दिव्या शुक्ला

देहदंश 

इस बार दिल्ली प्रवास कुछ लंबा हो गया था | साल में एक दो बार और वो भी बड़ी मुश्किल से मै दिल्ली आती हूँ | एक बार आने के बाद तो जैसे कोई कैदी कस्टडी में हो वही हाल मेरा भी होता है |ये बदमाश बच्चे जल्दी टिकिट ही नहीं कराते बस आजकल -आजकल करते रहते है | लोग कहते हैं दिल्ली दिलवालों का शहर है पर मुझे नहीं लगता यहाँ लोगों के पास दिल जैसी कोई चीज़ है भी | जहाँ तक मुझे लगता है यहाँ लेने -देने वाल....

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