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कादीपुर के कनक के उपनाम 'संजीव' की कहानी कापफी रोचक है। कहानी लिखते-लिखते उनके पेन की इंक सूख जाती है। वे संजीवन की जगह सिपर्फ संजीव ही लिख पाते हैं और कहानी भी उसी नाम से छप जाती है। कहा जाए तो स्याही ने सूखकर कथाकार के नए नाम को जन्म दे दिया। |
तब से लेकर आज तक वे संजीव के नाम से ही जाने जाते हैं। संजीव के गाँव बाँगर कला के कुम्हार टोली के ग्रामीणों को उनकी कमी जरूर सालती है लेकिन उनकी उपलब्ध्यिों के चलते जिस तरह से उनके गाँव की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनी है उससे वे बेहद खुश हैं। संजीव जल्द ही गाँव में ही अपना जीवन व्यतीत करने आने वाले हैं। उनके संगी-साथियों की मानें तो इस गाँव में संजीव ने हाल ही में अपना नया मकान इसी उद्देश्य से बनवाया है।
सुल्तानपुर जनपद के कादीपुर विधनसभा क्षेत्रा में बाँगर कला कुम्हार टोली साहित्य के क्षेत्रा में खासा चर्चा में है। इस गाँव की व्यक्तिगत विशेषता चाहे न हो लेकिन प्रख्यात साहित्यकार व कथाकार राम संजीवन प्रसाद उपर्फ संजीव की जन्मस्थली होने के कारण यह खासा चर्चा में है। जनपद सुल्तानपुर से लगभग ७० कि.मी. दूर कादीपुर की ध्रती पर पाँव रखते ही अहसास होने लगता है कि वरिष्ठ कथाकार संजीव का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। गाँव की 'हाट' से लेकर 'चौपालों' तक में बैठे ग्रामीण 'संजीव' का नाम सुनते ही गौरवान्वित महसूस करने लगते हैं। बकौल ग्रामीण, 'हम लोगों को गर्व है कि संजीव जैसा शख्स हमारे गाँव में पैदा हुआ है। मलाल है तो बस इतना सा कि उन्होंने अपने जीवन के सुनहरे पल पश्चिम बंगाल की कुल्टी में बिताए'।
यह कहने में कतई संकोच नहीं होता है कि अपराध, राजनीति, द्घोटाले और द्घपले की खबर लिखने वाले दि संडे पोस्ट के संवाददाता को उस वक्त शर्मिन्दगी का अहसास हुआ जब गांव के ज्यादातर बूढ़ों और बच्चों की जुबान पर तो संजीव का नाम था, लेकिन यह संवाददाता मशहूर कथाकार संजीव के नाम से अनभिज्ञ था।
राम संजीवन प्रसाद उपर्फ संजीव का जन्म वर्ष १९४७ में इसी गांव में हुआ था। तीन भाइयों में संजीव सबसे छोटे हैं। उनके बड़े भाई स्वर्गीय रामजीवन प्रसाद इण्टर कॉलेज में शिक्षक रहे जबकि मंझले भाई स्व. रामशिरोमणि प्रसाद खेतीबाड़ी का काम देखा करते थे। पिता रामशरण प्रसाद की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वे अपने बच्चों को मंहगी शिक्षा दिला पाते। इनके चाचा रामचरन जी १९५० के आस-पास नौकरी की तलाश में पश्चिम बंगाल चले गए। उस वक्त कुल्टी में एशिया का सबसे बड़ा लौह कारखाना स्थापित हुआ था। कंपनी को वर्कर्स की आवश्यकता थी इसलिए ज्यादा भागदौड़ किए बगैर उनकी कारखाने में नौकरी लग गयी। इसके बाद वे संजीव को भी पढ़ाने के लिए अपने साथ ले गए। इसी कारण राम संजीवन उपर्फ संजीव का बचपन और युवावस्था कुल्टी में ही बीता। वहीं उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा ग्रहण की। पश्चिम बंगाल के आसनसोल में स्थित बी.बी. कॉलेज से बी.एस.सी. ऑनर्स और ए.आई.सी. किया। संजीव पूरे परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे थे। चूंकि उनका जीवन कापफी गरीबी में बीता इसलिए बचपन और युवावस्था संकोच में ही कट गयी। अपने गिने चुने दोस्तों के अलावा वे किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे। ज्यादा समय वे पढ़ने-लिखने में ही बिताते रहे।
लेखन का कार्य उन्होंने स्कूली शिक्षा के दौरान ही शुरू कर दिया था। शुरू-शुरू में वर्ष १९७३-७४ के दौरान छोटी-छोटी कविताएँ लिखकर अपने दोस्तों को सुनाया करते थे। वर्ष १९७५ में उन्होंने पहली व्यंग्य कथा ''राजा नंगा है'' लिखी। यह कथा उनके परिवार वालों और संगी साथियों के बीच कापफी सराही गयी। इसके बाद उनका लेखन के प्रति रूझान बढ़ता ही गया। उनके द्वारा एक के बाद एक लिखी गयी कथाएँ अक्सर चर्चा में बनी रहीं। उन्होंने कई नाटक भी लिखे जो आज भी कापफी सराहनीय हैं।
सामाजिक जीवन में द्घटने वाली द्घटनाओं को वे अक्सर अपनी कथाओं में उतार देते थे। वर्ष १९७५ में इमरजेंसी के दौरान मिलावटखोरी की खबरें सुन-सुनकर उनके मन में नाटक लिखने की इच्छा हुई। उन्होंने अपना पहला नाटक 'मिलावट' लिखा। इसे बाद 'वांछित-अवांछित' नाटक खासा चर्चा में रहा। संजीव के इन सभी नाटकों को देखने का सौभाग्य पश्चिम बंगाल के कुल्टी के लोगों को मिला। वर्ष १९७७ में एक बीमा कंपनी पियरलेस में भी वे एक एजेंट के तौर पर काम करते रहे ताकि परिवार की आर्थिक आय बढ़ सके। इसी बीच पियरलेस बीमा कंपनी लोगों का पैसा हड़पने की पिफराक में थी। इस बात का पता लगते ही उन्होंने क्षुब्ध् होकर वर्ष १९७५ में 'कहानी एक बीमा कंपनी की' लिख डाली। इस कहानी से कंपनी के मालिकान को कापफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था।
कंपनी ने उन्हें नोटिस देकर जवाब तलब किया। कंपनी की धेखाध्ड़ी से व्यथित होकर उन्होंने पियरलेस का काम छोड़ दिया। इसी के बाद पढ़ाई के साथ-साथ परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने की गरज से वे उसी लौह कारखाने में लैब सहायक की नौकरी करने लगे जिसमें उनके पिता काम करते थे। पढ़ाई के साथ साथ वे कंपटीशन की तैयारी भी करते रहे। पढ़ाई में बहुमुखी प्रतिभा होने के कारण कंपटीशन में उन्हें सपफलता भी मिली। राजस्थान से नौकरी का ऑपफर आया लेकिन वे गए नहीं क्योंकि जिस लौह कारखाने में वे काम कर रहे थे उसके मालिक ने उनके काम से खुश होकर पगार बढ़ाने की बात कही थी। लैब असिसटेंट के पद से तरक्की देकर उन्हें लैब इंचार्ज बना दिया गया। साहित्य में रुचि के कारण और कारखाने में आर्थिक मंदी के चलते उन्होंने वी.आर.एस. ले लिया। उन पर काम करने के दौरान कई बार आरोप भी लगा कि वे काम के दौरान लेखन का काम भी करते हैं। इन सब की परवाह किए बगैर संजीव लगातार लिखते रहे। उस वक्त दिनमान और र्ध्मयुग में उनका साहित्य अक्सर पढ़ने को मिल जाता था। वर्ष १९८० से लेकर १९८५ तक उन्होंने रेडियो में भी साहित्य से जुडे़ कार्यक्रम प्रस्तुत किए।
वर्ष १९८० में कहानियों की एक प्रतियोगिता में उन्होंने अपनी कहानी 'अपराध' शामिल की। प्रतियोगिता में श्रेष्ठ लेखकों की लगभग एक हजार कहानियाँ शामिल हुई थीं। उनमें से संजीव की 'अपराध्' को श्रेष्ठ कहानी चुना गया। सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए उन्हें एक हजार रुपए का पुरस्कार भी मिला था। उनके परिवार के लोग बताते हैं कि इसकी सूचना मिलते ही वे पफूले नहीं समा रहे थे। इसी के बाद से उनका साहित्य के प्रति रूझान और बढ़ता चला गया। वर्तमान में संजीव दिल्ली से प्रकाशित एक साहित्य पत्रिाका 'हंस' में कार्यकारी संपादक की भूमिका निभा रहे हैं। दिल्ली में ही वे अपने परिवार के साथ निवास करते हैं। गाँव कभी कभार ही आना होता है। चार-छह माह में वे जब भी यहाँ आते हैं सबसे पहले अपने परिवार वालों और मित्राों से जरूर मिलते हैं।
संजीव के जीवन से जुड़ी एक द्घटना के बारे में उनके भतीजे ओमप्रकाश कहते हैं कि जितना व्यथित उन्हें अपने पिता की मौत पर नहीं देखा गया था उससे कहीं ज्यादा वे अपने भाई रामशिरोमणि की मौत पर दुखी हुए थे। इसके बाद से तो उनका स्वभाव और ज्यादा एकाकी हो गया।
उपनाम 'संजीव' कैसे पड़ा ? इसका भी एक रोचक वाकया है। वर्ष १९७५ में वे एक कहानी लिख रहे थे। उस दौरान पौने दस बजे डाकद्घर में बुकपोस्ट की सेवाएं बन्द हो जाती थीं। कहानी लिखते-लिखते उन्हें समय का अंदाजा ही नहीं लग पाया। कहानी समाप्त करते समय उनके पेन की स्याही तब खत्म हो गयी थी जब वे अन्त में अपना नाम संजीवन लिखने जा रहे थे। संजीवन का वह संजीव ही लिख पाए थे। जल्दबा८ाी के कारण पेन में स्याही भरने में समय गंवाने से बेहतर उन्होंने संजीवन की जगह संजीव ही लिखकर कहानी पोस्ट कर दी। हालांकि उन्होंने अपने भतीजे ओम प्रकाश से कहा था कि डाकद्घर में जाकर किसी से पेन लेकर संजीवन नाम पूरा लिख देना लेकिन ओमप्रकाश भी पूरा नाम लिखना भूल गए। कहानी भी संजीव के नाम से प्रकाशित हो गयी। इसके बाद से वह संजीव नाम से ही कहानियाँ लिखने लगे। ओम प्रकाश कहते हैं कि उनके चाचा संजीव ने ही उन्हें पढ़ाया लिखाया है।
संजीव की ८० वर्षीय भाभी पुतना देवी को आँखों से जरूर नहीं दिखायी देता है लेकिन अपने देवर की यादें उन्हें कुछ-कुछ बोलने पर विवश कर देती हैं। पुतना देवी को मलाल है कि उनके देवर संजीव का ज्यादातर समय पश्चिम बंगाल में ही बीता। संजीव के बचपन की याद ता८ाा करते हुए वे कहती हैं कि, बचपन में वह बहुत कम बात किया करता था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया उसमें संजीदगी झलकने लगी। वह बहुत कम बोलने लगा। उसके दोस्तों का दायरा भी सिकुड़ता गया। चन्द दोस्तों के साथ ही वह द्घूमा करता था। उनके गिने चुने दोस्तों में केदार नाथ सिंह, नरेन्द्र नाथ ओझा, भोलानाथ सिंह और राम शिरोमणि पाण्डेय प्रमुख थे।
संजीव के इन दोस्तों में से राम शिरोमणि पाण्डेय से इस संवाददाता ने बात की। संजीव का नाम सुनते ही राम शिरोमणि खुश हो जाते हैं। स्वयं को संजीव का सबसे करीबी बताने वाले राम शिरोमणि कहते हैं कि उनका बचपन और युवावस्था का अधिकांश समय स्वयं को संजीव के साथ ही बीता। कुल्टी में भी राम शिरोमणि पाण्डेय साथ रहा करते थे। उसी लौह कंपनी में वे साथ-साथ काम किया करते थे। बकौल राम शिरोमणि, 'संजीव बेहद व्यवहार कुशल होने के साथ साथ मृदुल स्वभाव के हैं। हर वक्त उनके चेहरे पर मुस्कुराहट सापफ झलकती रहती है।' बचपन में वे संजीव के साथ कबड्डी खेला करते थे।
संजीव के बारे में राम शिरोमणि अपनी यादें ताजा करते हुए बताते हैं कि, एक बार वे किसी बच्चे को पढ़ाते वक्त छड़ी से पीट रहे थे। उसी वक्त मेैं पहुँच गया। हालांकि मुझे खराब लगा लेकिन मैनें उन्हें टोका नहीं। बाद में पूछा तो बेहद सौम्य अंदाज में उन्होंने कहा कि कच्चे द्घड़े को मजबूत बनाने के लिए उसे आग में तपाना भी पड़ता है। संजीव जी का यह कथन उस वक्त सत्य लगा जब उनके हाथ की मार खाने वाला उस बच्चे ने बड़े होकर आई.पी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की। जहाँ तक जानकारी है कि, वर्तमान में वह बिहार में अध्किारी के रूप में तैनात है। राम शिरोमणि कहते हैं कि संजीव जैसा मित्रा मिलना आज के माहौल में नामुमकिन है। वे मित्रा की परिभाषा बखूबी समझते हैं। आज भी जब वे कभी-कभार गाँव आते हैं तो सबसे पहले उन्हीं से मिलते हैें।
संजीव के बड़े भाई रामजीवन प्रसाद के पुत्रा दिनेश कहते हैं कि चाचा जी का स्वभाव आज भी वेैसा ही है जैसा पहले हुआ करता था। लेखन में व्यस्त होने के कारण वे बहुत कम बोला करते थे। आज भी जब कभी वे आते हैं तो ज्यादातर समय चुपचाप ही रहते हैं।
पिफलहाल बाँगर कला के इस कुंदन की कमी गाँव वालों को आज भी महसूस होती है। लेकिन सुकून इस बात का है कि इस होनहार ने ढेऱ सारी उपलब्ध्यिाँ बटोर कर गाँव का नाम रोशन कर दिया है।
लेखक 'दि संडे पोस्ट' से जुड़े वरिष्ठ पत्राकार हैं |