निशांत राज

ढूंढ रही है

दूब-शिखा पर अश्रु बहाती ओस-कण
सूखे  पेड़ की डाल से चिपका रज-कण संग समीर
बेमंजिल भटकता डाल से टूटा पात
और, चट्टानों से टकराकर
अपना अस्तित्व खोती लहरें
कर रही हैं अन्तर्नाद
और ढूंढ रही हैं
उस मसीहा को
जो बयां कर सके
उसकी भी वेदना को
उसी वेदना के संग
जिसकी टीस तार-तार कर रही
पल-पल उसके अंतर्मन को!
लाक्षागृह की राख  मे खाक हुए
गुमना....

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