राजेन्द्र यादव के द्घर में जमा कुछ बु(जिीवियों के बीच छिड़ी बहस का मुद्दा था 'कैटल क्लास'। मनमोहन सिंह के प्रिय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का एक 'प्रोडक्ट' अब उनके मंत्रिामण्डल में शामिल है। विदेश मंत्राालय जैसे महत्वपूर्ण मंत्राालय में कनिष्ठ मंत्राी का ओहदा संभाल रहे शशि थरूर ने विमान यात्राा के दौरान इकोनॉमी क्लास में यात्राा करने वालों को कैटल क्लास का दर्जा दिया। इंटरनेट पर खासी लोकप्रिय नेटवर्किंग साइट ट्विट्र में उन्होंने अपने यह विचार व्यक्त किए जिसे लेकर पिछले दिनों मीडिया और कांग्रेस में बवाल भी मचा।
शशि थरूर समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने असली भारत को न तो देखा-समझा है, न ही उनकी ऐसी कोई मंशा है। लंदन की सर्द आबोहवा में पैदा हुए थरूर ठंडी संवेदना के हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा? आश्चर्य मिश्रित दुख तो उन पर होता है जो यहीं जन्में, यहीं की आबोहवा में पले-बढ़े, यहाँ की जमीनी हकीकत को जिन्होंने मात्रा एक दर्शक या विचारक की नजर से ही नहीं देखा बल्कि उसे भोगा भी। ऐसे तमाम खांटी हिन्दुस्तानी सत्ता के शिखर तक पहुँचते-पहुँचते थरूर समान ही संवेदनहीन हो गए हैं। थरूर ने जब 'कैटल क्लास' की बात कही तो वह विमान के सबसे सस्ते डिब्बे की बात कर रहे थे। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में तीन प्रकार के खानों में विमान बंटा होता है।
फर्स्ट क्लास, बिजनेस क्लास और इकोनॉमी क्लास। इकॉनामी क्लास और फर्स्ट क्लास के बीच किराए में लगभग छह गुना अंतर है। उदाहरण के लिए दिल्ली से लंदन तक की यात्राा इकोनॉमी क्लास में ३५,००० रुपयों में हो जाती है, वहीं फर्स्ट क्लास में यात्राा टिकट १८,०००० का है। थरूर हमेशा फर्स्ट क्लास में चलते रहे हैं, उन्हें इकोनॉमी क्लास में चलना गवारा नहीं। इसीलिए वह इसे 'कैटल क्लास' कहते हैं।
यदि उन्होंने भारतीय ट्रेन का अनारक्षित कोच देखा होता या कभी उसमें यात्राा की होती तो उसे क्या संज्ञा देते यह समझा जा सकता है। किन्तु लालू प्रसाद, रामविलास, मायावती से लेकर सुविधापरस्त बु(जिीवियों का सच्चाई से मुँह मोड़ लेना ज्यादा द्घातक, ज्यादा निदंनीय है। राजेन्द्र जी की बैठकी में मौजूद विद्वानों ने 'कैटल क्लास' की टिप्पणी को कांग्रेस अध्यक्ष पर प्रहार मानने और इस दुस्साहस के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के चमचों द्वारा थरूर को नीचा दिखाने की राजनीति का हिस्सा भर मानने पर जोर दिया। वह स्वीकारना ही नहीं चाहते कि इस टिप्पणी का विरोध इसलिए किया जाना ज्यादा जरूरी है क्योंकि यह टिप्पणी शासकवर्ग की संवेदनहीनता का प्रतीक है।
यह ठीक है कि थरूर ने अपनी टिप्पणी में जाने-अनजाने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर प्रहार किया है। यह भी सही है कि सादगी का यह नाटक वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा मात्रा है। चाहे सोनिया गाँधी की हवाई यात्राा में बरती जा रही मितव्ययता हो या पिफर राहुल गाँधी की ट्रेन यात्राा सभी एक बेहूदे नाटक से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। किन्तु कांग्रेस का एक परिवार के प्रति वफादारी का भाव एक अलग, जुदा मसला है। 'थरूरों' की संवेदन शून्यता को जबरन पीछे धकेलना किसी भी तरह से जायज नहीं लगता। मुझे लगता है राजनीति से लेकर साहित्य तक हमारे यहाँ असल मुद्दों से कतरा कर निकलने और व्यर्थ की बातों में समय जाया करने का प्रचलन एक सुनियोजित सोच के साथ किया जा रहा है। जिस मुल्क में ८० प्रतिशत जनता २० रुपया प्रतिदिन पर जिंदा रहने को विवश हो वहाँ का शासक संवेदन शून्यता के शिखर पर बैठ यदि सामान्य क्लास में हवाई यात्राा करने वालों को जानवरों की श्रेणी में रखता है तो इस ८० प्रतिशत आबादी का उसकी दृष्टि में मोल कितना है यह समझा जा सकता है। हिन्दी में तो अनावश्यक बहसों को जन्म देना एक प्रथा का रूप ले चुका है।
व्यक्तिगत राग-द्वेष को किसी न किसी बहाने सार्वजनिक मंचों के जरिए व्यक्त करने का भी चलन बढ़ गया है। अपनी कुंठाओं, अपनी भड़ास को उगल कर हमारे बु(जिीवियों ने एक प्रकार की संड़ाध चारों तरफ फैला रखी है। जिसे देखो दूसरे के चाल-चलन पर टिप्पणी करने में जुटा है। बड़े-बड़े सि(ातों के ''ास की बात कर अपने किसी समकक्ष को गिराने का काम हो रहा है। इस मनोवृत्ति के लगातार विकास और विस्तार का ही नतीजा है उत्कृष्ट लेखन का अभाव। हालांकि आज भी सत्ता केन्द्रों से दूर बैठे कई लेखक-कवि उच्चकोटि की रचनाओं को जन्म दे रहे हैं लेकिन आत्म-विज्ञप्ति के धुरंधरों की चालों के समक्ष उनके लिखे को गुनने वाला कोई नजर नहीं आता। छोटे कस्बों और शहर वालों की छोड़िए संजीव जैसे कथाकार को सिरे से खारिज करने का साहस आज का कोई नया या पुराना लेखक यदि कर रहा है तो समझ लेना चाहिए कि उसे महंतों का आशीर्वाद प्राप्त है।
यह बेहद कष्टदायक है। यदि संक्रमण-काल के दौर में लेखक और कवि को ऐसी उपेक्षा मिलेगी तो निश्चित तौर पर हिन्दी का भविष्य इससे प्रभावित होगा। जरूरत है ऐसे समीक्षकों-आलोचकों की जो विचारधारा के बोझ से मुक्त हो कोनों में बिखरे पड़े लेखकों-कवियों को उपेक्षा के अंधे कुएं से बाहर निकाल मुख्य धारा से जोड़ सकें।
बहरहाल मैं बात 'कैटल क्लास' के विवाद और उस विवाद पर हिन्दी के दिग्गजों की राय की कर रहा था। तो वापिस उसी पर लौटता हूँ। हिन्दी के नामचीन चिंतक, साहित्यकार और बु(जिीवी एक-दूसरे की छीछालेदर करने में तो खासे उलझे रहते हैं, उदय प्रकाश सरीखे किसी भी साथी के एक विचलन पर सवाल खड़ा कर, उसके पूरे सृजन को सिरे से खारिज करने का षड्यंत्रा करते हैं। लेकिन समकालीन समाज के विचलन पर स्पष्ट मत रखने से परहेज करते हैं। सांकेतिक भाषा के सहारे भले ही 'मोदियों' को हत्यारा कह दें, सामने आ वार करने से यह बचते रहे हैं।
आपातकाल से आजतक जब-जब जरूरत पड़ी ललकार लगाने की, 'यह' गायब मिले। संजीव ने ठीक ही कहा, ईमानदार स्वीकारोक्ति का साहस तो किया कि 'लेखक कायर होता है'। आमजन से, लोक से इनकी बढ़ती दूरी का ही तो नतीजा है कि आज हिन्दी में पाठकों की कमी का रोना रोया जा रहा है। कौन कहता है कि पाठक अथवा श्रोता नहीं हैं? दोनों ही बड़ी तादाद में मौजूद हैं। नहीं है तो उनके मन को छू लेने वाली कविता-कहानी। गलत नहीं कहा नरेश सक्सेना ने कि दिल्लीवासी दो वरिष्ठ कवियों को दिल्ली तक के लोग नहीं पहचानते, देश की तो छोड़ दीजिए।
रंड-रोवन जारी है कि हिन्दी का भविष्य खतरे में है। अरे भाई! तो, मिलो-बैठो, चिंतन करो कि कैसे इससे उबरा जाए। परंतु ऐसा तो करेंगे नहीं। सभी को दूसरे से शिकायत जो है। एक दूसरे की टाँग-खिंचाई का कोई अवसर हाथ से अवश्य जाने नहीं देंगे। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार को 'असंदिग्ध औचित्य' वाला बताने के साथ ही उसे 'जाति, क्षेत्रा, संबंध', के 'सच्चे-झूठे संदेह' के द्घेरे में कैद करना कहाँ कि बु(मिानी है? विष्णु खरे पत्रा-पत्रिाकाओं के संपादकीयों को चूहे की लेड़ी कह क्या साबित करना चाहते हैं? महज सनसनी फैला मजा लूटने का खबरिया चैनलों का नुस्खा हिन्दी का भला करने वाला नहीं है विष्णु जी।
हिन्दी भाषा और साहित्य की वर्तमान दशा पर भवानी बाबू ;भवानीप्रसाद मिश्रद्ध की एक कविता याद आ रही है। पढ़िए आप भी और चिंतन करिए :
याद किसकी करूँ?
आज इन अवसाद के बढ़ते पलों में, कौन हैं मेरे
करूँ किनका भरोसा?
मैं कहूँ किससे कि तुम मेरे बनो।
शीर्ण अपनी दीनता का
जल रहा इतिहास आँचल सामने किसके पसारूँ।
मैं कहूँ किससे कि मेरे प्राण। दो आँसू मुझे दे दो,
प्राण लो आँसू मुझे दे दो।
आँख किसकी सरल है इतनी,
कि सुख से भरी दुनिया छोड़ कर मुझ तक पिफरे,
मैं हृदय भारी किए हूँ,
कभी विस्तृत विश्व में कोई मिलेगा
एक यह कोई कि इसके आँख होगी, दर्द होगा,
दूसरे की कसक ज्वाला छू न पाए,
और छू भी ले न कोई आँच आए,
इस समझ तक जी न जिसका सर्द होगा।
और यह कोई कि इसके पुण्य, मुझको छू सकेंगे,
प्राण इतने सजल होंगे, देखते ही चू सकेंगे,
बह सकेंगे एक अविरल धार में दो,
और सुख की सृष्टि होगी,
जब कभी बादल द्घिरेंगे,
वज्र का गर्जन न होगा, तब पुलक की वृष्टि होगी। |