प्रखर पांडेय

आदमखोर

नहीं कोलाहल नहीं शोर-गुल
रहा टहल गली में शार्दूल।
हों गोरू, शुनक या नर, नभचर
नहीं देख इसे कोई व्याकुल!

घुटक तिरस्कार, मूंद नख -प्रखर, 

पड़े अचरज में वनराज बड़े। 

यहां मन हैं निडर, तन स्थावर
कल होते थे जो भाग खड़े।

यह काया प्रचंड, भर नभ-गर्जन,
करती अनेक बस्तियां निर्ज....

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