सितंबर 2009
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
अपनों की नजर में संजीव
सावधान! यह लेखक का जीवन है : प्रेम भारद्वाज

चलिए, इस बार हिन्दी के एक बड़े लेखक से उसके द्घर में मुलाकात करते हैं। लेकिन याद रखना। यह किसी कहानीकार का रचा संसार नहीं, कहानी भी नहीं। यह जीवन है। जीवन का वहाँ कौन सा रंग है, यह हम वहाँ चलकर ही देख पाएँगे। लेकिन मेरे साथ चलने की एक शर्त है। द्घनानंद की शर्त 'कविता द्घन आनंद की न पढ़ौ, पहचान नहीं वही खेत की जू' की तर्८ा पर वह यह कि अगर संवेदना और दर्द के गली से गुजरने का माद्दा नहीं है तो मेहरबानी कर मेरे साथ उस लेखक से मिलने न जाएँ। कोई मतलब नहीं होगा। न लेखक को जान पाएँगे न, उसके जीवन को।

राजधानी दिल्ली। मयूर विहार पफेज वन का इलाका। 'जीवन अनमोल' अस्पताल का पिछवाड़ा। प्रताप विहार के गली नबंर ८ में दाखिल हो जाइए। इस पतली गली में प्रवेश करते आप दिल्ली की तंग गलियों में उठने वाली एक अजीब सी गंध को महसूस कर सकते हैं। सौ कदम आगे बढ़ने पर आधे बित्ते का लकड़ी वाला नेम प्लेट। उसमें हिन्दी के सर्वाधिक चर्चित कथाकार और बेहद पुरानी पत्रिाका का नाम अंकित है। यहाँ रुकिये। दस्तक देनी होगी। गली के इसी जगह ;मोड़ नहींद्ध सूने दरवाजे के पीछे उस लेखक की दुनिया, उसका परिवार रहता है जो अपने आप में एक क्लासिक कहानी की थीम लिए हुए है। दस्तक। दरवाजा खुलता है। यह यशपाल की कहानी 'पर्दा' के पीछे का मर्मान्तक दृश्य नहीं है। लेखक का परिवार है। हमारा जैसे एक नई दुनिया में प्रवेश होता है।

छोटा सा कमरा। प्लास्टिक की दो कुर्सियाँ। बिखरी ची८ों-किसी कथा नायक के जीवन की तरह। दवाओं की गंध। भ्रम हुआ किसी अस्पताल के वार्ड में तो नहीं पहुँच गए। बेशक यह कोई वार्ड नहीं। लेकिन यहाँ कुछ बीमार जिंदगियाँ रहती हैं-नियति के दुश्चक्र में पफंसी। बेहद कठिन जीवन जीने को अभिशप्त। यह हिन्दी के बड़े कथाकार संजीव का द्घर है। बिहारियों की भाषा में बोलें तो 'डेरा' जो यथार्थ और दार्शनिकता का टच लिए हुए है।

डेरा दो कोठरियों का है। पहली में बहू प्रतिभा को रहना पड़ता है जहाँ खुली हवा छू भी नहीं सकती-रोशनी दम तोड़ देती है। अपने ससुर की कहानियों-उपन्यासों को पढ़ चुकने वाली प्रतिभा को मालूम है कि उसकी ख्वाबगाह ;?द्ध किसी जेल की सेल नहीं। सब जीवन का खेल है। दूसरी कोठरी में एक खिड़की गली की ओर खुलती है। गनीमत है उससे हवा का कुछ हिस्सा उसमें आ जाता है। संजीव मुस्कराकर कहते हैं-'ये है मेरा द्घर। इस द्घर और मेरे 'हंस' के दफ्रतर, जहाँ मेरी कोठरी है वहाँ हवा-रोशनी नहीं आती।' कहने में तल्खी है। सच्चाई स्वीकार करने का साहस भी है। इस कोठरी में हमारे साथ संजीव हैं, अपनी कहानियों और उसके पात्राों को कंधे पर उठाये। कंधे कमजोर हो गए हैं। दर्द रहता है। पेन किलर खाना पड़ता है। सामने पत्नी-प्रभावती हैं। दिल्ली आते उनको भी बीमारी ने डस लिया। दिल का वॉल्व खराब है। वॉल्व रिप्लेस नहीं हो सकता। इलाज में खर्चा बहुत है।

कथाकार पति के पास कहानियाँ तो बहुत हैं। पैसा नहीं है। सुना है 'हंस' का पंद्रह हजार मंदी में दस हजार आ पहुँचा है। उसमें से छह हजार किराए में। पुत्रा को नौकरी मिलती कम, छूटती ज्यादा है। आधा दर्जन लोगों का परिवार। बेदिल दिल्ली की महंगाई। कैसे चले जीवन। उस पर पति-पत्नी दोनों बीमार। प्रभावती जी नहीं जानतीं कि उनको कितनी गंभीर बीमारी है। संजीव के साथ वो भी अस्पताल के चक्कर लगा रही हैं-दवाइयाँ खा रही हैं। दर्द से कराह रही हैं। एक दम पति के साथ युगलबंदी करते हुए। यह किसी शास्त्राीय संगीत की युगलबंदी नहीं है जहाँ धुन निकलती है। यह दर्द की युगलबंदी है जहाँ करुणा पफूटती है। आँखें नम होती हैं। आँखों के सामने बीता जीवन। सपफलता-असपफलता का हिसाब लगाया जाता है-खीज में एक दूसरे पर आरोप लगाया जाता है। साझा जीवन। दर्द अपना-अपना।
हम प्रभावती जी से बातें करते हैं संजीव के बारे में। उनको इसका शायद इल्म नहीं कि उनके पति कितने बड़े लेखक हैं। क्या-क्या रचा है उन्होंने। एक खामोश शिकवा उनकी आँखों में आँसू बन कर छलक पड़ा-'ऐ जी!
कहानी बुनने के जुनून में क्या परिवार बिखर नहीं गया। जीवन पीछे नहीं छूट गया।' 'आरोहण' करती जिंदगी दर्द की द्घाटियों में पफंसी पड़ी है। रास्ते में बेबसी का यह कौन सा शिखर आ गया। नीचे उतर नहीं सकती। आगे कुछ सूझता नहीं।
नम आँखों में दर्द की परछाइयों के नाच के साथ आस्था की चट्टान भी है। प्रभावती जी को अपने पति पर अटूट भरोसा है। 'सागर-सीमांत' और 'आरोहण' के नायक-नायिकाओं को वह नहीं जानतीं। लेकिन खुद्दारी उनके भीतर कूट-कूटकर भरी है। वे बोल्ड हैं मगर अपने ढंग से। कुल्टी वाले मकान को बेचने की बात चलती है तो वे दो टूक कहती हैं-'जिनका मकान था, उन्होंने बेच दिया।' इशारा संजीव की ओर था।

पत्नी की न८ारों में हिन्दी का यह बड़ा कथाकार नाकारा है। किसी काम का नहीं। इसकी मति मारी गई है। उसके कई दोस्तों को समझाने का निहोरा-पाती कर चुकी। लेकिन 'बहेंगवा' के दोस्त उससे भी बड़े बहेंगवा साबित हुए। कई मंदिरों में देवताओं के आगे मन्नतें मांगीं। ओझा-गुनी को दिखाया। कोई पफायदा नहीं। एक बार तो सोते में संजीव के मुँह में किसी ओझा का दिया हुआ भभूत डाल दिया। इस उम्मीद में कि उनके ऊपर सवार लिखने का भूत उतर जाएगा। वो संजीव के लिखने की वजह किसी भूत-प्रेत की छाया मानती रहीं।
अजीब विरोधाभास है। संजीव द्घोर नास्तिक। मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक। धर्म को अपफीम मानने, तुलसीदास को गरियाने वाले। और उनकी पत्नी पूरी तरह से धार्मिक-आस्था की सीमा को पार कर अंधविश्वास की ८ामीन पर खड़ी। सहसा सब कुछ ठीक हो जाने के चमत्कार से ही शायद उम्मीद बरकरार है।

वह खास नजरों से संजीव को देखती हैं। उसमें प्यार भी है, शिकवा भी। संजीव के कथाकार मित्रा शिवमूर्ति ने कहीं लिखा है। पचास साल पहले की बात है। संजीव और प्रभावती की शादी हो गई थी। लेकिन वे इस शब्द का अर्थ भी नहीं जानते थे। दोनों का मिलना भी नहीं हो पाता था। दोस्तों-साथियों ने एक तरीका निकाला। संजीव को उस खेत में भेज दिया जाए जहाँ प्रभावती धान का बोझा बना रही थीं। दोनों ने मिलकर बोझा बनाया। बोझा बनाने की प्रक्रिया ही ऐसी होती है कि दोनों लोग बेहद करीब आ जाते हैं। साँसों को महसूसने की हद तक। इस क्षण की अनुभूति वही कर सकता है जो गाँवों में धान के बोझा बनाने की प्रक्रिया से अवगत हो। बोझा बन जाने के बाद प्रभावती ने कहा-'तनिक बोझवा उठाई दा।' वह दिन है और आज का दिन है। पचास साल का वक्त किन-किन मोड़ों और दर्द की किन-किन द्घाटियों से गुजर गया। संजीव और प्रभावती बोझा बना रहे हैं।

संजीव ने बोझा उठाने में मदद जरूर की। लेकिन बोझा को ढोने का कठिन काम प्रभावती के ही जिम्मे रहा। बोझा ढोते-ढोते बीमार पड़ गईं। संजीव भी बीमार। कंधे में हमेशा दर्द। आज वो यह निवेदन भी नहीं कर सकतीं-'तनिक, बोझवा उठाई दा।' चुपचाप कातर नजरों से पति को देखती हैं और न जाने क्या-क्या सोचते-सोचते बेहद उदास हो जाया करती हैं। हमें नहीं मालूम अब संजीव अपनी पत्नी को 'ए लब-लब' कहते हैं या नहीं। पहले कुल्टी में पत्नी को 'ए लब लब' संबोधन से पुकारते थे। पत्नी अनमना उठतीं-'अब का होई गवा।' वे समझाते 'लब-लब' माने प्यार ही प्यार। प्रभावती शरमा जातीं। लेकिन संजीव के कुछ दोस्त 'लब-लब' का अर्थ-'लबर-लबर' बोलने से लगाते। हमें भी नहीं पता 'लब-लब' का सही अर्थ।

आठ बाई दस की इस कोठरी में संजीव के एक मित्रा भी हैं-शिव कुमार यादव। कुल्टी के दोस्त। वे प्रभावती जी को सहज करने की कोशिश करते हैं। पुरानी बातें याद दिलाते हैं। प्रभावती जी के गुरुजी के बारे में कुरेदते हैं। कुल्टी, गाँव और दिल्ली के विषय में भी। दिल्ली को जितना संजीव नापसंद करते हैं-उससे कहीं हजार गुना अधिक वे नपफरत करती हैं। दर्दीला स्वर-''दिल्ली ने क्या दिया है, द्घुटनदार कोठरी-बंद गली और हम दोनों की बीमारी... अब न हम ठीक से जी-पाते हैं, न ई ठीक से लिख पाते हैं।''

न चाहते हुए भी कमरे के माहौल में उदासी द्घुल आयी। कुछ क्षण के लिए सब खामोश हो गए। मगर एक शख्स था जो लगातार मुस्कराए जा रहा था। वह थी संजीव की बड़ी बेटी मंजू। दुःखों-संकटों के बीच वह अक्सर मुस्कराया करती है। लोग कहते हैं उसका दिमाग खराब है। दुःख में रोना-छाती पीटना अकलमंदी। मुस्कराना पागलपन। अगर वह पागल है, मंदबु(ि है तो इस परिवार में वही सबसे ठीक है। वह एक ऐसा चिराग है जो अंधेरों में भी तेज हवाओं की परवाह किए बगैर हमेशा रोशन रहता है। मंजू परिवार का गमनाक हिस्सा नहीं, गमनाशक उजाला है।
संजीव के जीवन पर विहंगम दृष्टि डालते ही जगजीत सिंह की गायी एक ग़८ाल का मिसरा याद आता है-'कैसे-कैसे हादसे सहते रहे, हम जीते रहे और मरते रहे।' संजीव ने लिखा है कहीं-'कहानी जहाँ खत्म होती है, जीवन वहीं से शुरू होता है।' लेकिन बात हादसों की। तीन साल की उम्र में रोने पर तरह-तरह से बहलाकर चुप कराने वाले भैया को १९९४ में दिल का दौरा पड़ा। वे चल बसे। माँ मंझले बेटे की लाश को देखकर खुद को संभाल नहीं पायी। उसने भी अलविदा कह दिया। पिता भी ऐसी ही किसी कचोट में मरे थे।

संजीव को पढ़ाने वाले अनपढ़ काका अंधे-अपाहिज, मुपफलिस होकर कुएँ में गिरकर मरे। इस वामपंथी लेखक के प्रति विधाता, अगर वो है तो, उसकी नजरें वाम ही रहीं। बड़ी बिटिया मंजू बचपन से ही मंदबु(।ि उसके बाद वाली अंजू कड़क स्वभाव वाली। अपने अव्यवहारिक और स्वप्नजीवी पति के आचरण, को बर्दाश्त नहीं कर पाती। बार-बार गुस्से में माँ-बाप के पास लौट आती। भाभी प्रतिभा से भी बनती नहीं। बात-बात पर कलह। पिफलहाल पति के साथ पुणे में है। इकलौते बेटे को स्थायी नौकरी नहीं। ऐसे में कुल्टी की पफैक्ट्री का बंद होना। जमा-पूँजी से बनाए वहाँ के मकान को औने-पौने में बेचना। और अब पति-पत्नी को असाध्य बीमारी। बेरहम दिल्ली में जीवन-बसर। उनके मित्रा नरेन ने ठीक ही लिखा है-रचनाकार संजीव का असली 'वाटर लू' साबित हुआ है उनका पारिवारिक मोर्चा। लरजते स्वर में संजीव बोलते हैं-'मैंने इन लोगों को यथासाध्य अच्छी जिंदगी देने की कोशिश की। लेकिन पता नहीं कहाँ चूक हो गई मुझसे। कभी-कभी द्घर की स्थिति एकदम दयनीय बन जाती है-पत्नी सहयोग नहीं करती। द्घर काट खाने को दौड़ता है... जो कुछ लिखा, उससे बहुत ज्यादा संतोष नहीं है मुझे। काश दस साल चैन से लिखने को मिल जाते तो मैं कई महत्वपूर्ण कृतियाँ हिन्दी साहित्य को दे सकता था।'

मेरी तमाम रचनाएँ खोज का प्रतिपफल हैं। इस कोशिश में नियति पागल कुतिया की तरह पीछे पड़ी रही। ऐसा कहने वाले संजीव या सजीवन प्रसाद भले ही समाज के हाशिए पर पड़े लोगों के लिए यथार्थ का संजीवनी लाए हो। पर वे किसी को नया जीवन दे पाए इसका दंभ नहीं है। अलबत्ता उनको यह पीड़ा भी है-मैं संजीवन प्रसाद किसी के लिए संजीवनी बना या नहीं क्या पता। मगर यह सच है कि मेरा एक कोना मूर्च्छित पड़ा है, उसके लिए कहाँ है संजीवनी? कौन लाएगा उसे? निजी और साहित्यिक दोनों ही जिंदगियों में वे नकारे जाने के जहर को पी रहे हैं और 'शिव' भी नहीं बन पाए?

कहानियाँ लिखते-लिखते कब खुद की जिंदगी ही एक दर्दनाक कहानी बन गयी इसका इल्म ही नहीं हुआ? ऊपर वाला सबसे बड़ा बागवान है, पता नहीं किस पौधे को कहा से उखाड़े और कहाँ रोप दे? संजीव का जन्म कुम्हार टोले में हुआ है। उन्होंने बचपन से ही मिट्टी को रौंदे जाते, उसको चाक पर चढ़ते और उसे किसी शक्ल को अख्तियार करते देखा होगा? थोड़ा बड़े होने पर पद भी जरूर सुना होगा-'माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे, एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय।' संजीव ने बचपन में माटी को खूब रौंदा। जीवन भर माटी से जुड़े रहे। माटी से जुड़े रचनाकार की ही पहचान है उनकी। तो क्या मान लिया जाए कि माटी अब उन्हें रौंद रही है? माटी से जुड़े होने का यह इनाम है, नियति या प्रारब्ध? माटी मतलब सच। जीवन का यथार्थ। संजीव ने सच को जिया। सच ही लिखा। कामू के उस महत्वपूर्ण कथन की परवाह किए बिना-'सिपर्फ सच उस प्रकाश की भांति है जो आँखें चौंधिया देता, अन्य कुछ देखने नहीं देता। जबकि झूठ उस मनोरम धुंधलके की भांति है जो यथार्थ को उभारकर रख देता है।' लेकिन संजीव इन दिनों अपनी कहानियों में इसी मनोरम धुंधलके को गढ़ने में लगे हैं। काश वे इसे जीवन में लागू कर पाते। २४ कैरेट जीवन जीने वाला क्या निराला, मुक्तिबोध, शैलेश मटियानी, अमरकांत की परंपरा की कड़ी बनता है?

प्रताप विहार के गली नंबर ८ से महज एक किलोमीटर आगे बढ़ने पर मयूर विहार पफेज वन के वे अपार्टमेंट हैं जहाँ हिन्दी के कई नामी-गिरामी लेखक रहते हैं। उनमें से कई हिन्दी के लेखक होने के साथ महंत की गद्दी पर भी आसीन हैं। वे बेहतर ढंग से जी रहे हैं। आधे से ज्यादा करोड़ रुपये वाले फ्रलैट में हैं, गाड़ी है, समृ(ि है, खुशहाल परिवार है। सब कुछ ठीक-ठाक है। लेकिन वहाँ शायद २४ कैरेट वाली शु(ता नहीं है। आज के जमाने में खांटीपन पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया गया है और सच का रास्ता पागलखाने या गली नंबर ८ की ओर जाता है जहाँ बाहर लिखा होता है-संजीव, 'हंस'। दोनों, दो चीजें। संजीव जमीन पर हैं, हंस उड़ता है, मानसरोवर में तैरता है। अपने डैने पफैलाकर शिखर पर जा पहुँचता है।

बचपन में सहपाठी सूरज के साथ संजीव प्रधानमंत्राी को देश के हालात के बारे में खूब खत लिखते थे। अब सूरज भी नहीं रहे। न वे दिन। उम्मीदों से भरे। मुट्ठी खुल चुकी है। खत लिखें भी तो किसे? वर्ल्ड बैंक के उस नौकर को जो इस वक्त देश का प्रधानमंत्राी बन बैठा है? जो और महंगाई झेलने के लिए तैयार रहें की मुनादी करता है। संजीव को भैया डॉक्टर, इंजीनियर बनाना चाहते थे। प्रधानमंत्राी को पत्रा लिखते-लिखते बन गए लेखक। बकौल संजीव-''पहले मैं कहानियाँ लिखा करता था, अब कहानियाँ मुझे लिख रही हैं।'' और दर्द की स्याही में डुबो कर लिख रही हैं।

न्यूनतम सुविधाएँ मांगीं, नहीं मिलीं। न्यूनतम समय मांगा, वह भी मयस्सर नहीं। सपने भी देखे, तो कैसे? अपनी जमीन पर एक छोटा सा मकान हो, पफूलों-पत्तों की क्यारी हो? एक टाइपराइटर हो कहानी लिखने के लिए? क्या यह 'गोदान' के होरी के उस सपने की याद नहीं दिलाता कि उसकी अपनी एक गाय हो? पूरा उपन्यास 'गाय' को पाने की महत्वकांक्षा और उस महत्वकांक्षा के त्राासदी में बदल जाने की कथा नहीं है? क्या संजीव हमारे समय के होरी हैं? इतने बड़े लेखक की मामूली इच्छाएँ भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। लगता है केवल समय की नदी ही प्रवाहित हुई है- उसमें बदला कुछ भी नहीं है-न व्यवस्था, न होरी का सपना, न उस सपने की नियति। हम उस दौर में जी रहे हैं जो होरियों का नहीं, मनमोहनों का है? संजीव जैसे संवेदनशील लोगों के लिए तो इसमें तनिक भी जगह नहीं। यह प्रकाश के उदय होने का दौर है? सहसा संजीव मुस्कराते हैं-'जिंदगी तुझे बस ख्वाब में देखा है हमने'।

संजीव को भोर से बेहद लगाव है। वे जनरल डिब्बे में यात्राा करते वक्त इस आशंका से सो नहीं पाते थे कि पौ पफटना नहीं देख पाएँगे। सुबह का आकर्षण उनके लिए जादुई होता है। वे समाज में भी नई सुबह चाहते हैं। खुद के जीवन में भोर का इंतजार तो है ही। यह इंतजार बहुआयामी है। लेकिन इसका क्या किया जाय कि रात है। अंधेरा है। भोर नहीं। सिपर्फ उसका इंतजार है। माहौल में मायूसी है। जीवन में भी। लेकिन जीत का जज्बा अपनी जगह कायम है। अथक यो(ा की तरह संजीव हारे नहीं। सुबह देखने और सुबह लाने का हठ यथावत है। और उन आँखों में सुबह की उम्मीद भी। साहिर के शब्दों में 'वह सुबह कभी तो आयेगी...।'

 
 
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