सितंबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
संपादकीय
नए संकल्प के साथ जारी रहेगी उड़ान

यह एक ऐसा दौर है, जबकि मानवमात्रा का समूचा ध्यान, समस्त ऊर्जा भौतिक सपफलता के शीर्ष पर पहुँचने की अंधी दौड़ में व्यर्थ नष्ट हो रही है और मानवीय गुणों का ''ास अपने चरम्‌ पर है, जबकि विज्ञान ने मनुष्य को बर्बर बना दिया है, उसके भीतर भावनाओं का प्रवाह रुक सा गया है और दिल के भीतर वाली दुनिया में पतझड़ का मौसम स्थाई वास कर चुका है। हिन्दी साहित्य जगत्‌ भी इस दौर की विभीषिका से बच नहीं सका है। साहित्य और कला से दूर होती हमारी मानव सभ्यता आज केवल शक्ति संचय और सपफलता के लिए प्रयत्नशील है। भावना का जोर तेजी से समाप्त होता जा रहा है, हमारे प्राणों में वह आर्द्रता नहीं रही जिससे हृदय में कोमलता की दया की दूब पनपा करती थी।

यह कहना अतिशयोक्ति पूर्ण ना होगा कि मानव बर्बर हो चुका है। निराला के शब्दों में कहूँ तो 'संपूर्ण मानवता पर से उसकी दृष्टि हट गई है, क्योंकि मानवता उपासना से उसके संकीर्ण स्वार्थ को धक्का पहुँच सकता है।' 'रश्मिरथी' का एक पद है
एक बाज का पंख कतर कर
करना अभय अपर को,
सुर को शौभे भले, नीति यह
नहीं, शोभती नर को।
ऐसे दौर में जब हमारा सांस्कृतिक पतन होता जा रहा है। अपनी श्रेष्ठता को हम हीन मान अपनी परंपराओं का तिरस्कार कर, पश्चिम का अनुकरण कर उसे अपनी जीवन प(ति बना चुके हैं और उनकी श्रेष्ठता स्वीकार कर मानसिक गुलामी को आगे बढ़ गले लगा चुके हैं निश्चित तौर पर अपने साहित्य के प्रति भी हमारा तिरस्कार भाव बढ़ा है। यह कहा जा सकता है कि आज का समय गुलामी की पराकाष्ठा है। यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं कि भूमण्डलीकरण की आँधी ने मनुष्य का विनाश कर डाला है।

मनुष्य वही है जिसमें मनुष्यता हो। जब मनुष्यता का ही नाश हो गया हो तो पिफर मनुष्य कहाँ बचा? हमने उस दौर में संसार को समझा जब सामने वाले की आर्थिक-सामाजिक हीनता के समक्ष स्वयं की श्रेष्ठता लज्जा का बोध कराती थी। अब ऐसा नहीं है। श्रेष्ठता को अर्थ के साथ जोड़ उसका भोंडा प्रदर्शन आज का दस्तूर बन चुका है। ऐसे में साहित्य और कला का ''ास होना तो तय ही है। तो ऐसे भयावह समय में एक हिन्दी साहित्य पत्रिाका की शुरूआत करना किसी बड़े जोखिम भरे कार्य समान ही है। 'पाखी' की शुरूआत ऐसे ही गुलाम मानसिकता वाले दौर में हमने की।

इस अंक के साथ ही पाखी ने अपनी उड़ान का एक वर्ष पूरा कर लिया। पहले संपादकीय में मैंने लिखा कि 'पाखी' सृजन की खुली जमीन तैयार करने वाला एक मंच बन सके ऐसा हमारा प्रयास रहेगा। आज बारहवें अंक का संपादकीय लिखते समय मैं यह तो नहीं कह सकता और न ही ऐसा कोई दावा करने का हमारा इरादा है कि 'पाखी' हिन्दी साहित्य की समृ( परंपरा में कोई जानदार/शानदार हस्तक्षेप कर पाई है या उसमें कोई श्रीवृ(ि कर सकी है। हाँ! इतना अवश्य कह सकता हूँ कि गुटों, मठों, शिविरों और खेमों से जिस दूरी को बनाने का हमने संकल्प लिया था उसमें हम कापफी हद तक खरे उतरे हैं। चार्ल्स डिकिन्स के शब्द मुझे हमेशा प्रेरणा देते रहे हैं। उन्होंने लिखा 'मैंने जो कुछ भी अपने जीवन में करने का प्रयास किया, पूरे दिल से किया और पूरे समर्पण से किया। चाहे लक्ष्य बड़ा रहा या छोटा, मैंने पूरी शिद्दत से उसे पाने का प्रयास किया।' आज एक बार पिफर मैं इन्हें दोहरा इसलिए रहा हूँ कि 'पाखी' की उड़ान को निर्बाध और उसे सृजन की खुली उड़ान बनाने के लिए मैं और मेरी टीम पूरे समर्पण,पूरी शिद्दत और निष्ठा के साथ इन बारह महीनों में लगे रहे।

जिन विद्वानजनों ने, हिन्दी प्रेमियों ने हमारे इस प्रयास को शुरूआती दौर में कुछ शंका,कुछ उपेक्षा, थोड़ा तिरस्कार और अधिक उपहास की नजरों से देखा उनमें से बहुत अब मानने लगे हैं कि उड़ान ठीक ठाक है भले ही कहीं-कहीं पर 'मिड-एयर डिस्टर्बेंस' जरूर महसूस होता हो।
गत्‌ वर्ष प्रथम जे. सी. जोशी स्मृति शब्द साधक शिखर सम्मान श्री विष्णु प्रभाकर जी को देने के साथ ही हमारे द्वारा हिन्दी साहित्य सृजन में लगे शब्द साधकों के लिए प्रस्तावित सम्मान दिए जाने की द्घोषणा की गई थी। उसी के अंतर्गत वर्ष २००८-०९ के द्वितीय शब्द साधक शिखर सम्मान 'रागदरबारी' जैसी कालजयी कृति के रचनाकार श्री श्रीलाल शुक्ल को देने का निर्णय लिया गया। हम कृतज्ञ हैं श्रीलाल जी के जिन्होंने इस पुरस्कार को स्वीकारा। कृतज्ञ हम उन जूरी सदस्यों के भी हैं जिन्होंने इन पुरस्कारों के लिए सुपात्राों का चयन करने के हमारे अनुरोध को मान लिया। नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, विश्वनाथ त्रिापाठी, लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप और अनामिका का हम इसके लिए आभार व्यक्त करते हैं।

बहरहाल 'पाखी' पर सही और ईमानदार टिप्पणी तो इसके पाठक ही कर सकते हैं। हम तो सहज भाव से उनके प्यार और तिरस्कार, दोनों को सहेजते हुए अपनी इस यात्राा को पूरी ईमानदारी के साथ जारी रखने का प्रयास करते रहेंगे।
कथाकार संजीव पर केंद्रित यह अंक 'हमारे दौर के महत्वपूर्ण रचनाकार ' श्रृंखला' की पहली कड़ी है। संजीव इस दौर के प्रमुख रचनाकारों में एक हैं। अब तक जितना भी साहित्य सृजन उन्होंने किया, जितना गहरे डूब कर किया उसका उनको श्रेय मिला नहीं। ऐसा शायद इसलिए क्योंकि वह साहित्य सत्ता से लगातार दूर रहे। कुल्टी में बैठ उन्होंने जो कुछ लिखा वह दिल्ली के सत्ता गलियारों, मठों और शिविरों की राजनीति को भेद न सका। इसी के चलते जिस सम्मान के वह हकदार हैं उन्हें नहीं मिला। इसे राजेन्द्र यादव भी स्वीकारते हैं और उनके समकालीन अन्य रचनाकार भी। यह अंक संजीव के सृजन के साथ कितना न्याय कर पाया यह कहना कठिन है। हाँ इतना अवश्य है पहले कवि केंद्रित विशेषांक को निकालते समय जिन 'अदृश्य' कठिनाइयों का सामना हमें करना पड़ा उसके ठीक उलट यह सुखद अनुभव रहा। अधिकांश ने हमारे अनुरोध को न केवल स्वीकारा बल्कि बहुत सहयोग भी दिया। अंक आपके हाथों में है। आपकी प्रतिक्रिया हमें आगे ऐसे विशेषांक निकालने की प्रेरणा देगी और सुधार के लिए पथ प्रदर्शक का काम करेगी।

हिन्दी साहित्य जगत, जिसे मेरे एक मित्रा मात्रा पाँच हजार लोगों का वृहद संसार कह परिभाषित करते हैं, में इन दिनों जैसे की इसकी परंपरा रही है उठा-पठक अपने चरम पर है और द्घमासान तेज हो रहा है। दिल्ली साहित्य अकादमी का विवाद अभी थमा भी नहीं कि डॉ. नामवर सिंह द्वारा 'हंस' के वार्षिक कार्यक्रम में दिया आख्यान बड़े विवाद का रूप ले चुका है। हालांकि अभी मामला केवल ब्लॉग में भड़ास निकालने तक ही सीमित है लेकिन तलवारें खिंच चुकी हैं। उदय प्रकाश को लेकर हल्ला बोल भी जारी है। कुछेक दलित लेखक भी अपनी तलवारें भांज रहे हैं। ऐसे माहौल में 'पाखी' की निर्बाध उड़ान को सुनिश्चित करने के लिए जो बन पड़ेगा, हम करेंगे यह विश्वास मैं आप सब को दिलाना चाहता हूँ। और इस आशा के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ कि हमारे-आपके सामूहिक प्रयास से हम हिन्दी जगत में चल रही और चलती रहती अखाड़ेबाजी को समाप्त कर पाने में सपफल होंगे क्योंकि 'आपस में अदावत कुछ भी नहीं पिफर भी एक अखाड़ा कायम है।' तो इस संकल्प के साथ कि इस अखाड़ेबाजी से दूर तो रहेंगे ही, बौ(कि आतंकवाद के चलते पनपी इस प्रवृत्ति को जितना हाशिए में ढकेल सकें ढकेलेंगे, 'पाखी' अपनी यात्राा के दूसरे वर्ष में प्रवेश लेती है।

 
 
 
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