अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
गीत/ग़ज़ल
उर्मिल कुमार थपलियाल
एक किशोर क्रांति

न अब पुरनम लिखेगी
न अब शबनम लिखेगी
क़लम में दम है तो
अब बम लिखेगी
लिखेगी रात दिन
हर पल लिखेगी
लिखेगी आग तो
हरदम लिखेगी
लिखेगी दबावों में
दबी रहकर
समझना मत क़लम
कुछ कम लिखेगी
न कुछ भी व्यक्तिगत
होगा क़लम का
वो ''मैं'' की जगह
अब से ''हम'' लिखेगी
बहुत दिन हो गई
कविता कहानी
वो सुविधा की जगह
अबश्रमलिखेगी
 
मेरा पता
 

रोशनी से बच गए अंधियार में हूँ
जेब में पैसा नहीं, बा८ाार में हूँ
है समय विज्ञापनों का, क्या शिकायत
डरी कविता की तरह अख़बार में हूँ
समय से नारा८ा हूँ, मजबूर हूँ, बेचैन हूँ
हूँ तो लोहा मैं मगर तलवार में हूँ
बाबुओं की नींद में हूँ छुट्टियों के ख़वाब सा
कलेन्डर में छपे हर इतवार में हूँ
बंदिशें ही बंदिशें हैं लड़कियों के भाग में
बंद खिड़की की तरह दीवार में हूँ
भागते इक दूसरे से बंद कमरों में विभाजित
मैं किसी अति आधुनिक परिवार में हूँ।

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
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