| उर्मिल कुमार थपलियाल |
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एक किशोर क्रांति
न अब पुरनम लिखेगी
न अब शबनम लिखेगी
क़लम में दम है तो
अब बम लिखेगी
लिखेगी रात दिन
हर पल लिखेगी
लिखेगी आग तो
हरदम लिखेगी
लिखेगी दबावों में
दबी रहकर
समझना मत क़लम
कुछ कम लिखेगी
न कुछ भी व्यक्तिगत
होगा क़लम का
वो ''मैं'' की जगह
अब से ''हम'' लिखेगी
बहुत दिन हो गई
कविता कहानी
वो सुविधा की जगह
अबश्रमलिखेगी |
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| मेरा पता |
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रोशनी से बच गए अंधियार में हूँ
जेब में पैसा नहीं, बा८ाार में हूँ
है समय विज्ञापनों का, क्या शिकायत
डरी कविता की तरह अख़बार में हूँ
समय से नारा८ा हूँ, मजबूर हूँ, बेचैन हूँ
हूँ तो लोहा मैं मगर तलवार में हूँ
बाबुओं की नींद में हूँ छुट्टियों के ख़वाब सा
कलेन्डर में छपे हर इतवार में हूँ
बंदिशें ही बंदिशें हैं लड़कियों के भाग में
बंद खिड़की की तरह दीवार में हूँ
भागते इक दूसरे से बंद कमरों में विभाजित
मैं किसी अति आधुनिक परिवार में हूँ। |
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