए स्वयं को सशस्त्रा करने में ज्यादा क्षमता। साथ ही आंतरिक पार्टी संद्घर्षों से बचने के लिए नये तरीके से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उत्पीड़न के मुद्दों के लिए कैडर को लगातार संद्घर्ष से जोड़े रखना।''
माओवादियों की इस सोच को अगर रेड कॉरिडोर में टटोल कर देखें तो पहली बार कई ऐसी स्थितियां सामने आएँगी जिसमें यह साफ लगेगा कि जिस तैयारी में माओवादी पाँच साल पहले गठबंधन के जरिए जुटे और इन पाँच सालों में छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और बंगाल में जो चेहरा माओवादियों का उभरा उसने पहली बार विकास से कोसों दूर होते इलाकों में ही विकास की लकीर के जरिए लूटतंत्रा का संसदीय चेहरा भी उभार दिया है।
इससे पहले के ३५ सालों में रेड कॉरिडोर को लेकर यही सवाल सबसे ज्यादा गूंजता था कि नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास हुआ नहीं है या पिफर सरकार की किसी योजना को माओवादी वहाँ पहुँचने नहीं देते हैं। लेकिन बीते पाँच सालों में जिस तेजी से रेड कॉरिडोर में किसान-आदिवासियों की जमीन पर विकास की लकीर खींचने का प्रयास हुआ और प्राकृतिक संसाधनों की लूट खासकर खनिज पदार्थों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू हुई उसने सरकार-माओवादी टकराव को एक नया कलेवर दे दिया।
क्योंकि नक्सल प्रभावित सवा सौ जिलों के छह सौ गाँवों की स्थिति सामाजिक-आर्थिक तौर पर आज भी सबसे पिछड़े क्षेत्राों की त्राासदी ही बयान करती है। यह वैसे गाँव हैं जहाँ प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और पीने का पानी तक मुहैया नहीं है। वहीं अड़तालिस जिले ऐसे हैं जहाँ की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में आजादी के बाद से इतना ही बदलाव आया है कि अंग्रेजों की जगह स्थानीय जमींदारों और राज्य सत्ता के नुमाइन्दो ने ले ली है। इन क्षेत्राों में नया बदलाव उनकी जमीन पर दखल और खनन है। यहाँ 'स्पेशल इकोनॉमी जोन' के नाम पर सिपर्फ जमीन अधिग्रहण ही नहीं बल्कि उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में खनिज के लिए यूरोप, एशिया और अीका की दो दर्जन से ज्यादा बहुराष्ट्रीय कंपनियों से देश की टॉप दस कंपनियां इस बात की होड़ कर रही हैं कि खनिजों की माइनिंग का अधिकार किसे मिलता है।
अगर रेड कॉरिडोर में बंगाल को छोड़ भी दिया जाए तो भी इस लाल गलियारे के छह प्रमुख राज्यों आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड में करीब अठारह लाख करोड़ की माइनिंग की बोली बीते पाँच साल में लगाई गयी। जिसकी कीमत विश्व बाजार में साठ लाख करोड़ से ज्यादा की है। जाहिर है मुनाफे के इतने बड़े अंतर का मतलब राज्यों में कमीशन को लेकर भी होड़ होगी। इस होड़ का असर यही है कि जिन इलाकों में खनन होना है उन्हीं इलाकों में सबसे ज्यादा माओवादियों के प्रभाव को बताया दिखाया गया है और राज्य पुलिस से लेकर अर्(सैनिक बलों की जो तैनाती दिखायी जा रही है वह भी इन्हीं इलाकों में केन्द्रित है। इसका असर माओवादियों के लिए दोहरे फायदे वाला भी साबित हुआ है।
एक तरफ जिन इलाको में खनन हो रहा है या होना है वहाँ ग्रामीण-आदिवासी सरकार की नीतियों के खिलाफ एकजुट हुए हैं। इनके बीच माओवादियों की पैठ किस तेजी से बढ़ी है इसका एहसास इसी से हो सकता है कि आंकड़ों के लिहाज से माओवादियों के निर्माण कैडर में दो सौ फीसदी तक का इजाफा हुआ है। निर्माण कैडर का मतलब है, जहाँ माओवादी निर्माण की अवस्था में है। वहीं पाँच साल पहले जिस रणनीति का जिक्र पीपुल्स वार के महासचिव गणपति कर रहे थे कि उसी द्घेरे में सरकार भी द्घिरने आ रही है। क्योंकि उसी दौर में सुरक्षा बलों को सबसे ज्यादा नुकसान माओवादियों के हमले में हुआ है। हथियारों की लूट से लेकर अर्(सैनिकों की मौत बारूदी सुरंग के साथ-साथ मुठभेड़ के दौरान हुई है।
इसकी एक वजह माओवादियों से ज्यादा खनन में कोई मुश्किल न आने देने की राज्य सरकारों की सोच भी है। लेकिन माओवादियों को इसका सबसे बड़ा लाभ उन नये क्षेत्राों में मिल रहा है जिसे विकास की श्रेणी में रखकर सरकार गाँव से शहरों में तब्दील होते हुए देख रही है। इस दौर में रेड कॉरिडोर में ही पचास से ज्यादा नये शहर सरकार के दस्तावेजों में बने हैं। लेकिन आर्थिक नीतियों को लेकर जो तनाव इन क्षेत्राों में पनपा है उसमें वैचारिक तौर पर माओवादियों का एक बड़ा आधार भी इन्हीं क्षेत्रा में बनता जा रहा है। क्योंकि माओवादी इन इलाकों में उन मुद्दों को छू रहे हैं जिससे जनता को हर क्षण दो-चार होना पड़ता है। मसलन, माओवादियों ने राष्ट्रीयता से लेकर दलित उत्पीड़न और महिलाओं से लेकर अल्पसंख्यक समुदायों के उत्पीड़न के मुद्दों को लेकर विशिष्ट नीतिया तैयार की हैं। लेकिन गठबंधन के इस दौर में संसदीय राजनीति या माओवादियों से इतर आम लोगों की परिस्थतियों को देखें तो उनके सामने सबसे मुश्किल वक्त है।
एक तरफ राज्य की भूमिका ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बनाने वाली हो चली है और वैसी नीतियों को ही लागू कराने वाली बन चुकी है जिसमें उनका वोट बैंक समा जाए। वहीं माओवादियों का चाहे विस्तार इन इलाकों में खूब हो रहा है लेकिन उनकी रणनीति अभी भी खुद को बचाते हुए अपनी पकड़ को मजबूत बनाने की है। यानी माओवादी अभी उस स्थिति में नहीं आए हैं जहाँ प्रभावित इलाकों की आर्थिक परिस्थितियों को बदल दें। या पिफर जिस सर्वहारा का सवाल जिन इलाकों में गूंजता है उन इलाकों के लिए कोई वैकल्पिक ढांचा खड़ा कर सकें। वहीं दूसरी तरफ केन्द्र सरकार का नजरिया माओवादियों को लेकर कितनी सतही समझ वाला है यह माओवादियों के आत्मसमर्पण और उनके पुनर्वास के लिए जारी सुविधाओं के एलान से समझा जा सकता है, जिसके तहत मुआवजे-दर-मुआवजे का जिक्र किया गया है।
यानी गठबंधन में जिस तरह छोटे सहयोगी दलों को सत्ता की मलाई चखाकर सत्ता बरकरार रखी जाती है उसी तर्ज पर माओवादियों की समस्या का समाधान भी देखा जा रहा है। जबकि माओवादियों की पहल बताती है कि संसदीय राजनीति के इसी तौर तरीकों में पिछले चालीस साल में माओवादी न सिपर्फ फैलते चले गये हैं बल्कि राजनीतिक दलों से कहीं ज्यादा प्रयोग कर उन्होंने खुद को खासा मजबूत बनाया और गठबंधन उनका नया हथियार बन गया। जाहिर है इन परिस्थितियों में अगर सरकार सिपर्फ हथियार या सैनिक बल के आधार पर माओवादियों का खात्मा करना चाह रही है तो मामला सिपर्फ हथियारबंद कैडर का होगा। और भारतीय परिस्थितियों में माओवादियों के हथियारबंद कैडर को खत्म करना सरकार के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है।
सिपर्फ राज्य और केन्द्र के बीच तालमेल होना चाहिए। लेकिन यहीं से एक दूसरा सवाल खड़ा होता है कि अगर केन्द्र और राज्य के बीच माओवादियों के खात्मे को लेकर एक सहमति बन जाती है तो विकास की लकीर को लेकर असमान नीतियों पर सहमति क्यों नहीं बन सकती और अगर उन सत्तर करोड़ लोगों को भी विकास की धारा से जोड़ने के लिए सरकार खड़ी होती है जिनकी रोजाना की कमाई बीस रुपये है, तो पिफर माओवादी धारा मायने ही क्या रखेगी। लेकिन इसके लिए सत्ता के चरित्रा को बदलना होगा, जो चालीस नहीं चार सौ साल से नहीं बदला है।
लेखक सामाजिक सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ पत्राकार हैं। वर्तमान में 'जी न्यूज' चैनल के राजनीतिक संपादक।
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