सितंबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कविताएं
गाड़ीवान, कह रहे तुम गीत गाओ
गाड़ीवान
 
गाड़ीवान
पेट में टाँगें सिकोड़े
बेखबर सो गया है
जाड़े की इस लंबी वीरान रात में
और बैल बढ़े जा रहे हैं
चिर-परिचित लीक पर।
बैलों के गले की द्घंटियाँ बजती हैं
और सपनों की तरह छाई
धूसर चाँदनी में
एक सुगबुगाहट खिलकर
थर-थरा रही है,
पारे की मानिंद।
 
कह रहे तुम गीत गाओ
 

कह रहे तुम गीत गाओ
किंतु कैसे गीत गाऊँ
जब तलक प्यासी धरा है
जब तलक प्यासा गगन है
दे सकूँगा मैं न गीले गीत
खेल पाऊँगा न निष्ठुर चाँदनी से
जो सदा उपहास करती

सोचता हूँ गीत गाऊँगा
मगर तुम सुन पाओगे?
यहाँ कितनी जलन है गुन पाओगे?
क्योंकि काँटों पर तुम्हारे पाँव थम जाएँगे
तुम तो सदा से
पफूल, कलियों,
मखमली दुर्बादलों को
कुचल कर बढ़ते रहे हो।

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
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