सितंबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
चिट्ठी आई है
आलोचना के एक भी पत्रा नहीं
शिखर पुरुषों के साथ तीन दिन बिताना आपके लिए जीवन-उपलब्ध्ि होगी लेकिन यह चीज संपादकीय महत्व की नहीं है।
आपका संपादकीय और 'अदबी हयात' उड़ान भरने की कोशिश तो बहुत कर रहा है लेकिन भर नहीं पा रहा है। कहानियाँ और कविताएँ सिपर्फ पफुदकने तक सीमित हैं। कोढ़ में खाज यह कि हर अंक में सारे पत्रा पत्रिाका की प्रशंसा के छप रहे हैं। यह कितना लज्जाजनक है कि आलोचना का एक पत्रा नहीं छपता। इसमें गाजियाबाद और आसपास के लेखकों का जमावड़ा है। बनारस के न काशीनाथ सिंह, न चंदन पांडेय, न ज्ञानेन्द्रपति, न व्योमेश शुक्ल न शिव कुमार पराग न केशव शरण, न मुक्ता, न नीरजा माध्व। जबकि यह पत्रिाका बनारस के हर बुक स्टॉल पर उपलब्ध् है।

प्रेम विश्वास शर्मा, वाराणसी, उ.प्र.
 
अपने ही दम्भ में गर्क स्वयंभू साहित्यकार
 
जुलाई की 'पाखी' पढ़ी। उपभोक्ता संस्कृति की पर्तें उद्घाड़ती हुयी ईश्वर चन्द्र सक्सेना की कहानी '८ामाना बदल गया' बहुत अच्छी लगी क्योंकि किसी सुंदरी के साथ स्वैच्छिक संभोग हर किसी को अच्छा लगता है। सोचता हूँ कि हिन्दी कहानी को स्त्राी देह से कब मुक्ति मिलेगी? रूपलाल बेदिया की कहानी 'सुरसुरुंग गढ़ा' निःसंदेह एक श्रेष्ठ आंचलिक कहानी है। स्त्राी-विमर्श पर आधरित कविता की कहानी 'मध्यवर्ती प्रदेश' ने भी प्रभावित किया। ज्ञान प्रकाश विवेक कितने ही बड़े कथाकार क्यों न हों किंतु उनकी कहानी 'चाबी' दो पात्राों का संवाद भर है। कहानीपन तो ढूँढ़ने से भी नहीं मिला। ऐसा दर्शन बद्घारा गया है कि पाठक बोर हो जाए।

अंक की तीन लद्घुकथाएँ बेजोड़ रहीं। जहाँ महावीर राजी और मासूम भारद्वाज की लद्घुकथाएँ 'ध्ृतराष्ट्र मोह' और 'दूध' में समाज में बेटियों की स्थिति का खुलासा किया गया है वहीं पूरन सिंह की लद्घुकथा धार्मिक ढकोसलों पर करारी चोट करती है।

संपादकीय में आपने दो क्षेत्राों ;साहित्य और पत्राकारिताद्ध के दो पुरोधओं की शिष्टता, शालीनता, विनम्रता का बखान किया है क्योंकि आपके प्रति उनका व्यवहार नम्र रहा। उन्हें भी आपसे कुछ न कुछ स्वार्थसि(ि करनी होगी, अन्यथा प्रभाष जोशी ने अपने ही मित्रा की पुस्तक की भूमिका क्यों नहीं लिखी? ऐसी मित्राता तो चूल्हे में जलाने योग्य है। वस्तुतः ऐसे स्वयंभू साहित्यकार अपने ही दंभ में गर्क रहते हैं। ५० के बाद की कहानी पर नामवर सिंह ;जो वास्तव में नामवर हैंद्ध के साथ हुयी भेंटवार्ता रिकार्ड कर के क्या स्वयं के सुनने भर के लिए रख छोड़ी है। उसे 'पाखी' में प्रकाशित करें ताकि साहित्य का कुछ भला हो। पृ. ४ कॉलम १ पं. १० में 'प्रभाष जोशी ने लिखना था' में 'ने' के स्थान पर 'को' होना चाहिए। 'ने' पंजाबी भाषाई प्रभाव है जबकि आप उत्तराखण्डी हैं। दूसरे कॉलम में आपने 'व्यक्तिगत' और 'कथन' में हलन्त त्‌-न्‌ लगाया है जबकि दोनों शब्द हलन्त रहित हैं।

राजकुमार गौतम की 'यात्राा-डायरी' में अच्छी जानकारियाँ दी। सूर्यबाला के नाम लिखे विष्णु प्रभाकर जी के पत्राांश भी गुदगुदा गये। हर अंक की भाँति इस अंक में भी मीमांसा, खबरनामा में नूतन कृतियों और साहित्यिक गतिविध्यिों की जानकारी मिली। मृणाल पाण्डेय से वाराणसी एयरपोर्ट पर हुयी राजेश जैन की आकस्मिक मुलाकात भी पसंद आयी जो संस्मरण भी है और साक्षात्कार भी। ओम द्विवेदी के दोहों ने जहाँ मन मुग्ध् किया वहीं ८ाहीर कुरैशी की ग८ालों ने निराश। बाकी छंदतोडू़ कविताएँ ;जिन्हें मैं कविता नहीं मानता क्योंकि वे कविताएँ नहीं विचार हैं और विचार कभी कविता नहीं हो सकता क्योंकि विचार का संबंध् मस्तिष्क से है और कविता का हृदय से।द्ध पढ़ने का मेरे पास न समय है और न रुचि ही।

चेतन दुबे 'अनिल', बरेली, उ.प्र.
 
उद्देश्य है सत्ता को आगाह करना
 
'पाखी' का जुलाई २००९ अंक पढ़ा। 'शिखर पुरुषों के साथ तीन दिन' शीर्षक से आपका संपादकीय पढ़ने के बाद लगा कि ७ वर्ष व्यापार करने के पश्चात पिछले नौ वर्षों से साहित्यिक पत्राकारिता में बिना कोई कार्य योजना के लक्ष्य निर्धरित किये यहाँ तक आ गये हैं कि 'पाखी' की उड़ान उन्नति के शिखर को छू रही है।

आपके अंदर की सात्विक प्रतिभा ने ही यह प्रतिष्ठत कार्य करने को उत्साहित किया है। आपकी उस प्रतिभा के सपफलतापूर्ण कार्यविध्ि को साधुवाद। पूर्व की भाँति इस अंक की कहानियाँ, कविताएँ, दोहे/ग़८ाल, लेख, अदबी हयात, मीमांसा, मीडिया विमर्श, समय समाज, सिने-संवाद, हाशिए पर हपर्फ, संस्मरण, खबरनामा, यात्राा डायरी, अवसर विशेष एवं लद्घुकथाओं में उत्कृष्ट पठनीय एवं मननीय रचनाएँ आपके सपफल संपादन की द्योतक हैं। यात्राा डायरी में राजकुमार गौतम के लेख में चार्ल्स हेराल्ड सेंट जॉन हैमिल्टन द्वारा करीब ८० हजार शब्द प्रति सप्ताह, कैथरीन लिंडसे ;१९०३-७३द्ध के उपन्यासों की संख्या ९०४, जान क्रीसी की पुस्तकें ५६४, जार्ज सिमनोन आदि ने ५०० से अधिक पुस्तकों की रचना की।

इतने बड़े लेखकों के प्रति श्र(ापूर्ण नमन करने को जी चाहता है। पृष्ठ ८७ पर पंकज बिष्ट के कथन 'लद्घु पत्रिाका हमेशा सत्ता के खिलापफ आवाज उठाती रही है। जिस पत्रिाका में यह शक्ति नहीं वह लद्घु पत्रिाका की श्रेणी में नहीं आ सकती।' इससे मैं सहमत नहीं। लद्घु पत्रिाका का उद्देश्य साहित्य के साथ समाज की विद्रूपताओं को दूर करने के साथ सत्ता की त्राुटियों को आगाह करना है, विरोध् करना नहीं।


डॉ. केवल कृष्ण 'पाठक', जींद, हरियाणा
 
शुरू से आखिरी तक पठनीय
 
ऐसा अमूमन कम ही होता है कि किसी पत्रिाका में शुरू से आखिर तक हर रचना पढ़ने योग्य एवं पठनीय हो। यह अंक मुझे ऐसा ही अति पठनीय लगा। कुछ रचनाओं पर एक पाठक के तौर पर प्रतिक्रियाएँ देने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। 'हाशिए पर हपर्फ' स्तंभ में 'माँ ने कहा था' अति विचारणीय लेख लगा। इस आलेख में चर्चित कहानीकार संजीव, उदय प्रकाश व प्रियदर्शन के माँ को याद करते हुए जो विचार दिये गये हैं वह नोट करने योग्य हैं।

'ऐसा अक्सर होता है कि माँ के महत्व का पता तब चलता है जब माँ नहीं होती...।' यह कथन भी शायद अध्किांश पाठक मानेंगे ही। इस अंक की लगभग सभी कहानियों ने मुझे प्रभावित किया। अतः कहानियों पर...। ज्ञानप्रकाश विवेक कहानी के अति चर्चित नाम हैं। उनकी कहानी 'चाबी' मेंं चाबी प्रतीक के माध्यम से अनेक बिंब बने हैं। उनकी कहानी कहने की कलात्मकता व कभी-कभी पफेंटेसी अध्किांश कथा प्रेमियों को बहुत भाती है...। इस कहानी में भी ऐसी ही कला है। '

मध्यवर्ती प्रदेश' में कहानीकार कविता ने पिता-पुत्राी के स्नेहिल संबंधें को कविताओं का माध्यम बनाकर अच्छी कहानी लिखी है। इस अंक की अन्य दो बहुत प्रभावित करने वाली कहानियाँ मुझे जो लगीं वह हैं राजेन्द्र लहरिया की 'एक था आदमी'। इस कहानी की अति पठनीयता शैली के साथ कथ्य, भाषा शैली व शिल्प अत्यन्त रोचक है। पाठक कहानी को एक ही साँस में पढ़ लेता है। और रूपलाल बेदिया की कहानी 'सुरसुरुंग गढा' तो एक अति सपफल कहानी है।

कहानीकार को इतनी महत्वपूर्ण कहानी हेतु अलग से पत्रा भी भेज रहा हूँ। इस कहानी में माधे व बुधनी पात्राों के माध्यम से कहानीकार ने एक आम आदमी के दो जून रोटी के जुगाड़ का अत्यन्त यथार्थपरक चित्राण किया है। विनोद साव की कहानी 'सिन्टी' भी ठीकठाक लगी। ईश्वरचन्द्र सक्सेना की '८ामाना बदल गया' में आध्ुनिक उपभोक्ता संस्कृति का स्वार्थ, प्रपंच रोमा भाभी पात्रा के माध्यम से सटीक चित्रिात किया गया है।

भरत प्रसाद का लेख, पवन करण के कविता संग्रह 'स्त्राी मेरे भीतर' की अच्छी मीमांसा करता है। कविताएँ सभी बेहतर तथा अन्य सभी स्तंभ भी और लद्घु कथाएँ भी। 'पाखी' की अब तक सपफल उड़ान हेतु संपादकीय परिवार को साधुवाद।

शशिभूषण बडोनी, मसूरी, उत्तराखण्ड
 
क्या मूल्य इतनी जल्दी बदलते हैं?
 
अपफसोस है कि 'पाखी' जैसी महत्वपूर्ण पत्रिाका पहले क्यों नहीं देख सका। मेरी बात के आधर पर केवल सदेच्छा ही की जा सकती है कि क्रांतिकारी शुरूआत करने वाले राजीव गाँध्ी जैसा बदलाव राहुल में न आए। अगर ऐसा होता है तो एक ही राहुल की उपस्थिति पर्याप्त होगी। राजकिशोर ने भी नहीं कहा और संभवतः किसी पत्रा-पत्रिाका में भी, तमाम खतरों की आशंका के बाद, पहली बार यह बात उठाई गई है कि 'भारतीय संस्कृति के चितेरे ने कभी मोहम्मद साहब के ऐसे चित्रा क्यों नहीं उकेरे?'
'इस राजनीतिक सुबह...' के लिए तो पिफलहाल यही लगता है कि कोई उम्मीद गर न८ार नहीं आती। '

प्रश्न भरोसे में...' और 'मल्टीप्लेक्स की...' के तथ्यों से किसी की असहमति का प्रश्न ही नहीं उठता। दरअसल, आज र्ध्म, राजनीति, मनुष्य के साथ-साथ कला, संगीत, थियेटर, पत्राकारिता भी व्यवसाय में परिवर्तित होते जा रहे हैं। शायद यही जमाने की जरूरत है। ३०-३५ वर्षो के अंदर ही जिस दल की सरकार के मुखिया ने सामाजिक प्रतिब(ता के तहत बैंकों का, उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया था, प्रीवीपर्स समाप्त किए थे, उसी दल की सरकार ने इन्हें देशी-विदेशी पूँजी के हाथों बेचना शुरू कर दिया। क्या मूल्य और मान्यताएँ इतनी जल्दी बदलती हैं?

अभिज्ञात की कविता 'हावड़ा ब्रिज' अपने प्रतीकों से आज के सर्वग्रासी विकास की विडम्बनाओं को बयां करती है। 'निहितार्थ के लिए' की प्रासंगिकता साहित्य ही नहीं बल्कि आज लगातार निरर्थक होते जा रहे मनुष्य के निहितार्थ वाली व्यवस्था पर कटाक्ष है। अन्य कविताएँ, लद्घु कथाएँ साधरण ही हैं। 'दूसरे प्रजातंत्रा की तलाश में' में व्यवस्था के विरोध् में खड़े कवि का सार्थक मूल्यांकन किया गया है। कंवल भारती का लेख सामयिक है। आवश्यकता है दलितों के बीच वर्ग, उपवर्ग, उफँच-नीच समझने की भावना की समाप्ति की। दलित रचनाकार, बु(जिीवी इसे समाप्त करने में प्रमुख रोल अदा कर सकते हैं। परन्तु अध्किांशतः कुछ को छोड़कर वे गुटों में एक दूसरे को आरोपित-प्रत्यारोपित करने में, विभाजित हैं अथवा आत्मकथाओं के लेखन में व्यस्त। 'एक जिहादी का चीरहरण' में मसीहा के दोहरे चरित्रा का चित्राण जरूर किया गया है। परंतु समीक्षक की बात सत्य प्रतीत होती है कि यह प्रयोजित लगता है-'हमीं से दोस्ती, हमीं से लड़ाई' नई पीढ़ी के लोग चंद्रकिरण सौनरेक्सा जी को कम जानते हैं, श्र(ांजलि एक प्रख्यात लेखिका से परिचय भी कराती है। अच्छा होता उनकी एकाध रचना भी दी जाती। बल्लभ डोभाल इस विध में भी महारत रखते है, पहली बार मालूम हुआ।

रीता सिन्हा की 'अध्खुली गांठें' का कथानक पुराना है लेकिन अंत संवेदित करता है। 'परित्रााण' रोचक होने के साथ अपेक्षित अन्विति पर पहुंचती है। 'कहानी मौत की' आज पत्राकारिता की संवेदनहीनता को व्यक्त करने में सपफल है। 'नुगरे' में र्ध्मांतरण का सच है। 'कैंसरस द्घाव' आरोपित प्रतीकों से बोझिल, मात्रा चौंकाने और लेखिका के बोल्ड दिखाने के असपफल प्रयास की असपफल रचना है, जिसमें न तो कुछ कहानी जैसा न मंतव्य। कहानी 'स्त्राी विमर्श : एक सरल अध्ययन' और 'कौन ठगवा...' अंक की सर्वाध्कि महत्वपूर्ण और सार्थक रचनाएँ हैं। न केवल पठनीय बल्कि आज के सभी संदर्भों और परिवेश पर पाठकों को नए सिरे से सोचने के लिए विवश करती हैं। 'स्त्राी विमर्श...' रोचक होने के साथ ही आज के सर्वाध्कि चर्चित विषय स्त्राी-विमर्श की विसंगतियों पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। स्त्राी-विमर्श की यह 'स्त्रिायां' कुछ विशेष पत्रिाकाओं के पृष्ठों, सेमिनारों-गोष्ठियों अथवा स्त्राी मुक्ति के स्वयंभू प्रवक्ताओं के कुंठित मन-मस्तिष्क के अलावा हैं कहाँ? हमारे विमर्शकर्ताओं ने भी बिना जड़ों, परिवेश, मानसिकता को खंगाले, आयातित विमर्श थोप दिया है-केवल देहमुक्ति तक सीमित करके। कहानी इन विडंबनाओं को पर्त दर पर्त उद्घाड़ती चलती हैं। विटवीन द लाइंस विचार के लिए आधर देती है। मजा तो यह है कि इतने गंभीर विषय पर इतने सीध्े सादे भोलेपन ;?द्ध के साथ सरल व्याख्या की गई है कि बहुत बाद में पता लगता है कि लेखक ने कहाँ चोट की है। 'कौन ठगवा...' एक मार्मिक कविता अथवा दूर से आती संगीत की सिंपफनी की भांति कोई रास्ता तो नहीं सुझाती लेकिन एक विश्रांति, भले ही कुछ पल के लिए अवश्य देती है-पिफर नई तैयारी के लिए।

प्रताप दीक्षित, कानपुर, उ.प्र.
 
सराहनीय प्रयास 'शुद्ध-अशुद्ध'
 
प्रतिक्रिया स्वरूप दो-तीन बातें कहनी हैं। 'पाखी' के जुलाई अंक में ओम द्विवेदी के दोहे बहुत अच्छे लगे। द्विवेदी जी को बहुत बधई। प्रेम भारद्वाज का स्तम्भ 'माँ ने कहा था' बेहतरीन रहा। हिमांशु शेखर का स्तम्भ लगातार उत्कृष्टता की ओर है। 'पाखी' की तरपफ से एक सराहनीय प्रयास हुआ है कॉलम 'शु(-अशु('। शब्दों की व्युत्पत्ति एवं उनका मूल स्वरूप जाने बिना हम उनका गलत उपयोग करते हैं। अंग्रे८ाी में पत्रा-पत्रिाकाएँ ऐसे नियमित स्तंभ निकालती हैं। 'हिन्दू' दैनिक में तो पाठक की जिज्ञासा के अनुरूप एक ऐसा ही स्तंभ निकलता है। हिन्दी में ऐसा प्रयास न सिपर्फ पाठकों के लिए बल्कि हिन्दी भाषा के लिए भी अहम होगा। उत्तरोत्तर उत्कृष्टता में ही मानव कल्याण के सूत्रा निहित हैं। यह उत्कृष्टता आचार-विचार, भाषा-बोली आदि सब में वांछित है। 'पाखी' से हम सबको उम्मीदें हैं।

कृष्णकान्त, इलाहाबाद, उ.प्र.
 
अध्ूरे उपन्यास को पूरा पढ़ने की इच्छा
 
'पाखी' का मई २००९ अंक पढ़कर अच्छा लगा। विजय बहादुर सिंह का लेख 'मुकाबला तो करना ही पड़ेगा' पढ़कर आनंद आ गया। लोक, सभ्यता, आध्ुनिकता और परंपरा को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने बौ(कि चेतना संपन्न लोगों के दृष्टिकोण पर प्रकाश तो डाला ही है, सही राह भी दिखा दी है कि मुकाबला किससे, किसे और क्यों करना पड़ेगा...। 'मजबूरी का नया नाम पत्राकार' में पत्राकारिता जैसे भयभीत करने वाले, संवेदनशील क्षेत्रा के यथार्थ को निर्भयता से खोल कर रख देने के लिए हिमांशु शेखर बधई के पात्रा हैं। 'अदबी हयात' में राजीव रंजन गिरि की समीक्षा ने हमेशा की तरह प्रभावित किया। इस अंक की तीनों कहानियाँ बेहतरीन लगीं। राजेन्द्र यादव का पूरा साहित्य मैंने पढ़ा है। कुछेक नया जो इन दिनों आया है वह छूट गया है। इस अध्ूरे उपन्यास को पूरा पढ़ने की इच्छा है। इतनी सुंदर पत्रिाका के लिए आपको बधाई और इसके उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ।

लक्ष्मी पाण्डेय, सागर, म.प्र.
 
नये-पुराने लेखकों में कोई भेद नहीं
 
एक सबसे अच्छा रवैया आपका यह लगा कि आप नये-पुराने लेखकों में कोई भेद नहीं करते। अनेक पत्रिाकाएँ नये लेखकों को 'आते हुये लोग' या 'नवांकुर' या ऐसा ही कोई अन्य विशेषण देकर लगभग अछूत बनाकर छापती हैं। आप यह भेदभाव नहीं कर रहे हैं। मेरी समझ से हर नई रचना लेखक को एक बार पिफर से लेखक बनाती है। जिस प्रकार लेखक द्घटनाओं और जीवित पात्राों का पुनःसंस्कार करके उन्हें लेखक बनाता है उसी प्रकार हर रचना लेखक को भी पुनः संस्कारित करती है। बरसों से लिखने का अभ्यास कर रहा और कभी न छप सका लेखक भी इस दृष्टि से तो नवांकुर ही सि( होगा। संपादकों का यह 'नवांकुरवादी' रवैया छपने को महत्वपूर्ण बनाता है लिखने को नहीं।

आप इस पूर्वाग्रह से मुक्त हैं। 'पाखी' की सृजन-कतारों में नये-पुराने सब लेखक आगे-पीछे का भेद किये बिना कहीं भी खड़े हो जाते हैं। यही दृष्टि सदैव बनाये रखें। संपादक मंडल जिये हजारों साल-साल के दिन हो पचास हजार।


मदन मोहन पाण्डे, नरेन्द्रनगर, टिहरी
 
कैमरा पानी भरे
 
'पाखी' का जुलाई २००९ अंक मिला। ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी 'चाबी' इस अंक की सबसे अच्छी कहानी है। प्रारंभ से अंत तक पाठक को बांध्कर रखती है। चाबी को लेकर उन्होंने अपने कहानी कौशल से इसे म८ोदार बना दिया। 'मध्यवर्ती प्रदेश' में कविता पुत्राी-पिता की आत्मीयता से हमें भिगो देती हैं। राजेन्द्र लहरिया की कहानी 'एक था आदमी' नौकरीपेशा तबके में ईमानदार, साहसी और कुछ मौलिक कर गु८ारने वाले लोगों की प्रताड़ना को रेखांकित करती है। मुझे किरण बेदी की याद आ गई। उन्होंने भी तिहाड़ जेल में ऐसे ही प्रयोग किये थे। राजेश झरपुरे 'शरीपफ लोग' कहानी में तथाकथित शरीपफों पर मारक व्यंग्य करते हैं। रूपलाल बेदिया की 'सुरसुरुंग गढ़ा' कहानी में द्घटनाओं का विस्तार अध्कि है। उन्हें इस कौशल को साध्ना होगा। लेकिन जो द्घोड़े की पीठ पर सवार हो ही गया है वह गिरते-पड़ते द्घुड़सवारी सीख ही जाएगा। '८ामाना बदल गया' कहानी में ईश्वरचन्द्र सक्सेना पाठक को हाड़ौती के इतिहास की सैर भी कराते हैं और अल्ट्रामॉडर्न सोसायटी का विद्रूप चेहरा भी हमारे समक्ष खोलते हैं। यह पढ़कर अच्छा लगा कि उन्होंने मादक दृश्यों को अनावश्यक विस्तार नहीं दिया। 'सिन्टी' का कथ्य साधरण सा है किंतु विनोद साव की यह खूबी रही कि जिस मासूमियत को वे उकेरना चाहते थे, उसमें सपफल रहे। लद्घुकथाएँ सभी बढ़िया हैं। कविताएँ अच्छी हैं। खासतौर पर कुमार विनोद और शिवनारायण की। हम शिवनारायण की कविता की अंतिम पंक्तियों के बाद कहेंगे... हाँ, हाँ, हाँ। हम आपके इन विश्वासों की दुनिया से नेह-नाता जरूर जोड़ना चाहेंगे। दोहे, गजलों का इस बार चयन अच्छा रहा। राजेन्द्र स्वर्णकार को बधई। लेख 'समकालीन कविता का मुहावरा' ;भरत प्रसादद्ध, 'नवगीत के जनबोध् की हकीकत' ;नचिकेताद्ध बहुत महत्वपूर्ण हैं। 'प्रेमचंद रचनावली में दूसरों की रचनाएँ' राजीव रंजन गिरि ने जो खुलासा किया वह चौंकाने वाला है। मैंने अपने मित्रा कहानीकार भालचंद्र जोशी ;खरगोनद्ध से इस संबंध् में पफोन पर जब चर्चा की तो हम दोनों इस बात को लेकर आश्चर्यचकित थे कि इतना सा लिखने के लिए राजीव रंजन ने प्रेमचंद रचनावली और उनके साहित्य को कितना खंगाला होगा। बाप रे बाप.... कोई इतना भी पढ़ता है। हिमांशु शेखर ने 'महिला प्रतिभा पर भरोसा नहीं' में बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। इस प्रश्न का कोई जवाब दे कि 'आखिर मीडिया को सामान्य रूप-रंग वाली लड़कियां क्यों नहीं दिखतीं?' हाशिए पर हपर्फ 'माँ ने कहा था' में प्रेम भारद्वाज ने बहुत भावुक होकर लिखा है। सिने-संवाद, संस्मरण, मीमांसा, ख़बरनामा सभी अच्छा सजाया है आपने। सूर्यबाला जी का 'विष्णु प्रभाकरःकुछ पत्रा स्मृतियाँ' विष्णुजी के व्यक्तित्व पर और रोशनी डालते हैं। रेखाचित्राों का क्या कहना। रेखाओं में ऐसे नाक-नक्श कि कैमरा पानी भरे। पृष्ठ १५, १८, ३९ के रेखांकन पर बधई। और अपूर्व जी आपका संपादकीय...एक जुनून है आपके भीतर जो आपको 'पाखी' तक खींच लाया है।


कुँअर उदयसिंह 'अनुज', खरगोन, म.प्र.
 
अश्लीलता से महान बनने के ख्वाब
 
मैं 'पाखी' के माध्यम से 'हंस' के संपादक श्री राजेन्द्र यादव का ध्यान 'हंस' के जून २००९ के अंक में प्रकाशित कुँअर बेचैन की लद्घुकथा 'बबूल' की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। लद्घुकथाकार ने कथा में व्यंग्य भरने के लिए अश्लील एवं भद्दे शब्दों का प्रयोग कर अपनी गंदी मानसिकता का परिचय दिया है, जिसने उन्हें विवाद के द्घेरे में ला खड़ा किया है।

'बबूल' हिन्दी साहित्य में एक निम्न एवं ओछी हरकत का परिणाम है जिसे लद्घुकथा में समाहित करना कतई स्वीकार नहीं होगा। कुँअर बेचैन जैसे स्थापित साहित्यकार से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी। उन्हें विचार करना चाहिए कि इस स्तर का साहित्य रचने से किसका भला होगा? मेरी समझ से ये रचना बिल्कुल निचले दर्जे की है जिसे साहित्य में ८ाबरदस्ती समाहित करने की एक सा८िाश है। हमारे पाठक इतने भी नासमझ नहीं हैं कि उफलजलूल बकवास एवं गंदी रचनाओं को किसी चिर-परिचित उफँचे दर्जे के लेखक के नाम से छाप देने मात्रा से स्वीकार कर लेंगे। कुँअर बेचैन की दृष्टि में 'बबूल' एक लद्घुकथा हो सकती है। परंतु कथानक का वर्णन अश्लील व द्घटिया है। लेखक ने इसमें कई पंक्तियाँ ऐसी लिखी हैं कि पाठक इसे पढ़कर शर्मसार हो जाये। पंक्तियाँ हैं-'वे आँखों में नाखून लेकर उसके पास आये और उसके उन्नत वक्ष पर हाथ पिफराते हुए बोले।' दूसरी पंक्ति है-'लच्छो ने अपने सीने पर न८ार डाली, वाकई उसकी अंगिया पफटी हुयी थी और उसके वक्षों की गोलाईयाँ सापफ चमक रही थीं।' मैं लेखक महोदय से पूछना चाहता हूँ कि बगैर इन अश्लील शब्दों के प्रयोग किए क्या इस तरह के व्यंग्य लिख पाना उनके लिए संभव नहीं था? या यह समझूंँ कि लेखक प्रसि(ि पाने के लिए साहित्य की परिभाषा ही बदल रहे हैं? जहाँ तक मेरी अपनी समझ है सआदत हसन मंटो जैसे वरिष्ठ साहित्यकार से अपनी तुलना इस लद्घुकथा के लेखक यदि करते हैं तो यह उनकी एक बड़ी भूल होगी। मंटो की कहानियाँ अमर हो चुकी हैं जबकि आज की कहानियाँ इनसे बड़ी भिन्न हैं। यदि लेखक यह समझते हैं कि मंटो की ही तरह वह भी विख्यात हो जाएँगे तो यह उनकी बचकानी हरकत के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। क्योंकि मंटो की रचनाएँ अपने आप में ऐसी महान रचना है, जिसे नकल करना तो दूर इन छिछोरी हरकत करने वाले लेखकों की समझ से भी परे है। ये लेखक साहित्य में अश्लीलता डालकर महान बनने के ख्वाब देख रहे हैं। जबकि कुँअर बेचैन जैसे साहित्यकारों को मंटो, प्रेमचंद एवं अमरकांत जैसे अमर साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ने की आवश्यकता है। मंटो की कहानियों में कभी न दिखने वाली अश्लीलता से पर्दा उठाने की हिमाकत कुँअर बेचैन ने अपनी लद्घुकथा में पुरजोर की है। मंटो की कहानियों में अश्लीलता पर से पर्दा अन्त तक नहीं उठता था। जबकि आज के ये लेखक बेबाक होकर अश्लीलता को परोसने के शौकीन हैं। मेरा 'हंस' के संपादक से आग्रह है कि आइंदा कुँअर बेचैन जैसे साहित्यकार को छापने से पहले रचनाओं को अवश्य पढ़ा करें। अन्यथा 'हंस' को विवादों के द्घेरे में रहने की आदत पड़ जाएगी।

कैलाश केशरी, दुमका, झारखण्ड
 
 
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