अक्टूबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
वाद विवाद
झूठ-सच के बीच प्रेमचंद : प्रदीप जैन, राजीव रंजन गिरि

प्रेमचंद की जातिगत टिप्पणी के अलावा उनकी रचनाओं के संदर्भ भी समय-समय पर विवाद को जन्म देते रहे हैं। 'पाखी' के जुलाई अंक के 'अदबी हयात' स्तंभ में राजीव रंजन गिरि ने प्रेमचंद की रचनाओं की प्रमाणिकता के बारे में लिखा था कि कुछ रचनाएँ प्रेमचंद के नाम से संकलित हैं जो उनकी हैं ही नहीं। इस रहस्योद्द्घाटन के बाद सहसा डॉ. प्रदीप जैन का प्रकटीकरण हो गया जो इस 'खोज' पर अपना दावा ठोक रहे हैं कि प्रेमचंद की उन रचनाओं की प्रमाणिकता का सबसे पहले उन्होंने ही आविष्कार किया था। बकौल डॉ. प्रदीप जैन-'राजीव रंजन गिरि ने मेरे महत्वपूर्ण शोध का अपहरण कर लिया है।' सर्वविदित है कि प्रेमचंद की अनुपलब्ध रचनाओं की खोज के लिए हिन्दी साहित्य में कैसे खेल होते रहे हैं। बहरहाल, पेश है हिन्दी कथा के शिखर पुरुष से जुड़े इस ता८ाा विवाद के दोनों पहलू-शिकवा और जवाब ए-शिकवा के रूप में।



शिकवा


पाखी' मासिक के जुलाई २००९ अंक में पृष्ठ ६५/६७ पर प्रकाशित राजीव रंजन गिरि का कथित शोध लेख मेरे महत्वपूर्ण व पूर्व प्रकाशित/प्रसारित शोध की अधूरी नकल मात्रा है। पुरानी कहावत है कि नकल को भी अकल चाहिए। राजीव रंजन गिरि ने मेरे महत्वपूर्ण शोध लेख का अपहरण करने का प्रयास तो किया लेकिन शोध प्रविधि तथा तथ्यों की पूरी जानकारी न होने के कारण उनका आलेख हास्यास्पद वस्तु बनकर रह गया है।

प्रेमचंद की लिखी हुई जीवनियों का संग्रह उर्दू में वर्ष १९२९ में रामनारायण लाल ने इलाहाबाद से प्रकाशित किया था। पुस्तक, पाठ्यक्रम में स्वीकृत किये जाने हेतु समिति के सम्मुख प्रस्तुत हुई थी परंतु स्वीकृत न हो सकी। पुस्तक में ५ मुस्लिम महापुरुषों की जीवनियाँ सम्मिलित करके और दो जीवनियाँ खारिज करके इसका दूसरा संस्करण वर्ष १९३२ में उसी प्रकाशक ने प्रकाशित किया। मुंशी प्रेमचंद ने २५ अक्टूबर १९३२ के पत्रा में दया नारायण निगम ;संपादक जमानाद्ध को स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि पुस्तक के द्वितीय संस्करण में शामिल मुस्लिम महापुरुषों की जीवनियों में से अकबरे आजम, वहीदुद्दीन सलीम व अब्दुल हलीम शरर अन्य लेखकों की लिखी हुई व जमाना में पूर्व प्रकाशित जीवनियाँ हैं।

प्रेमचंद का यह पत्रा स्व. मदनगोपाल के व्यक्तिगत संग्रह में है और यही कारण है कि जब सन १९४० में प्रेमचंद के पुत्राों अमृतराय व श्रीपतराय ने ''बाकमालों के दर्शन'' का हिन्दी रूपान्तरण करके ''कलम, तलवार व त्याग'' के नाम से दो भागों में प्रकाशित किया तो अन्य लेखकों की लिखी अन्य जीवनियाँ भी उसमें सम्मिलित हो गईं। गौरतलब है कि ''कलम, तलवार और त्याग'' पुस्तक न तो कोई प्रेमचंद की स्वतंत्रा हिन्दी पुस्तक है और न प्रेमचंद द्वारा किया हुआ हिन्दी रूपान्तरण। जमाना की फाइलों से उक्त तीनों जीवनियों के मूल पाठ प्राप्त होते हैं, जिनका संदर्भ निम्न है-
अ- अकबर आजम, लेखक मौलवी अजीज मिर्जा साहिब, बी.ए. जज हाईकोर्ट, हैदराबाद दक्कन, जमाना ;उर्दू मंथलीद्ध अक्टूबर १९०५, पेज १८७-२०१
ब- मौलाना वहीदुद्दीन सलीम, लेखक सैक्षयद अब्दुल वदूद साहब दर्द बरेलवी, जमाना ;उर्दू मंथलीद्ध अगस्त १९२८, पेज ९९-१०५ ;शीर्षक मौलाना सलीम पानीपतीद्ध
स- अब्दुल हलीम शरर, लेखक ख्वाजा अब्दुल रऊफ इशरत लखनवी, जमाना ;उर्दू मंथलीद्ध फरवरी १९२७, पेज ८५-९१ ;शीर्षक मौलाना शरर मरहूमद्ध

अफसोस की बात यह है कि प्रेमचंद के पूर्व संदर्भित पत्रा को मदन गोपाल ने शब्दशः उद्धृत किया था लेकिन कुल्लियाते प्रेमचंद को इन तीनों रचनाओं से बचाने में वे सफल नहीं हुए। इसे उनकी असावधानी, लापरवाही या बढ़ी हुई उम्र का असर कहा जाए, यह कहना संभव नहीं है। हाँ, इतना जरूर है कि उक्त तीनों जीवनियों के अलावा मदन गोपाल ने कुछ ऐसी रचनाएँ कुल्लियाते प्रेमचंद में शामिल की हैं जो प्रेमचंद की मूल रचनाएँ नहीं हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्न है-
१. इंसाफ-डान गॉल्सवर्दी के अंग्रेजी नाटक का उर्दू अनुवाद, मूल अनुवादक हरप्रसाद सक्सेना
२. कलाम ए अकबर पर एक नजर-मूल लेखक अज्ञात
३. पिफरकेवाराना कशीदगी - जमाना का जो संदर्भ दिया गया है वहाँ रचना उपलब्ध नहीं है तथा न ही कहीं देखने में आती है।
४. सुरूर और शाकिर - मूल लेखक मुंशी नौबतराय नजर
५. मुबाहिसा मौजूदा ८ाौक़ ही सही-मूल लेखक खान बहादुर मि८र्ाा ८ाफर अली खान
६. शु(ि एक जवाब - मूल लेखक श्रीराम शर्मा

गौरतलब है कि प्रेमचंद का दया नारायण निगम के नाम लिखा पूर्व संदर्भित पत्रा मदन गोपाल के व्यक्तिगत संग्रह में है और यही वजह है कि जब १९४० में श्रीपत राय व अमृत राय ने 'बाकमालों के दर्शन' का हिन्दी रूपान्तरण 'कलम, तलवार व त्याग' के नाम से प्रकाशित किया तो उन्हें इस पत्रा के कथन ही नहीं बल्कि अस्तित्व की भी जानकारी नहीं थी और ये तीनों जीवनियाँ 'कलम, तलवार व त्याग' में भी शामिल हो गईं। प्रेमचंद के पत्राों का संकलन 'चिट्ठी' पत्राी के नाम से पहली बार १९६२ में छपा, लेकिन अफसोस की बात है कि १९६२ के बाद अमृत राय प्रेमचंद के जीवन तथा साहित्य पर कुछ काम करते दिखाई नहीं देते और अपने मौलिक लेखन में व्यस्त रहते हैं।

यदि अमृत राय चिट्ठी पत्राी में संकलित पत्राों पर १९६२ के बाद कुछ ध्यान दे पाते तो संभव था कि 'कलम, तलवार व त्याग' के नवीन संस्करण से उक्त तीनों जीवनियाँ हटा दी गई होतीं। परंतु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका और ये तीनों जीवनियाँ प्रेमचंद की लिखी न होने पर भी प्रेमचंद रचनावली, प्रेमचंद बाल साहित्य कोष और कुल्लियाते प्रेमचंद में सम्मिलित करके प्रकाशित कर दी गईं। क्योंकि तीनों जीवनियाँ मूल रूप से उर्दू की रचनाएँ हैं, इसलिए इनको प्रेमचंद साहित्य से निकाल बाहर करने का पहला दायित्व कुल्लियाते प्रेमचंद के संपादक मदन गोपाल का था और इसी आधार पर इस साहित्यिक असंगति को उद्द्घाटित करने का दायित्व उर्दू विद्वानों का था।

राजीव रंजन गिरि उर्दू के ज्ञान के मामले में हमारे सबसे बड़े प्रेमचंद विशेषज्ञ डॉ. कमल किशोर गोयनका के समकक्ष हैं, यानि दोनों ही महानुभावों को उर्दू नहीं आती। इसका प्रमाण यह है कि अपने उपर्युक्त लेख में पृष्ठ ६६ पर राजीव रंजन गिरि लिखते हैं ''साथ ही मौलाना अब्दुल हलीम शरर को मौलाना शरर मरहूम नाम से भी लोग जानते हैं'' यदि लेखक को उर्दू का कार्यसाधक ज्ञान भी हुआ होता तो उन्हें पता होना चाहिए था कि उर्दू में 'मरहूम' शब्द का प्रयोग हिन्दी के 'स्वर्गीय' शब्द के लिए किया जाता है। और मरहूम शब्द न तो कोई तखल्लुस है और न ही इस नाम से लोग जाने जाते हैं। अनुनय विनय करके मुझसे ही ली गई सामग्री के आधार पर जो अधकचरा एवं अप्रमाणिक सा आलेख राजीव रंजन गिरि ने प्रस्तुत किया है, यह न केवल साहित्यिक बेईमानी है वरन मेरे महत्वपूर्ण शोध का अपहरण करने का भोंडा सा प्रयास मात्रा है, जो प्रत्येक दृष्टि से निंदनीय है।

 
 
जवाब ए शिकवा
 

जुलाई के 'अदबी हयात' में आप सबने पढ़ा कि 'प्रेमचंद रचनावली', 'प्रेमचंद : बाल साहित्य समग्र' और 'कुल्लियाते प्रेमचंद' में तीन ऐसी रचनाएँ हैं जो प्रेमचंद की नहीं हैं। भूलवश ये रचनाएँ प्रेमचंद के नाम से छपती रही हैं। ये तीनों रचनाएँ हैं-अकबर, मो. वहीदुद्दीन सलीम और मौ. अब्दुल हलीम 'शरर'। जुलाई के 'अदबी हयात' में इस मसले पर, विस्तारपूर्वक लिखा जा चुका है। तीन साल पहले, इस मसले पर सारी सूचनाओं के साथ 'राष्ट्रीय सहारा' ;रविवार, २० अगस्त २००६द्ध के 'मंथन/शब्दार्थ' पृष्ठ पर भी मेरा एक आलेख ''ये रचनाएँ प्रेमचंद की क्यों बताई गईं?'' शीर्षक से छप चुका है। यह सूचना अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे और तथ्यात्मक सुधार हो जाए, इस मकसद से, 'आउटलुक' हिन्दी के जुलाई अंक में भी प्रकाशित कराया।

तीन साल पहले जब 'राष्ट्रीय सहारा' में इस मुद्दे पर सारी सूचनाओं के साथ विस्तारपूर्वक 'ये रचनाएँ प्रेमचंद की क्यों बताई गईं' शीर्षक लेख छपा, किसी तरह का विवाद नहीं हुआ। 'पाखी' ;जुलाई ०९द्ध में जब 'प्रेमचंद रचनावली में दूसरों की रचनाएँ' छपा, एक सज्जन ने आधारहीन आरोप लगाते हुए एक लेख लिखा है।
सवाल उठता है कि 'राष्ट्रीय सहारा' में जब इसी मुद्दे पर छपा तो आरोप क्यों नहीं लगाए गए? आरोप लगाने के लिए तीन साल की चुप्पी क्या बताती है? दरअसल, 'राष्ट्रीय सहारा' वाले लेख में इस मुद्दे से संबंधित सारी जानकारियाँ लिखी गयी थीं। 'पाखी' ;जुलाईद्ध में भी राष्ट्रीय सहारा की तुलना में कुछ कम संदर्भ हैं, पिफर भी पर्याप्त हैं। 'आउटलुक' में स्पेस की कमी के कारण सारी जानकारियाँ विस्तारपूर्वक नहीं दी जा सकी हैं।

इस निराधार आरोप पर उसी भाषा में जवाब देना अकादमिक शिष्टाचार के प्रतिकूल होगा। इसलिए जरूरी यह है कि इस मुद्दे से संबंधित सारी जानकारियों का खुलासा सामने लाया जाएऋ ताकि पाठक खुद निर्णय कर सकें। सन्‌ १९२९ ई. में प्रेमचंद की एक किताब छपी-'बा-कमालों के दर्शन'। इलाहाबाद के रामनारायण लाल इसके प्रकाशक थे। बच्चों के लिए लिखी गयी इस किताब में महत्वपूर्ण शख्सियतों की जीवनियाँ संकलित थीं। जिन्हें प्रेमचंद ने समय-समय पर लिखा था। प्रेमचंद चाहते थे कि यह किताब स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल हो जाए। ८ााहिर है स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल होने पर पाठक अधिक मिलते और रॉयल्टी भी ज्यादा मिलती। बच्चों की चेतना का विकास भी होता। लिहा८ाा, यह किताब 'टेक्स्ट बुक कमेटी' के अवलोकनार्थ भेजी गयी।

कमेटी ने इस किताब को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। प्रेमचंद ने इस किताब को पाठ्यक्रम में स्वीकृत नहीं होने की वजह माना -इसमें किसी मुस्लिम महापुरुष की जीवनी का नहीं होना। इसका पता मुझे कैसे चला? प्रेमचंद के एक जीवनीकार मदन गोपाल द्वारा लिखित जीवनी 'कलम का मजदूर प्रेमचंद' ;राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली-६, प्रथम संस्करण १९६५द्ध के पच्चीसवें अध्याय 'पिफर बनारस में' में जीवनीकार ने लिखते हुए प्रेमचंद के खत से उ(ृत किया है, जिसके ८ारिए इस मसले का पता चलता है। ''इसी समय दयानारायण निगम से टेक्स्ट बुक योजनाओं पर भी पत्रा-व्यवहार हो रहा था। इस संबंध में उनको पूरे सहयोग का आश्वासन दिया। प्रेमचंद ने स्वयं भी कुछ अन्य साथियों से मिलकर टेक्स्ट बुक की योजना बनाई थी। परंतु 'मेरा मुआमला शायद अड़ा जा रहा है। ताल्लुकदार प्रेस फाकामस्त है। उमानाथ बली साहब नाम के ताल्लुकदार हैं। प्रेस के पास असासा कुछ नहीं है। अभी तक किताबों की तबाअत शुरू नहीं हुई। मुसन्नपफ़ीन में दो साहब इलाहाबाद म्योर कॉलेज के हैं। एक साहब तो मसूरी में तशरीफ रखते हैं, दूसरे रायपुर में या नरसिंहपुर में, तीसरा मैं हूँ। खैर, चूंकि मैं सबसे ज्यादा ग़र्८ामंद हूँ, इसलिए मैंने प्रूफ वगैरह देखने का ८िाम्मा ले लिया था। मगर अभी तक तबाअत शुरू नहीं हुई। जुलाई में तीनों किताबें तैयार हो जाएँगी, मुझे इसमें शुबहा है।'' ;पृष्ठ-२२९द्ध

मदनगोपाल आगे लिखते हैं ''बाकमालों के दर्शन' को भी टेक्स्ट बुक लगवाने का प्रयत्न किया गया, परंतु असफल रहे। नये संस्करण के बारे में निगम को लिखा-'पहले इस मजमुए में मुसलमान मशाहीर न थे। शायद इसी बिना पर कमेटी ने इस पर इल्तपफ़ात न किया था। अब वह कमी पूरी कर दी गई है। अकबर तो मैंने 'अ८ाी८ा मि८र्ाा' से लिया है। वहीदुद्दीन ;गलती से वसीउद्दीन छपा हैद्ध सलीम और शरर भी '८ामाना' के म८ाामीन से मक्तबस हैं। मेरे खयाल में अब यह स्कूल के क़ाबिल है। अबकी यह किताब पिफर पेश की जाएगी। मैं आपसे उम्मीद करूँगा कि इसके हक में एक कलमा-ए-खैर कहकर इसे दाखिले इंतखाब करा दें। इसके लिए शुक्रिया न अदा करूँगा।'' ;वही पृष्ठद्ध इसके ८ारिए इन पंक्तियों के लेखक को पता चला कि उक्त तीन म८ामून प्रेमचंद ने अन्य रचनाकारों से लिए हैं। प्रेमचंद ने स्रोत भी बता दिया है कि अकबर अ८ाी८ा मि८र्ाा से लिया है और शेष दो भी '८ामाना' के म८ाामीन से। हिन्दी में छपी 'प्रेमचंद रचनावली' ;जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.द्ध और डॉ. कमल किशोर गोयनका द्वारा संपादित 'प्रेमचंद : बाल साहित्य समग्र' में ये रचनाएँ संकलित हैं, पर इनके मूल स्रोत का पता नहीं चलता है।

डॉ. गोयनका ने संदर्भ के तौर पर 'बा-कमालों के दर्शन' का ही जिक्र किया है। प्रसंगवश, राजकमल प्रकाशन ने अपनी स्थापना के साठ साल पूरा होने पर जिन साठ शिखर पुस्तकों का चयन किया है, उनमें एक मदन गोपाल की किताब 'कलम का मजदूर : प्रेमचंद' भी है। प्रेमचंद द्वारा २५ अक्टूबर १९३२ को इलाहाबाद से लिखा गया यह पत्रा 'प्रेमचंद : चिट्ठी पत्राी' ;संकलन-लिप्यंतर-शब्दार्थ : अमृत राय, मदन गोपालऋ खण्ड-१, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम संस्करणद्ध में भी संकलित है। इस किताब के १९९ पन्ने पर इस पत्रा का क्रम २५८ है। प्रेमचंद ने इसमें पूरी जानकारी देते हुए लिखा है-''बा-कमालों के दर्शन यहाँ लाला राम नारायण लाल बुकसेलर ने शाया किया है। यह आपको मालूम है। इसमें इतनी सवानेह उमरियाँ हैं-१. राणा प्रताप २. टोडरमल ३. मानसिंह ४. अकबर ५. बदरुद्दीन तैयब जी ६. सर सैयद अहमद ७. वहीदुद्दीन सलीम ८. शरर ९. गैरी बाल्डी १०. रणजीत सिंह ११. विवेकानंद''

बहरहाल, इन तीनों आलेखों के संदर्भ का सिपर्फ इतना ही पता चल पाया कि इनमें से दो '८ामाना' से लिए गए हैं और एक अ८ाी८ा मि८र्ाा से। अब यह जानना था कि अ८ाी८ा मि८र्ाा का लेख आखिरकार कहाँ छपा था? क्या इस लेख को प्रेमचंद ने सीधे अ८ाी८ा मि८र्ाा से लिखवाया था या यह भी कहीं छप चुका था?
नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाईब्रेरी ;तीन मूर्तिद्ध नयी दिल्ली में '८ामाना' के अंकों की माइक्रोपिफल्म है। बीच-बीच के कुछेक अंकों को छोड़कर १९०६ से १९४९ जून तक के ज्यादातर '८ामाना' के अंक, तीनमूर्ति में माइक्रोपिफल्म बनाकर रखे गए हैं। इन माइक्रोपिफल्मों को कोई भी देख सकता है। माइक्रोपिफल्म की एक रील में कई अंक होते हैं। पत्रा-पत्रिाकाओं के पृष्ठों और माइक्रोपिफल्म की रील की क्षमता पर यह निर्भर करता है। मसलन-जुलाई १९२४ से फरवरी १९२८ तक के ८ामाना के अंक, एक रील में हैं। बहरहाल, तीनमूर्ति में एक सहयोगी के साथ माइक्रोपिफल्म में '८ामाना' की विषय-सूची देखने पर अंक फरवरी १९२७ में 'मौलाना शरर मरहूम' शीर्षक लेख मिला था।

इसके लेखक का नाम 'ख्वाजा अब्दुल्ल रऊफ ईशरत' छपा है। आरोपकर्ता ने लिखा है कि '८ामाना' में लेखक का नाम 'ख्वाजा अब्दुल रऊफ इशरत लखनवी' छपा है। जबकि सच्चाई यह है कि '८ामाना' में 'लखनवी' तखल्लुस छपा ही नहीं है। इसके साथ ही '८ामाना' के इस लेख का अंतिम अनुच्छेद प्रेमचंद के नाम से छपी किताबों में नहीं है, इसके बारे में भी आरोपकर्ता चुप है। तो क्या इस वजह से आरोपकर्ता के उर्दू-ज्ञान पर उँगली उठायी जाए? नहीं। ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं, जैसा कि अन्य लोगों से भी हुई हैं। '८ामाना' का यही लेख प्रेमचंद ने 'बा-कमालों के दर्शन' में शामिल किया था। जहाँ से 'क़लम, तलवार और त्याग' में भी तर्जुमा कर १९४० ई. में छपा। इसी प्रकार, माइक्रोपिफल्म में अंक अगस्त १९२८ में 'मौलाना सलीम पानीपती' शीर्षक लेख छपा है। इसके लेखक का नाम जनाब सैयद मोहम्मद अब्दुल्ल बदूद साहब दर्द बरेलवी है। पिफर से दुहरा दें कि सर सैयद अहमद खाँ के सहयोगी रहे मौलाना वहीदुद्दीन सलीम को मौलाना सलीम पानीपती के नाम से भी जाना जाता है।

इस प्रकार, दो आलेख मिल गए। परंतु अ८ाी८ा मि८र्ाा की रचना का पता नहीं लग सका। इसलिए, यह काम स्थगित करना पड़ा। काफी समय बाद जून २००५ के 'आजकल' ;हिन्दीद्ध में मदन गोपाल का 'प्रेमचंद वाघ्‌मय अब उर्दू में भी' शीर्षक लेख पढ़ा। इस लेख में मदन गोपाल ने उर्दू में प्रेमचंद की रचनाओं को संकलित करने की प्रक्रिया पर लिखा है। चूंकि मदन गोपाल द्वारा लिखी जीवनी में प्रेमचंद का वह खत उ(ृत हैऋ लिहा८ाा इनके द्वारा संकलित 'कुल्लियाते प्रेमचंद' को देखना आवश्यक लगा। इसके खण्ड बीस एवं इक्कीस में उक्त तीनों रचनाओं को देखकर अचरज हुआऋ क्योंकि मदन गोपाल ने ही 'कलम का मजदूर : प्रेमचंद' में प्रेमचंद द्वारा '८ामाना' के संपादक दयानारायण निगम को लिखे पत्रा से उ(ृत किया है, और 'प्रेमचंद : चिट्ठी पत्राी' के संयोजन में अमृत राय के साथ भी मदन गोपाल थेऋ जिसमें 'बा-कमालों के दर्शन' के दूसरे संस्करण के बारे में जिक्र है और यह बताया गया है कि उक्त तीन लेख दूसरे लेखकों/८ामाना से ले रहे हैं। बहरहाल, 'कुल्लियाते प्रेमचंद' में 'अकबर आ८ाम' शीर्षक लेख के नीचे स्रोत के तौर पर छपा है-'८ामाना, अक्टूबर १९०५ और 'मौलाना वहीदुद्दीन सलीम' तथा 'अब्दुल्ल हलीम शरर' के अंत में 'बाकमालों के दर्शन' का जिक्र है। दो लेख '८ामाना' में मिल ही चुके थे परंतु 'अकबर आ८ाम' के स्रोत का पता नहीं चल पा रहा था। 'कुल्लियाते प्रेमचंद' के ८ारिए इसकी जानकारी भी मिल गयी।

पटना स्थित खुदाबख्श ओरिएन्टल पब्लिक लाईब्रेरी और गवर्नमेंट उर्दू लाईब्रेरी में '८ामाना' के अंक देखने को मिले। खुदाबख्श लाईब्रेरी में '८ामाना' के १९०३ से १९४३ तक के ज्यादातर अंक हैं जबकि गवर्नमेंट उर्दू लाईब्रेरी में १९४० के बाद के अंक हैं। प्रसंगवश, खुदाबख्श लाईब्रेरी में '८ामाना' के जितने अंक हैं, सारे-के-सारे '८ामाना' के मूल अंक नहीं हैं। इस लाईब्रेरी ने जिस अंक की मूल प्रति नहीं मिल सकती थी, उसका जेरॉक्स कराकर देश-समाज की उस थाती को सहेजकर सुरक्षित रखने का सुंदर एवं सार्थक काम किया है। उदाहरणस्वरूप, इस लाईब्रेरी में '८ामाना' के पहले अंक ;जून १९०३द्ध की मूल प्रति है जबकि इसके बाद के अंक ;यानी जुलाई, अगस्त के अंकद्ध जेरॉक्स कराकर रखे गए हैं। खुदाबख्श लाईब्रेरी में '८ामाना' का 'अक्टूबर १९०५' का अंक मिला। यह अकबर पर केंद्रित अंक था। इस अंक में नवाब राय ;प्रेमचंदद्ध के दो लेख राजा मान सिंह और टोडरमल पर प्रकाशित हैं। 'अकबर-ए-आ८ाम' शीर्षक लेख के रचनाकार का नाम मौलवी अ८ाी८ा मि८र्ाा साहब, बी.ए. जज हाइकोर्ट, हैदराबाद दक्कन है। यानी प्रेमचंद ने अपने पत्रा में 'अकबर तो मैंने अ८ाी८ा मि८र्ाा से लिया है' लिखा था, वह लेख यही है। नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाईब्रेरी में जो दो लेख मिले थे, वे खुदाबख्श में भी मौजूद हैं। यहाँ से मैंने तीनों लेखों का जेरॉक्स कराकर रख लिया और अपने लेख में इसका उपयोग किया।

अब कुछ बातें इन तथ्यों के महत्व पर। क्या इन तथ्यों के उजागर होने से प्रेमचंद के महत्व पर कोई पफ़र्क पड़ेगा? क्या प्रेमचंद के बारे में जो धारणाएँ, मान्यताएँ साहित्य जगत में मौजूद हैंऋ वह दरक जाएँगी? जवाब है-बिल्कुल नहीं। भले ही इन तीनों जीवनीपरक लेखों को प्रेमचंद ने अपनी तत्कालीन जरूरत को पूरा करने के लिए शामिल किया था, पर इससे उनके मूल्यांकन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वजह साफ है। ये तीनों लेख प्रेमचंद की प्रगतिशील विचारधारा के अनुकूल हैं। ऐसा अनुमान किया जा सकता है-प्रेमचंद की तरक्कीपसंद और धर्मनिरपेक्ष प्रवृत्ति के लिहा८ा से यह बिल्कुल तार्किक और विश्वसनीय भी है कि इन तीनों को प्रेमचंद खुद भी लिखते तो उसमें ऐसी ही मान्यता मौजूद होती। अगर प्रेमचंद की विचारधारा के अनुरूप इन जीवनियों में मान्यताएँ अंतनिर्हित नहीं होतीं तो प्रेमचंद इसे अपनी किताब 'बा-कमालों के दर्शन' में कतई शामिल नहीं करते, यह यकीनन कहा जा सकता है। 'बा-कमालों के दर्शन' के दूसरे संस्करण में प्रेमचंद ने दो अन्य मुस्लिम शख्सियतों-बदरुद्दीन तैयब जी और सर सैयद अहमद खाँ की जीवनियाँ भी शामिल कीं। ये पाँचों जीवनियाँ प्रेमचंद की विचारधारा के अनुकूल हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इन तथ्यों के उजागर होने से क्या होगा? इन तथ्यों की जानकारी से इसके वास्तविक लेखकों को उनका श्रेय मिलेगा, जो प्रेमचंद के नाम से छपने पर पर्दे से ढक गया था।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि ऐसी गलतियाँ सिपर्फ प्रेमचंद के साथ ही हुई हैं। कुछ रचनाओं का छूट जाना या दूसरों की रचना जाने-अनजाने शामिल होना और जगह भी हैं। उदाहरण के तौर पर 'भारतेंदु हरिश्चंद्र ग्रंथावली' ;संपादक-ओमप्रकाश सिंह, प्रकाशन संस्थान, दिल्लीद्ध में मौलिक नाटक के रूप में 'भारत जननी' नाटक छपा है। जबकि यह नाटक भारतेंदु हरिश्चंद्र का नहीं है। इस तथ्य की जानकारी संपादक को बाद में हो गयी थी, इसलिए उन्होंने इसे स्वीकार करते हुए एक नोट भी लगा दिया है। भाव और भाषा शीर्षक लेख 'निराला रचनावली' ;खण्ड पाँच, संपादक नंद किशोर नवलद्ध में छपा है। साथ ही यही लेख-पय न हो पाने के कारण की आखिर निराला जी का है या वाजपेयी जी का-'नंद दुलारे वाजपेयी रचनावली' ;खण्ड-७ संपादक विजय बहादुर सिंहद्ध में भी छपा है। यह तो हुई अतीत की बात। हमारे एक वर्तमान रचनाकार के साथ भी ऐसी तथ्यात्मक गलती हुई है। कवि मदन कश्यप की 'द्घर' शीर्षक कविता ;जो इनके संग्रह 'लेकिन उदास है पृथ्वी' में छपी हैद्ध गलतीवश कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह के संग्रह 'पत्थरों का गीत' ;संपादक-आनंद प्रकाशद्ध में छप गयी है। लिहाजा, इन तथ्यों का महत्व महज 'भूल-सुधार' जितना ही है।

इन तथ्यों के एकाधिकार पर भी कुछ बातें! क्या इन तथ्यों
पर किसी का कॉपीराइट होगा? बिल्कुल नहीं। प्रेमचंद की रचनाएँ कॉपीराइट मुक्त हो गयी हैं। ये तथ्य भी तीनमूर्ति लाईब्रेरी और खुदाबख्श लाईब्रेरी ;संभव है और भी कई जगह और कई लोगों के पास भी होंद्ध में '८ामाना' के अंकों में हैं। लिहा८ाा इसका उपयोग कोई भी कर सकता है। आरोपकर्ता का इस विषय पर लेख २००८ में, एक उर्दू पत्रिाका में और २००९ की एक हिन्दी पत्रिाका में छपा है जबकि मेरा विस्तृत लेख २००६ में ही प्रकाशित हो चुका है। बावजूद इसके, इन तथ्यों पर किसी का कॉपीराइट नहीं हो सकता। एक दिलचस्प बात और। आरोपकर्ता ने जहाँ भी इन प्रसंगों पर लिखा है, कहीं भी जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि. से प्रकाशित 'प्रेमचंद रचनावली' और अपने वैचारिक साथी डॉ. कमल किशोर गोयंका द्वारा संपादित 'प्रेमचंद : बाल-साहित्य समग्र' की चर्चा बिलकुल नहीं की है। आरोपकर्ता के निशाने पर उर्दू में प्रकाशित 'कुल्लियाते प्रेमचंद' ही रहा है। जबकि उर्दू से कई साल पहले हिन्दी वाली उक्त पुस्तकें छप चुकी थीं। आखिर इसके पीछे की वजह क्या है? इसके ८ारिए, इस विवाद को भी समझा जा सकता है।

अंत में, एक बात और। क्या इस या ऐसे कुछेक तथ्यों को खोजकर सामने लाने से कोई भी प्रेमचंद का विशेषज्ञ मान लिया जाएगा? अगर कोई भी ऐसा सोचता है तो यह उसकी बौ(कि नादानी होगी। प्रेमचंद-साहित्य का विशेषज्ञ होने के लिए उसकी नयी व्याख्या करनी होगी। नए परिप्रेक्ष्य में तार्किक विचारोत्तेजक और विश्वसनीय विश्लेषण करने होंगे। प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञों, आलोचक-रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, वीर भारत तलवार, कांति मोहन, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, वीरेन्द्र यादवऋ इतिहासकार सुधीर चंद्र, शाहिद अमीन, गीतांजलि पांडेयऋ अर्थशास्त्राी गिरीश मिश्र, पूरनचंद्र जोशी इत्यादि में से ज्यादातर ने कोई तथ्य नहीं खोजा है। इन सबने प्रेमचंद को नए संदर्भ में देखा-परखा है, नयी मान्यताएँ पेश की हैं। अपनी स्थापनाओं के कारण ये लोग या इनके जैसे और भी कई लोग प्रेमचंद-विशेषज्ञ के तौर पर शुमार किए जाते हैं। लिहा८ाा, आरोपों के ८ारिए विवाद फैलाकर, चर्चा में आने की प्रवृत्ति छोड़कर बौ(कि श्रम करने से 'विशेषज्ञ' का दर्जा मिलेगा।

 
 
 
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