सिंतम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
ख़बरनामा
१३१वीं प्रेमचंद जयंती
प्रासंगिक है प्रेमचंद का साहित्य

था सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती, ३१ जुलाई पर पोर्टब्लेयर में हिंदी साहित्य कला परिषद् के तत्वावधन में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय भूमंडलीकरण का वर्तमान सन्दर्भ और प्रेमचंद का कथा साहित्य' था। मुख्य अतिथि के रूप में संगोष्ठी को संबोधित करते हुए साहित्यकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि प्रेमचंद ने जिस दौर में सक्रिय रूप से लिखना

शुरू किया, वह छायावाद का दौर था। निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी जैसे रचनाकार उस समय चरम पर थे पर प्रेमचंद ने अपने को किसी वाद से जोड़ने के बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचंद ने कापफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहे वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्रत में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और सामाजिक भेद-भाव हो। कृष्ण कुमार यादव ने जोर देकर कहा कि आज प्रेमचंद की प्रासंगिकता इसलिये और भी बढ़ जाती है क्योंकि आध्ुनिक साहित्य के स्थापित नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अन्ततः लोग इनके सूत्रा किसी न किसी रूप में प्रेमचंद की रचनाओं में ढूँढते नजर आते हैं।
परिषद् के अध्यक्ष आर. पी. सिंह ने संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि प्रेमचंद से पहले हिन्दी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के ध्रातल पर उतारा। डॉ. राम कृपाल तिवारी ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में किसान, मजदूर को लेकर जो भी कहा गया, वह आज भी प्रासंगिक है। उनका साहित्य शाश्वत है और यथार्थ के करीब रहकर वह समय से होड़ लेती नजर आती हैं। द्वीप लहरी के संपादक और परिषद् के साहित्य सचिव डॉ. व्यासमणि त्रिापाठी ने कहा कि वे आम भारतीय के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में वे नायक हुए, जिसे भारतीय समाज अछूत और द्घृणित समझता था। उन्होंने सरल, सहज और आम बोल-चाल की भाषा का उपयोग किया। इस ग्लैमर और उपभोक्तावादी संस्कृति में प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी जीवंत हैं क्योंकि वे आम आदमी की बातें करती हैं। इसके अतिरिक्त जयबहादुर शर्मा, डी. एम. सावित्राी, जगदीश नारायण राय, संत प्रसाद राय आदि ने इस संगोष्ठी में अपने विचार रखे। प्रेमचंद के कई साहित्यिक कृतियों का अंग्रेजी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। यह उनकी विश्वस्तर पर लोकप्रियता का परिचायक है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. व्यासमणि त्रिापाठी और ध्न्यवाद ज्ञापन परिषद् के उपाध्यक्ष शम्भूनाथ तिवारी द्वारा किया गया।

का इसलिए सम्मान करते हैं क्योंकि उनके शब्द हमेशा हमें जटिल प्रश्नों से जूझने में मदद करते हैं। साउथहॉल के सांसद वीरेन्द्र शर्मा ने
राष्ट्रमंडल खेलों में हिन्दी
 
राजभाषा समर्थन समिति मेरठ, अक्षरम एवं वाणी प्रकाशन दिल्ली ने 'राष्ट्रमंडल खेलों में हिन्दी' विषय पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में २७ जुलाई को सांसदों, पत्राकारों, साहित्यकारों, कमेंटटरों की एक संगोष्ठी आयोजित की गयी। यह संगोष्ठी राष्ट्रमंडल खेलों में राजभाषा की अवेहलना होने, दिल्ली नगरपालिका, दिल्ली पुलिस द्वारा नामपट्टों और संकेत चिन्हों पर केवल अंग्रेजी का प्रयोग होने तथा इतने बडे़ आयोजन की वेबसाइट तक हिन्दी में नहीं होने जैसे मुद्दों को लेकर आयोजित किया गया था। साथ ही खेल समारोह के उद्द्घाटन और समापन जैसे कार्यक्रमों में भारत की भाषा और संस्कृति का प्रतिबिंब होना एवं भारत के प्रधानमंत्राी और राष्ट्रपति को इन कार्यक्रमों में अपनी भाषा में संबोध्न को लेकर सवाल उठाये गये। इस अवसर पर कलराज मिश्र ;सांसदद्ध और रत्नाकर पांडेय आदि ने सुझाव दिया कि सुरेश कलमाडी, शीला दीक्षित, एम.एस. गिल से हिन्दी की अवहेलना के मुद्दे पर प्रतिनिध्मिंडल लेकर मिला जाए और ठोस कार्ययोजना बनाई जाए। रामशरण जोशी ने राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े ठोस मुद्दों को सामने रखा। रवि चतुर्वेदी और जसदेव सिंह ने बताया कि किस प्रकार विश्वभर के आयोजनों में स्थानीय देश की भाषा को महत्व दिया जाता है।
कार्यक्रम में प्रदीप टमटा, राजेन्द्र अग्रवाल, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, रामशरण जोशी, डॉ. गंगा प्रसाद विमल, जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी, महेश शर्मा, आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। गोष्ठी का संयोजन अक्षरम के अध्यक्ष अनिल जोशी ने किया।
 
महेश चंद्र पुनेठा सम्मानित
 
'डॉ. पूरनसिंह स्मृति सूत्रा' सम्मान इस वर्ष पिथौरागढ़ ;उत्तराखण्डद्ध में रहने वाले चर्चित युवा कवि महेश चंद्र पुनेठा को प्रदान किया जाएगा। यह पुरस्कार छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से प्रकाशित पत्रिाका 'समकालीन सूत्रा' द्वारा प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष देश के किसी ऐसे युवा कवि को प्रदान किया जाता है जो अपने जनपद और जन से जुड़कर निरंतर अपनी सृजनात्मकता और काव्य सहजता से देश की युवा कविता को समृ( करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
उत्तराखण्ड पिथौरागढ़ के सिरालीखेत गाँव में १० मार्च १९७१ को जन्में महेश चंद्र पुनेठा की कविताएॅं जनपद से उठकर सहजता से वहाँ के जन-जीवन, दुख-सुख और लोक राग के साथ विस्तृत पफलक तैयार करती हैं। अब तक उनकी कविताएँ देश की तमाम चर्चित पत्रा-पत्रिाकाओं में प्रकाशित हो रही हैं, जिसमें महत्वपूर्ण हैं वागर्थ, हंस, पाखी, कथादेश, बया, समकालीन जनमत, वर्तमान साहित्य, समकालीन सूत्रा, वसुध, आजकल, लोकगंगा, प्रतिश्रुति, आधरशिला आदि। अध्यापन से जुड़े महेश देशभर से निकलने वाली छोटी-बड़ी पत्रिाकाओं जनपक्षधर का संग्रह कर एक अध्ययन केंद्र की स्थापना के लिए प्रयासरत हैं। महेश चंद्र पुनेठा का एक कविता संग्रह 'भय अतल में' हाल ही में प्रकाशित हुआ है। १९९७ से शुरू किए गए सूत्रा सम्मान से अब तक देश के चर्चित युवा कवि अशोक साह, नासिर अहमद सिकंदर, रजत कृष्ण, निर्मल आनंद, एकांत श्रीवास्तव, अग्निशेखर, बसंत त्रिापाठी, सुरेश सेन निशांत, केशव तिवारी आदि को सम्मानित किया जा चुका है।
 
हिन्दी विज्ञापनों का समकालीन विमर्श
 
कवि-समालोचक एवं 'नई धरा' के संपादक डॉ. शिवनारायण की नई पुस्तक 'हिन्दी विज्ञापनों का समकालीन विमर्श' का लोकार्पण पटना में सुभद्रा साहित्य परिषद के तत्वावधन में किया गया। पुस्तक का लोकार्पण साहित्यकार एवं मीडिया विशेषज्ञ डॉ. अमरनाथ अमर ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि डॉ. शिवनारायण ने हिन्दी विज्ञापनों के समकालीन विमर्श के बहाने पूंजी बाजार की गिरफ्रत समाज और संस्कृति के क्षय को चित्रिात किया है। मुख्य वक्ता के रूप में कथाकार कलानाथ मिश्र ने कहा कि वे पत्राकारिता, भाषा विज्ञान, आलोचना आदि विधओं में २६ से अध्कि पुस्तकों की रचना की है। उसी श्रृंखला में उन्होंने विज्ञापन से संबंध्ति इस पुस्तक में विज्ञापनों के जरिए बदलते भारतीय समाज के विद्रूप को रेखांकित किया है। इस मौके पर आशा त्रिापाठी, साध्ना ठाकुर, पफरजाना असलम, चित्रा वैश, रामयतन यादव आदि ने भी शिवनारायण की पुस्तक के विषय में अपने विचार रखे। समारोह का संचालन पत्राकार ध््रुव कुमार ने किया।
 
वेदों में हिंसा का समर्थन नहीं
 
प्रेमचंद जयंती के अवसर पर ३१ जुलाई को ऐवाने गालिब हॉल, दिल्ली में 'हंस' के २५वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में संगोष्ठी का विषय 'वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति' था। कार्यक्रम के प्रारंभ में 'हंस' के संपादक राजेन्द्र यादव ने अपने संबोध्न में हिंसा के उफपर प्रकाश डालते हुए कहा कि 'र्ध्म हमेशा
पुरातन व्यवस्था को स्थापित करने पर बल देता है। वहाँ भविष्य गौण होता है। वही राजनीति हमेशा भविष्य की चिंता करती है जबकि दर्शन हमेशा वर्तमान परिस्थितियों पर ही बल देता है।' इसके पश्चात सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेष ने अपने वक्तव्य में कहा कि वेदों में हिंसा का समर्थन किया गया है। यह धारणा गलत है।' माओवादी हिंसा समाधन के परिपे्रक्ष्य में उन्होंने आगे कहा कि समाधन गोली से नहीं बोली से होगा। इस संगोष्ठी में दूसरे अन्य वक्ताओं के रूप में पत्राकार इरा झा, कुलपति विभूतिनारायण राय, आदित्य निगम एवं वरिष्ठ पत्राकार रामशरण जोशी उपस्थित थे। जहाँ एक ओर कुलपति विभूतिनारायण राय ने माओवादी हिंसा के बरक्स राज्यकीय हिंसा का समर्थन किया वही वरिष्ठ पत्राकार रामशरण जोशी ने कहा कि माओवादी बनते नहीं, बनाये जाते है। इसका एक कारण सामाजिक विषमता भी है। पत्राकार इरा झा ने नक्सलियों के बीच अपने पत्राकार जीवन के अनुभवों को विस्तार से बताया। मंच संचालन आनंद प्रधन ने किया।
 
 
 
इस वर्ष का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार युवा कवि व्योमेश शुक्ल को दिया जा रहा है। २५ जून १९८० को जन्में व्योमेश शुक्ल का काव्य संग्रह 'पिफर भी कुछ लोग' आ चुका है। गद्यात्मक शैली में अपने ढंग के नये शिल्प में रचना करना इनके काव्य की प्रमुख विशेषता है। इससे पूर्व इन्हें 'अंकुर समिति' पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। कवि शुक्ल वर्तमान में हिन्दी साहित्य पत्रिाका 'समास' के संपादक भी है। भारत भूषण अग्रवाल सम्मान प्रत्येक वर्ष एक युवा उत्कृष्ट काव्य रचनाकार को दिया जाता है। पिछले वर्ष यह पुरस्कार मनोज कुमार झा को दिया गया था।
 
अष्टभुजा को केदार सम्मान
 
समकालीन कविता के महत्वपूर्ण चर्चित कवि अष्टभुजा शुक्ल को उनके कविता संग्रह 'दुःस्वप्न भी आते हैं' के लिए वर्ष २००९ का केदार सम्मान दिया जाएगा। उक्त द्घोषणा २३ जुलाई को की गयी। १९५४ में बस्ती जनपद में जन्मे अष्टभुजा शुक्ल ग्रामीण कवि हैं। उनकी कविता में एक साथ केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की झलक मिलती है। उनकी कविता का केंद्र न केवल काव्यलक्षण सौंदर्य है बल्कि जनजीवन के पूर्ण सुख-दुख भी हैं। उनके इस संग्रह की कविता बाजारवाद और भूमंडलीकरण के चक्रवाद के बीच दूर-दराज गाँवों के लोगों के पक्ष में खड़ी दिखती हैं। उनके अब तक तीन काव्य संग्रह आ चुके हैं। केदार सम्मान अब तक १३ कवियों को दिया जा चुका हैं।
 
कविता में स्त्राी
 

रमणिका पफाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में डॉ. सुध्ीर सागर का कविता संग्रह 'बस! एक बार सोचो' तथा कुन्ती की पुस्तक 'अंध्ेरे में कंदील' का लोकार्पण किया गया। इन पुस्तकों का लोकार्पण रमणिका पफाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष एस. एस. नूर एवं कवयित्राी अनामिका के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुआ।
इस अवसर पर एस एस नूर ने बताया कि काव्य भाषा दोनों कवियों के पास है। काव्यशास्त्रा की गहरी पहचान है। इस कविता संग्रह में यथार्थ से उपजी नई काव्यभाषा देखने को मिलती है। अनामिका ने कहा कि कुन्ती की कविता 'उजाले की किरण' में सकारात्मक उफर्जा को बदलने की शक्ति है। अजय नावरिया ने कहा कि डॉ. सागर की कविताओं में चित्राात्मक अभिव्यक्ति है! जबकि कुन्ती की कविताओं में स्त्राी है। रमणिका गुप्ता ने कहा कि 'ठाकुर का कुआं' कविता छोटी जरूर है लेकिन ये गहरी तथा लम्बी बात कहती है। अंध्ेरे में कंदील कविता के आरंभ में 'खरपतवार' शब्द का प्रयोग सहज और सही है। रमेश प्रजापति ने कविता पर आलेख पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन दलित साहित्यकार संजीव खुदशाह ने किया। कार्यक्रम में मैत्रोयी पुष्पा, असगर वजाहत, सुध अरोड़ा, अनिता भारती, रूपनारायण सोनकर आदि साहित्यकार उपस्थित थे।

 
राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त जयंती
 
तीन अगस्त को देश की राजधनी में राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त मेमोरियल ट्रस्ट एवं गहोई वैश्य एसोसिएशन द्वारा राष्ट्रकवि की जयंती एवं पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया। पुरस्कारों के अंतगर्त इस वर्ष का मैथिलीशरण गुप्त शिरोमणि पुरस्कार मानिक बच्छावत द्वारा रचित पुस्तक 'इस शहर के लोग', राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार दिव्या माथुर की पुस्तक 'झूठ, झूठ और झूठ', राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त गरिमा पुरस्कार डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण रचित वैदुष्मणि विद्योत्तमा, राष्ट्रकवि गहोई साहित्य सम्मान डॉ. अनुपमा गुप्त रचित कुरूक्षेत्रा बनाम कलि क्षेत्रा तथा विशेष सम्मान गोविंद गुप्त समाजसेवी शिक्षाविद, कवि तथा साहित्यकार को दिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. रत्नाकर पांडेय ने कहा कि राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त वर्तमान भारतीयता की संकल्पना के जनक थे। इस अवसर पर स्मारिका का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में मंचीय संचालन विवेक गौतम ने किया।
 
'जिंदगियाँ भी बंटी'
 
'भारत को दो मुल्क बनाने के दौरान जमीन ही नहीं, ख्वाब, ख्यालात और जिंदगियां भी बंटी। ऐसे में बंटवारे का मामला कापफी पेचीदा भरा है।' उक्त बातें वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने दो नाटकों के विमोचन के अवसर पर कहीं। देश की राजधनी में पिछले दिनों परवेज अहमद के नाटक संकलन 'ये ध्ुआं सा कहाँ से उठता है' एवं 'छोटी ड्योढ़ीवालियां' का विमोचन किया गया। इन पुस्तकों के विमोचन कर्ता नामवर सिंह, कवि अशोक वाजपेयी और अली जावेद थे।
अशोक वाजपेयी ने इन नाटकों के विषय में कहा कि दोनों नाटकों में मुस्लिम जिंदगी का दर्द है। द्घाव पुराने भी हैं और नए भी। अहमद के इन नाटकों में बहुत सारे ऐसे चरित्रा हैं जिनका कहा हुआ याद आएगा। इन चरित्राों में बुनी गई जिंदगी साधरण लोगों की है।' कार्यक्रम के अंत में नाटक के दो दृश्यों का पाठ भी किया गया। समारोह का संचालन रवीन्द्र त्रिापाठी और धन्यवाद ज्ञापन शिल्पायन के ललित शर्मा ने किया।
 
'अनुत्तरित' कहानी का पाठ
 
'क्षितिज शर्मा एक लो-लाइन व्यक्ति हैं। न वे अधिकारी हैं, न कोई संपादक और न कोई हाई प्रोपफाइल व्यक्ति। मतलब कि हम उनकी कहानियों को बिना किसी दबाव के पढ़ सकते हैं। मैंने क्षितिज की ४-५ कहानियों को पढ़ा है, लेकिन 'उकाव' उपन्यास को पढ़ने से पहले मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि क्षितिज पहाड़ी जीवन के संद्घषोर्ं को इतने निकट से जानते हैं।'

उक्त बातें संपादक राजेन्द्र यादव ने १३ अगस्त को आयोजित एक कार्यक्रम में कहीं। पीपुल्स विजन, दिल्ली, हिन्द-युग्म और गाँधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधन में 'एक शाम एक कथाकार' नामक आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में कथाकार क्षितिज शर्मा ने 'अनुत्तरित' कहानी का पाठ किया। कार्यक्रम के अध्यक्ष संपादक राजेन्द्र यादव थे। लेखक के कृतित्व पर समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट और कथाकार महेश दर्पण ने अपने विचार रखे। संयोजन हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी तथा युवा कवि व लेखक रामजी यादव ने किया। कार्यक्रम का संचालन आलोचक आनंद प्रकाश ने किया।
पीपुल्स विजन निकट भविष्य में हर महीने एक ऐसी गोष्ठी के आयोजन को लेकर कटिब( है जिसमें एक कथाकार अपनी कहानियों का पाठ करे और कहानी के जानकार और आम पाठक उस पर अपनी ईमानदार टिप्पणियाँ करें। कथाकार की प्रशस्ति करना ही मात्रा इस गोष्ठी का उद्देश्य न हो, बल्कि कहानीकार को तल्ख और वास्तविक प्रतिक्रियाएँ तत्काल मिलें। इस आयोजन में पीपुल्स विजन को हिन्द-युग्म डॉट काम और गांध्ी शांति प्रतिष्ठान का सहयोग प्राप्त है।

 
स्मृति संगीत संध्या का आयोजन
 
नर्मदापुरम ;होशंगाबादद्ध में २७ जुलाई को गीतकार स्व. ठाकुर बृजमोहन सिंह 'सत्यकवि' के जन्म दिवस पर पर स्मृति संगीत संध्या 'सत्य राग' का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में समाजसेवी पं. भवानी शंकर शर्मा मुख्य अतिथि थे। साध्वी राधामुनि के विशेष अतिथि एवं वरिष्ठ गायक ओमप्रकाश शर्मा की अध्यक्षत में संपन्न इस कार्यक्रम में सत्यकवि की कालजयी रचनाओं 'द्घटा उतरी है', 'जहाँ भी गये', 'छंदों की जंजीर' आदि को प्रस्तुत किया गया। जयश्री तरडे, ओ पी शर्मा, राम परसाई, राकेश दुबे आदि ने अपना गायन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में रंगकर्मी जगदीश वाजपेयी ने आभार व्यक्त किया।
 
ईमानदारी से लेखन
 
कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद के तत्वावधान में पवित्रा अग्रवाल कहीं पुस्तक 'उजाले दूर नहीं' का लोकार्पण ३१जुलाई को हुआ। पुस्तक 'उजाले दूर नहीं' का लोकार्पण 'स्वतंत्रा वार्ता' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने किया। क्लब और शुभचिन्तकों की तरपफ से शॉल देकर लेखिका को सम्मानित किया गया। मुख्य वक्ता डॉ. आँषभ देव शर्मा ने लोकार्पित कृति की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए कहा कि 'इस कहानी संकलन का शीर्षक पर्याप्त व्यंजनापूर्ण और प्रतीकात्मक है तथा लेखिका 'पहला कदम' से इस विकास तक पहुँची हैं कि 'उजाले दूर नहीं' हैं। कहानियाँ दर्शाती हैं कि लेखिका बेहद ईमानदार हैं और कहानियों में कहीं भी नारेबाजी नहीं है। वह स्त्राी या पुरुष दोनों में से किसी एक को सदा खल पात्रा के रूप में नहीं देखतीं, उन्हें स्त्राीवादी बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। मैं उन्हें मानव संबंधें की सहज, सौम्य कान्तासम्मित कहानीकार मानता हूँ।' अध्यक्ष पद से बोलते हुए डॉ. रामसिंह 'उदयन' ने कहा बहुत से कहानीकार विश्लेषण पर विश्लेषण करते जाते हैं, उससे कहानियाँ बोझिल हो जाती हैं। पर ये कहानियाँ इससे बच गई हैं। उन में मूल्यों की स्थापना का प्रयास है, जो इन्हें सार्थक साहित्य बनाता है।' इसी प्रकार डॉ. अहिल्या मिश्रा, डॉ. राध्ेश्याम शुक्ल, डॉ. एम वेंकटेश्वर आदि ने भी उक्त पुस्तक पर अपने विचार रखे। विशेष अतिथि तेलुगु भाषा के विख्यात कवि डॉ. एन गोपी ने कहा कि लेखक जो भी लिखता है वह दिल से ईमानदारी से आना चाहिए, लेखिका अपने अनुभवों के प्रति ईमानदार है, उन्होंने हितोपदेश देने का प्रयास नहीं किया है। कार्यक्रम का संचालन लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने किया।
 
 
कण्णन को हिन्दी रत्न सम्मान
 
एक अगस्त को तमिलनाडु के हिन्दी भाषा के समर्थक टी. एस. के. कण्णन को हिन्दी भवन, दिल्ली ने एक समारोह में १३वें हिन्दी रत्न सम्मान से सम्मानित किया। सम्मानस्वरूप उन्हें एक लाख की ध्नराशि, प्रशस्ति पत्रा, वाग्देवी की प्रतिमा, रजत श्रीपफल एवं शॉल प्रदान किया गया। यह पुरस्कार प्रत्येक वर्ष किसी अहिन्दी भाषी विद्वान को राष्ट्रभाषा की सेवा के लिए दिया जाता है। १९६५ में जब तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध् जोरो पर था तब कण्णन ने समाज की परवाह न करते हुए हिन्दी का प्रचार जारी रखा था। इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय भाषण में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाध्ीश विकास श्रीधर सिरपुरकर ने कहा कि हिन्दी के विकास के लिए भारतीय भाषाओं का सुदृढ़ होना आवश्यक है। किसी दूसरी भाषा को सीखना या अपनाना अपनी भाषा का अपमान नहीं है। समारोह के मुख्य अतिथि आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिापाठी थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि देश की दूसरी भाषाओं और बोलियों की रक्षा का भार हिन्दीभाषी क्षेत्रा के लोगों पर अपेक्षाकृत ज्यादा है। कार्यक्रम में हिन्दी भवन के मंत्राी गोविंद व्यास ने अतिथियों का स्वागत किया और अध्यक्ष त्रिालोकीनाथ चतुवेर्दी ने आभार व्यक्त किया।
 
आंदम के दो वर्ष पूर्ण
 
दो माह के ग्रीष्मकालीन अंतराल के बाद आनंदम्‌ की काव्य गोष्ठी का आयोजन कनॉट प्लेस, दिल्ली में २१ जुलाई की शाम को किया गया। दो वर्षों से निरंतर आनंदम्‌ काव्य गोष्ठियों का आयोजन करता रहा है। इस गोष्ठी में भाग लेने वालों में सतीश सागर, दर्द देहलवी, जपर्फ देहलवी, वीरेंद्र कमर, पुरुषोत्तम वज्र, शैलेश सक्सेना, जगदीश रावतानी, भूपेन्द्र कुमार, मनमोहन शर्मा तालिब, लाल बिहारी लाल, नागेश चंद्रा, शिव कुमार मिश्र, दिनेश आहूजा, विजय कुमार ग्रोवर आदि थे। इस कार्यक्रम में समसामयिक विषयों पर मार्मिक रचनाओं का पाठ किया गया। इस गोष्ठी का संचालन भूपेन्द्र कुमार ने किया।
 
शांता मुक्तिबोध का निधन
 
 
कवि मुक्तिबोध् की पत्नी शांता मुक्तिबोध् का निध्न नौ जुलाई को हो गया। उनकी उम्र ८८ वर्ष थी, वे कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थी। वे अपने पीछे पुत्रा रमेश, दिवाकर, गिरीश व दिलीप मुक्तिबोध् को छोड़ गई हैं। उन्हें मुखाग्नि उनके कनिष्ठ पुत्रा गिरीश ने दी। एक साहित्यकार की पत्नी होने के नाते शांता मुक्तिबोध् ने पति के संद्घर्ष के दिनों में उनका हमेशा साथ दिया। पति के निध्न के बाद उन्होंने ही बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ उनको जीवन में व्यवस्थित करने में अहम भूमिका निभायी।
 
नहीं रहे कामगार कवि
 
१८ अगस्त को कामगार कवि नारायण सुर्वे ने आखिरी साँस ली। वे मुम्बई के आम आदमी, मजदूरों, मुपफलिसों, दलितों और उत्पीड़ितों के कवि थे। कवि नारायण सुर्वे १९२६ में एक मजदूर गंगाराम सुर्वे को पफुटपाथ पर मिले

थे। उन्होंने ही उनका लालन-पालन किया। कवि सुर्वे १९५६ में सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार एवं मध्य प्रदेश का कबीर सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।

 
प्रेमचंद की परंपरा से आगे
 
राजस्थान प्रगतिशील लेखक संद्घ और जवाहर कला केंद्र की तरपफ से जयपुर में कहानी सम्राट प्रेमचंद की जयंती के उपलक्ष्य पर कथा दर्शन एवं कथा सरिता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। ३१ जुलाई से ०१ अगस्त तक चले इस दो दिवसीय कार्यक्रम में पिफल्म प्रदर्शन और कहानी पाठ के सत्रा रखे गये थे। पहले सत्रा में गुलजार के निर्देशन में बनी तथा दूरदर्शन द्वारा निर्मित पिफल्म दिखाई गयी। इसके साथ ही साथ नमक का दरोगा, ज्योति, हज्ज-ए-अकबर जैसी कहानियों पर बनी पिफल्में दिखाई गई। इस अवसर पर प्रलेस के महासचिव प्रेमचंद गाँधी ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में व्याप्त सामाजिक संदेशों को और उनकी कहानी परंपरा को आम जनता तक ले जाने की एक रचनात्मक कोशिश है यह दो दिवसीय समारोह। इसमें एक तरपफ जहाँ प्रेमचंद की कहानियों पर बनी पिफल्मों के माध्यम से प्रेमचंद के सरोकारों को आमजन तक ले जाने का प्रयास है वहीं प्रेमचंद की कथा परंपरा में राजस्थान की दस युवा कहानीकारों को एक साथ प्रस्तुत कर हम प्रदेश की युवा रचनाशीलता को राजधनी के मंच पर ला रहे हैं। जितेंद्र भाटिया ने कहा कि समूचे भारतीय साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा में उनके समकालीन रचनाकारों में उनके जितना बड़ा कहानीकार कोई नहीं है। उनके बाद कहानी में बहुत विकास हुआ है लेकिन सरोकार आज भी प्रेमचंद के समय के ही हैं। कहानी पाठ के क्रम में रामकुमार सिंह, राजपाल सिंह शेखावत, आदिल रजा मंसूरी, अरुण कुमार असपफल, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिनेश चारण, लक्ष्मी शर्मा, दुष्यंत आदि की कहानियों का पाठ किया गया। इन सभी कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ में जितेंद्र भाटिया ने कहा कि हिन्दी का भविष्य उज्जवल है। आखिर में उन्होंने अपनी नई कहानी 'ख्वाब एक दीवाने का' का पाठ किया। नंद भारद्वाज ने कहा कि पढ़ी गई कहानियों से राजस्थान की समकालीन रचनाशीलता का पता चलता है कि वह कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है। अपने परिवेश की गहरी समझ और प्रेमचंद के सरोकारों से लैस यह पीढ़ी निश्चित रूप से आगे जाएगी और प्रदेश की जनभावनाओं को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त करेगी।
प्रतिभाकुशवाहा
 
 
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