| गाड़ीवान, कह रहे तुम गीत गाओ |
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| गाड़ीवान |
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गाड़ीवान
पेट में टाँगें सिकोड़े
बेखबर सो गया है
जाड़े की इस लंबी वीरान रात में
और बैल बढ़े जा रहे हैं
चिर-परिचित लीक पर।
बैलों के गले की द्घंटियाँ बजती हैं
और सपनों की तरह छाई
धूसर चाँदनी में
एक सुगबुगाहट खिलकर
थर-थरा रही है,
पारे की मानिंद। |
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| कह रहे तुम गीत गाओ |
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कह रहे तुम गीत गाओ
किंतु कैसे गीत गाऊँ
जब तलक प्यासी धरा है
जब तलक प्यासा गगन है
दे सकूँगा मैं न गीले गीत
खेल पाऊँगा न निष्ठुर चाँदनी से
जो सदा उपहास करती
सोचता हूँ गीत गाऊँगा
मगर तुम सुन पाओगे?
यहाँ कितनी जलन है गुन पाओगे?
क्योंकि काँटों पर तुम्हारे पाँव थम जाएँगे
तुम तो सदा से
पफूल, कलियों,
मखमली दुर्बादलों को
कुचल कर बढ़ते रहे हो। |
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