महिमा श्री

हम नै छुवै

दोपहर केचार बजे रहे होंगे।जब हमारे घर का कॉल बेल किसी ने बजाया।“ओम जय जगदीश हरे” की गूंज पूरे घर में तैरने लगा।मैं उपन्यास में सर गड़ाये इंतजार करती हूँ।माँ तो दरवाजा खोलेंगी ही।तब तक दूसरी बार वेल  तेजी से बज जाती है। इस बार पहले से भी ऊँची आवाज में ओम जय जगदीश हरे बजने लगता है। मेरा मन इस अनावश्यक धुन के असमय बज जाने से खीज उठा।माँ से कई बार कह चुकी हूँ कि घर में चौबि....

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