दीर्घ नारायण

मेरी भी सुनो डार्विन

ठीक है, मैं पांच घंटे से इस थाने में कैद हूं, इसका अर्थ यह नहीं कि एक लड़की पर गंदी-गंदी फब्तियां कसी जाएं। सिपाही, मुंशी, दारोगा जिसे देखो, महिला लॉकअप के सामने से बेवजह गुजरते रहते हैं, मुझ पर ऐसी नजरें फेंकते हैं जैसे कोई बर्गर हूं, अभी लॉकअप से निकालेगा और रेपर उतार कर अभी चट कर जाएगा। उनका थाना है, मेरे सामने से बार-बार गुजरे, मैं कैसे आपत्ति कर सकती हूं_ उनकी आंखों हैं, मेर....

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