कृष्ण बिहारी

कुछ खुले-खुल, कुछ ढंके-ढंके ‘शील साहब-2’

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो कई बार देखना।
निदा फाजली का यह शेर पिछले पचीस साल से तो मेरी जानकारी में है लेकिन अब भी मैं मनुष्य को उस संदेह से देखने की निपुणता हासिल नहीं कर पाया हूं जिसकी चर्चा निदा फाजली ने अपनी गजल के इस शेर में की है। शील साहब को तो मैंने 37 साल पहले देखा था। वे रहस्यमय थे। कुछ खुले-खुले, कुछ ढंके-ढंके। शील साहब को मैं देख तो रहा था ले....

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