अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
तीसरा नेत्र
चिंतन के आँसू : रवीन्द्र त्रिापाठी

सामाजिक और शासकीय विसंगतियों पर चोट कर इस लोकतांत्रिाक व्यवस्था में आम आदमी के दर्द को उभारने में व्यंग्य की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता। व्यंग्य के महत्व को समझते हुए नए स्तंभ की शुरूआत इस अंक से की जा रही है। स्तंभकार हैं वरिष्ठ पत्राकार और समीक्षक रविन्द्र त्रिापाठी। भोलेनाथ के त्रिानेत्रा की भांति स्तंभकार के त्रिानेत्रा के विध्वंसक पुट लिए होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

पहला दृश्य : चिंतन की सजा
वे भर्राए गले से बोल रहे थे। लग रहा था कि रोने लगेंगे। साफ दिख रहा था कि उनको रुलाई आ रही है और वे उसको रोकने की कोशिश कर रहे हैं। और पिफर सबने देखा कि अचानक आँसू की एक बूंद उनकी एक आँख से गिर ही पड़ी। बाकी आँसू को रोकने का काम उनके रूमाल ने किया।
पत्राकारों ने उनसे पूछा-'क्या ये दुख के आँसू हैं?'
उन्होंने चेहरे पर मुस्कान लाने का लाचार प्रयास किया और कहा-'नहीं, ये चिंतन के आँसू हैं।'
आगे उन्होंने कहा-'हाँ मुझे दुख भी है और वो इस बात का है कि मुझे चिंतन करने की स८ाा दी जा रही है।'

उनका गला पिफर भर्रा गया। एक गिलास पानी पीकर वे बोले-'मुझे जिन्ना पर चिंतन की सजा दी जा रही है। मैं चिंतन बैठक में आया था ताकि जिन्ना पर चिंतन का ब्यौरा पेश कर सकूँ। लेकिन बैठक शुरू होने के पहले ही मुझे पार्टी से निकाल दिया गया। तीस साल तक जिस पार्टी की सेवा मैंने की उसने मेरे चिंतन का महत्व नहीं समझा। तीस बरसों में ये पहला मौका था जब पार्टी के नेता साथ बैठकर कुछ चिंतन करने जा रहे हैं और वो मौका भी मुझसे छीन लिया गया।'

असल में वे एक पराजित पार्टी के पराजित नेताओं की बैठक में आए थे। चुनाव में हारने के बाद इस पार्टी के नेताओं की समझ में ये नहीं आ रहा था कि अब क्या करें। तभी एक के मन में खयाल आया कि जब कुछ करने के लिए है ही नहीं तो क्यों न चिंतन किया जाए। सबको ये विचार अच्छा लगा और एक पंच सितारा होटल में बैठक का आयोजन किया गया।

जिन नेता जी को पार्टी से निकाल दिया गया था और जिनकी आँख से चिंतन का आँसू टपका था, उन्होंने सोचा था कि अगर अलग ढंग का चिंतक बनना है तो क्यों न किताब लिख दी जाए। फटाफट उन्होंने किताब लिख भी डाली। लेकिन पार्टी के दूसरे चितकों को ये अच्छा नहीं लगा। सबने एक स्वर में कहा कि किताब लिखकर तो इन नेता महोदय ने चिंतन की लक्ष्मण रेखा पार कर डाली। आखिर सभी पराजित नेताओं ने सर्वसम्मति से किताब लिखकर चिंतन करने वाले नेता को पार्टी से बर्खास्त कर दिया।

उसके बाद चिंतन बैठक शुरू हुई। पार्टी के अध्यक्ष ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा-'हमें चिंतन करना है, जमकर चिंतन करना है, तीन दिनों तक खूब चिंतन करना है। सुबह का नाश्ता करने के पहले भी चिंतन करना है और रात का खाना खाने के बाद भी चिंतन करना है। हो सके तो रात में भी चिंतन कर सकते हैं। यहाँ चिंतन करने की सारी सुविधाएँ हैं। हर कमरे में एयर कंडीशन लगा है जिससे चिंतन करने में खलल न पैदा हो। लेकिन हमें ये भी याद रखना है कि हम सबको दायरे में रहकर चिंतन करना है। चिंतन की लक्ष्मण रेखा नहीं तोड़नी चाहिए और सबको मालूम है कि लक्ष्मण रेखा क्या है। ये लक्ष्मण रेखा है नागपुर। जो भी नागपुर से आई गाइडलाइन से बाहर जाकर चिंतन करेगा उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।'

इस अध्यक्षीय भाषण के बाद अध्यक्ष जी मौन हो गए। कई मिनटों तक मौन छाया रहा। पिफर एक पुराने नेता ने पूछा-'क्या नागपुर से ये गाइडलाइन आई है हम सब मौन रहकर चिंतन करेंगे? पहले तो ऐसा नहीं होता था।'
ये सुनकर अध्यक्ष जी थोड़ा सकपकाए। पिफर बोले-'नहीं, नहीं, सबको मुखर होकर ही चिंतन करना है, लेकिन मैं मौन रहकर ही चिंतन करना पसंद करता हूँ। ये मेरी चिंतन शैली है। इसका एक फायदा ये भी रहता है कि इसमें लक्ष्मण रेखा के टूटने की कोई गुंजाइश नहीं होती। मैं तो अब सिपर्फ प्रेस कोंस में ही मुँह खोलूँगा और मीडिया के माध्यम से पूरे देश को बताऊँगा कि हमने क्या चिंतन क्या। भारत माता की जय!'

ये सुनकर पार्टी की भावी अध्यक्ष बनने की जुगत में लगे नेता ने अपने एक खासमखास कनिष्ठ नेता से कहा-'देखा, कितना काइयाँ है। हम सबको बोलने के लिए कह रहा है ताकि मुँह से गलती से भी कुछ इधर-उधर चिंतन हो जाए तो नागपुर जाकर हमारा पत्ता कटा सके। लेकिन मैं तो इसकी चाल में नहीं फंसने वाला नहीं! इसलिए मैंने तो तय कर लिया है कि मौन रहकर ही चिंतन करूँगा।'
देखादेखी बाकी नेता भी चिंतन बैठक में मौन ही रहे। तीन दिनों तक मौन चिंतन चलता रहा।


दूसरा दृश्य : चिंता की मुद्रा

पार्टी अध्यक्ष चिंता की मुद्रा में थे। वे चिंतन बैठक से आ गए थे। पिफर भी चिंतित नजर आ रहे थे। असल में पार्टी ने जो चिंतन बैठक की उसका अजीब नतीजा निकाला। मोहम्मद अली जिन्ना पर लिखकर चिंतन करने वाले नेता को पार्टी से निकाले जाने के बाद पार्टी के नेताओं को लगा था कि अब सब कुछ ठीकठाक होगा। लेकिन जो हुआ उससे पार्टी के अध्यक्ष ही नहीं बल्कि दूसरे नेता भी चिंतित हो गए। सबने चिंतन बैठक में ही सुना था कि नागपुर से रिटायरमेंट की उम्र सीमा द्घटाए जाने का फरमान चल चुका है। लेकिन नेता लोग रिटायर होने के लिए तैयार नहीं थे।
पार्टी के अध्यक्ष कुछ ज्यादा ही चिंतित दिख रहे थे। हुआ ऐसा कि पार्टी ने एक पत्राकार-नेता ने टीवी पर जोर-जोर से यानी मुखर चिंतन करते हुए अध्यक्ष की तुलना टार्जन से कर डाली। अध्यक्ष को समझ में नहीं आ रहा था कि इस पर क्या कार्रवाई करें। जिन्ना पर चिंतन करने वाले नेता को पार्टी से निकालकर उन्होंने समझा था कि उनकी छवि एक दबंग नेता की बन जाएगी।

अध्यक्ष के बारे में पार्टी में सबका कहना था कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती। बात कुछ कुछ सही भी थी। इसलिए अध्यक्ष को ये समझ में नहीं आ रहा था कि उनको 'टार्जन' खिताब देकर उनकी प्रशंसा की गई है या उनका मजाक उड़ाया गया है। उनके चमचे भी दो भागों में बंट गए थे। कुछ का कहना है कि 'टार्जन' बताकर उनकी प्रशंसा की गई है और कुछ ये कह रहे थे इससे तो उनकी भद्द पिट गई है। चमचों के साथ मुश्किल ये थी कि उनको भी ठीक से अंग्रेजी नहीं आती थी। इसलिए अध्यक्ष की समझ में नहीं आ रहा था क्या समझे और क्या कार्रवाई करे। वे किसी अंग्रेजीदां नेता से पूछ भी नहीं सकते थे। इससे भद्द ज्यादा पिट जाती। अब पत्राकार लोग पूछ रहे थे कि पार्टी के पत्राकार-नेता के टीवी चिंतन पर उनका क्या रूख है तो अध्यक्ष कुछ बोल नहीं पा रहे थे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने तय किया कि पत्राकार-नेता से स्पष्टीकरण मांगा जाए कि उनका टार्जन कहने का क्या मतलब है।

अध्यक्ष आगे भी पार्टी के अध्यक्ष बने रहना चाहते थे। हालांकि पार्टी का संविधान इसके खिलाफ था। इस वजह से वे संविधान बदलना चाहते थे। कुछ दिन पहले तक उनको लग रहा था वे संविधान बदलने में कामयाब हो जाएँगे। पर चिंतन बैठक के बाद जिस तरह की द्घटनाएँ द्घट रही थीं उससे लग रहा था कि संविधान बदलने की उनकी मंशा सफल नहीं होने जा रही है। वे किसी से पूछना चाहते थे कि क्या टार्जन कभी संविधान बदल पाया। लेकिन किससे पूछें? कोई भरोसेमंद साथी टार्जन के इतिहास भूगोल के बारे में जानता नहीं था। और जो भरोसेमंद नहीं थे उनसे पूछने में खतरा था। उनकी चिंता बढ़ती जा रही थी।

तीसरा दृश्य : चिंतनीय पुरुष
पार्टी में उनको लौह पुरुष कहा जाता था। अपना ये उपनाम उन्होंने खुद रखा था। जब उनको इस नाम से पुकारा जाता तो उनका चेहरा दमकने लगता। और जब उनको असली नाम से पुकारा जाता तो उनका चेहरा मुरझा जाता। मगर इधर लंबे अरसे से उनको लगने लगा था कि पार्टी के जो नेता उनको सामने लौहपुरुष कहते हैं वही नजरों से ओझल होते ही उनके खिलाफ माहौल बनाने में लगे हैं। उनको इस तरह के सपने भी आने लगे थे कि उनके पीठ पीछे पार्टी के नेता उनको मोम पुरुष कहते हैं।

चिंतन बैठक के बाद पार्टी में जो हुआ उससे उनकी लौह पुरुष वाली छवि को गहरा धक्का लगा। लोगों की निगाह में अब वे लौहपुरुष नहीं बल्कि चिंतनीय पुरुष लग रहे थे। उनके ललाट पर कई रेखाएँ दिख रही थीं। पार्टी के चुनाव हारने के बाद इन रेखाओं की संख्या में इजाफा होने लगा था। वे रोज सुबह उठते और आईने में अपना चेहरा देखते थे तो उनको एक नई रेखा दिखती थी। उनके आजूबाजू के लोग ये फैला रहे थे कि ये चिंतन की रेखाएँ हैं क्योंकि लौहपुरुष आजकल चिंतन में ज्यादा समय दे रहे हैं।
पर उनके विरोधी फुसफसा रहे थे कि लौहपुरुष को वीआरएस दिए जाने की पेशकश की गई है इसलिए उनके माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही हैं। लौहपुरुष वीआरएस नहीं लेना चाहते थे। वे ये तो चाहते थे कि कुछ नेताओं को तो जल्द से जल्द रिटायर कर दिया जाए, बिना वीआरएस दिए हुए। लेकिन अपने बारे में उनकी राय थी कि उनकी सेवाओं को देखते हुए उनको कभी रिटायर नहीं किया जाना चाहिए। कभी-कभी वे अपने ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे हुए अपने आप से पूछते कि क्या कोई लौहपुरुष कभी रिटायर हो सकता है। उनको अपने भीतर से आती हुई आवाज सुनाई देती-'कदापि नहीं, लौह पुरुष रिटायर नहीं होते।'

आवाज सुनकर जब वे आइने की तरफ देखते उनको अपने ललाट पर पिफर से एक नई देखा दिखती। पिफर उनका चेहरा कुछ और ज्यादा चिंतनीय दिखने लगता।

 

साहित्य, रंगमंच और पिफल्मों पर नियमित लेखन। कहानी और व्यंग्य लेखन भी। पिछले २५ सालों से हिन्दी पत्राकारिता। आजकल स्टार न्यूज से संब(।
ई-१०२, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-९, वसुंध्रा, गाजियाबाद, उ.प्र.
मो. ०९८७३१९६३४३

 
 
 
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