भूमिका द्विवेदी अश्क

राज़दारी

आज हारून मियां की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. दिल में अरमानों के फूल तो क्या पूरे-पूरे बागीचे ही खिले हुये थे. उनकी ज़िन्दग़ी आफ़ताब की तरह जगमगा रही थी. उनके रोयें-रोयें में हरियाली की फ़सल लहलहा रही थी. उनकी तजुर्बेकार आंखों और उनके मुर्झाये हुये ज़ईफ़ चेहरे पर छाया हुआ ताज़ा नूर उनकी खुशियों की अनगिनत कहानियां जो बयान कर रहा था. और ऐसा होता भी क्यों ना, सिर से पांव तलक़ कर्ज़े में डूबे, ....

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