विनोद शाही

आलोचना की नयी पाठ पद्धतियां

" शिशिर कणों से लदी हुई, कमली के भीगे हैं सब तार
पश्चिम का चलता है मारुत,  लेकर शीतलता का भार
भीग रहा है रजनी का, वह सुंदर कोमल कबरी भाल
अरुण किरण सम कर से छू लो, खोलो प्रियतम, खोलो द्वार।"

1914 में प्रकाशित जयशंकर प्रसाद की इस कविता से हिंदी जगत में छायावाद ने दस्तक देकर कहा था - 'खोलो द्वार'। 
कविता को खुल कर अपनी अभिव्यक्ति करने से द्विवेदी....

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