स्वाति अग्रवाल सिंह

अमलतास !

अमलतास के गहरे सूर्ख पत्ते
अब मुझे नहीं डराते।
 हुलस के झूमझूम के कहते हैं
लहको ,लहक उठो।
बिना तिल-तिल जले
कोई भी चीज़
रोशनी और प्रकाश नहीं देती
मलबे के नीचे दबे हुए
तुम सुरक्षित नहीं हो
हवा और रोशनी से टूटकर
और भी दबते हुए
तुम दफ़्न हो जाओगे।

मिठास कोई स्वाद नहीं
ख़ुशी कोई  दौलत नहीं
तल्ख़ी और जलन
देती है मुझे ....

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