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लेखनी विलास उपर्फ़ लिखने की मजबूरी' नामक निबंध में श्रीलाल शुक्ल अपनी विशिष्टता के साथ लिखते हैं, 'यह इरादा नहीं कि आत्मदया का नाटक करूँ, या पाठकों और आलोचकों से सहानुभूति की भीख मागूँ। ऐसा भी नहीं कि यह ऐसे लेखक की दुर्गति का वर्णन है जिसका प्रेरणा स्रोत सूख गया है। सिपर्फ़ यह स्पष्ट करना है कि लेखक को समझना अपने पालतू कुत्ते को समझने के मुक़ाबले ८यादा महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य है।' इसलिए ८यादा तैयारी और थोड़ा धैर्य भी चाहिए। हिन्दी की दुनिया में एक बात दिलचस्प है। जिस किसी लेखक की एक रचना अप्रत्याशित रूप से चर्चित, महत्वपूर्ण, लोकप्रिय या विलक्षण हो जाती है रचना की परवर्ती ;या पूर्ववर्तीद्ध रचनाओं को ध्यान से पढ़ने की ८ाहमत प्रायः नहीं उठाई जाती।
हाँ, सवाल इस अंदा८ा में होते हैं जैसे सारा कुछ खँगालने के बाद मिली वास्तविक हताशा को प्रकट कर रहे हैं। हिन्दी में कई 'स्वयंभू मानव बम' द्घूमते रहते हैं। कोई अगर आपसे लिपटकर फट गया तो आपका खुदा भी मालिक नहीं है। ये आपसे बड़े रचनाकारों के विषय में कुछ भी पूछ सकते हैं। यह भी पूछ सकते हैं कि 'श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी के अलावा और क्या लिखा है!'
यह सच है कि हिन्दी ही नहीं समस्त भारतीय भाषाओं में 'राग दरबारी' जैसी दूसरी रचना नहीं है। किसी भी रचनाकार के लिए ऐसे चमत्कार को दुहरा पाना असंभव होता है। और वह दुहराए ही क्यों, यदि वह महान रचनाकार है। रचनात्मक उपलब्धि कितनी ही बड़ी क्यों न हो रचनाकार उससे आगे निकलना चाहते हैं। यह तो हम हैं कि सुविधाजनक तरीके से मिल गए निष्कर्षों को अपना बनाकर बहस करते रहते हैं। इस सुविधा से जो अलग रहते हैं उन्हें ही व्यक्ति और रचनाकार के रूप में श्रीलाल शुक्ल जैसे साहित्यकार समझ में आ सकते हैं।
श्रीलाल जी के व्यक्तित्व में बहुत सारी बातें ऐसी हैं जो उन्हें खास बनाती हैं। दूसरों पर राय देते समय वे शब्दों के विकल्प तलाशते हैं और कोशिश करते हैं कि बात अप्रिय न लगे। ...लेकिन यदि उनसे उनकी किसी कृति या उनकी जिंदगी के किसी प्रसंग पर केंद्रित प्रश्न पूछा गया तो वे निर्मम रवैया अपनाते हैं। कोई लागलपेट नहीं, कोई शब्दाडम्बर नहीं। उनकी अपनी सहजता तो शामिल रहती ही है। सब जानते हैं कि श्रीलाल जी अपनी पत्नी को कितना प्रेम और आदर देते थे। एक साक्षात्कार के दौरान मैंने ऐसा प्रश्न पूछा जो मेरी मूर्खतापूर्ण पत्राकारिता की देन थी। पिष्ट पोषित प्रश्न था कि, 'हर सफल पुरुष के पीछे कोई न कोई स्त्राी होती है। आप अपना खुलासा करें।' श्रीलाल जी का शानदार उत्तर था, 'मैं इस मिथक का कायल नहीं कि प्रत्येक सफल व्यक्ति के पीछे किसी न किसी स्त्राी का हाथ होता है। माना कि बहुतों का साथ अपनी प्रिय पत्नी या प्रेमिका की ओर से मिलने वाला प्रोत्साहन उनके कामों की निरंतरता और समृ(ि में सहायक होता है। लेकिन कला और साहित्य के क्षेत्रा में ज्यादातर ऐसा नहीं होता।
उसमें जो सफलता मिलती है वह मुख्यतया साहित्यकार की प्रतिभा और कुछ हद तक पागलपन की हद तथा जाने वाले लगाव से संभव होती है। जिस नारी की कल्पना इस बहुप्रचलित धारणा में व्यक्त की गई है वह अपनी उग्रता, क्रूरता और दूसरी विकर्षक मांगों के कारण किसी प्रतिभा संपन्न कृतिकार के लिए द्घातक तो हो सकती है, पर उसके प्रति स्नेह और प्रोत्साहन स्वयं कृतिकार की प्रतिभा और अपने कार्य के प्रति उत्कट लगाव था प्रति-स्थानीय नहीं हो सकता।' किसी बेहद मामूली प्रश्न या प्रसंग को नया अर्थ दे देना श्रीलाल जी का स्वभाव है। उनकी रचनाओं में इसे खास तौर पर देखना चाहिए। वे बहुत दूर की कौड़ी नहीं लाते, न विदेशी साहित्य की शातिर नकल कर रचनाओं को जटिल बनाते हैं। एक सामान्य अनुभव में छिपी असाधारणता श्रीलाल जी जैसे रचनाकार देख लेते हैं। यह बात उन्हें प्रेमचंद के सबसे करीब लाती है। मगर इसे देखने के लिए थोड़ा धैर्य चाहिए।
श्रीलाल शुक्ल से मेरा रिश्ता गुरु और शिष्य जैसा है। 'जैसा' इसलिए कि श्रीलाल जी गंडा बाँधने में भरोसा नहीं करते और अंधश्र(ा की गंडक में बहना मुझे अच्छा नहीं लगता। उनका तेजस्वी बौ(कि रूप मुझे मुग्ध करता रहा है। जीवन जगत के कितने ही पक्षों पर बातों के दौरान उनकी व्यंजना शक्ति का प्रमाण मिला है। अपने लेखन पर वे चर्चा से बचते हैं, मगर औरों के लेखन पर उनकी पूरी निगाह रहती है। हाँ, अपनी बात कभी इस अंदाज से करेंगे कि सामने वाले का बड़बोलापन बन्द हो जाय। 'कथाक्रम' की एक बैठक के बाद लखनऊ के एक आत्मद्घोषित परम प्रतिब( सज्जन कह रहे थे कि मुझसे तो कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं छूटता। महत्वपूर्ण छोड़िए.. द्घटिया भी नहीं। सब पर निगाह रखता हूँ। ...श्रीलाल जी ने खाने की प्लेट मेज पर रखी। हाथ जोड़कर कहा, ''इस नामाकूल ने भी 'राग विराग' नाम का एक नाचीज उपन्यास लिखा है। सात महीने पहले छप चुका है। कभी उस पर भी कृपा करें।''
यह श्रीलालीय शैली है। उन सज्जन का तो पता नहीं, मगर औरों के लेखन पर श्रीलाल जी की पूरी निगाह रहती है। कुछ वर्ष पूर्व तथा श्रीलाल जी सबसे ज्यादा पढ़ने वाले लेखकों में से एक थे। अब अस्वस्थता के कारण ज्यादातर विश्राम ही करते हैं। इधर उन्हें जब-जब देखने गया तो निराला की यह पंक्ति द्घुमड़ती रही, 'झूल चुकी है खाल ढाल की तरह तनी थी।' कोई बात नहीं। काल के प्रभाव से हर ढाल एक दिन निढाल होती है। श्रीलाल जी ने यशस्वी, सक्रिय, समर्थ और लम्बा रचनात्मक जीवन जिया है। जाने कितनों को उनसे ईर्ष्या होती। वे अपनी उदार मनोवृत्ति के कारण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमला करने वालों को, ईर्ष्या करने वालों को सहज ही क्षमा कर देते हैं। प्रसंग या भुला देते हैं या उनका म८ाा लेते हैं। एक उदाहरण, ''मुझे याद है, १९६९ में बंबई में मैं धर्मवीर भारती के यहाँ रुका था। हम चार पाँच मित्रा खाने पर एक मित्रा के यहाँ थे। वहाँ कमलेश्वर भी मौजूद थे। मुझे याद पड़ता है मजाक ही मजाक में उन्होंने मेरे लिए 'अपकंट्री बम' ;देहात से विकसित हुआ बेतकूफद्ध का पिफकरा कसा था।
शायद वह बहुत गलत नहीं था।'' कमलेश्वर के लिए उनके मन में बढ़ा स्नेह का भाव बना रहा। श्रीलाल जी शब्दों का अचूक इस्तेमाल ;व्यवहार में भीद्ध करते हैं और विलक्षण प्रत्युत्पन्नमति उसमें चमक पैदा करती है। किसी भी गोष्ठी या सभा में उनका होना आकर्षण का कारण रहा है। यह विचित्रा है कि वे 'कांटों से भी निर्वाह किए जा रहा हूँ मैं' में भी निपुण हैं। मगर जब खीझ जाते हैं तो एक से बढ़कर एक मौलिक समाधान निकालते हैं। कई वर्ष पहले की बात है। एक मतिमंद-स्वच्छंद लेखिका सप्ताहों से श्रीलाल जी को द्घेर रही थीं कि मेरे कहानी संग्रह की भूमिका लिख दीजिए। श्रीलाल जी हार गए तो एक शर्त रखी, ''भूमिका मैं लिख दूँगा, मगर जीवन भर आप मेरे द्घर का रुख नहीं करेंगी।''
श्रीलाल शुक्ल की जीवनचर्या और विचार प(ति को लेकर पक्ष व विपक्ष में काफी कुछ कहा जाता रहा है। उन पर केंद्रित पत्रा पत्रिाकाओं में छपी सामग्री इसका प्रमाण है। जब हिन्दी में संस्मरणों और आत्मकथाओं का फैशन शुरू हुआ तो मैंने श्रीलाल जी से कहा कि आपके पास तो भंडार है। आप ऐसा कुछ क्यों नहीं लिखते। उन्होंने मुझे द्घूरकर देखा था, ''यानी मैं कमलेश्वर की तरह जलती हुई नदी लिखूँ। राजेन्द्र यादव को मुड़ मुडकर देखूँ। देखिए, आपने जिस किसी के साथ भी जीवन का कोई हिस्सा जिया है उसके व्यक्तिगत प्रसंगों को चौराहे पर खोल देना नितांत अनुचित है। यह रिश्तों का अपमान है।'' श्रीलाल शुक्ल के जीवन में निस्संदेह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष हैं, लेकिन दोनों का सौन्दर्य उन्होंने बनाए रखा है। 'इस उम्र में 'कहानी में बहाने-बहाने से उन्होंने तीखा आत्मसाक्षात्कार किया है, ''मैं गाड़ी कुछ ८यादा ही तेज रफ्रतार से ले आया। जैसे इस तरह बचाए गए पलों का कोई खास उपयोग करना चाहता होऊँ। ...कैसी विडम्बना है कि दूसरों की आलोचना करते हुए भी, खुद अपने जीवन के क्षणों को किसी श्रेष्ठतर उद्देश्य के लिए समर्पित करने की ८ारूरत मुझे आज तक नहीं अखरी...।''
आम भारतीय लेखकों की तरह उन्होंने भी संद्घर्ष किया, दुख के दिन बिताए.. लेकिन इसका स्यापा कभी नहीं किया। 'ट्रेजिडी' शब्द पर 'विश्रामपुर का संत' में उन्होंने जो टिप्पणी की है, वह शहीदों की सूची में नाम लिखवाने वालों या करूणा के सिक्के बटोरने वालों या मेरे गर्दिश के दिन की कथरी ढोने वालों को ८ारूर पढ़नी चाहिए। सुशीला को विवेक समझता है, ''और, तुम्हें व्यक्तिगत ट्रेजिडी चाहिए! तो सुनो, इस वक़्त जब आराम से हम इस वातानुकूलित कमरे में गपशप कर रहे हैं, ठीक उसी वक्त देश में न जाने कितनों की हत्या हो रही होगी, कितनी मासूम बच्चियों को कोड़े मारकर वेश्या बनाया जा रहा होगा, न जाने कितने बच्चों के हाथ पाँव तोड़कर उन्हें अपाहिज बनाकर भीख मांगने के लिए मजबूर किया जा रहा होगा! ...टे्रजिडी को लेकर अब मुझसे कभी ऐसी हलकी बात मत कहना।''
हलकी बात कैसी भी हो, श्रीलाल जी को नापसंद रही है। 'राग दरबारी', 'पहला पड़ाव', 'विश्रामपुर का संत' आदि अनेक श्रेष्ठ उपन्यासों, अनेक बेहतरीन कहानियों और व्यंग्य आलेखों के रचनाकार श्रीलाल जी हमारे समय के बहुत बड़े-महान-लेखक हैं। 'राग विराग' पिफलहाल उनकी अंतिम रचना है। एक उपन्यास उनके मन में विकसित हो रहा था कि अस्वस्थ हो गये। अब शायद लिखने के लिए स्वयं को सहेज न सकें। ...लेकिन अब भी वे प्रायः साहित्य और समाज के वृहत्तर हितों की चर्चा ही करते हैं। बात करते-करते चिरपरिचित मुस्कराहट कौंध जाती है। अनेक भाषाओं के जानकार, साहित्य व संजीव के मर्मज्ञ श्रीलाल जी का मौन भी बहुत कुछ कहता है। उन्हें अनेकानेक सम्मान, पुरस्कार और अलंकरण प्राप्त हुए हैं। सर्वोपरि यह कि अपार पाठकों का अकूत आदर।
व्यक्ति और रचनाकार के तौर पर उन्हें जानना बहुत बड़ी बात है। दूसरों से राय लेने की उदारता और उस पर अमल करने का विवेक श्रीलाल जी के पास रहा है। वे 'आर्ट ऑफ लिविंग' के बहुआयामी आचार्य हैं। एक बार पूछा था कि व्यतीत जीवन को किस तरह देखते हैं तो उनका उत्तर था, ''जाने कितना जीवन नष्ट हुआ। जितना नष्ट हुआ उसका सदुपयोग करते तो गुणवत्ता में वृ(ि होती। ...पिफर भी इन स्थितियों को मैं अफसोस के भाव से नहीं लेता। जी हुई जिंदगी को लेकर आत्मभर्त्सना का इरादा नहीं है।'' यही है मस्ती। 'अब लों नसानी अब न नर्सेहों' का कलात्मक पछतावा उनमें नहीं है। नसाया तो नसाया! यही हैं श्रीलाल शुक्ल। उनका सान्निध्य मिलना जीवन मिलने के बाद की शायद सबसे बड़ी द्घटना है।
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