डॉ. भारती अग्रवाल

पितृसत्तात्मक समाज के पायदान पर ‘वह कोठेवाली है’

आज हम इक्कीसवीं सदी के उत्तरआधुनिकता युग में जी रहे हैं। जहाँ लिव इन रिलेशनशिप, विवाहेत्तर संबंध, जिगालो पर हम सरलता से बात कर लेते हैं। ऐसे समय में हम वेश्या शब्द बोलने पर भी झिझकते हैं। जिसका सीधा और स्पष्ट कारण है कि आज भी वेश्या, समाज का अंग होते हुए भी समाज द्वारा स्वीकारी नहीं गई। समय-समय पर वेश्या जीवन पर कहानी और उपन्यास लिखे गए परन्तु फिर भी इस पर व्यापक विचार-विमर....

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