सुभाष पाठक 'ज़िया'

तू चाहता है जो मंज़िल की दीद साँकल खोल

तू चाहता है जो मंज़िल की दीद साँकल खोल

सदायें   देने   लगी  है  उमीद   साँकल खोल

तुझे ख़बर भी नहीं कब गुज़र गया इक दौर

क़दीम  था वो मैं दौरे जदीद साँकल खोल

बड़े  मज़े  में  उदासी  है   बंद  कमरे  में

मगर हँसी तो हुये है शहीद साँकल ख....

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