आनंद गुप्ता

इन दिनों नींद

किसी छोर से आरंभ करने की कोशिश
एक अंधी गुफा में हमें छोड़ आती है
अंधेरा हमें जकड़ना चाहता है
करवटें मन को थकाती हुई
कोई दिलासा नहीं दे पाती
इंतजार सूइयों सी बोझिल आंखों में चुभती है

रात और सुबह के बीच
नींद किसी मकड़जाल में फंसा छटपटा रहा है
मन अमेजन का जंगल बन गया है
और तन रेगिस्तान
जहां मंजिल से कहीं अधिक भटकाव है

अनगिनत यात्रा हैं
....

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